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मिर्ज़ा ग़ालिब ने 1857 के आन्दोलन के सम्बन्ध में अपनी जो रूदाद लिखी है, उसे उन्होंने लगभग डायरी की शक्ल में प्रस्तुत किया है। फ़ारसी भाषा में लिखी गई इस छोटी-सी किताब का नाम है—‘दस्तंबू’। इसमें ग़ालिब के निजी जीवन की वेदना भी भरी हुई है। आज ग़ालिब की जयन्ती पर राजकमल ब्लॉग में प्रस्तुत है, इस डायरी का एक अंश।
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सआदत हसन मंटो की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनकी सम्पूर्ण रचनाओं के संग्रह ‘दस्तावेज’ के खण्ड चार में संकलित मंटो की डायरी का एक अंश : ‘मैं अफ़साना क्योंकर लिखता हूँ’।
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मिर्ज़ा ग़ालिब की जयंती पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, 1857 के जनविद्रोह के समय लिखी गई उनकी डायरी 'दस्तंबू' का एक अंश। अब्दुल बिस्मिल्लाह के सम्पादन में प्रकाशित इस पुस्तक का फ़ारसी से अनुवाद सैयद ऐनुल हसन ने किया है।
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विश्व कैंसर दिवस के मौके पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, अनन्या मुखर्जी की कैंसर डायरी 'ठहरती साँसों के सिरहाने से' का अंश 'दुख, दर्द और उम्मीद का मौसम।'