“अनुपम मिश्र एक अत्यन्त विनम्र, निरभिमानी व्यक्ति थे जिन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में साधारण और सामुदायिक विवेक और विधि का जैसा अवगाहन किया वैसा आधुनिक टेक्नॉलॉजी के दुश्चक्र में फँसे अन्य पर्यावरणविद् अकसर नज़रन्दाज़ करते रहे हैं। अनुपम जी लगभग जिद कर अपनी इस धारणा पर डटे रहे कि साधारण लोग और समुदाय पढ़े-लिखों से ज़्यादा जानता-समझता है और आधुनिकता को अपनी सर्वज्ञता के दम्भ से मुक्त हो सकना चाहिए। उनसे बातचीत का यह संचयन इस अनूठे व्यक्ति के सोच-विचार की नयी परतें सहजता से खोलेगा ऐसा हमारा विश्वास है।”
— अशोक वाजपेयी
विश्व जल दिवस पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र के साक्षात्कारों की किताब ‘पर्यावरण के पाठ’ में संकलित टीवी शो सत्यमेव जयते में लिया गया उनका एक साक्षात्कार।
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मल्हार के इस देश में यह नौबत आ गयी कि पानी के लिए खून बह रहा है। मुझे बताइये हम इस स्थिति में कैसे पहुँचे और क्यों?
पहले मैं बताना चाहूँगा कि पानी जब इस धरती पर नहीं था तो जि़न्दगी नहीं थी। पानी आने के बाद ही हमारे आने का क़िस्सा, ज़िन्दगी शुरू होती है। इसलिए यह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि पानी चला गया तो हम भी चले जायेंगे। पानी के मामले में हम लोग गरीब बिलकुल नहीं हैं। पानी हम को कुदरत ने इतना अच्छा दिया, हर साल दिया। एक तो यह है कि एक बार लॉटरी खुल जाये और फिर न खुले कई दिनों तक। लेकिन हर साल लॉटरी खोलती है कुदरत। पर हमारी जेब में उसको रखने की तमीज़ तो हमें आनी चाहिए। हमने अपनी जेब फाड़ ली है तो पानी आता है और चला जाता है।
ऐसा कहते हैं कि जब अँग्रेज़ हमारे देश में आये तो क़रीब-क़रीब हमारे पाँच लाख गाँवों में और कुछ हज़ार छोटे-बड़े शहर होंगे इन सब में तालाब हुआ करते थे, बड़ी-बड़ी झील हुआ करती थीं और उन सब में ऊपर वाला हर साल पानी देता है। उसे हम लोग भर लेते थे। हर जगह का समाज उसको ठीक से रोकना जानता था। ज़िन्दगी उसके इर्द-गिर्द चलाते थे। अभी हमने वह सब खो दिया। और हमने सोचा कि पानी तो कहीं से भी आ जायेगा।
अगर हम अपने शहर दिल्ली की बात करें, कहते हैं एक समय में दिल्ली में 800 तालाब थे। आज गिनती के पाँच तालाब नहीं हैं दिल्ली में। हमें लगा कि पानी की कोई क़ीमत नहीं है, ज़मीन की क़ीमत है। और उसमें हमने दुकान बना दी, मकान बना दिये, कुछ स्टेडियम बना दिये, तालाब नहीं रहने दिये। अब दिल्ली में पानी उतना ही गिरता है, जितना पहले गिरता था पर वह रुकता नहीं है। कहाँ जायेगा वह। बाढ़ आयेगी, पानी बह कर हमारे कमरों में आयेगा, हमारे दफ़्तरों में आयेगा। यह हालत आज हमारे सामने है।
लेकिन जब इतने तालाब थे हमारे देश भर में? तो फिर ये ऐसे कम कैसे हो गये? क्यों ऐसा हुआ?
जब अँग्रेज़ आये हैं, उससे पहले ये दिक्कत नहीं थी। उनके आने से राज करने का तरीका बदला। एक छोटा-सा उदाहरण बताता हूँ। जब अँग्रेज़ आये मैसूर राज्य था। उस समय 40,000 तालाब थे—मैसूर राज्य में। एक अकेले राज्य में। इसको राज और समाज दोनों मिलकर बनाता था, रखवाली करता था। इसमें राजा अपनी तरफ से कुछ पैसा डालता था। जब अँग्रेज़ों के हाथ में राज आया तो उन्होंने कहा कि हम क्यों डालें? ये तालाब तो तुम्हारे हैं। हम नहीं डालेंगे इसमें पैसा। फिर उन्होंने कहा कि ये तालाब तुम्हारे हैं, लेकिन तुम इनसे सिंचाई लेते हो इसलिए हम सिंचाई पर टैक्स लगायेंगे। फिर उन्होंने कहा कि तालाब भी मेरे हो गये अब। इस तरह उनकी मिल्कियत चली गयी, इज़्ज़त चली गयी और उनकी जेब काट ली गयी। तो लोगों ने तालाबों की रखवाली बन्द कर दी। लोगों का जो ममत्व था, अपनापन था वह खत्म होता चला गया। फिर टूटने लगे तो हम लोग धीरे-धीरे सरकार पर निर्भर होते रहे। अब 100 साल 200 साल में हम उसके नतीजे देख रहे हैं। अब हमें सूझता नहीं है कि हमें क्या करना है।
अनुपमजी, मुझे बताइये कि ज़मीन के नीचे जो पानी है वह कुदरत में आता कैसे है?
पानी तो सब ऊपर से आता है। वह कुछ लाख साल में नीचे जमा हुआ है। इस धरती को सचमुच मिट्टी की बहुत बड़ी गुल्लक बनाकर दी है ऊपर वाले ने। जिसे अँग्रेज़ी में पिगी बैंक कहते हैं। पानी की एक-एक बूँद अन्दर डालते जाओ। सूरज की गर्मी से वह सारा ऊपर नहीं उड़ जायेगा। नीचे ढक्कन लगाकर आपने उसे सुरक्षित रख लिया है। अब उसको जब ज़रूरत पड़े तो थोड़ा-सा निकाल लो इस्तेमाल करने के लिए। अभी हम सोचते हैं कि इन्द्र ने जो चुटकी चलायी हम तो एक चुटकी में पानी निकाल लें। हमने अपनी धरती को छेदने का काम शुरू किया, छलनी बना दिया—जगह-जगह बोरिंग, ट्यूबवैल खोदकर। पहले तो कुआँ बनता था तो हाथ से पानी खींचना पड़ता था। थोड़े हाथ भी अच्छे होते थे। लेकिन फिर बिजली आ गयी। अब तो बटन दबाने में थकते नहीं हैं तो 100 बाल्टी पानी निकाल लिया। नीचे का अपना खज़ाना हमने खाली करना शुरू कर दिया। और अब हमारे शहरों में और गाँवों में भी पानी के स्तर की बहुत बुरी स्थिति है। आँकड़ों को छोड़ दीजिये। अँग्रेज़ी में शब्द चलता है—उसको डार्क ज़ोन कहते हैं। किसी-किसी इलाके का पानी इतने नीचे चला गया कि अब उसे ऊपर लाने में आँसू बह जायेंगे लोगों के। और यदि इसको बचाने का कोई ईनाम होता हो भारत सरकार का या आप सबका तो वह बिजली विभागों को दिया जाना चाहिए। चौबीस घण्टे की बिजली नहीं देते। यदि चौबीस घण्टे की बिजली होती तो हम बटन दबा-दबाकर पूरा पानी खत्म कर देते।
पहले 200 फीट में पानी मिल जाता था। अब 300, 400, 500 फीट तक पहुँच गया है। इसमें क्या खतरे हैं?
शायद कुदरत ने हमें इतने नीचे तक जाने की इजाज़त नहीं दी थी। इसके नीचे मत जाना, क्योंकि इसके नीचे हमने कुछ और ज़हरीली चीज़ें भी रखी हैं। शायद हमारे लिए रखी हों—चेतावनी देने। अब हम जब उससे भी नीचे जा रहे हैं तो कहीं हमें फ्लोराइड मिल रहा है, कहीं आर्सनिक मिल रहा है—पानी में। ये ज़हर है और ये ज़हर हमारे लोग पी रहे हैं। इसका बहुत बुरा असर हो रहा है। और इसको हमारा कोई नया साईंस, कोई टेक्नोलॉजी रोक नहीं पायेगी, इसका ईलाज नहीं है।
अच्छा शहरों में हम ये भी देख रहे हैं कि हर जगह सीमेंट लगा दिया है। इससे तो मिट्टी बची ही नहीं जिससे कि पानी जज़्ब हो और जमा हो। अब तो सब टाइल्स हो गया है।
सब टाइल्स हो गया है। इसके कारण पानी ज़मीन के नीचे जाना बन्द हो गया है। हरेक काम हम इस समय सोच-समझकर, प्लानिंग से ऐसा कर रहे हैं—पानी को हम से दूर करते जा रहे हैं। रिश्ता हमारा टूटता जा रहा है। अब पानी हमें याद दिला रहा है कि सच्चाई तो पानी की कीमत की है। ज़मीन की कीमत ज़रूर रखो, लेकिन पानी की कीमत याद रखो। पानी अब कह रहा है—मैं जीतूँगा, अगर तुम सुधरे नहीं तो।
बिलकुल सही कहा आपने।
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