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राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित’ का एक अंश
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Posted: December 07, 2023
पुस्तक अंश : इंतजार हुसैन का उपन्यास 'बस्ती'
Read moreराजकमल ब्लॉग में आज पढ़ें, पाकिस्तान के शीर्षस्थ कथाकार इंतिजार हुसैन के उपन्यास ‘बस्ती’ का एक अंश। विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह उपन्यास मानवीय संवेदनाओं का एक महाआख्यान है। इस उपन्यास के लिए लेखक को पाकिस्तान के सबसे बड़े पुरस्कार ‘आदमजी एवार्ड’ से सम्मानित किया गया, जिसे उन्होंने वापस कर दिया।
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महार जाति में पैदा होनेवाला आदमी इतना तेजस्वी हो सकता है, इस बात पर मुझे विश्वास ही न होता। उजला व्यक्तित्व, ऊँचा माथा। पूरे सूर में थे। सिर पर हैट भी। परन्तु उनका चेहरा बीमारी के कारण बहुत क्लान्त दिख रहा था। उन्हें पैरों में तकलीफ़ थी। चलते समय दूसरे लोगों की मदद लेनी पड़ती। एक बार कुलाबा में घूमते हुए मैंने देखा कि बाबासाहब धीरे-धीरे छड़ी के सहारे नीचे उतर रहे हैं। हम लड़के बाबासाहब को ऐसे देख रहे थे, जैसे कोई महान आश्चर्य देख रहे हों।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, मराठी के शीर्षस्थ दलित लेखक दया पवार के आत्मकथात्मक उपन्यास ‘अछूत’ से एक संस्मरणात्मक अंश।...मैंने बाबासाहब को बहुत बचपन में देखा था। स्पष्ट याद न रहते। बोर्डिंग में जब था, तब ख़बर आती है कि बाबासाहब
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Posted: November 17, 2023
ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन'
Read moreअगले दिन सुबह से लेकर दोपहर तक कोई चूल्हा नहीं जला था। बरसात ने फाकों की नौबत पैदा कर दी थी। जीवन जैसे पंगु हो गया था। लोग गाँव भर में घूम रहे थे, कहीं से कुछ चावल-गेहूँ मिल जाए तो चूल्हा जले। ऐसे दिनों में उधार भी नहीं मिलता। दर-दर भटककर कई लोग खाली हाथ आ गए थे। पिताजी भी खाली हाथ ही आ गए थे। उनके चेहरे पर बेबसी थी। सगवा प्रधान ने अनाज देने की शर्त भी रख दी थी। अपने किसी लड़के को सालाना नौकर रख दो, बदले में जितना अनाज चाहो ले जाओ।
ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनकी आत्मकथा जूठन का एक अंश। इसमें बरसात के दिनों में दलित बस्तियों की दुर्दशा का वर्णन है।
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1962 के साल में खूब बारिश हुई थी। बस्ती में सभी के घर कच्ची मिट्टी से बने थे। कई दिन की लगातार बारिश ने मिट्टी के घरों पर कहर बरपा दिया था। हमारा घर जगह-जगह
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आमतौर पर हमारा समाज-मन एक प्रश्नहीन आनुगत्य चाहता है, और इसलिये कोई भी जिज्ञासा, कोई भी समालोचना, कोई भी भिन्नमत फौरन प्रबल विरूपता, या लगभग आक्रोश ही उत्पन्न कर देता है और ऐसे में विभिन्न विचारों और समन्वय में से होते हुए सामने की ओर अग्रसर होने वाला पथ अवरुद्ध होता जाता है।
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मान लीजिए, रवीन्द्रनाथ की कविताएँ आपको अच्छी लगती हैं, लेकिन मुझे नहीं लगतीं। आपको लगता है कि नि:संग किसी फुर्सत के समय को भी जिस तरह वे कविताएँ आनन्द से भर सकती हैं, ठीक उसी तरह जीवन के अत्यन्त प्रखर संकटपूर्ण क्षणों में भी उनसे वैसा ही आश्वासन मिल सकता है, वे कविताएँ आपके समूचे जीवन की साथी बन सकती हैं, यहाँ तक कि मृत्यु के क्षण में भी आश्रय बन सकती हैं। ‘कविकाहिनी’ से ‘अन्तिम रचना’ तक एक कवि के उन्मोचन और विकास की छवि देखते-देखते सम्भवत: आप स्तब्ध हो जाते हैं, हो सकता है उनकी विभिन्न स्तर की कविताओं को पढ़ते-पढ़ते आपको बुद्धदेव बसु के ‘कविता की सात सीढ़ियाँ’ शीर्षक वाले लेख की याद हो आती हो, जहाँ बुद्धदेव ने बताना चाहा था कि
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Posted: September 15, 2023
मैयतों और क़ब्रों के बीच जनमती-पलती ज़िन्दगियों की कहानी
Read moreआजकल इस लड़की को भी पाँख निकल आए थे। यह भी छोटी की तरह इन दिनों लहराती रहती थी। बात-बेबात ज़ुबान चलाती रहती। इसकी भी गज भर की ज़ुबान निकल गई थी। झूठ तो इस सफाई से बोलने लगी थी कि रसीदन को उस पर अब रत्ती भर भरोसा नहीं होता था। पहले बे-परवाह रहती थी, पर इन दिनों उसे भी छोटी की तरह हर घड़ी आईने के सामने खड़ा रहने का रोग लग गया था। ठीक है। होता है इस उम्र में, पर इसका मतलब यह नहीं कि बिना आगा-पीछा देखे जो जी में आए करो और दूसरों की आँखों में धूल झोंकती रहो। -
Read moreमहादेवी वर्मा की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, 'विचार का आईना' शृंखला में उन पर एकाग्र पुस्तक की समीक्षा। इसमें उनके कला, साहित्य और संस्कृति के बारे में विचारों पर दृष्टि डालने का प्रयास किया गया है।
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Read moreमहात्मा गाँधी कहते हैं: “स्त्री को चाहिए कि वह स्वयं को पुरुष के भोग की वस्तु मानना बन्द कर दे। इसका इलाज पुरुष की अपेक्षा स्वयं स्त्री के हाथों में ज्यादा है। उसे पुरुष की ख़ातिर, जिसमें पति भी शामिल है, सजने से इनकार कर देना चाहिए। तभी वह पुरुष के साथ बराबर की साझीदार बन सकेगी।”
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Read more‘‘इस छल और कपट के भार को लेकर तुम कैसे सो सकोगी ? जब तक तुम अपना अपराध स्वीकार न कर लोगी, तब तक तुम्हें शान्ति न मिलेगी। तुमने जो कुछ किया है, वह पाप है, एक जघन्य पाप ! उस पाप को तुम बिना प्रायश्चित किए न धो सकोगी। आज तुमने जो कुछ कर डाला है, उसे तुम्हें प्रोफेसर को बतलाना ही होगा।’’