नामवर सिंह : बातें कुछ अपनी, कुछ अपनों की

नामवर सिंह के जन्मदिवस पर पढ़ें, आशीष त्रिपाठी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘जीवन क्या जिया’ से एक अंश

---

मैं हाईस्कूल में था। कक्षा नौ में पढ़ रहा था। बहुत बीमार पड़ा। यह सन् ’44 की घटना होगी। इसी के आसपास कुछ ही दिनों बाद पिताजी बीमार पड़े। हार्निया की शिकायत थी। गाँवों में जैसा इलाज होता है, वैसा ही हो रहा था। और उसी समय उनका ट्रांसफर भी हो गया था। बड़ी परेशानी में थे। घर में तय हुआ कि मेरी शादी कर देनी चाहिए। मैं पढ़ना चाहता था और चूँकि मुझको शहर की हवा भी लग चुकी थी, मैंने कहा, ‘मैं शादी नहीं करूँगा।’ 

पिताजी सोचते थे कि कहीं वह मर जाएँ और इसकी शादी ही न हो। जल्दबाजी में उन्होंने मेरी शादी तय कर दी। मैं घर से भाग आया। लेकिन पकड़कर लाया गया। हाईस्कूल का इम्तिहान खत्म हुआ था और मेरी शादी कर दी गई। यू.पी. से लगा हुआ बिहार का बॉर्डर है दुर्गावती नदी के किनारे बसा हुआ गाँव मचखिया, वहीं मेरी शादी हो रही थी और मैं रो रहा था।

बहुत दिनों तक इस शादी को मैंने स्वीकार नहीं किया। वह अलग कहानी है। गौने के बाद मेरी पत्नी आईं। 1945 में मेरी शादी हुई थी, ’48 में मेरा पहला पुत्र हुआ। दूसरी सन्तान बीस साल बाद 1968 में हुई—बेटी।

पिताजी ने मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह किया था, सही है, लेकिन उसका दंड मेरी पत्नी भोगे, यह उचित नहीं, यह मैं जानता था और जानता हूँ लेकिन जाने क्यों मन में ऐसी गाँठ थी कि मैं पत्नी को पति का सुख नहीं दे सका। आज तक। कारण जो हो, मैं उसका विश्लेषण नहीं करता, लेकिन इसका दुख तो मेरे मन में रहेगा ही कि इतना पढ़ने, लिखने, समझने, मानवीय संवेदना की बातें करने के बावजूद मैं अपनी पत्नी को सुख नहीं दे सका।

मैं पारिवारिक आदमी तो नहीं रहा लेकिन एक दूसरी तरह के परिवार ने मुझे सहारा दिया। मित्रों का परिवार। दिल्ली अजीब शहर है। पराया है। पूरब वालों के लिए तो खास तौर पर। मैं 1965 में यहाँ आया था और किराये का मकान लेकर रहता था। कुछ ऐसे परिवार थे जिनसे मेरे पुराने सम्बन्ध थे। कुछ नये सम्बन्ध बने। एक परिवार था राजेन्द्र-मन्नू का। मैं मॉडल टाउन में रहता था, ये शक्तिनगर में रहते थे। राजेन्द्र-मन्नू का घर ऐसा था, जिसमें अपनापन मिलता था। लेकिन मैं दो लोगों का विशेष जिक्र करना चाहूँगा। एक हैं मेरे छात्र जीवन के सहपाठी मार्कंडेय सिंह। आजमगढ़ के रहनेवाले, आई.पी.एस. दिल्ली में नौकरी करते हुए भी कई बार मुझसे बनारस में मिल चुके थे। 

मैं दिल्ली आया तो जो लखनऊ रोड कहलाता है माल रोड के सामने, वहाँ वह रहते थे। साथ में भाभी जी, उनके बेटे-बेटी। मार्कंडेय सिंह का घर जैसे मेरा भी घर था। दिल्ली रहते हुए उन दिनों मैं अक्सर शाम को उनके यहाँ जाता था। छुट्टी वाले दिन कभी-कभी दो बार चला जाता था। आज भी हमारे-उनके वैसे ही सम्बन्ध हैं। वह विद्यानुरागी आदमी हैं। ‘आलोचना’ में मैंने जार्ज लूकाच के एक इंटरव्यू का उनके द्वारा किया गया अनुवाद छापा था : ‘प्राज्ञ’ नाम से। खास तौर से मार्क्सवाद का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। बाद में उनकी दिलचस्पी तंत्र में हुई...।

इसी तरह से एक दूसरा परिवार है डॉ. निर्मला जैन का। वह माल रोड पर रहती थीं और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती थीं। लिखती भी थीं और साहित्यकारों से उनके सम्बन्ध थे। उस परिवार में मेरा प्रवेश मेरे मित्र भारतभूषण अग्रवाल और बिन्दु जी के माध्यम से हुआ। बिन्दु जी भी बी.एच.यू. में पढ़ती थीं तो भारतभूषण जी उनसे मिलने बनारस आया करते थे। तो उनके कारण निर्मला जी से परिचय हुआ।

निर्मला जी दिल्ली की रहने वाली हैं। बहुत व्यवहार-कुशल। जैन लोग वैसे भी बहुत प्रैक्टिकल होते हैं। आर्थिक मामले में महिलाएँ और ज्यादा। जीवन में अनेक व्यावहारिक समस्याएँ आती थीं तो उन्हें मैं निर्मला जी की सहायता से सुलझाता। आज भी ऐसे मामलों में वह बहुत सहायक हैं। निर्मला जी के भी सम्बन्ध राजेन्द्र यादव और मन्नू से थे। इसी तरह के कुछ और भी परिवार थे, देवीशंकर अवस्थी का, अजित कुमार का, विश्वनाथ त्रिपाठी का...।

मेरे जीवन में परिवार का सुख नहीं रहा लेकिन दिल्ली में मुझे जो ये परिवार मिले, अविस्मरणीय हैं। मुझे अपने मित्रों से घर का वातावरण मिला। रोजमर्रा के जीवन में, सुख-दुख में काम आनेवाला सम्बन्ध मिला। मैं अपना सौभाग्य मानूँगा कि परिवार की कमी दिल्ली में पूरी हुई, वरना मैं भी बोहेमियन होता, जैसाकि दिल्ली में आकर बहुत-से लोग हो गए।

जिन परिवारों ने मुझे सँभालकर रखा, उनमें प्रमुख हैं : श्रीमती शीला सन्धू और उनके पति हरदेव सन्धू का परिवार। कम्यूनिस्ट पार्टी के मेम्बर रहे हैं ये लोग। राजकमल प्रकाशन के नाते इनसे मेरे लेखक-प्रकाशक के, सम्पादक के सम्बन्ध तो बने, उससे आगे पारिवारिक सम्बन्ध भी बने। 

शीला जी बड़ी ही रौशनखयाल, प्रबुद्ध, साहित्य-प्रेमी, पंजाबी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य खूब पढ़नेवाली महिला हैं। उनके यहाँ अक्सर शाम को जुड़ाव होता था। राजेन्द्र, मन्नू, निर्मला जी तो वहाँ आते ही थे; भारत जी, निर्मल जी अपने परिवार के साथ आते थे। कृष्णा सोबती आती थीं। तो यह पारिवारिक जमावड़ा जैसा होता। दिल्ली में मेरा पहला ऑपरेशन अपेंडिक्स का हुआ। ऑपरेशन के बाद हफ्ते-पन्द्रह दिन के लिए देखभाल की जरूरत थी तो शीला जी अपने घर ले आई थीं। यह मैं नहीं भूल सकता। यह ऐसी बात थी कि हृदय कृतज्ञता से भर जाता है। 

ऐसा नहीं कि नाशुक्रा हूँ, बस, कभी जिक्र करने का मौका नहीं आया। लेकिन मैं सोचता हूँ कि उम्र के जिस बिन्दु पर मैं पहुँचा हूँ, वहाँ आकर सारी कृतज्ञताएँ प्रकट कर देनी चाहिए।

भवभूति का एक श्लोक याद आता है : 

न किंचिदपि कुर्वाण: सौख्यैर्दु:खान्यपोहति।

तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जन:॥

मित्रता की इससे अच्छी परिभाषा नहीं हो सकती। बिना कुछ किए, सौख्य मात्र से ही सारे दुखों को दूर कर देता है। ऐसे मित्र अनिर्वचनीय उपलब्धि हैं आपके जीवन की। ये हमारे जितने मित्र हैं, उनसे खटपट भी होती रहती। गलतफहमियाँ भी होती रहती थीं। राजेन्द्र यादव को तो मेरी बेटी ‘दुश्मन’ नाम से जानती है। लेकिन यह वैसा ही दुश्मन है, जैसा अश्क का ‘मंटो मेरा दुश्मन’। यद्यपि राजेन्द्र मंटो नहीं हैं। जाहिर है कि अश्क होना मेरे लिए कोई स्पृहणीय बात नहीं है। खैर, यह सब तो होता ही रहता है। सच्चाई यह है कि मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे जैसे भाई मिले, उसी तरह के मित्र मिले।

इस प्रसंग में मैं कहना चाहूँगा कि मेरे दो ऐसे गैर-साहित्यिक मित्र हैं जो मुझको मुझसे भी अधिक जानते-समझते हैं। एक हैं एडवोकेट नगेन्द्र प्रसादसिंह। बनारस के। यह हमारे कक्षा पाँच के सहपाठी हैं। अकेले वही हैं जो मुझे डाँट सकते हैं और मैं चुप लगा जाता हूँ। मेरी तीखी आलोचना कर सकते हैं। मेरे प्रशंसक नहीं हैं वह। वह मुझे ‘तुम’ कह सकते हैं, बल्कि ‘तुम’ कहकर ही बुलाते हैं। वह ‘नामवर’ नाम से बुलाते हैं। ‘सिंह’ कभी नहीं बोलते हैं। इस तरह पुकारने वाले दूसरे हैं मार्कंडेय सिंह। हम भी उनको केवल मार्कंडेय कहते हैं। भूतपूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर। वकील साहब नगेन्द्र प्रसाद सिंह से मैं महीनों नहीं मिलता। वह बनारस में रहते हैं, मैं दिल्ली, लेकिन ऐसा लगता है कि हम लोग कल ही मिले थे शाम को।

इसी तरह परिवार में भी एक व्यक्ति ऐसा मिला—मेरा भाई काशीनाथ, जो इन दोनों मित्रों से भी ज्यादा मुझे समझता है और आर-पार मुझे देखता रहा है। उसने सबसे ज्यादा निकट से मुझे देखा और जाना है और मुझे बिना बतलाए मेरी बहुत-सी भूलों को—गलतियों को क्षमा भी कर देता है। मैंने कभी अपने गुरुदेव हजारीप्रसाद द्विवेदी से पूछा था, ‘सबसे बड़ा दुख क्या है?’ बोले, ‘न समझा जाना।’...‘और सबसे बड़ा सुख?’ मैंने पूछा। फिर बोले, ‘ठीक उलटा! समझा जाना।’ 

अगर लगे कि दुनिया में सभी गलत समझ रहे हैं लेकिन एक भी आदमी ऐसा है जिसके बारे में तुम आश्वस्त हो कि वह तुम्हें समझता है तो फिर उसके बाद किसी और चीज की कमी नहीं रह जाती। इस दृष्टि से मैं बहुत आश्वस्त हूँ और निश्चिन्त भी। वह इस कारण है कि एक आदमी है जो मेरे निकट का है, संयोग से मेरा भाई है, वह मुझे जानता है।

 

[नामवर सिंह की पुस्तकें यहाँ से प्राप्त करें।]