विनोद कुमार शुक्ल को 59वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा पर रवीन्द्र आरोही की टिप्पणी
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उन दिनों रेणु की कहानी ‘ठेस’ और शेखर जोशी की कहानी ‘कोसी का घटवार’ दिलो-दिमाग़ पर छाई रहती थी। उन्हीं दिनों की बात है कि भीतर कहीं एक बीज गड़ गया था। नायिकाएँ रोज़ कहानी की मालती-सी लगने लगी थीं। एक अँधेरे बंद कमरे में हम जवान हो रहे थे। अपनी ही सोच में थोड़ा अलग लगना, वह अलग लगने का सुख था। शहर से कमा कर लौटे रिटायर्ड चटकलियों (जूट मिल्स को चटकल कहा जाता है। चट यानि बोरा और कल यानि मशीन और उसमें काम करने वालों को चटकालिया) को उषा प्रियंवदा की वापसी की आँखों से जैसे हम देख पाते थे, वैसे कहाँ कोई देख पाता था।
ज्ञानरंजन के पिता को हम हर कहीं देख पाते थे। देखते–देखते हमारे आस-पास के सारे किरदार साहित्यिक हो गए थे। लगता था कि हम रंगमंच पर जी रहे हैं। प्रेमचंद थोड़े बाद में मिले पर उनके मिलने के पहले तक जाति को लेकर हमारे यहाँ एक जड़ता थी—दलित और सवर्ण वाली जड़ता—एक खाई थी। प्रेमचंद ने कोई साहित्यिक माहौल नहीं दिया। उनके मिलने से मैं आदमी बनने लगा। मेरे भीतर एक सामाजिक विद्रोह सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेमचंद से आया था।
हिन्दू-मुस्लिम की समस्या मेरे गाँव में पहले नहीं थी। सारे मुस्लिम बूढ़े सफ़ेद धोती पहनते थे। हिज़ाब नहीं था, वो बस उसके विशेष कार्यक्रमों में ही दीखता था। महिलाएँ चटक साड़ी पहनती थीं और हमारे घर के बीमार बच्चों के लिए मस्जिद से दुआएँ पढ़वाकर लाती थीं। बच्चे हमारे साथ होली खेलते थे। पकवान खाते थे। ईद में जब हम मेला जाते तो हमारे भीतर एक कसक रहती कि इनके जैसे साफ़ कपड़े हमारे नहीं थे और हमारे पास कोई कशीदेकारी वाली टोपी नहीं होती थी। सब कुछ इतना एकमेक था कि अलग कुछ नहीं था। हमारे गाँव से कोई लड़की विदा होती तो उसका आँचल सबके आँसुओं से भींगा होता।
पर यह सब सिर्फ़ था, अब नहीं है। अब जब भी कुछ लिखने बैठता हूँ तो एक अजीब किस्म के भार का अनुभव होता है। उन दिनों को फिर नहीं लौटा पाया तो लिखना किस काम का। कलम रुक जाती है।
यह सब कुछ इसलिए यहाँ लिखना हो पाया कि जो साहित्यिक बीज मेरे भीतर पड़ा था उसमें लिखने का पहला अंकुरण तब आया, जब मैंने निर्मल वर्मा को पढ़ा। लगा कि बस यही शिल्प है जिसमें मुझे फूटना है। पर वह अंकुरण जमीन के भीतर था।
वर्षों बाद जब मैंने ‘नौकर की कमीज़’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ को पढ़ा तो उस बीज के दो पत्ते बाहर आये और लगा कि दुनिया बहुत बड़ी है। इसकी कोई हद नहीं है।
सच कहूँ तो विनोद जी ने मुझे बस ये विश्वास दिया कि आप कुछ भी लिख सकते हैं, कैसे भी लिख सकते हैं। सच कहूँ मैंने पहली बार आकाश विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य से देखा था—और लगा था कि बस और कुछ नहीं, सिर्फ़ उड़ना है, कोई नियम, कोई बंधन नहीं। असीम।
एक प्रेमचंद जिसका आसमान भी जमीन की तरह दीखता है और एक विनोद कुमार शुक्ल जिसकी जमीन भी आसमान की तरह दीखती है।
— रवीन्द्र आरोही
लेखक की अनुमति से उनकी फेसबुक वॉल से साभार
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