राजकमल ब्लॉग में प्रस्तुत है, पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक ‘आँसू और रौशनी : आलोकधन्वा से संवाद’ के चुनिंदा अंश
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आलोक धन्वा से मैंने पूछा: “भारत में इस समय सबसे बड़ी समस्या आपको क्या लगती है?”
बोले : “वही, जो मैंने वर्षों पहले हैदराबाद में एक खुली चाँदनी रात में महात्मा गांधी के पौत्र एवं विचारक राजमोहन गांधी, अंग्रेजी कवि अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा और हिन्दी कवि वेणुगोपाल के साथ टहलते हुए कही थी कि जनता आपके साथ नहीं है, तो आप कोई बड़ा परिवर्तन नहीं कर सकते। करेंगे, तो वह तात्कालिक होगा। ज्योति बसु इतने वर्ष बंगाल के मुख्यमंत्री रहे, तो इसलिए कि जनता मानती थी, वह हमारे सुख-दुख के साथी हैं। जिस किसी विचारधारा के जो भी हेडक्वार्टर्स हैं, वे अगर ‘मोनोपॉली’ [एकाधिपत्य] लाते हैं―बहुमत की भी ‘मोनोपॉली’ होती है—तो वह एक ऐसी चीज है कि खतरनाक है मनुष्य के लिए। फिर तो वही हो गया कि जहाँ से हम चले थे, वहीं पहुँच गए—कबीलाई, मध्ययुगीन या सामन्ती बर्बरता के समय में।
‘मोनोपॉली’ हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। वह ऐसी जगह हमें खड़ा करेगी, जहाँ हम सहज मानवीय जीवन नहीं जी सकते, वह हमें ऐसी जगह ले जाकर फेंकेगी, जहाँ हम घास भी नहीं उगा सकते। वह रेगिस्तान में फेंकेगी, जेल में डाल देगी, जंजीरों से जकड़ेगी, साइबेरिया भेजेगी, जहाँ चाहेगी, ‘एनकाउंटर’ में मारेगी― आप कितना भी कहें कि हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं, लेकिन वह आपसे अठारह घंटे काम करवाएगी, आपस में लड़वाएगी, नफ़रत और क्रूरता फैलाएगी—उसे नफ़रत और हिंसा ही सबसे प्रिय है—जनवादी ताक़तों को छिन्न-भिन्न करेगी, मनुष्य के हृदय की संवेदनशीलता और मस्तिष्क की कल्पनाशीलता को कुचल देगी। आपको वह कीचड़, बाढ़, अकाल और महामारी के बीच ही रखेगी।
मैं नहीं मानता कि कोरोना वायरस जैसी चीजें अपने आप पैदा होती हैं। ये महामारियाँ पर्यावरण के विनाश, आबादी के विस्फोट और विश्व बाज़ारों की शत्रुता का नतीजा हैं। जेलों में भयावह यातनाएँ दी गईं और आज भी दी जा रही हैं। बुद्ध और तोल्स्तोय क्या कह सकते थे किसी के लिए कि इन्हें ‘हैंग’ कर दो! बुद्ध तो नहीं चाहते थे कि किसी का नाख़ून भी उखड़े, लेकिन सिनेमा में आप देखते हैं कि वे किस-किस तरह से हमें मारना चाहते हैं। ‘स्पेस’ घट रहा है और जो नैसर्गिक सुन्दरता है, वह सामने नहीं आ पा रही। कभी हमारा एक ही स्वप्न था समाजवाद और हम सोचते थे कि मुठभेड़ के लिए हमारे पास एक स्थायी शक्ति हैं। अब हाल यह है कि हम खोते जा रहे हैं उस दुनिया को, जिसे हमने चाहा था।
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‘भागी हुई लड़कियाँ’ के सन्दर्भ में आलोकधन्वा कहते हैं: “बीसवीं सदी का वह रोमांटिक दौर यादगार है― उसमें मनुष्य पराक्रम की जिस ऊँचाई तक गया, कविता में भी उसी ऊँचाई तक गया। उसी को कहते हैं ‘रिवॉल्यूशनरी रोमांटिसिज्म’।
कोई नई बात आप शुरू करेंगे, अच्छाई की ओर जाने का जो रास्ता होगा, तो विरोध होगा उसका। सावित्रीबाई फुले ने स्कूल खोला लड़कियों के लिए, उसके पहले तो कहा जाता था कि स्त्रियाँ वेद नहीं सुन सकतीं। वेद नहीं सुन सकतीं, तो क़ुरान भी नहीं सुन सकतीं। शरतचन्द्र ने ‘चरित्रहीन’ जैसे उपन्यास लिखकर ज़ंजीरें तोड़ीं, तो कहा गया कि इनकी किताबों पर पाबन्दी लगाओ, ये समाज को भ्रष्ट कर देंगे। उन्होंने पाठकों को उन स्त्रियों से परिचित कराया, जो सही थीं, पूरी तरह नैतिक थीं, लेकिन सामन्तवाद के चलते अच्छी नहीं मानी जाती थीं। असंख्य लोग उमड़े शरतचन्द्र के समर्थन में, जो उनके लेखन में अपनी मुक्ति देखते थे। अच्छे लेखकों ने उनका साथ दिया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर उनसे मिलने गए।
उनकी अद्भुत जीवनी लिखी विष्णु प्रभाकर ने―‘आवारा मसीहा’—मगर हिन्दी के सत्ता-प्रतिष्ठान ने उसका स्वागत नहीं किया। हिन्दी के लोगों ने तो रवीन्द्रनाथ ठाकुर का सम्मान भी नेहरू, निराला और हजारीप्रसाद द्विवेदी के कारण किया, ख़ुद से नहीं।
अभिव्यक्ति की आज़ादी जब हम माँगते हैं, तो उसका यही मतलब है कि सत्य की अभिव्यक्ति पर प्रतिबन्ध है। रोम में ब्रूनो को ईसाई धर्म न्यायालय के आदेश से जिन्दा जला दिया गया, क्योंकि उन्होंने कहा कि सूर्य ब्रह्मांड के केन्द्र में है और हमारी पृथ्वी के अलावा और भी ग्रह हैं। बाद में उनके शिष्य गैलीलियो आते हैं और इस बात को ‘इंट्यूशन’ तक सीमित और अस्पष्ट नहीं रहने देते, बल्कि दूरबीन बनाकर इसे साबित करते हैं। बर्टोल्ट ब्रेष्ट ने नाटक लिखा : ‘लाइफ़ ऑफ़ गैलीलियो’ [मूल जर्मन शीर्षक Leben des Galilei]। ब्रेष्ट और आइंस्टाइन को नाजी जर्मनी से भागना पड़ा। आइंस्टाइन ने सापेक्षता के सिद्धान्त की खोज की। ये बड़े आविष्कार थे, जिन्होंने पूरी दुनिया बदल दी। उस समय सारे अच्छे वैज्ञानिकों के काम में इस बात एक ‘कोहेरेंट’ लय थी कि आदमी अपनी कूपमंडूकता से बाहर निकलकर प्रकाशित मुक्ति-मार्ग पर जा सके। कम्प्यूटर भी जब शुरू में आया, तो उसे सन्देह से देखा गया, लेकिन धीरे-धीरे उसने पूरी दुनिया से अपनी ‘रिदम’ बना ली।
जो सच है, वही विज्ञान है। आज़ादी की लड़ाई में हमारे वैज्ञानिक भी शामिल हुए। सत्यजित राय की फ़िल्मों में आपको यह वैज्ञानिक दृष्टि मिलेगी। ‘पथेर पांचाली’ में भाई-बहन अपू और दुर्गा में प्रेम कितना गहन है! मनुष्य में प्रेम की जो क्षमता है, वही अनन्त है। सारी चीजें नश्वर हैं, जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करती हैं, उसे आततायी बनाती हैं। शत्रुता के बरअक्स इनसान ने कविता का आविष्कार किया, जो रौशनी को सोखने में बहुत रवादार है।
एक कविता जो मैं अभी पूरी नहीं कर पाया हूँ, ‘पथेर पांचाली’ में ग़रीब पुरोहित की बिटिया दुर्गा पर लिखना चाहता हूँ कि उसकी मृत्यु का बदला कौन लेगा? बाढ़ आई हुई है और टाइफ़ॉयड हो गया उसे। और इलाज के अभाव में वह दम तोड़ देती है।
निपट असहायता के बीच मरती है दुर्गा―चारों ओर पानी ही पानी है, दवा की एक पुड़िया नहीं, अन्न का एक दाना नहीं। भूख और बीमारी से मरी वह। एक दुर्गा नहीं, हजारों दुर्गा मरीं, सामन्तवाद के कारण मरीं। आज के ज़माने की लड़कियाँ उनकी भयावह अमानवीय मौत का बदला लेंगी। मैंने लिखा है कि भूख और असहायता से मरने वाले बच्चों का निधन बहुत भारी होता है :
असमय निधन लोहे के गोलों की तरह ठोस, हृदयहीन
चारों ओर निधन
बच्चों का निधन
दूध के बिना निधन
गेहूँ के बिना निधन
कौन रोकता है दूध को बच्चों तक आने में
गेहूँ को कौन रोकता है
बाहर निकालो इस आततायी को
भोग करते हैं सामन्त और हमारे बच्चों को भूखा रखते हैं। एक बार अकाल पड़ा था, तो हमारे गाँव में ट्रक से बच्चों के लिए मिल्क पाउडर के पैकेट्स आते थे, अमीर लोग उनका एक हिस्सा अपने पास रख लेते। मेरी माँ उनसे कहती थी : “जिनके लिए आया है, उन्हीं को दो! नहीं तो पाप लिखेगा तुम्हारे नाम।”
‘पथेर पांचाली’ के ग़रीब पुरोहित के ज़िक्र से आलोक जी को नरोत्तमदास की कविता ‘सुदामा चरित’ के इस प्रसंग की याद आ जाती है :
हाय महा दुख पायो सखा तुम,
आए इतै न कितै दिन खोए।
देखी सुदामा की दीन दसा,
करुना करि कै करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयौ नहिं,
नैनन के जल सों पग धोए॥
और वह भावुक होकर कहते हैं: “मैं एक बार अपनी एक परिचिता मधु पन्त से मिला, तो इस कविता को पढ़कर उनकी आँखें डबडबा गईं और हमारी आँखें तो डबडबाने से भी आगे गईं। कृष्ण जैसा बड़ा आदमी रो रहा है! उनके पास सब कुछ था, लेकिन यह नहीं सोचा था कि उनका दोस्त इतना असहाय हो जाएगा। सुदामा के पाँव पखारते जा रहे हैं और रोते जा रहे हैं। आज मानव-सम्बन्धों की क्या हालत है? हम अपने दोस्तों के बीच ज़लील होते हैं और कृष्ण-सुदामा की-सी एक भी दोस्ती नहीं है हमारे पास! आदमी ठंड या गर्मी से नहीं टूटता, वह अपने रिश्तों को देखता है कि कितने खोखले हैं और अनुमान से कितने परे हैं, तो उसे चोट बहुत गहरी लगती है। हमने पाने का कम ही किया, खोया ज्यादा!”
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