उपन्यासों के आकाश में नवरंगी इंद्रधनुष
—रश्मि रावत
स्त्री लेखनी से रचित नौ उपन्यास एक साथ। यह तो धरती के एक टुकड़े से देखे जाने वाला आकाश है। अनंत आकाश तले जाने किस-किस कोने-अंतरे और विशाल मैदानों से क्या-क्या और नहीं लिखा जा रहा होगा। यकीनन लिखा जा रहा है। यह उद्गार निकले हैं एक समय में एक ही मंच से उपन्यास जैसी विस्तृत फलक वाली विधा में नौ लेखिकाओं की कृतियों को एक साथ देखने से। मेरी चेतना तो उन्हें एक साथ देखती थी ही और उनसे ताकत भी लेती थी। एक साथ होने का असर यह होता है कि हर रंग अपने आप में तो मुकम्मल होता ही है, एक-दूसरे के पड़ोस में बैठ कर धूप-छाँही झिलमिलाहट से अनूठा सौंदर्य और ठसक और पा जाता है।
रचने के एकांत में तो हर कोई एक व्यक्ति ही होता है। किसी समूह का प्रतिनिधि नहीं। ख़ास पलों में ख़ास जगह पर किन्हीं ख़ास कोणों से देखे गए यथार्थ में ख़ास तरीके से रचनाशीलता अभिव्यक्त होती है। मगर प्रकाशित होने के बाद अमूमन रचना बाध्य होती है इकहरे, पाठ से गुजरने के लिए। फिर कहा जाने लगता है—दुनिया में इतने सारे रंग हैं इन्हें बस अमुक रंग ही दिखता है।
वहीं कृतियाँ जब एक बड़े परिप्रेक्ष्य में एक साथ आँखों के आगे खुलती हैं तो उनका हर रंग अन्य रंगों से ताकत पाता है। प्रत्येक रंग में अपनी शक्ति पहले से ही मौजूद होती है। उसे सीमित समझकर आँखें चुराए जाने के बहाने कम करके एक सजग पाठ होने की संभाव्यता की अतिरिक्त ताकत भी मिल जाती है।
पिछले कुछ समय से स्त्रियाँ अधिकाधिक तैयारी से अधिकाधिक मात्रा में अधिकाधिक दायरों पर लिख रही ही हैं। इस क्रम में एक समय में इतने उपन्यास एक प्रकाशन से आना, अगर यह संयोग है तो उस संयोग पर ध्यान जाना, अगर सायास है तो बौद्धिक जगत की सामूहिक संवेदना के पाट चौड़े करने वाले उपक्रम करना, उसे महोत्सव की तरह सेलिब्रेट करना और 2025-2026 को ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष’ घोषित करना एक नई परिघटना है।
ऐसे प्रयासों से जब सर्वानुमति का पलड़ा सम पर आ जाएगा। उसकी एकतरफ़ा ढुलक खत्म हो जाने पर ‘लेखिका’ शब्द दिक्कततलब लगना भी बंद हो जाएगा। जरूरत होती है देश-काल में ठोस प्रयास करके शब्दों में मायने भरने की। मगर हम अतिरिक्त मायने ठुँसे शब्दों की चौंध से प्रभावित हो कर उन शब्दों के पीछे भागने लगते हैं। अब धीरे-धीरे समय आ रहा है शब्दों से फालतू अर्थ झड़ने और उचित अर्थ भरने का। इस व्यापक कार्यभार की पूर्ति की एक छोटी-सी पहल मेरी नज़र में ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री-वर्ष’ भी है।
****
लंबी चुप्पी से गूँजती आवाज़ों तक
—सुदीप्ति
‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष’ मनाया जाना हिन्दी-लोकवृत का एक ऐतिहासिक क्षण है। यह एक सदी से अधिक लंबे संघर्ष के बाद अपनी आवाज़ को सम्पूर्णता में स्थापित करने की यात्रा का उत्सव है। राजकमल प्रकाशन ने अपने निमंत्रण में सच ही कहा कि 21वीं सदी स्त्रियों की सदी है। अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो समझ में आता है कि हिन्दी साहित्य में स्त्री लेखन का इतिहास एकरेखीय नहीं है। 20वीं सदी के साहित्यिक परिदृश्य पर पुरुषों का वर्चस्व था बावजूद इसके कि उसमें 100 से अधिक स्त्री रचनाकारों की उपस्थिति मिल जाएगी। उनकी रचनाओं में विविधता और अलग पहचान भी दिखेगी लेकिन उनकी जगह? उनकी जगह सदा किनारे की रही।
जब स्त्रियाें ने मुखरता से लिखना शुरू किया तब भी उनके लेखन को मात्र ‘स्त्रियों का’ और ‘के लिए’ में सीमित कर दिया गया। एक लंबी लड़ाई स्त्री रचनाकारों ने इस बारे में भी लड़ी कि वे स्त्री हैं लेकिन उनका लेखन सिर्फ़ स्त्री लेखन के दायरे में नहीं आता। कोई भी लेखक जिस जगह से लिखता है वहाँ से उसके अनुभव, अनुभूतियाँ और उसकी विश्व-दृष्टि ही सबसे अधिक मायने रखते हैं।
आज भी बेहद सरलीकृत दृष्टिकोण से हिन्दी में स्त्री लेखन को मुख्यत: दो तरह से ही देखा जाता है। पहला दृष्टिकोण उसे नारे के स्वर से जोड़कर मात्र विमर्शवादी बता देता है तो दूसरा उसे अलंकारिक-पारिवारिक लेखन मान लेता है।। इसके बावजूद कि हम सबके लिए 90 के दशक में शुरू हुए स्त्री विमर्श का एक ऐतिहासिक और गंभीर सांस्कृतिक अर्थ है। मैं कहना चाहती हूँ कि स्त्रियों द्वारा किए गए लेखन को सिर्फ़ इस नज़रिए से देखना उसे कम कर देना है, उसके महत्व को संकुचित कर देना है। इसीलिए हमने हिन्दी वैचारिक पटल पर बार-बार देखा कि जितनी स्त्री रचनाकारों ने मुखरता से स्वीकारा कि वे स्त्रीवादी हैं उससे कहीं ज्यादा स्त्रियों ने यह कहा कि उनका लेखन स्त्रीवादी लेखन की श्रेणी में नहीं आता है। वे लेखक को लेखक मानती हैं, स्त्री और पुरुष में बाँट कर नहीं देखतीं। स्त्री लेखन को एक अलंकारिक लेखन यानी सिर्फ़ फूल-पत्ती, सौंदर्य-प्रेम आदि के बारे में लेखन मानने वाली दृष्टि तो ऐसी है कि इसके बारे में बात करना भी समय बर्बाद करना है।
21वीं सदी आते-आते, हिन्दी में स्त्री उपन्यासकारों की एक नई पीढ़ी उभरी है उन्हीं में से 9 विशिष्ट रचनाकारों की रचनाएँ स्त्री वर्ष में प्रकाशित हुईं हैं। यह स्त्री के लेखन का उत्सव भर नहीं, यह उस स्त्री रचनाशीलता को सेलिब्रेट करने तक सीमित नहीं जो अपने लिए कोई आरक्षण, कोई कंसेशन, कोई छूट नहीं माँगती बल्कि वर्तमान में अपनी पूरी ताक़त के साथ उठ खड़ी हुई है। यह स्त्रियों द्वारा, सिर्फ़ स्त्रियों के बारे में और सिर्फ़ स्त्रियों के लिए किए जा रहे लेखन का मंच नहीं है। यह समकालीन हिन्दी रचनाशीलता का वितान है जिसके विस्तार को स्त्रियों ने नए आयाम दिए।
इन नौ उपन्यासों से गुजरते हुए मैंने पाया कि रचनाकारों ने समय और इतिहास को अपनी विश्व दृष्टि से देखा, पहचाना और औपन्यासिक आख्यान में क़ैद किया है। स्त्री लेखन जब हम कहते हैं तो स्त्री पद संज्ञा की जगह विशेषण हो जाता है और ये कृतिकार स्त्रियाँ विशेष होने की माँग अपने कथाकार रूप में ही करती हैं स्त्री रूप में नहीं। इन उपन्यासों में मात्र स्त्री के हिस्से की दुनिया नहीं लिखी हुई है स्त्री की नज़र से इस दुनिया का पुन:सृजन है यह। यह सुचिंतित संयोग की बात है कि एक साथ नौ स्त्रियाँ इतिहास के अलग-अलग खंडो, चित्रों के साथ उपस्थित हैं और राजकमल प्रकाशन ने इसे स्त्री-वर्ष के रूप में मनाने का शानदार निर्णय लिया है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में यह साल और यह कदम ऐसे ही दर्ज होगा जहाँ पर स्त्रियाँ हाशिए में नहीं मुख्य पृष्ठ पर एक साथ उपस्थित हैं—एक नहीं दो नहीं, पूरी 9 की 9 अपने-अपने विशिष्ट रंग और अंदाज में।
प्रस्तुत रचनाकार विभिन्न भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आती हैं, और उनके उपन्यास इसी तरह जीवन के विविध अनुभवों को समेटते हैं। इन उपन्यासों में आधुनिक समय और इतिहास के संघर्ष, आकांक्षाएँ, विरोधाभास की कथाएँ हैं। सभी रचनाकारों की विशिष्ट कथा-शैलियाँ हिन्दी उपन्यास विधा को नए आयाम दे रही है। स्त्री-स्वर को भी विस्तार और पूर्ण व्यापकता के साथ उपस्थित कर रहे हैं। सभी रंगों और अंदाज़ में एक साथ उपस्थित जो उसकी विराट उपस्थिति का रेखांकन है।
****
इसे ऐतिहासिक घटना के रुप में क्यों न देखें हम
—गीताश्री
राजकमल प्रकाशन ने बड़ा कदम उठाते हुए वर्ष 2025–2026 को ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष’ घोषित किया है। कितना सुंदर संयोग है कि एक तरफ़ ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष’ मनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ यू.एन. ने वर्ष 2026 को ‘अंतराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष’ घोषित किया है। एक साथ घटित हुईं ये दोनों सुघटनाएँ स्वागत योग्य है। इससे एक सार्थक संदेश गया है।
अब स्त्री लेखन केंद्र में है। लेकिन यहाँ तक पहुँचना आसान नहीं था। जो लिखते हैं वो जानते हैं कि लेखन एक लेखक को क्या बना देता है। ओरहान पामुक की तर्ज पर कहना चाहती हूँ कि हम लिखते हैं, क्योंकि हम दुनिया से नाराज हैं। स्त्री के लिए लेखन कोई मनोरंजक खेल नहीं, प्रतिरोध का, नाराज़गी का एक अचूक टूल है। लेखन एकान्त साधना है। इसका चयन आसान नहीं है, यहाँ फूल कम और पत्थर ज्यादा बरसते हैं।
21वीं सदी के स्त्री लेखन पर किसिम-किसिम के आरोप लगे हैं। जैसे यह ऊबी-अघाई, खाई-पी स्त्रियों का शग़ल है, यह देह मुक्ति की पैरोकारी करता है और यह भी कि आज कल की कवियित्रियाँ बस फूल-पत्ती लिखती हैं। इन आरोपों का करारा जवाब स्त्रियाँ अपनी रचनाओं से दे रही हैं। स्त्री लेखन अब ख़ास जेंडर बाइनरी में नहीं लिपटा हुआ है, वो उसको छिन्न-भिन्न कर रहा है। उनके लेखन में आज का समय बोलता है।
स्त्री वर्ष में प्रकाशित नौ लेखिकाओं के उपन्यास—
वन्दना राग का उपन्यास ‘सरकफंदा’ देखिए जिसमें एक सिरा गुलाम भारत में खुलता है तो दूसरा निपट वर्तमान में। दोनों के बीच वह भविष्य है जिस पर शिकंजा कसता जा रहा है। यह उपन्यास हमारे समय के यथार्थ की सघन, आवेग-भरी कलात्मक दुनिया का आईना है।
प्रत्यक्षा के उपन्यास ‘शीशाघर’ में विभाजन और बिखराव से ज़्यादा उस अन्दरूनी इनसानी एकता के बारे में है जो इसके चरित्रों को बिखरकर भी बिखरने नहीं देती और वे एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर, दूसरे देशों में अपना रोज़मर्रा का जीवन जीते हुए भी एक-दूसरे से गहरे तौर पर जुड़े हुए हैं। यह हमारे समय की ही तो गूँज है।
अलका सरावगी का उपन्यास ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन : दिल और दरारें’ किसी सीधी रेखा पर चलने के बजाय अतीत और वर्तमान में आवाजाही करता चलता है, जहाँ से उपन्यास की दुनिया और उसके किरदारों के तमाम कोने-अँतरे एक पारदर्शी रोशनी से जगमगा उठते हैं।
सुजाता के उपन्यास ‘दरयागंज वाया बाज़ार फ़त्ते ख़ाँ’ में एकदम अछूता विषय, अदृश्य दुनिया का पता मिलता है। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले मुल्तानी लोग भी थे, उनकी ज़बान भी थी, उनकी तहज़ीब भी थी—यह कोई नहीं जानता। उनके भीतर अपनी पहचान खोने का भय भी था। तीन पीढ़ियों का यह आख्यान विभाजन की उस महात्रासदी से आगे बढ़ता है जिसे हम सब जानते हैं। यह उस अनकही दास्तान को खोलता है।
अनामिका का ‘दूर देश के परिन्दे’ उपन्यास बीसवीं सदी में, स्वतंत्रता-प्राप्ति के आसपास के वर्षों में ऐसे विश्व-प्रसिद्ध लोगों के जीवन में आईं स्त्रियों की कथा कहता है जो अपने समय की स्त्रियों के विशेष प्रिय रहे। कुछ था उनमें जिसके चलते स्त्री-मन उन्हें उम्मीद से देखता था। शायद यह उम्मीद कि उनकी अगुवाई में जो समाज बनेगा उसमें धैर्य, ममता, सहिष्णुता और त्याग जैसे गुण स्त्री और पुरुष दोनों में बराबर बँटेगे। दोनों साहचर्य का एक अधिक सृजनात्मक मॉडल विकसित करेंगे।
गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘सह-सा’ में छोटे-छोटे अकस्मातों में बनती व्यापक मानव नियति की कहानी है। रोज़मर्रा के अनाटकीय प्रसंगों की टकराहटों से बड़े सवालों के खुले में आ जाने की कहानी। प्रकट कथा के पीछे, उसके अनकहे में, एक और कथा भी चलती है जो दिखाती है कि इस वाचाल समय में हम वही देखते सुनते हैं जो ढिंढोरा है, भड़कीला है, उसके पीछे हो रहे को नहीं। बात चाहे परिजनों की हो या नेताओं की या मेहनतकश मज़दूरों की, हम चुपचाप अच्छे और बुरे दोनों को मिस कर देते हैं।
जया जादवानी का उपन्यास ‘इस शहर में इक शहर था’ विभाजित सिन्ध और उसके लोगों की कसक और पीड़ा का आख्यान है।
शोभा लिम्बू का उपन्यास ‘शुकमाया हाङमा’ में लिम्बू आदिवासी समुदाय की एक सशक्त, स्वाभिमानी स्त्री की सच्ची कहानी पर आधारित है। बर्मा युद्ध को पृष्ठभूमि बनाकर रची गई यह कृति उस युद्ध के दौरान विस्थापित हुए लोगों की पीड़ा और क्षत-विक्षत मन की कहानी भी पूरी मार्मिकता से सामने लाता है। जिस आदिवासी समुदाय और जिस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अंकन इस उपन्यास में किया गया है वह हिन्दी पाठकों के लिए अपेक्षाकृत कम जाना-सुना है। यह उपन्यास हिन्दी साहित्य में एक नया अध्याय जोड़ता है।
सविता भार्गव के उपन्यास ‘जहाज़ पाँच पाल वाला’ के केन्द्र में तीन ख़ुद-मुख़्तार स्त्रियाँ—वर्तिका, चारुचित्रा और एमिली—हैं जिन्होंने लीक तोड़ते हुए, अपने घर-परिवार, परम्परा और आसपास की पितृसत्तात्मक दुनिया के द्वारा आरोपित तमाम अवरोधों से जूझते हुए, अपने लिए अलग राह चुनी और रंगमंच और जीवन दोनों ही इलाकों में एक क़ाबिले-रश्क जगह बनाई।
क्या इन उपन्यासों में हम अपना समय नही देख पा रहे?
****