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इमरोज़ साहब ने पिछले दिनों दुनिया को अलविदा कह दिया पर वे अपने पी़छे उनको याद करते रहने की अनेक वजहें छोड़ गए हैं। अपने अनूठे चित्रों की बदौलत वे हमारी स्मृतियों में हमेशा बने रहेंगे। साहित्यिक दुनिया में अमृता-इमरोज़ का प्रेम सम्बन्ध अत्यन्त चर्चित रहा है। लगभग मिथकीय गरिमा हासिल कर चुके इस प्रेम सम्बन्ध को युवा कलाकार कुनाल हृदय ने अपने नाटक ‘इमरोज़’ में एक नई निगाह से देखते हुए प्रासंगिक ढ़ंग से प्रस्तुत किया है। राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, हाल ही में प्रकाशित इस नाटक का एक अंश।
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किसान दिवस पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, मनदीप पुनिया की किताब 'किसान आन्दोलन : ग्राउंड जीरो' का एक अंश
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कथाकार संजीव को वर्ष 2023 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनकी ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ से एक कहानी ‘ज्वार’Read more
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गोवा लिबरेशन-डे पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, विकास कुमार झा के उपन्यास राजा मोमो और पीली बुलबुल का एक अंश। इस उपन्यास के जरिए हिन्दी साहित्य में पहली बार देश के सबसे छोटे राज्य को बड़े फ़लक पर लेकर केन्द्रीय विमर्श में लाने की पेशकश की गई है।Read more
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भिखारी ठाकुर निम्नवर्गीय कला, भाषा और वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। नाटकों में भीड़ इसी वर्ग के दर्शकों के कारण होती थी। भिखारी का तमाशा इसी वर्ग का भोगा हुआ यथार्थ था।
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Read moreशैलेन्द्र के गीतों से मुहब्बत करने वाले बहुत कम लोग जानते हैं कि 'हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है' जैसा सुप्रसिद्ध आस्थान गीत शैलेन्द्र की ही रचना है। जिसके ये सिर्फ रचयिता ही नहीं थे, गायक भी थे–मंचों से जागृत प्रस्तोता। जो विद्वान कहते हैं कि शैलेन्द्र फिल्मों में नहीं गये होते तो हिन्दी काव्य संसार उन्हें सिर माथे पर बिठाता तो कुछ गलत नहीं कहते हैं। पर एक बार फिल्मों से नाता जोड़ लेने के बाद वे समूचे सिनेमा के हो गए।
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कई राज्यों में विधानसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री के पद को लेकर अभी तक राजनीतिक गहमागहमी बनी हुई है। राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, नवीन चौधरी के उपन्यास ‘ढाई चाल’ का एक अंश जो इसी तरह के माहौल की एक रोमांचक कहानी कहती है।
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Posted: December 11, 2023
यात्रा वृतान्त : महातीर्थ के अंतिम यात्री
Read moreचारों ओर भयंकर सन्नाटा था और उस निस्तब्ध प्रांतर में मैं अकेला प्राणी था। रात जैसे सरक ही नहीं रही थी, मुझे लग रहा था कि मैं अनंत रात्रि के बीच से गुजर रहा हूँ। धरती के कोलाहल से दूर भागकर मैं अनजान अनंत रात्रि के फंदे में अटक गया हूँ जहाँ से मैं निकल नहीं पा रहा हूँ। रात कितनी लम्बी हो सकती है यह मैं आज ही जान सका। मैं लगातार चल रहा था किन्तु ठंड भी क्रमशः बढ़ती ही जा रही थी और रात भी मानों कभी न खत्म होने वाली रात थी।
पर्वत दिवस पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, घुमक्कड़ पर्वतारोही भू-पर्यटक बिमल दे के यात्रा वृतान्त ‘महातीर्थ के अंतिम यात्री’ का एक अंश। इसमें लेखक की 15 वर्ष की उम्र में अकेले की गई ल्हासा-कैलाशनाथ-मानसरोवर यात्रा के अनुभवों का लेखा-जोखा है।
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सांपो की घाटी तक पहुँचते सांझ हो गयी थी। नदी तक पहुँचने में और एक घंटा लग गया। तब तक अंधेरा हो गया था और तारे दिखने लगे थे। रास्ता लगभग समतल
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राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उदय प्रकाश की ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ संग्रह से उनकी कहानी ‘असत्य का भौतिक प्रमाण’