मधु कांकरिया की ढाका डायरी

मधु कांकरिया की नवीनतम पुस्तक ‘मेरी ढाका डायरी’ की ओमा शर्मा द्वारा समीक्षा

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कहानी और उपन्यास लेखन में मधु कांकरिया एक चर्चित और सुपरिचित नाम है। उनकी रचनात्मक सक्रियता अक्सर चौंकाती है। वे नए विषयों पर एक जिज्ञासु की तरह प्रवेश करती हैं और उनकी अपनी तरह से आजमाइश करती रही हैं। लेकिन इस बार उनकी नई किताब, कहानी और उपन्यास से हटकर, कथेतर की है जिसे उन्होंने बांग्लादेश-ढाका प्रवास के दौरान हुए अनुभवों-निरीक्षणों के सहारे बुना है और जो डायरी के थोड़े उदारवादी शिल्प में है। उदारवादी यूँ कि यह उस तरह तारीखवार नहीं है जैसा यह विधा अक्सर लिए होती है। (याद करें आर. के. नारायण की ‘माई डेटलेस डायरी’)

यह सुखद है कि हिन्दी में इधर कई महत्वपूर्ण डायरियाँ प्रकाशित हुई हैं जो कभी लेखक के अंतर्जगत को किंचित उधेड़ती जाती हैं तो कभी उसके बाह्यजगत को। मधु कांकरिया की किताब इस अर्थ में थोड़ी अलग है कि यह हमारे पड़ोसी मुल्क की एक पूरी सभ्यता की निजी झलक देती है। 

हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश भाषा और संस्कृति के स्तर पर भारत के साथ बहुत कुछ साझा करते हैं। वस्तुत: तीनों एक ही सभ्यता-संस्कृति से उपजे समाज हैँ। लेकिन हम इन पड़ोसी देशों, उनके जनजीवन, उनके लोगों के आत्मसंघर्ष, परेशानियों, उनके सपनों और मुश्किलों के बारे में—राजनीतिक कारणों के चलते—निजी निगाह की सहूलियत से कम ही जानते हैँ। हमारे कुछ लोग, लेखक/पत्रकार जो एक पर्यटक की तरह वहाँ जाते हैं, फौरी तौर पर अपने देखे-जाने अनुभवों और निरीक्षणों को दर्ज करते रहे हैं। उनमें एक रहवासी-नागरिक के तौर पर ठहरकर देखने-समझने का अवकाश कम होता है। इस श्रमसाध्य पुस्तक को पढ़ते हुए हमें लेखक से सामाजिक सरोकारों और उसकी कलागत जिज्ञासाओं के बारे में बहुत कुछ हासिल होता है।

मधु कांकरिया एक किसी नए समाज, नए परिवेश में जाने के बाद  कैसे वहाँ के जनजीवन, धार्मिक-व्याप्तियों, संस्कृति, पुरातन और आधुनिकता के टकराव और भू-राजनीति आदि में सहजता से प्रवेश करते हुए कुछ निजी और अनूठा-सा निकाल लाती हैं। इसके लिए वे बड़ा ताम-झाम नहीं करती बल्कि सीधे-सीधे निजी स्तर पर जीवन में प्रवेश करती हैं: कभी बाजार, कभी ऐतिहासिक स्थलों, कभी मन्दिर, कभी विश्वविद्यालय, कभी बेटे के मित्रों से वार्तालाप के दौरान तो कभी अपने ड्राइवर या घरेलू सहायकों से बातचीत। उनके निष्कर्ष का आधार जमीनी स्तर पर बिखरी वास्तविकताएँ हैं। एक तरह से यह मधु कांकरिया की सीमा भी है लेकिन इसके तहत वे उस समाज और जीवन के बारे में जो चीज़ दर्ज कर पाती हैं, वह गौरतलब है। 

हम जानते हैं कि बांग्लादेश का अस्तित्व उसकी भाषा और संस्कृति के कारण हुआ लेकिन उस भाषा और संस्कृति की सलवटों के नीचे जो कलह-कलेश चल रहा था, लेखक उसे उघाड़-खंगाल डालती हैं। उनकी खोजी वृत्ती उन्हें उन इलाकों में ले जाती है जहाँ पर बिहार से गए मुस्लिम उर्दूदाँ थे और आज़ादी से पहले पाकिस्तान द्वारा पोषित थे लेकिन बांग्लादेश के उदय के बाद जिन्हें एक दोयम दर्जे की नागरिकता झेलनी पड़ी है। वे हमें वहाँ के युवकों के सऊदी अरब या बाहर पलायन के बाद बांग्लादेशी समाज में होने वाले प्रभावों के बारे में बताती हैं, वे हमें बांग्लादेश की कानून और न्यायिक व्यवस्था पर बात करते हुए समांतर रूप से भारत की कानून व्यवस्था की भी बात करती हैं। 

वे निजी जोखिम उठाते हुए दूर-दराज के मदरसे देखने चली जाती हैं, वे नोआखली को भी देखती है जहाँ गांधी जी ने विभाजन के समय हुए दंगों के बीच अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर वह कर डाला था जो हजारों लोगों की पुलिस फोर्स करने में असमर्थ थी। वे हमें चिटगाँव के उस गुमनाम नायक मास्टर सूर्यसेन के उन खदेड़े अवशेषों की भी तलाश में ले जाती हैं जो वहाँ से कब से गुम कर दिए गए हैं। वे वहाँ के अल्पसंख्यक हिन्दुओं के भविष्य और डरों से मुकाबिल कराती हैं और उन्हें भारत के अल्पसंख्यकों के समांतर तौलती जाती है—जीवन की जटिलताओं और आपसी मुश्किलों के बरक्स।

डायरी लेखन से जो ईमानदारी और किंचित साहस की अपेक्षा पाठक रखता है, मधु कांकरिया उसका भरपूर निर्वहन यहाँ  करती दिखती हैं। मुझे देखकर अच्छा लगा कि वे स्त्री के प्रश्नों पर निरपेक्षता और गहराई से बांग्लादेश के समाज को परखती हैं। स्त्रियों का यह पक्ष वहाँ की धार्मिकता से भी जुड़ा है; जैसे बच्चियों को शुरू से ही बुर्के पहनाने की परम्परा को वे सहज साहस से इसलिए दर्ज़ कर पाती हैं क्योंकि इसी के समांतर हुए और उतने ही साहस से वे हिन्दू समाज की कुरीतियों और आडंबरों को भी करती है। कई स्थलों पर अपने लेखकीय स्वभाव के कारण घर-परिवार में अकेले होते जाने के आत्मसंशय को भी साझा कर डालती है। 

कथा-कहानी के बरक्स, डायरी लेखन में एक लेखक की नज़र और व्यक्तित्व अधिक सक्रियता से उपस्थित होते हैं लेकिन  मधु कांकरिया अपने निजी आग्रहों के साथ बिंदास डटी रहती हैं। बांग्लादेशी अल्पसंख्यक समुदाय के डरों को भारतीय अल्पसंख्यकों के डरों से जोड़ते हुए वे कहती हैं कि “धर्म की बुनियाद पर सभ्यताएँ समय के साथ जीवन विरोधी होती जाती है।” इस तरह के निष्कर्ष पुस्तक को अलग गुणवत्ता देते हुए उनके आग्रहों की आपूर्ति सी कर देते हैं। अपनी अनेक बारीकियों को समेटे ‘मेरी ढाका डायरी’ हिन्दी पाठकों को बांग्लादेशी समाज, उसके संघर्ष और जटिलताओं के बारे में कई स्तर पर समृद्ध करती है। 

मधु कांकरिया ने कोरोना संकट को पुस्तक में अच्छी खासी जगह दी है जो वस्तुत: लेखकीय कम, पत्रकारिता किस्म का लेखन अधिक लगता है। जिस तरह से कई स्त्री-गाथाओं को पुस्तक में जगह दी गई है उसे संक्षिप्त किया जा सकता था क्योंकि स्त्रियों की वह छटपटाहट... विवाह न होने के संकट, पति की बेवफ़ाई या ठुकराए जाने के सन्दर्भ आदि उतने ही भारतीय या दूसरे समाजों में मिल जाएंगे जितना की बांग्लादेशी समाज में। इसलिए पुस्तक में दर्ज बांग्लादेशी समाज-निरीक्षण के आख्यान में किंचित व्यवधान सा लगता है।

पुस्तक में यह भी अच्छी बात लगी कि जीवन के सन्दर्भों को देखते हुए मधु जी कला और जिजीविषा के प्रश्नों को भी अपनी नज़र के दायरे में रखती हैं और उनकी पड़ताल उसके साथ-साथ आत्म-सन्देह की भूमि पर बने रहकर करती जाती है। कुल मिलाकर यह एक महत्वपूर्ण किताब है। महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य।

 

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[लेखक की फेसबुक वॉल से साभार]