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Read moreबिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उन पर आधारित हृषीकेश सुलभ के नाटक 'धरती आबा' का एक अंश।
करमी : तू इतना बेचैन क्यों है रे बेटा?...तुझे नींद नहीं आती क्या? तू रात-रात भर जागता है...। सारी-सारी रात छटपट करता है तू बिन पानी की मछरी जैसे...।
बिरसा : मैं मछरी नहीं हूँ माँ।
करमी : हाँ रे जानती हूँ...बाघ है तू...बाघ। इसीलिए फन्दे में फँसे बाघ की तरह छटपटाता है तू। अब तो तू धरती का आबा है रे।
बिरसा : तुझे कैसे मालूम कि मैं सारी-सारी रात जागता हूँ...सोता नहीं हूँ? क्या तू भी जागती है सारी रात?
करमी : हाँ रे...जब से तू धरती का आबा बना, मेरी नींद चली गई।...तू भी मेरे कलेजे का दुख नहीं समझता। तुझे क्या लेना-देना मेरे इस दुख से। तू तो अब सारी दुनिया का दुख लिये घूम रहा है।...कल तक इस करमी को कोई नहीं जानता था।...चीन्हते नहीं थे सब। अब सब देखते ही उठकर खड़े हो जाते हैं। बनिया...महाजन...पहान, सब कहते हैंµतू तो भगवान की माँ है...।
बिरसा : तुझे अच्छा
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राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, अनुराधा बेनीवाल के यात्रा-आख्यान 'लोग जो मुझमें रह गए' का एक अंश। इसमें लेखक के एक समलैंगिक जोड़े के साथ बिताए गए पलों और उनके साथ हुई बातचीत का जिक्र है।
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Read moreराजकमल ब्लॉग में पढ़ें, अजय नावरिया के उपन्यास 'उधर के लोग' का एक अंश। इस उपन्यास में बाजार की भयावहता, वेश्यावृत्ति, यौन-विकार, विचारधाराओं की प्रासंगिकता, प्रेम, विवाह और तलाक पर खुलकर बात की गई है।
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विश्व पर्यावरण दिवस और पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने वाले गांधीवादी पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र के जन्मदिवस पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनकी किताब 'पर्यावरण के पाठ' का एक अंश।
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Read moreमेरा अनुभव बताता है, श्रीकान्त, कि आदमी के ज्ञान का दायरा ज्यों-ज्यों बढ़ता है, त्यों-त्यों उसके अज्ञान
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Read moreपिछले कुछ दिनों से परिवार में बैंगन की ही बात होती है। जब भी जाता हूँ, परिवार की स्त्रियाँ कहती हैं—'खाना खा लीजिए। घर के बैंगन बने हैं।' जब वे 'भरे भटे' का अनुप्रास साधती हैं, तब उन्हें काव्य-रचना का आनन्द आ जाता है। मेरा मित्र भी बैठक से चिल्लाता है-'अरे भई, बैंगन बने हैं कि नहीं!' मुझे लगता है, आगे ये मुझसे 'चाय पी लीजिए' के बदले कहेंगी—' एक बैंगन खा लीजिए। घर के हैं।'राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य 'आंगन में बैंगन'।
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राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखक दामोदर मावज़ो के कहानी संग्रह 'स्वप्न प्रेमी' से उनकी कहानी 'इनसानों के देस में'। इस संग्रह में संकलित अधिकांश कहानियों की पृष्ठभूमि गोवा की संस्कृति और जीवनशैली है।
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राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, भालचन्द्र नेमाडे के उपन्यास 'हिन्दू' का एक अंश। यह उपन्यास भारतीय समाज की जातीय-सांस्कृतिक संरचना का बहुआयामी आख्यान है। इसमें मोहन जोदड़ो से लेकर उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के ग्रामीण भारत की अनेक कथाएँ दर्ज है।