कबीर, तुलसी, वृंद, रहीम और बिहारी आदि कवियों ने सदियों पहले अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि और मानव-स्वभाव की समझ की बुनियाद पर कुछ बातें कहीं, और इसके लिए उन्होंने कविता का जो रूप चुना, वह था— दोहा। दो पंक्तियों में गुँथी-गठी एक सम्पूर्ण कविता जो तीर की तरह जाकर हमारी चेतना में गड़ जाती है।
'सीपियाँ' में जावेद अख़्तर ने ऐसे ही कुछ दोहों को चुनकर उनके भीतर छिपे सत्य को आमफ़हम जबान में हर किसी के लिए सुलभ कर दिया है। जो बातें इनसे निकलकर आई हैं वे आज भी उतनी ही सच है, आज भी उतनी ही उपयोगी हैं, जितनी उस समय में थीं, और आगे भी उतनी ही सार्थक रहेंगी।
प्रस्तुत है जावेद अख़्तर की इस नवीनतम कृति के चुनिंदा अंश।

कबीर बहुत बड़े शायर, बहुत बड़े कवि थे। उनकी सोच कितनी ऊँची थी! लेकिन वो बहुत ऊँची-ऊँची बातें ज़िन्दगी की मामूली और रोज़मर्रा की चीजों के माध्यम से, आसानी से सबको समझ में आने वाली भाषा में समझा देते थे। अब इस दोहे को ही देखिए। इसमें उन्होंने लिखा है ‘जैसे खाल लुहार की’—तो यहाँ ‘खाल लुहार की’—का मतलब क्या है? बहुत से लोग जानते होंगे, और बहुत से नहीं भी जानते होंगे।
दुनिया बदल रही है। अब तो लुहार आपको दिखाई भी नहीं देते। बड़े शहरों में तो हर चीज़ दुकान से मिल जाती है। लेकिन पहले छोटी-छोटी दुकानें होती थीं लुहार की, जहाँ लुहार की एक भट्ठी होती थी, भट्ठी से चमड़े का एक बैग जुड़ा होता था, जिसे धौंकनी कहते थे। वो धौंकनी क्या होती थी! किसी जानवर की खाल का बहुत बड़ा-सा बैग; जैसे ऐयर बैग। वो उसको पुश करते थे। उसमें हवा भर जाती थी, फिर दबाने से उसमें भरी हवा भट्ठी में जाती थी। भट्ठी में रखा कोयला जल उठता था। उसके बाद लुहार उसमें लोहे को गर्म करता था और जो चीज़ आपको चाहिए, बनाकर दे देता था। तो वो धौंकनी जो मोटी खाल की होती थी। ये खाल लुहार की अपनी खाल नहीं है, यहाँ उस खाल का जिक्र है, जो कि उसके काम आई है, जिससे वो भट्टी को गर्म रखता है। लेकिन जाहिर है कि ये खाल अपने आप में बेजान थी। यह तो एक मरे हुए जानवर की खाल थी, इसके अन्दर कोई जान थोड़े न थी। ये तो एक बैग बन गई थी। लेकिन वो बैग यानी धौंकनी वैसे ही चलती थी, जैसे हमारे फेफड़ों में हवा आती-जाती है।
अब ये मायने समझ के देखिए :
जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।
मतलब वो जगह जहाँ लोगों में प्यार न हो, मोहब्बत न हो, वो जगह तो एक श्मशान की तरह है। लोग हँस रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं, बात कर रहे हैं, घूम रहे हैं, जैसे पार्टी हो रही है, लेकिन ये ऐसा ही है, जैसे वो बैग, वो धौंकनी साँस लेते हुई दिखाई देती है, उसमें हवा भरती है, बाहर जाती है, जैसे कि इनसान के लंग्स में। इनसान जब साँस ले रहा होता है तो ग़ौर से देखिए तो उसका सीना, उसका पेट मूव करता दिखाई देता है। उसी तरह से यह खाल भी मूव कर रही है। लेकिन दरअसल यह मरे हुए जानवर की खाल है। यह जीवित नहीं है, इसमें कोई रूह या आत्मा नहीं है।
उसी तरह वो लोग जिनके बड़े-बड़े घर हैं, जिनके पास दुनिया की हर चीज़ है—क़ीमती कारें हैं, बड़े-बड़े टेलीविज़न हैं, सारे गैजेट्स हैं, दौलत है, फ़र्नीचर है, मॉडर्न इटैलियन मार्बल के फ़्लोर हैं, लेकिन उस घर में प्यार नहीं है, रिश्ते झूठे हैं, अन्दर कोई किसी की परवाह नहीं करता, सब ऊपर-ऊपर का ढकोसला है, सब ऊपर-ऊपर की बातें हैं। तो ये ज़िन्दा नहीं हैं। ये लोग मर चुके हैं। इसलिए कि ज़िन्दगी का मतलब है मोहब्बत। ज़िन्दगी का मतलब है चाहत, विश्वास, एक-दूसरे पर यक़ीन। अगर वह मोहब्बत ही अन्दर नहीं रही, तो ये सब ढकोसला है, खोखला है, बेमानी है, निर्जीव है, इसमें ज़िन्दगी ही नहीं है। ये घर घर नहीं है। यह एक मरघट है जिसमें मुर्दे साँस लेते हुए दिखाई देते हैं। तो याद रखिए इस दोहे को :
जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।
जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिन प्रान॥
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तुलसीदास जी कहते हैं कि जहाँ आपके जाने से लोगों में ख़ुशी न हो, जहाँ लोगों की आँखों में आपके लिए मोहब्बत और इज़्ज़त न हो, वहाँ मत जाइए, भले वहाँ सोना बरस रहा हो!
देखिए, आजकल तो वाक़ई जहाँ सोना बरसे, वहाँ हम सब भागते हैं। मैटेरियलिज्म का टाइम है। उपभोक्तावाद का दौर है। बड़ी होड़ है, बड़ा मुक़ाबला है, कम्पीटीशन है—हर आदमी कामयाब होना चाहता है। सुख-सुविधा के सब सामान ख़रीदना चाहता है। हालाँकि, ये कोई बुरी बात नहीं है। आप अगर कुछ ख़रीदना चाहते हैं, हासिल करना चाहते हैं—ज़िन्दगी में आराम, सुख, चैन चाहते हैं, पैसा कमाना चाहते हैं—कोई बुरी बात नहीं है। अच्छी बात है। आपको जरूर यह अरमान रखना चाहिए। मगर सवाल उठता है कि ये सब हम करते क्यों हैं? आप भी करते हैं, मैं भी करता हूँ, लेकिन क्यों? इसलिए कि हम चाहते हैं कि दुनिया यह देखे और समझे कि हमने कुछ किया है, कि हम कहीं पहुँचे हैं। और हम खुद अपने दिल में यह महसूस कर सकें, अपने बारे में यह सोच सकें कि हमने जिन्दगी में कुछ हासिल किया है, हम कहीं पहुँचे हैं, हम कुछ हैं।
इनसान को अपने आप से बड़ी मुहब्बत है। हम सब अपने आप से बड़ी मुहब्बत करते हैं। और अपने से मुहब्बत अगर हम करते हैं तो हम अपनी इज्ज़त भी करते होंगे। तो सवाल यह है कि हमें ये जो हासिल करना है, अगर वह इस तरह से मिले कि अपनी ही नज़रों में हम गिर जाएँ, तो गड़बड़ है। अगर दूसरों की नज़रों में हमारे लिए इज्ज़त नहीं है, मोहब्बत नहीं है, और फिर भी हम वहाँ जा रहे हैं, फिर भी हम उनसे फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि हमारे मन में अपने लिए इज्ज़त रहे। कहीं-न-कहीं हम अन्दर से टूटेंगे, कमजोर होंगे। अपनी नज़रों से गिरेंगे। लाख हम अपने आप से छुपाने की कोशिश करें, अपने आप से झूठ बोलें कि नहीं वो तो मजबूरी थी, ये तो ऐसे ही लोग हैं। ये वो हम दुनिया भर के बहाने अपने आप से करते हैं, लेकिन सच यह है कि हमारी नज़र में भी हमारी इज़्ज़त कम होगी।
और जब आपकी नजर में अपनी इज़्ज़त कम होती है, तो आपमें आत्मविश्वास भी कम होता है। भले आप खुद को तसल्ली दें कि आपने जो किया इस वजह से किया, लेकिन यह आप की समझ में आ जाता है कि यह सेल्फ़ कॉन्फिडेंस झूठा है। जहाँ कंचन बरस रहा था, सोना बरस रहा था, वहाँ आप गए। यानी आप सोने की इज़्ज़त ज़्यादा करते हैं, अपनी कम! तो आपने अपना भाव गिरा लिया। और जब आपका भाव गिरता है, तो कहीं-न-कहीं आप अपनी नज़रों में भी गिरते हैं। और जब आप अपनी नज़रों में गिरते हैं तो कहीं-न-कहीं समाज को, दुनिया को भी यह पता चल जाता है कि इन्हें इतनी ज़्यादा इज़्ज़त देने की जरूरत नहीं है, ये कम में भी आ जाते हैं।
दुनिया की जो सबसे क़ीमती चीज़ है आपके लिए—वह हैं आप! आपका स्वाभिमान, आपकी सेल्फ़-रेस्पेक्ट। उस पर आँच नहीं आनी चाहिए।
आप दुनिया से निभाएँ भी, लेकिन आपमें एक तेवर रहे। मैं आपको बड़ा इंटरेस्टिंग क्रिस्सा सुनाता हूँ।
के. आसिफ़ साहेब, जिन्होंने ‘मुग़ले-आज़म’ जैसी फ़िल्म बनाई। वो एक अजीब तरह के आदमी थे, बड़े अलग तरह के आदमी। उनका अपना एक तेवर था। फ़िल्म रिलीज हो गई, बड़ी कामयाब हुई, बहुत तारीफ़ें हुईं। तो एक बड़ी पार्टी हो रही थी ड्रिंक्स वगैरह भी चल रहे थे तो नादिरा जी, जो एक बहुत अच्छी अदाकारा थीं, बहुत अच्छे-अच्छे काम किये फ़िल्मों में उन्होंने, वो ज़रा कुछ मूड में थीं, हाई थीं।
उन्होंने प्यार से आसिफ़ साहेब के एक असिस्टेंट का कोट का कॉलर पकड़ा और उसे खींचती हुई के. आसिफ़ के पास ले गईं और कहने लगीं—आसिफ़ साहेब इस लड़के ने आपसे बहुत कुछ सीखा है, ये लड़का बड़ा टेलेंटेड है, इसने आपका ज्ञान, आपकी विद्या, आपके काम का तरीका सीख लिया है और यह एक दिन बड़ा नाम पैदा करेगा, ये बहुत बड़ा आदमी बनेगा। तो आसिफ़ साहेब ने नादिराजी का हाथ हटाया उसके कोट से, उसके कोट का कॉलर ठीक किया और कहने लगे कि तुम सही कह रही हो, इसने मुझसे बहुत कुछ सीखा है, लेकिन एक बात और सीख ली होती, तो तुम इसके कोट का कॉलर पकड़कर खींचते हुए यहाँ तक नहीं ला सकती थीं।
क्या खूबसूरत बात है! यह तेवर जो है ज़िन्दगी में, ये सोने से कहीं अधिक क़ीमती है। जब आपको अपने ऊपर ये नाज़ हो, अपनी रेस्पेक्ट आप करें कि कोई भी फ़ायदा हो लेकिन जहाँ आँखों में मिलने की ख़ुशी नहीं है, जहाँ इज़्ज़त नहीं है वहाँ मैं नहीं जाऊँगा। वो फ़ायदा मुझे नहीं चाहिए। अगर इज़्ज़त चाहिए, स्नेह चाहिए, हर्ष चाहिए तो ये बात भी साथ में याद रखिए। यह वन-वे ट्रैफ़िक नहीं है। ये सड़क एक तरफ़ से नहीं चलती, दोनों तरफ़ से चलती है। आप सिर्फ़ माँगें मुहब्बत और इज़्ज़त, वो काफ़ी नहीं है। वाक़ई अगर चाहिए तो ये इज़्ज़त, ये मुहब्बत दूसरों को देनी भी होगी। अब इस दोहे को आइए दोबारा पढ़ते हैं :
आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
तुलसी वहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥
***

वृंद ने बड़ी अच्छी बात कही है और बड़े दिलचस्प तरीके से कही है, और जो सीख दी है वो बड़े मजे की है। वे कहते हैं कि अपनी-अपनी जगह हर आदमी कमाल का है। जब उसका वक़्त पड़ता है, मौक़ा आता है तो उसी का दाँव लगता है, उसी का काम होता है, उसी का हुनर काम आता है। जैसे कि पानी में अगर नदी क्रॉस करनी है तो गाड़ी जो है वो नाव पर रख दी जाएगी लेकिन जब किनारा आएगा और जमीन पर चलना है, तो नाव गाड़ी पर आ जाएगी। यहाँ नाव चली और वहाँ गाड़ी चली। अगर गाड़ी पानी में चलना चाहे तो डूब जाएगी, नाव अगर ज़मीन पर चलना चाहे तो टूट जाएगी, वक़्त वक़्त की बात है—कौन-कब किस काम आ जाए।
बहुत अच्छी बात है और ये बात समझने की है लेकिन बड़ी हैरत की बात है कि हम लोग यह बात भूल जाते हैं। लेकिन ये बात हमारे कुछ मिज़ाज में, कुछ संस्कार में शामिल है, कि जिसे कहते हैं टीम वर्क वो हममें ज़रा कम होता है। मैं ऐसा मानकर चलता हूँ कि एक आम हिन्दुस्तानी जो है उसका आइ-क्यू काफ़ी अच्छा होता है। हो सकता है वो पढ़ा-लिखा नहीं हो, गाँव का रहनेवाला हो, शहर का रहनेवाला हो वो अलग बात है, लेकिन अगर आप उसकी प्योर इंटेलिजेंस देखिए तो मुझे लगता है कि वो ख़ासा इंटेलिजेंट आदमी होता है। यही वजह है कि जो कहीं भी गया, तो उसने अपनी जगह बनाई है और कामयाब हुआ है।
लेकिन हममें एक गड़बड़ भी होती है जिसे हमें दूर करना चाहिए। वो ये कि टीम वर्क की स्पिरिट हममें कम है। ज़िन्दगी का जो रास्ता है उसमें मैदान भी आएँगे और नदियाँ भी आएँगी, तो कभी किसी इनसान की जरूरत आपको पड़ेगी, कभी उसे आपकी जरूरत पड़ेगी। लेकिन हम इस टीम वर्क में कमजोर हैं, उसकी वजह यह है कि हम या तो दूसरों पर उतना यक़ीन नहीं कर पाते जितना हमें करना चाहिए या हमको ऐसा लगता है कि हम अगर नाव हैं तो हम इस गाड़ी को क्यों पार करवाएँ, ये फिर आगे निकल गई तो और अगर गाड़ी हैं तो सोचते हैं कि मैं क्यों इस नाव को सहारा दूँ जिसे चलना हो चले।
ये एक तरह की स्पिरिट हममें है जिससे हम एक-दूसरे को सपोर्ट नहीं करते अगर सपोर्ट करते नहीं तो सपोर्ट पाते भी नहीं। दूसरी एक और बात है जो बड़ी वर्चु बनती है। लोग अक्सर बात करते हैं, कुछ लोग हैं जो चाहते हैं कि सब एक जैसे हो जाएँ। तरह-तरह के सेक्शन में मैंने भी देखा है कि वो चाहते हैं कि लोग एक तरह सोचें, एक तरह रहें, एक तरह खाएँ, एक तरह पिएँ, एक जैसे हो जाएँ, उनके कन्विक्शन एक हों, लेकिन एक हेल्दी समाज वही है जिसमें तरह-तरह की सोच के लोग हों।
ये बात अक्सर हमारे ध्यान से निकल जाती है कि ये अच्छा ही है कि हमारे पास वेरायटी हो, तरह-तरह के लोग हों, तरह-तरह के फ़नकार हों, तरह-तरह के टेक्नीशियन हों, तरह-तरह के फ़िलॉस्फ़र हों, साइंटिस्ट हों और उनका जो हुनर है वो एक-दूसरे से बिलकुल अलग हो जैसे नाव और गाड़ी बिलकुल अलग हैं। आप कहें कि नाव ग़लत है—तो ये ग़लत होगा, आप कहें कि गाड़ी ग़लत है तो ये भी ग़लत होगा, फ़ैक्ट यह है कि जो समाज का सफ़र है, जो ज़िन्दगी का सफ़र है उसमें अलग-अलग तरह के लोग चाहिए होते हैं जो कि समाज को, जिन्दगी को आगे ले जा सकें।
मैं तो ऐसा मानता हूँ कि अगर सारे लोग एक जैसे—दो आदमी अगर एक जैसे हैं तो फिर उन्हें साथ रहने की क्या जरूरत है, एक ही काफ़ी है, और ये भी सच है कि दो आदमी अगर बिलकुल अलग हैं तो साथ कैसे रहेंगे। कुछ भी कॉमन नहीं, लेकिन गाड़ी और नाव में एक बात कॉमन है, दोनों आगे ले जा रही हैं, दोनों सफ़र में आपकी मददगार हैं, कब गाड़ी चाहिए कब नाव चाहिए—ये बात हमेशा हमें समझनी चाहिए, और ये बात हमें माननी होगी कि हम गाड़ी में हैं तो तैर नहीं सकते, तैरने में मदद नाव करेगी, अगर हम नाव हैं तो धरती पर नहीं चल सकते, यहाँ गाड़ी हमारी मदद करेगी। न कोई छोटा न कोई बड़ा। आप कहें कि गाड़ी बड़ी होती है या नाव, दोनों ही बड़ी हैं, हम दोनों ही हैं दोनों एक-दूसरे से अलग हैं और अलग होने के बावजूद एक-दूसरे के काम आ सकते हैं।
हक़ीक़त ये है कि हम अलग-अलग तरह के होकर भी एक कम्पलीट टीम वर्क बना कर एक बहुत स्ट्रांग यूनिट बन सकते हैं।
ये सच्चाई सिर्फ़ देश और समाज के लिए नहीं है घर के लिए भी है। लेकिन हम घर में भी यही चाहते हैं, अगर हमारा वश चले तो सब बिलकुल वैसे ही चलें जैसा हम कहते हैं, कोई जरा-सा अलग काम कर रहा है, अलग तरह से सोचता है तो हमें लगता है कि ये तो बिलकुल ग़लत हो गया। हक़ीक़त यह है कि इससे घर में जो केपेबिलिटीज हैं, कैनवास है वो थोड़ा-सा बड़ा हुआ है, हो सकता है किसी दिन वही काम आए आपके, हो सकता है उसकी सोच, उसका हुनर, उसका प्रोफ़ेशन, उसका तरीका एक दिन कहीं आपको हेल्प करे।
अगर आप ओपेन हैं, ये मानते हैं कि इसके पास कुछ है जो मेरे पास नहीं है और मेरे पास कुछ है जो इसके पास नहीं है, तो हम मिल-जुलकर क्यों न ज़िन्दगी को कंप्लीट कर लें। जैसे गाड़ी और नाव साथ चलें तो फिर उन्हें कौन रोके, भले नदी आए या बीच में रेगिस्तान आ जाए इनका सफ़र तो चलता ही रहेगा। तो आइए कुछ गाड़ियाँ, कुछ नाव जमा हो जाएँ और आगे चलें, देखते हैं कौन-सा समन्दर हमें रोकता है या कौन-सा रेगिस्तान हमें रोकता है, कोई नहीं रोक सकेगा।
अपनी अपनी ठौर पर, सबकों लागै दाव।
जल में गाड़ी नाव पर, थल गाड़ी पर नाव॥
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रहीम कहते हैं कि मिलन के गुण गाइए कि ये रंग को दुगुना कर देता है। जैसे कि हल्दी और चूने को आप मिलाएँगे तो नया रंग बन जाता है।
इसमें दो-तीन लफ़्ज़ जो हैं, बड़े इम्पोर्टेंट हैं। बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। एक तो हल्दी और चूना दोनों अलग रंग के हैं, तभी वो मिलकर दुगुने हुए। अगर हल्दी ही हल्दी से मिलती या चूना ही चूने से मिलता तो रंग दुगुना नहीं होता। हम जिन्दगी में रंग दुगुना तब कर पाते हैं, जब किसी जरा अलग-सी चीज़ से मिलें, अलग से इनसान से मिलें। ये बात दो इनसानों के बारे में भी सच्ची है और दो तहसीबों के बारे में भी सच्ची है। दो ट्रेडिशंस और दो भाषाओं के बारे में भी सच्ची है। जब वो मिलती हैं, तो एक दूसरे को कुछ दे सकती हैं। ले कैसे सकते हैं, दे कैसे सकते हैं, इसके लिए ‘तजै’ बहुत ज़रूरी है।
मुश्किल ये होती है कि आजकल चाहे बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड हों, हस्बैंड-वाइफ है, या किसी भी फ़ील्ड में पार्टनर हों, साथ में काम करनेवाले हों, एक टीम में लोग काम कर रहे हों, आई मीन, माय सेल्फ़ प्रॉब्लम हो जाता है। होता ये है कि मैं ऐसा हूँ या वैसे हूँ, मैं क्यों इतना बदलूँ किसी के लिए लेकिन ज़िन्दगी में रंग दुगुना तभी हो सकता है, जब कुछ हम बदलें, कुछ दूसरा बदले।
जब हल्दी और चूना मिलते हैं, तो न तो रंग पूरा पीला होता है और न ही पूरा सफ़ेद, बल्कि वो रंग लाल होता है जो इन दोनों रंगों से ज्यादा मजबूत और गहरा होता है। हालाँकि आमतौर पर कहा जाता है कि ये दो इनसान बिलकुल एक जैसे हैं, इन्हें एक साथ रहना चाहिए, इनकी तो सब आदतें, सब ख़याल, सब विचार एक से हैं, इनके तरीके एक से हैं, तो इन्हें एक साथ रहना चाहिए। लेकिन सच्चाई ये है कि जो बिलकुल एक जैसे हैं, वो एक-दूसरे को क्या दे सकते हैं? फिर तो एक ही काफ़ी है, दो की जरूरत क्या है।
ये भी कहा जा सकता है कि दो बिलकुल एक तरह के हैं, तो साथ कैसे रह सकते हैं। ये भी सच है। कुछ रंग ऐसे होते हैं कि जो इतने गहरे हो जाते हैं, इतने मज़बूत हो जाते हैं, इतने पुख्ता हो जाते हैं कि अपने अन्दर वो किसी दूसरे रंग से मिल ही नहीं पाते हैं। उनमें दूसरे रंग से मिलने की शक्ति नहीं है, ख़ूबी नहीं है, तो फिर रंग दुगुना नहीं हो पाएगा।
ज़िन्दगी का, मोहब्बत का या रिश्तों का रंग दुगुना तभी हो सकता है, आपकी खुशियों का रंग दुगुना तभी हो सकता है, जब आप में ये सलाहियत हो कि आप दूसरे के लिए थोड़ा-सा बदल सकते हों। मैं ना बदलूँ, तो फिर दूसरा क्यों बदलेगा? इसलिए दिलों के दरवाजे दोनों तरफ़ से खुले हों, दोनों एक दूसरे को कुछ दें, कुछ हासिल करें, तभी इस रिश्ते में एक नया रंग, इक नई ख़ूबी, एक नई बात पैदा होगी। यही रहीम का कहना है :
रहिमन प्रीत सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून॥
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