परफ़ैक्शनिस्ट प्रकाशक—ओंप्रकाश

राजकमल प्रकाशन के सह-संस्थापक व सम्पादक और राधाकृष्ण प्रकाशन के संस्थापक ओंप्रकाशजी के जन्मदिवस पर पढ़ें, राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘सबद रमन्ता सबद गुणन्ता’ का एक अंश। यह पुस्तक ओंप्रकाशजी के सन् 47 से 79 के बीच लिखे गये लेखों का ऐसा संग्रह है जिसमें उन्होंने साम्प्रदायिकता के स्वरूप और प्रभाव से लेकर भारतीय प्रकाशन के विभिन्न पहलुओं पर गहराई और प्रमाण के साथ विचार किया है।

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हम मानकर चलते हैं कि हिन्दी प्रकाशक बेपढ़ा-लिखा, दुनिया से बेखबर और सिर्फ़ पैसों पर निगाह रखने वाला कुछ लिजलिजा-सा ऐसा प्राणी होता है जो कभी किसी जगह एजेण्ट था और जगह-जगह किताबें बेचा करता था। ओंप्रकाशजी इस तसवीर को तोड़ते ही नहीं, उससे घृणा करते थे। साहित्यिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक—हर मामले में दुनिया की नवीनतम गतिविधियों से परिचित वे भाषा और साहित्य के किसी भी मसले को प्रबुद्ध कहने वाले लेखकों के मुक़ाबले अधिक समझते थे। 

सही है कि व्यवसाय को उन्होंने साध लिया था और वह सब-कुछ भी किया था जो इसमें होता है, मगर अपनी मूल मानसिक बनावट में वे हमेशा अत्यन्त जागरूक बुद्धिजीवी और कलाकार थे। हर चीज़ को बहुत बड़े धरातल पर सोचते थे और छोटी-से-छोटी बात को लेकर परफ़ैक्शनिस्ट हो जाते थे। अपने प्रकाशन के विज्ञापनों, सूचियों और फ़्लैप मैटर पर जितनी मेहनत करते थे, मैंने खुद को और साथी लेखकों को अपनी रचनाओं पर करते नहीं देखा। पाण्डुलिपियों पर उस तरह की मेहनत और ख़र्चा तो शायद कोई भी भारतीय प्रकाशक नहीं करता। बड़ा और निर्दोष—यही उनका खब्त था। “देखिए, अमुक पाण्डुलिपि को मैंने उन साहब को दिखाया हैउस रचना के स्कैच या कवर-डिजाइन मैंने वहाँ से बनवाकर मँगाये हैं—आर्टिस्ट को वहाँ फ़लाँ मूर्ति या पेंटिंग दिखाने ले गया कि मुझे इस आधार पर डिजाइन चाहिए... ‘मेरी टायलर’ की फ़ोटो और हस्ताक्षर के लिए आज ही केबुल किया है—रात को उन साहब से बातें करूँगा…” दिमाग़ में एक बात बैठ जाये तो वे उसके लिए कलकत्ता, बम्बई, लन्दन, न्यूयार्क कहीं भी जा सकते थे और कितने भी पैसे ख़र्च कर सकते थे। जाने कितने फ्लैप, छपे-छपाये कवर, पुस्तकों के फ़र्मे उन्होंने खर्चा बरदाश्त करके नष्ट कर दिये... उनकी ज़िन्दगी भर की कशमकश कलाकार और व्यवसायी के बीच सन्तुलन बनाये रखने की थी।

उन दिनों तो नहीं, लेकिन अब यह सब लिखते हुए मुझे उनकी मानसिक बनावट बहुत-कुछ जवाहरलाल नेहरू जैसी लगती है। जो कुछ है उससे भयानक असंतोष और सब-कुछ को जल्दी-से-जल्दी बदल डालने की अधीर तड़प—एक स्वप्न और विज़न के अनुरूप सारी स्थिति को ढाल देने की उतावली, धीमी गति या रुकावटों को लेकर झुंझलाहट और फिर डिप्रेशन या ‘भाड़ में जाये सब’ के उदासीन अन्तराल। 

शायद यही निष्ठा और झख थी कि उस अकेले व्यक्ति ने हिन्दी-प्रकाशन के नक्शे को आमूल बदल दिया। ‘हिन्दी-सेवी’ नुमा जाहिलों और गद्दी लगाकर बैठे मुंशी-छाप प्रकाशक को एकदम आधुनिक रूप-रंग और मिजाज़ देने का एकमात्र श्रेय ओमजी को ही है। पाण्डुलिपियों पर परिश्रम, अधिकारियों से उनका मूल्यांकन, मुद्रण-शुद्धता और कलात्मक रूप-रंग देने से लेकर लेखकीय सम्मान, उन्हें बाक़ायदा रॉयल्टी या पारिश्रमिक देने का प्रारंभ, प्रकाशन-गोष्ठियाँ, विचार-चर्चाएँ और प्रचार-प्रसार—यह सब दसियों बरस सिर्फ़ उनके साथ ही जुड़ा रहा है।

रचनात्मक साहित्य के वैचारिक धरातल की आधार-पत्रिका ‘आलोचना’ हो, या सुरुचिपूर्ण साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने के लिए ‘राजकमल पॉकेट-बुक्स’ की योजना; व्यवसाय जगत की पत्रिका ‘प्रकाशन-समाचार’ हो, या कथा-लेखक की आन्दोलन केन्द्र ‘नई कहानियाँ’—सभी का प्रारंभ तो ओंप्रकाशजी ने किया था। बाद में तो कुछ की केवल निरन्तरता बनाये रखी गयी। 

सही है कि कुछ में वे सफल हुए, कुछ में असफल; कुछ के लिए वातावरण तब उतना पका नहीं था तो कुछ के लिए साधन नाकाफ़ी थे। मगर हर समय कुछ-न-कुछ नया करने का साहस, झख और पहलक़दमी, हर नयी रचनात्मकता से जुड़े होने की बेचैनी और योगदान.. बेशक ‘राजकमल’ उन दिनों सिर्फ़ प्रकाशन ही नहीं, एक जीवन्त संस्था और विचार-मंच था। कितने उठते हुए सशक्त लेखकों को ओंप्रकाशजी ने अपने साथ ले लिया था—रेणु, भारती, राकेश, मार्कण्डेय, कमलेश्वर, नागार्जुन, दुष्यन्त, मैं, मन्नू, उषा प्रियंवदा, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, निर्मल वर्मा, नामवर, शिवदान सिंह चौहान—कौन-सा युवा लेखक था जो किसी-न-किसी समय ‘राजकमल’ के साथ न रहा हो... और इस सारी गहमागहमी या रचनात्मक खलबलाहट और साहित्यिक राजनीति के केन्द्र में थे ओंप्रकाशजी, विभिन्न ईर्ष्याओं, स्पर्द्धाओं और ऊर्जाओं के बीच सन्तुलन बनाये, साधन और सहयोग के स्रोत की तरह सब-कुछ समझते और सबका हिस्सा बन कर जीते हुए। 

सारी परेशानियाँ, अन्दरूनी और बाहरी तनाव और सन्तोष-असन्तोष के बावजूद वह ओंप्रकाशजी का स्वर्ण-काल था। जहाँ तक मेरी जानकारी है, शायद छायावाद काल में ऐसी साहित्यिक हलचलों का केन्द्र ‘भारती-भण्डार’ भी नहीं बन पाया था—हालाँकि उस प्रवृत्ति की सारी रचनाएँ लगभग वहीं से आयी थीं—निराला, पंत, प्रसाद, महादेवी, भगतीचरण वर्मा, इलाचन्द्र जोशी, सभी तो थे। उधर स्वतंत्रता के बाद की सारी प्रतिभाएँ ‘नयी कविता’ और ‘नई कहानियाँ’ के माध्यम से जिस तरह ओंप्रकाशजी के आस-पास सिमट आयी थीं—वैसा पहले कब हुआ था? न दुलारेलाल भार्गव के जमाने में और न ही श्री वाचस्पति पाठक के काल में।

—राजेन्द्र यादव