साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2025 से सम्मानित ममता कालिया की संस्मरणात्मक कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ का एक अंश
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पिछले चार-पाँच बरसों से ऐसा हो रहा है। जब भी कहीं कोई इलाहाबादी हमसे टकराता तो सारी ख़ैरियत के बीच हम शहर की ख़ैरियत ज़रूर पूछते, “और बताएँ, इलाहाबाद का क्या हाल है!”
इलाहाबादी कहता, “क्या बताएँ, शहर का नक्शा एकदम बदल गया है। ये ऊँची-ऊँची इमारतें बन गई हैं और अभी बननी जारी हैं। सारा दिन बालू-सीमेंट उड़ाती धूल भरी आँधी चलती है। सड़कों की शान फ़ना हो गई है, लोग अपनी हरियाली बेच कर ख़ुशहाली ख़रीद रहे हैं।” हम भी बेचैन हो जाते, ‘यह अपने अलमस्त शहर को क्या हो गया। वहाँ टैगोर टाउन और लूकरगंज में बँगले से बड़ी बारादरी और बारादरी से बड़ा लॉन हुआ करता। वहाँ रहने वालों के घर जब उत्सव-आयोजन होते, उन्हें कोई जलसाघर लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सारा काज अपने द्वार पर निपट जाता।’ व्यग्रता थमने पर हमें अहसास होता कि हमारा डर निर्मूल है। इलाहाबाद का हाल और माहौल ईंट-गारे से न कभी बना न बनेगा। शहर की ऊपरी सतह पर चाहे जितनी मंज़िलें चढ़ जाएँ, उसकी अन्दरूनी ख़ूबसूरती नष्ट नहीं होगी।
इलाहाबाद साहित्य, संस्कृति, कला और इतिहास का नगर है। ये सम्पदाएँ सैकड़ों साल से यहाँ मौजूद हैं। पीढ़ियाँ बदल जाएँ, संवाद-विवाद गतांक से आगे बढ़ जाएँ किन्तु इलाहाबाद की इयत्ता स्थापित रहेगी। भारतीय राजनीति में भी इलाहाबाद का अन्नप्राशन काम आता है। मँजे हुए राजनेता वे ही व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने यहाँ के हवा-पानी में साँस ली है। यहाँ के विश्वविद्यालय के छात्र संघ का चुनाव, राजनेता की पहली मंज़िल रहा है। कुछ तो ख़ास है यहाँ के मिज़ाज में कि यहाँ सत्ता पक्ष की राजनीति की जगह प्रतिपक्ष की राजनीति ही पनपती है। साहित्य में भी विरोध और प्रतिरोध की घोषणा यहीं से आरम्भ होती है।
भैरव जी, मार्कण्डेय जी, अमरकान्त जी और शेखर जी के बाद साठोत्तरी पीढ़ी ने यहीं रह कर अपने पैर जमाए और नई कहानी की शक्तिशाली त्रयी—मोहन राकेश, कमलेश्वर तथा राजेन्द्र यादव के किले को ध्वस्त किया। कहानी के कल्पतरु की उपशाखा बनने की बजाय साठोत्तरी कहानीकारों ने अपना अलग वृक्षारोपण किया। इतने बड़े-बड़े विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हो जाते हैं जिनमें मूल समस्या का समाधान नहीं निकलता, वहीं एक हिन्दी कथा-समारोह में, सन् 1965 में कलकत्ते में यह तथ्य स्पष्ट हो गया कि कहानी में नई कहानी के युग का पटाक्षेप हुआ। इस तेवर और तैयारी के पीछे इलाहाबाद की पृष्ठभूमि और अग्रगामिता थी।
ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया ने नई कहानी की फॉर्मूलाबद्धता के ख़िलाफ़ अपनी ताज़ा, मौलिक रचनाओं से जिहाद छेड़ा। दूधनाथ सिंह बलिया से आए किन्तु उनकी शिक्षा इलाहाबाद में हुई और यहीं उनकी वैचारिकता निर्मित हुई। ज्ञानरंजन खाँटी इलाहाबादी हैं। काशी जी रहते बनारस में हैं पर जब भी इलाहाबाद आते, यहाँ रम जाते। रवीन्द्र कालिया कई शहरों की ख़ाक छान कर इलाहाबाद पहुँचे और यहीं के होकर रह गए। इस शहर में रचना करना बड़ी मुमकिन सी बात है। दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन और रवीन्द्र कालिया ने अपनी तमाम यादगार कहानियाँ यहीं लिखीं। दूधनाथ सिंह ने जटिल फंतासी के ज़रिए, ‘रक्तपात’, ‘रीछ’, ‘स्वर्गवासी’ जैसी कहानियों में भयावह यथार्थ का शोध किया। ज्ञानरंजन की सभी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ इलाहाबाद में सम्भव हुईं जैसे ‘दाम्पत्य’, ‘यात्रा’, ‘घंटा’ और ‘बहिर्गमन’। काशीनाथ सिंह ने बनारस में रहते हुए इलाहाबादी लेखकों की टक्कर की कहानियाँ लिखीं—‘अपना रास्ता लो बाबा’ और ‘कविता की नई तारीख़’ आदि।
रवीन्द्र कालिया ने शहर में रानी मंडी की गली में जीवन के अनेक रंग देखे जो उनकी कहानियों—‘गरीबी हटाओ’, ‘टाट के किवाड़ों वाले घर’, ‘पनाह’ और ‘नया कुरता’ में व्यक्त हुए। इन रचनाओं ने कहानी सृजन का पैमाना तय कर दिया और तापमान भी। इससे यह न समझा जाए कि ये कहानीकार हर वक़्त काग़ज़-कलम लिए बैठे रहते थे। इन सब में ज़िन्दगी जीने की अदम्य आग थी। दो पहिया वाहन तक उपलब्ध न होने पर भी ये शहर का कोना-कोना छान मारते। इलाहाबाद में पैदल चलना कभी भी निरुपायता का पर्याय नहीं था।
‘मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले’ वाले अन्दाज़ में इन सबके लिए शम्भू बैरक, लूकरगंज और रानी मंडी से सिविल लाइन्स तक टहलते हुए निकल जाना मामूली सी बात थी। काशी जी तो दूर थे पर इन तीनों में सबसे शाहदिल ज्ञानरंजन थे। उनकी जेब में जैसे छेद था। वे ख़र्च करने में सबसे अव्वल रहते। उनके आसपास दोस्तों का जमघट भी सबसे ज़्यादा लगता। सिविल लाइन्स में एक मिठाई की दुकान थी ‘मुरारी’। कॉफ़ी हाउस की बजाय ज्ञान जी यहीं महफ़िल जमाते। ‘मुरारी’ का मालिक शायद ज्ञान जी की मुहब्बत में गिरफ़्तार था। वह बिना एतराज़ चाय के बेहिसाब प्याले ऊपर की मंज़िल पर भिजवाता रहता। लेखकों, ग़ैर-लेखकों से सजी यह महफ़िल तब तक चलती जब तक ‘मुरारी’ के बन्द होने का वक़्त न हो जाता। ‘मुरारी’ से जुड़ा एक और क़िस्सा याद आया। इस वाक़िये पर आज भी मन उद्विग्न हो जाता है।
दरअसल रवि बम्बई में धोखा खाकर, प्रताड़ित होकर पूरी इस तैयारी से आए थे कि जैसे भी हो इलाहाबाद में पैर जमाने हैं। उनके विपरीत मैं पैर पटकती, इलाहाबाद पहुँची थी। मुझे बम्बई की रफ़्तार रास आई थी। धोखे मेरे साथ भी हुए थे, मैं फिर भी वहाँ रहना चाहती थी। नौकरी छूटने पर, जब मैं मुम्बई से इलाहाबाद पहुँची तो एक बड़े शहर से छोटे, लद् धड़ शहर में आने की उदासी के साथ-साथ घर चलाना बड़ी चुनौती था। चौक का मकान घर से ज़्यादा गोदाम था। समस्त दीवारें तारकोल से पुती हुईं कि दीमक न लगे। नीचे छापाख़ाना ऊपर बेढंगे कमरों में रिहाइश। मकान मालिक जो इस छापेख़ाने के मालिक भी थे उन्होंने इस ऊपरी हिस्से में अपना पुस्तक गोदाम बना रखा था। हमारे लिए अन्यत्र घर लेना सामर्थ्य से बाहर था सो यहीं डेरा जमाया। मकानमालिक ने आँगन पार करके एक बड़े कमरे में रसोई के लिए एक प्लेटफॉर्म बनवा दिया था, बस। नीचे रवि के ऑफ़िस में चाय ले जाने के लिए रसोई से आँगन, गलियारा, कमरा पार कर ऊँची-ऊँची अँधेरी सीढ़ी उतरनी पड़तीं। हमारी कुकिंग गैस भी अश्क जी के यहाँ काम आ रही थी सो माँगते नहीं बन रही थी। स्टोव पर, अँगीठी पर मैंने कभी काम नहीं किया था।
मैंने बहुत से परिचितों, दोस्तों से एक घरेलू सेवक के लिए कह रखा था। घर के कामों में मदद कर दे, बाज़ार का फेरा लगा दे, और नीचे रवि के दफ़्तर में चाय पहुँचाता रहे तो जीवन जीने लायक़ बने।
एक शाम सिविल लाइन्स की मिठाई की दुकान ‘मुरारी’ में हम सब बैठे हुए थे—यानी ज्ञानरंजन, सतीश जमाली, शैलेश मटियानी, अमर गोस्वामी, रवि और मैं। और भी दोस्त थे, नाम याद नहीं आ रहे। यह ज्ञान जी का प्रिय अड्डा था। नीचे दुकान में मिठाई बिकती, ऊपर चाय पीने के लिए कुर्सी-मेज़ थी। जो लड़का चाय लेकर आया, बड़ा ख़ूबसूरत, भोला-भाला पहाड़ी बालक था। उम्र मुश्किल से तेरह-चौदह। मटियानी जी ने बात शुरू की “कहाँ के हो, कब आए?” ज्ञान जी ने पूछा, “यहाँ क्या मिलता है?” “पन्द्रह रुपए और खाना।” लड़के ने बताया। ज्ञान जी ने कहा, “पच्चीस रुपए पर काम करोगे?”
लड़का भौचक ज्ञान जी की तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, “अगर हमसे कप-प्लेट टूटेगा, तो पैसे तो नहीं काटोगे?” ज्ञान जी ने आश्वस्त किया, “कुछ नहीं कटेगा। यहाँ सैकड़ों लोगों का काम करते हो, घर में सिर्फ़ दो लोगों का काम होगा।”
लड़के ने थोड़ी देर सोचा, फिर कहा, “अभी मालिक हमको सौंफ लेने बाहर भेजेंगे। हम चौराहे पर मिलेंगे।”
हम सब सिविल लाइन्स के चौराहे पर इन्तज़ार करने लगे।
वादे के मुताबिक लड़का आया।
अमर गोस्वामी ने उसे अपनी साइकिल के कैरियर पर बिठाकर हमारे घर पहुँचाया।
उस लड़के की भोली-भाली सूरत ने हमारा मन मोह लिया। जगदीश नाम के इस लड़के को सब्ज़ी काटना, चाय बनाना, बिस्तर बिछाना सब आता था। सबसे बड़ी बात, वह ऊपर-नीचे के दसियों चक्कर लगाता। बहुत जल्द जगदीश हमारे लिए घर का सदस्य बन गया। दोस्तों के आने पर वह झट ऊपर जाकर चाय बना लाता। जगदीश प्रेस के कर्मचारियों से भी हिल-मिल गया। कुछ महीने बाद जगदीश को गाँव की याद सताने लगी। वह कहता, “मुझे घर जाना है। तीन साल से मैं घर नहीं गया।”
मैं कहती, “साल भर बाद जाना। तब तुम्हारे हाथ में कुछ रुपए भी हो जाएँगे।”
एक शाम हमें अश्क जी के यहाँ जाना था। जगदीश ने बताया घर में सब्ज़ी एकदम ख़त्म है। मैंने उसे पैसे दिए और चाभी का गुच्छा कि वह ताला लगा कर बाज़ार जाए और लौट कर अपना खाना बना कर खा ले। अश्क जी कभी भी हमें बिना खाना खिलाए नहीं भेजते थे।
हम रात दस बजे घर लौटे। ताला बाहर से बन्द था। हमने अपनी चाभी से फाटक खोला तो ड्योढ़ी में चाभियों का गुच्छा पड़ा मिला।
रवि ने फ़ौरन कहा, “लगता है जगदीश पहाड़ चला गया। देखो कितना सच्चा है। ताला लगा कर चाभियाँ अन्दर डाल गया।”
यह तो ऊपर जाकर पता चला कि लड़का चोरी करके भागा था। कमरे से रुपए, ट्रांजिस्टर, रवि की हाथ घड़ी और लोहे के ट्रंक से घर की कुल सम्पदा तेरह सौ रुपए उसने उड़ाए थे।
हम सन्न रह गए। हानि से अधिक यह धक्का था जो हमारे विश्वास को लगा।
अगले दिन जिसने भी सुना यही कहा कि पुलिस में रपट लिखाओ। लड़के को पूरे घर की जानकारी है, वह फिर कभी चोरी कर सकता है। अतरसुइया थाने में हमने रपट लिखवाई। दो घंटों में पुलिस ने उसे बरामद कर लिया। हम सोच रहे थे अब पुलिस इसे हमारे हवाले कर देगी पर पुलिस ने इनकार कर दिया। जगदीश को हवालात में बन्द कर दिया गया।
घर लौट कर रवि एकदम उदास हो गए। उन्होंने उस दिन खाना भी नहीं खाया। कहने लगे, “पता नहीं पुलिस ने जगदीश को कितना पीटा होगा। कहीं वह मर न जाए।”
मेरा मन भी कच्चा हो रहा था जैसे हमारे हाथों अपराध हो गया।
दो-तीन दिन बाद साहस करके हम थाने पहुँचे तो पता चला जगदीश को किसी बाल सुधार गृह में भेज दिया गया। हम बेहद उदास हो गए।
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मिर्ज़ा ग़ालिब की जीवनी लिखने वाले रचनाकार, स्वाधीनता-सेनानी रामनाथ ‘सुमन’ का लूकरगंज में बहुत विस्तृत और विशाल बँगला था। वह चारों तरफ़ हरियाली से भरा रहता। कथाकार मित्र ज्ञानरंजन इन्हीं सुमन जी के मझले सुपुत्र हैं। ज्ञान जी का िज़क्र आया तो यह चंद सतरों में क़ैद नहीं किया जा सकता। विलक्षणता के अपने वलय होते हैं। सन् 1970 के ज्ञानरंजन को हम बेधक रचनाकार, बेधड़क इनसान और बेमिसाल दोस्त की तरह जानते थे। मैंने उन्हें सुनयना के साथी और पाशा के पापा की भूमिका में भी देखा और सराहा। पिता के बड़े से बँगले में ज्ञानरंजन फ़क़ीर की तरह बसते थे। गर्मी की दोपहरें वे अपने घर के ठंडे कमरों में नहीं बल्कि प्लाज़ा बिल्डिंग की दुकान पेट्रोला में गुज़ारते। कभी हम सब रानी मंडी में मिल बैठते। रवि तो लगातार सिगरेट होंठों से लगाए होते। कभी-कभार ज्ञानरंजन भी सिगरेट आज़माते। उनके बेटे पाशा के अन्दर सिगरेट को लेकर दिली दहशत थी। ज्ञान जी जैसे ही सिगरेट का पहला कश लेते, पाशा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगता, “पापा फू पियो ना। पापा फू नहीं पीना।” ज्ञानरंजन उसी वक़्त सिगरेट मसल कर बुझा देते।
आप पूछ सकते हैं ज्ञानरंजन तो जबलपुर में काम करते थे, उन्हें इलाहाबादी क्यों समझा जाए? ज्ञान जी जबलपुर में सिर्फ़ नौकरी करते थे। उनका मन इलाहाबाद में रहता था। यहीं उनकी यारी-दोस्ती थी, यहीं घुमक्कड़ी-छुट्टियाँ ख़त्म हो जातीं, ज्ञान जी की तफ़रीह ख़त्म न होती। दोस्तियाँ और अदावतें धारावाहिक चलती रहतीं। सच और सही के लिए अड़ने के लिए ज्ञान जी में बेकाबू आग थी। कभी काशीनाथ सिंह, बनारस से आ जाते तो चारों यार जम कर बैठते। दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह ज्ञानरंजन और रवीन्द्र कालिया, ये सब साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख कथाकार थे जिनमें कोई किसी की कार्बन-कॉपी नहीं था। दूधनाथ सिंह इन सबमें वरिष्ठ थे और गरिष्ठ। वे जटिल फंतासी के ज़रिए अलक्षित यथार्थ तक पहुँचने की कोशिश करते। उनकी कहानियों में इस तरह के प्रयोग अधिकाधिक हुए। ज्ञानरंजन, दम तोड़ती व्यवस्था, टूटते रिश्ते और घिसटती विसंगतियों के कहानीकार थे। उन्होंने अपने कथा-संकलन का शीर्षक भी ‘सपना नहीं’ रखा। वे अपनी कहानियों में सच का क्रूरतम स्वरूप दिखाने से नहीं हिचकते। यथार्थवाद का दामन तीनों ने अपनी तरह से थाम रखा था। रवीन्द्र कालिया ने अपनी कहानियों में कथ्य को कॉमिक एंगिल बना कर सचाइयों को लिख डाला तो सहज ही ‘एब्सर्ड’ विधा का सूत्रपात हो गया। पुरानी पीढ़ी के जो साहित्यकार जीवन की कटु सचाइयों को रेशमी रूमाल के नीचे दबा-छुपा कर रखने के कायल थे, एकबारगी चिहुँक पड़े।
अपने शहर इलाहाबाद की विलक्षण सामर्थ्य का पता ऐसे ही मौक़ों पर चलता रहा है। इस छोटे से शहर का पेट इतना गहरा है कि ये कई सैकड़ा परिमलियन रचनाकार हज़म कर लेने के बाद भी प्रगतिशीलों की अगवानी में लेखक सम्मेलन बुलवा लेता है। प्रलेस (प्रगतिशील लेखक संघ), जलेस (जनवादी लेखक संघ) के किंचित् शिथिल पड़ने पर यह जसम (जन संस्कृति मंच) की गतिविधियाँ आयोजित होने देता है। दरअसल इलाहाबाद ने लोगों, विचारधाराओं, आन्दोलनों और एजेंडों को इतनी उलटी-पलटी खाते देख लिया है कि अब उसे आश्चर्य नहीं होता। साहित्यिक हलक़ों में दो जुमले ज़ालिम बेइज़्ज़ती माने जाते। (1) तुम सी.आई.ए. के एजेंट हो। (2) तुम मीडियाकर हो। आरोपित लेखक यह सोच-सोच कर चकराता कि एक अदद ‘स्पैन’ पत्रिका की कॉपी भेजने के सिवा अमेरिका ने उसे और क्या दे दिया। लेखन के क्षेत्र में मीडियाकर कहलाना सबसे निकृष्ट गाली थी। इसका दाग़ी रचनाकार ख़ुद-ब-ख़ुद महफ़िलों से उठ जाता, गोष्ठियों से ग़ायब हो जाता और साहित्यिक पत्रिकाओं से बाहर। उसके लिए सिर्फ़ दैनिक अख़बारों के रविवार पृष्ठ और सरिता, नीहारिका जैसी व्यावसायिक पत्रिकाएँ बचतीं। कई बार दाग़ी रचनाकार अपनी ‘न्यूसेंस वैल्यू’ विकसित कर लेता। वह गोष्ठियों में गुलगपाड़ा मचाता और कॉफ़ी हाउस में कोलाहल।
साहित्य से इतर इलाहाबाद में बहुत बड़ी तादाद विद्यार्थियों की है। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र तो लाखों की संख्या में हमेशा से थे ही, साल दर साल हुजूम के हुजूम छात्र बाहर से यहाँ आकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते। शहर में इतनी हॉस्टल व्यवस्था नहीं थी। बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश से आए मेहनती लड़के मिलजुल कर एक मकान किराए पर लेते, यूनिवर्सिटी रोड से किताबें ख़रीदते। वहीं ठेलों पर किलोग्राम के हिसाब से कॉपियाँ मिला करतीं। हर छात्र दो-तीन किलो कॉपी ख़रीदता और उसका अध्ययन आरम्भ हो जाता। सुबह का अख़बार ये चाय की दुकान पर पढ़ लेते और शाम की ख़बरें पानवाले के टी.वी. सेट पर सुन लेते। न्यूनतम सुविधाओं में रह कर ये छात्र आई.ए.एस., पी. सी.एस., रेलवे भर्ती बोर्ड, स्टाफ़ सेलेक्शन कमीशन जैसे पेचीदा इम्तहानों से जूझते। बहुत से इस परीक्षा प्रतियोगिता को जीत जाते तो काफ़ी सारे छात्र वापस लौट जाते। जो नहीं लौटते वे शहर की हताश जनसंख्या में बढ़ोतरी करते और अपने अभिभावकों पर एक और साल अपना व्यय-भार डालने का इसरार करते। कुछ छात्र पत्रकारिता और लेखन की तरफ़ मुड़ जाते।
विद्यार्थियों में वामपंथी विचारधारा सर्वाधिक स्वीकार्य रही। इस दीक्षा में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों की शिक्षण-संस्कृति का भरपूर योगदान रहा। कई बार गुरुओं को धूल चटा दी, ऐसे भी तेजस्वी शिष्य निकले। हीन भावना से हताहत प्राध्यापकों ने विद्यार्थियों के शोधकार्य में अड़ंगे लगा कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रा मीनू दुबे ने एम.ए. के बाद, डी.फिल् करने की सोची। बतौर गाइड उसे दूधनाथ सिंह मिले। दूधनाथ ने उसके अध्ययन में इतने रोड़े अटकाए कि तंग आकर उसने शोध का उपक्रम ही छोड़ दिया। उन दिनों दूधनाथ, विश्वविद्यालय की एक प्राध्यापिका के प्रेम में पड़े थे। हिन्दी विभाग इस प्रेम प्रकरण का साक्षी रहा। शहर और विश्वविद्यालय का चरित्र इतना सहिष्णु था कि उन्होंने पटना के मटुकनाथ की तरह इलाहाबाद के मटुकनाथ के मुँह पर न तो कालिख मली न ही दूधनाथ की पत्नी निर्मला ने उनकी सार्वजनिक पिटाई की हालाँकि वह दुखी रहती थी। जब कभी मैं निर्मला से कहती, “तुम उस गोष्ठी में क्यों नहीं आईं?” वह उदास होकर जवाब देती, “ये हमें लेकर ही नहीं गए। दूसरी वाली को ले गए होंगे।” अध्यापन के बाद दूधनाथ का स्कूटर मिंटो रोड पर खड़ा मिलता। उनके रिटायर होने पर यह प्रेम प्रसंग भी अवकाश प्राप्त कर गया।
यह उदारता और सहिष्णुता हमारे इस शहर को रहने योग्य बनाती है। हमारी कमज़ोरियों को लुकाने वाली, हमारी ग़लतियों को छुपाने वाली, हमें बार-बार जीवन शुरू करने का मौक़ा देने वाली। हम उत्तीर्ण होकर तो जीते ही हैं, अनुत्तीर्ण होकर भी यहाँ जी सकते हैं। ऐसे कई निठल्लों को मैंने नज़दीक से देखा जो हर परीक्षा और इंटरव्यू में असफल रहे लेकिन अपने घर-परिवार में हेकड़ी बनाए रहे। किसी दिन माँ या पत्नी ने ज़्यादा चूँ-चपड़ की तो रसोई में जाकर पानी का मटका एक धक्के से फोड़ दिया। सारी रसोई पानी-पानी हो गई। माँ और पत्नी मटके के अवशेष बीनने में व्यस्त हो गईं और उनका मूल प्रश्न “क्या कहीं पर काम मिला?” हवा में विलीन हो गया। एक युवा पत्रकार वर्षों राष्ट्रीय सहारा में काम करता रहा जहाँ तनख्वाह ही नहीं मिली। तंग आकर उसने कार्यालय जाना बन्द कर दिया। वह जब भी कभी मिलता, सिगरेट सुलगा कर घोषणा करता, “मैं बहुत जल्द अपना अख़बार शुरू करने जा रहा हूँ।” एक और लड़का जो हमारे घर के पास रहता था, हर साल मुझसे कहता, “इस बार पर्चे बहुत अच्छे हुए हैं। मैं श्योर लिखित परीक्षा निकाल लूँगा। आप मुझे थोड़ी सी इंगलिश पढ़ा दें तो इंटरव्यू भी पार लग जाए।”
उसकी इस सादगी पर फ़िदा होना मुश्किल था क्योंकि तीन बरसों में मिले तीन अवसरों में वह लिखित परीक्षा भी पास नहीं कर पाया। तंग आकर वह एक दिन बोला, “अच्छा आप मुझे कहानी लिखना ही सिखा दीजिए।” उसे कैसे समझाती कि कहानी का कोई विद्यालय नहीं होता। ऐसे लड़कों से बात करते हुए मुझे अखिलेश की कहानी ‘चिट्ठी’ और अरुण प्रकाश की कहानी ‘भाषा’ का ध्यान आता। दोनों कहानियों में युवाओं और प्रतियोगी छात्रों का संत्रास व्यक्त हुआ है।
किसी शहर की शख़्सियत महज़ पढ़े-लिखे लोगों, विद्यालय और विश्वविद्यालय से नहीं बनती। उसकी नींव में वे पुराने मोहल्लों और चौबारे होते हैं जहाँ दादा, नाना, दादी, परदादी क़िस्म के दुर्लभ पात्रों ने निवास किया। इलाहाबाद में पुरनिया मोहल्लों और गलियों की भरमार है। कई बार एक गली से गुज़रते हुए कई मोहल्लों की सैर हो जाती है।
चौक इलाक़ा अपने आप में गुलज़ार रहता है। रोज़मर्रा की ज़रूरत की हर चीज़ यहाँ किफ़ायती दाम पर उपलब्ध है। चौक से चार राहें फूटती हैं। एक घंटाघर और जॉनसनगंज की तरफ़ चली जाती है तो दूसरी खुल्दाबाद की तरफ़। तीसरी राह बताशा मंडी, गुड़मंडी, मीरगंज से गुज़रती बहादुरगंज, कोठापारचा होती हुई बाई का बाग़, कीडगंज, बैरहना निकल जाती है। चौथी राह कोतवाली से अन्दर मुड़ती है उस तरफ़ जहाँ शहर की सबसे सघन बस्ती है। इन गलियों में रहने वाले बख़ूबी जानते हैं कि कैसे कुत्तों, कूड़े और साँड़ों से बचते हुए घर तक पहुँचना है। स्कूल जाने वाले बच्चे, पतली गलियों में, दोनों तरफ़ की नाली में गिरने से अपने आप को बचाते हुए, साइकिल चलाने में निष्णात हो जाते हैं। कोतवाली के पिछवाड़े से ही रानी मंडी शुरू हो जाती है। चौड़ी सड़क के एक तरफ़ बच्चा जी की कोठी और दूसरी तरफ़ काशी कोठी दो अमीरों की वैभवगाथा के प्राचीन नमूने हैं। यहाँ से सड़क फिर तीन तरफ़ की गलियों में मुड़ती है। एक हाथ को घनघोर हिन्दूवादी मोहल्ला लोकनाथ है तो दूसरी तरफ़ अतरसुइया और तीसरी तरफ़ रानी मंडी का अन्दरूनी इलाक़ा।
मैं रोज़ बैरहना से रिक्शे में बैठ कर वापस घर आती। कॉलेज से बाहर निकलते ही मेरे सिर पर घर सवार हो जाता और मैं रानी मंडी की बजाय चौक उतर जाती। पाठक स्टोर से डबलरोटी, बिस्किट वगैरह ख़रीद कर, फल मंडी से केले, सन्तरे, अमरूद लेती। चौक लाँघकर लोकनाथ की लम्बी-लम्बी दो गलियाँ पड़तीं। वहाँ सब्ज़ी सस्ती और ताज़ी मिलती। लोकनाथ की गली में मिठाइयों के साथ-साथ हरि नमकीन नाम की दुकान भी थी जिसके समोसे, खस्ता और दमआलू की दुनिया भर में धूम रही। कई लोगों का तो सुबह का नाश्ता ही यह होता। छप्परवाले हलवाई की दही-जलेबी और हरि नमकीन का खस्ता दमआलू, ऊपर से एक कुल्हड़ लस्सी, इलाहाबाद का रईसी नाश्ता था। यही नाश्ता खाने-खिलाने, ज्ञानरंजन लूकरगंज से लोकनाथ आया करते। लोकनाथ में दुमंज़िले, तिमंज़िले पुराने मकान थे जिनमें भूतल के कमरों में छोटी-छोटी दुकानें थीं। देखा जाए तो ये वर्कशॉप जैसी थीं। बड़े सर्राफों के कारीगर यहाँ बैठ कर गहने गढ़ते और पॉलिश करते। किसी का यहाँ जूतों का गोदाम होता। कहीं कोई औरत सिलाई मशीन पर गुड़ियों के धड़ों पर सिर सिल रही होती तो कहीं दो औरतें चबूतरे पर बैठी दस रुपए पंसेरी के हिसाब से खरबूजे के बीज छील रही होतीं। मकानों की ऊपरी मंज़िल से समृद्ध घरों के विंडो एयरकंडीशनरों से टप-टप टपकता पानी सब्ज़ी वालियों के लिए मुसीबत पैदा करता। वे कभी अपना माल बचातीं कभी कपड़े। घर पहुँचने की उतावली में मैं जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाती, गलियाँ पार कर जाती।
रानी मंडी का नामकरण उस ज़माने में हुआ था जब यहाँ तवायफ़ों के कोठे हुआ करते थे। सभी मकानों की रचना एक सी थी, प्रवेश द्वार की शक्ल में ख़ूब बड़ी ड्योढ़ी जिसमें दो विशाल पल्लों का फाटक। कहते हैं यहाँ नवाबों के इक्के आकर खड़े होते थे। अन्दर दो या तीन आँगन, उसके बाद बारादरी। खिड़की के स्थान पर बिना सींखचे वाले खिड़के, जैसे फ़िल्म पाक़ीज़ा में दिखाए गए थे। मकान की रचना देख कर ही अतीत का अनुमान लग जाता। मकान का पटाव इतना ऊँचा था कि घनघोर गर्मी में भी कमरे ठंडे रहते। ऊपर की मंज़िल में बड़ा आँगन और उतनी ही बड़ी छत। रहते-रहते यह बेढंगा घर भी हमें प्यारा लगने लगा था।
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