-
Read moreराजकमल ब्लॉग में पढ़ें, अमित गुप्ता के उपन्यास 'देहरी पर ठिठकी धूप' का एक अंश। समलिंगी प्रेम की स्वाभाविकता और उसके इर्द-गिर्द उपस्थित सामाजिक-नैतिक जड़ताओं को उजागर करता यह उपन्यास अपने छोटे-से कलेवर में कुछ बड़े सवालों और पेचीदा जीवन-स्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना करता है।
-
Read moreराजकमल ब्लॉग में पढ़ें, विष्णु नागर के संस्मरणों की किताब 'डालडा की औलाद' के कुछ अंश। इन संस्मरणों में लेखक ने बचपन से अब तक समाज को जितने रूपों में देखा है, उसे केन्द्र में रखकर अपने आसपास के जीवन के बारे में लिखा है।
भाग्यशाली हम
बहुत दिनों से मैं सोच रहा हूँ कि हम साधारण लोग किस-किस अर्थ में भाग्यशाली हैं। एक तो इस अर्थ में हम किस्मतवाले हैं कि हमारे माँ-बाप न टाटा-बिड़ला थे, न अंबानी-अडाणी, न बड़े राजनेता थे, न बड़े कलाकार थे या फिल्मी हीरो-हीरोइन थे। न महान सन्त थे, न नाथूराम गोडसे जैसे हत्यारे थे। हम अपने माता-पिता की प्रसिद्धि या धन या महानता या कलंक के बोझ तले दबे हुए नहीं हैं। हम जो भी हैं, जैसे भी हैं, अपने किए या अनकिए से हैं। इसके दुख कम, सुख ज्यादा हैं। हो सकता है इनमें से किसी की सन्तान होते तो पता नहीं कितनी सीढ़ियाँ अपने आप चढ़ चुके होते या और अधिक गिरकर भी बड़े बन चुके होते। मगर यह हजार गुना बेहतर है कि हम नीचे हैं, जमीन पर हैं। हम न जाने कितनी आवाजें, कितनी गूँजे
-
Read more
राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' का एक अंश।
-
Read more
राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, सविता पाठक के कहानी संग्रह 'हिस्टीरिया' से एक कहानी 'नीम के आँसू।' इस संग्रह में संकलित कहानियाँ महिलाओं के बारे में फैलाए गए भ्रमों और मिथकों पर प्रहार करती है।
-
Read moreबिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उन पर आधारित हृषीकेश सुलभ के नाटक 'धरती आबा' का एक अंश।
करमी : तू इतना बेचैन क्यों है रे बेटा?...तुझे नींद नहीं आती क्या? तू रात-रात भर जागता है...। सारी-सारी रात छटपट करता है तू बिन पानी की मछरी जैसे...।
बिरसा : मैं मछरी नहीं हूँ माँ।
करमी : हाँ रे जानती हूँ...बाघ है तू...बाघ। इसीलिए फन्दे में फँसे बाघ की तरह छटपटाता है तू। अब तो तू धरती का आबा है रे।
बिरसा : तुझे कैसे मालूम कि मैं सारी-सारी रात जागता हूँ...सोता नहीं हूँ? क्या तू भी जागती है सारी रात?
करमी : हाँ रे...जब से तू धरती का आबा बना, मेरी नींद चली गई।...तू भी मेरे कलेजे का दुख नहीं समझता। तुझे क्या लेना-देना मेरे इस दुख से। तू तो अब सारी दुनिया का दुख लिये घूम रहा है।...कल तक इस करमी को कोई नहीं जानता था।...चीन्हते नहीं थे सब। अब सब देखते ही उठकर खड़े हो जाते हैं। बनिया...महाजन...पहान, सब कहते हैंµतू तो भगवान की माँ है...।
बिरसा : तुझे अच्छा