समलैंगिकता : ‘मने माणस वधारे फावे छे’

भूपेन नहीं जानता था उस वक़्त। पर हम हिसाब लगा सकते हैं उसके जाने के बाद, कि अपनी 69 बरस की ज़िन्दगी में सिर्फ़ आख़िरी दस बरस वह चैन, आनन्द और आज़ादी से जी सका। बाक़ी सारी ज़िन्दगी—सारा बचपन, सारी जवानी और प्रौढ़ावस्था का एक बड़ा हिस्सा—जीता रहा दहशत में। कहीं पकड़ा न जाऊँ। क्या होगा अगर पता लग गया घरवालों को, दोस्तों को, या जानने वालों को? झूठ, बेईमानी और ड्रामेबाजी के सहारे अपने को बचाये रखने की मुसलसल सफल-असफल कोशिशें करता रहा। मौत से आठ बरस पहले, 1995 में, उसने लिखा: ‘धीरे-धीरे अब साठ साल की उमर पे हिम्मत कर पाया हूँ अपनी इच्छाओं और अपने दोस्तों के बारे में बोलने की।’ अपनी समलैंगिक इच्छाओं और अपने समलैंगिक दोस्तों के बारे में।

1980 में शिवमहाल के आउटहाउस में भूपेन से हुई मुलाक़ात के वक़्त वल्लवभाई उसके साथ थे। उसके बाद जब भी बड़ोदा जाता भूपेन के घर में ही रहना होता। तब वल्लवभाई से और मिलना-जुलना होने लगा। जल्दी ही गीतांजलि और मेरा भी वल्लवभाई के यहाँ आना-जाना शुरू हो गया। भूपेन के और ‘पुरुष-मित्र’ भी आते ही रहते थे। न ही ऐसा था कि हमें भूपेन की समलैंगिकता का पता नहीं था। न सिर्फ़ गीता कपूर की ‘कन्टेम्परेरी इण्डियन आर्टिस्ट्स’ की कापी-एडिटिंग की थी मैं ने, उससे मेरी दोस्ती भी हो गयी थी। सो जो किताब में नहीं था भूपेन के निजी जीवन के बारे में वह भी पता चल चुका था गीता से। लेकिन खुद भूपेन से कई सालों तक कोई सीधी बात नहीं हुई इस बाबत।

भूपेन अक्सर कहा करता था कि 1979 के लन्दन प्रवास ने उसे समलैंगिक सम्बन्धों का खुला आज़ाद रूप दिखा दिया। उसने देखा कि समलैंगिक जोड़े निश्चिन्त सरेआम साथ-साथ रहते हैं। इस अनुभव ने उसको अपने अपराध-बोध से मुक्त कर दिया, और उस में एक नया आत्मविश्वास पनपने लगा। पर यह असर अकेला काफ़ी नहीं था उसे बेपरवाह समलैंगिक ज़िन्दगी जी सकने देने के लिए। भूपेन की तर्ज पर कहें तो ‘एक और बात’—‘ऍनअदर थिंग’—यह थी कि इस तरह के असर एकबारगी अपना पूरा रंग नहीं दिखाते। धीरे-धीरे हिम्मत देते और अमल में आते हैं।

ख़ैर, मेरी दोस्ती तो शुरू ही हुई थी। पर महेन्द्र देसाई और भूपेन के बीच तो खूब छनती थी। वैसे भी जब 1983 में महेन्द्र की किताब छपी तब तक भूपेन ‘यू कांट प्लीज़ ऑल’ (1981) और ‘टू मैन इन बनारस’ (1982) जैसे घोषणाकारी समलैंगिक चित्र बना चुका था। मुमकिन नहीं था कि महेन्द्र को असलियत का पता न हो। पर भूपेन की समलैंगिकता को लेकर मौन है महेन्द्र की किताब। यहाँ तक कि उस में जो दो लम्बे प्रकरण हैं भूपेन के शादी न करने के बारे में उन में भी उसकी समलैंगिकता की भनक तक नहीं है। पहले प्रकरण में रणछोड़भाई विस्तार से बताते हैं कि हर कोशिश कर ली उन्होंने भूपेन की शादी करवाने की, लेकिन उनकी हसरत पूरी न हो सकी। एक बार तो राज़ी भी कर लिया था भूपेन को एक लड़की से मिलने के लिए, किन्तु नापास कर दिया भूपेन ने उसे। जब रणछोड़भाई फिर भी लड़की की अच्छाइयाँ गिनाने लगे भूपेन को मनाने के इरादे से तो उसने पलट के कह दिया: ‘इतनी अच्छी है तो ख़ुद ही ब्याह कर लो उससे। तीन कर ही चुके हो पहले, एक और कर डालो।’ दूसरे प्रकरण में महेन्द्र सीधे भूपेन से शादी न करने का कारण पूछते हैं। तब भी समलैंगिकता का कोई जिक्र नहीं होता।

इतना ही नहीं, महेन्द्र की किताब में भूपेन और शीला के प्रेम सम्बन्ध का भी जिक्र आता है। भूपेन की ‘कज़िन’ थी शीला। जैसा कि उस ज़माने की परिवार व्यवस्था में ममेरे-फुफेरे-मौसेरे-चचेरे भाई-बहनों में अक्सर हो जाया करता था, भूपेन और शीला में प्रेम हो गया। लेकिन, जैसी कि ऐसे सम्बन्धों की सामान्य नियति होती थी, उनका विवाह न हो सका। शीला के अमीर पिता को नामंजूर था भूपेन जैसे के साथ अपनी बेटी का रिश्ता।

महेन्द्र को यह जानकारी बचपन से ताउम्र भूपेन के मित्र रहे प्रसिद्ध नृत्य समालोचक सुनील कोठारी से बातचीत के दौरान मिली। शायद यह सोच कर कि सुनील से ज्यादा नजदीक से और लगातार किसी ने भूपेन को नहीं देखा था, महेन्द्र ने सुनील का कहा जस का तस लिख दिया अपनी किताब में। लेकिन हम जानते हैं—जानना तो महेन्द्र को भी चाहिए था—कि भूपेन समलैंगिकता को पैदाइशी मानता था, मानता था कि वह पैदा ही हुआ था समलैंगिक। उसका यह मानना सुनील के दिये प्रेम प्रसंग से मेल नहीं खाता। बस इतनी गुंजाइश फिर भी रहती है कि शीला से प्रेम-प्रसंग के वक़्त तक भूपेन अपना रुझान ठीक से समझ न पाया हो।

साथ ही यह भी सम्भव है कि असलियत छिपाने के लिए भूपेन शायद अपने आप से भी ढोंग कर रहा था एक लड़की से प्रेम हो जाने का। 1995 के अपने उसी दस्तावेज़ में, जिसमें उसने साठ साल की उमर पर जा कर हिम्मत जुटा पाने की बात की है, भूपेन यह भी बताता है कि लोगों को झाँसे में रखने के लिए—कि वह भी उन्हीं की तरह ‘नॉर्मल’ है, वह बड़े-बड़े फ़िल्मी पोस्टरों में हीरोइनों को देख कर या किसी लड़की के बगल से निकलने पर ऐसे दिखाता था जैसे बड़ा आनन्द ले रहा है, जब कि अन्दर ही अन्दर उसे घिन आ रही होती थी इस सबसे।

आँखों देखे और कानों सुने तथ्यों और प्रमाणों के भी बड़े अदृश्य छलावे होते हैं। जीवन में सोलह आने खरे साक्ष्य नहीं होते; हों भी तो अपने आँख-कान की खोट तो रहती ही है। इतना जानने के बाद भी इच्छा हुई कि चलो सीधे सुनील से ही पूछ लें। भेज दिया एक ई-मेल। शीला भूपेन के सगे मामा, चाचा, मौसी या बुआ की बेटी थी, या कोई दूर की ‘कज़िन’ थी? दोनों कितने बड़े थे उस वक़्त? मामला गम्भीर था क्या? इस प्रेम प्रसंग के वक़्त क्या भूपेन को अपनी समलैंगिकता का पूरा एहसास नहीं था? सुनील का जवाब संक्षिप्त था : भूपेन बन रहा था; अपनी ‘सेक्सुअलिटी’ वह अच्छी तरह समझता था; शीला किस की बेटी थी मालूम नहीं।

सुनील के जवाब के बावजूद धुँधलाहट बनी रहती है। सुनील मेरे सवालों के जवाब में साफ़-साफ़ कहते हैं कि भूपेन सरासर नाटक कर रहा था शीला से प्रेम का। लेकिन रस ले-लेकर जिस अन्दाज में सुनील महेन्द्र को यह प्रेम कथा सुनाते हैं उस में किसी को सन्देह तक नहीं हो सकता कि यह सब दिखावा था। महेन्द्र ने सुनील के शब्दों में ही सारा क़िस्सा बयान किया है, अपनी तरफ़ से कुछ नहीं जोड़ा है। उसी को पढ़ कर आख़िर मुझे भी जरूरत पड़ी थी सुनील से पूछने की कि असल में माजरा था क्या।

महेन्द्र बड़े पत्रकार थे, चीज़ें सूँघ लेने में दीक्षित। ज्योति लिमिटेड में भूपेन के साथ थे। भूपेन की समलैंगिकता की कुछ भनक तो मिली होगी उन्हें भी। (अपने लेख ‘भेरू’ में गुलाम का कहना है कि महेन्द्र को 1980 तक कुछ नहीं मालूम था, और उन्होंने गुलाम से भी पूछा था भूपेन के शादी न करने का कारण। गुलाम यह नहीं बताते अपने लेख में कि उन्होंने कितना कुछ बताया महेन्द्र को।) ज़्यादा सम्भावना यह है कि महेन्द्र को भी लगा हो कि शीला-प्रसंग के समय तक भूपेन शायद अपनी ‘सेक्सुअलिटी’ को लेकर असमंजस में था, और उसी के साथ जुड़ गयी हो वर्जित फल चखने—‘इन्सेस्ट’ की लालसा, और वाक़ई आकर्षित हो गया हो वह अपनी ‘कज़िन’ की तरफ़। फिर भी अचरज है कि अपनी पूरी किताब में महेन्द्र इशारा तक नहीं आने देते भूपेन की समलैंगिकता का। बल्कि शादी-ब्याह का इतना विस्तृत ब्यौरा डाल कर वह, शायद अनजाने ही, पाठक को पुरुष-स्त्री सम्बन्धों में ही घेरे रहते हैं। कोई और गुंजाइश आने ही नहीं देते। लगता है कि जानते हुए कि अपनी कला में समलैंगिकता का शंख-नाद कर देने के बावजूद भूपेन अपनी निज की समलैंगिकता के मामले में एहतियात बरतना चाह रहा था, महेन्द्र ने दोस्त के रहस्य को रहस्य ही बनाये रखना ठीक समझा। महेन्द्र ने जितना लिखा, लगता है, उससे कहीं ज्यादा था उनके पास लिखने को।

हमारी जानकारी इतनी थोड़ी है, और जिस विषय की बात हो रही है वह इतना रहस्यमय है और खुद सम्बन्धित व्यक्ति के लिए भी काफ़ी हद तक रहस्यमय बना रहता है, कि शीला प्रसंग की असलियत जानना असम्भव है। कितने भी विश्वास के साथ आज सुनील दावा करें कि भूपेन ढोंग कर रहा था शीला से प्रेम का, इस सम्भावना को ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि जब हुआ वह प्रसंग तब उस तरह का कोरा नाटक भर नहीं था जैसा कि बाद में लगने—और कहा जाने लगा कि था।

इस सन्दर्भ को और पेचीदा बनाने वाला एक दिलचस्प तथ्य नौशिल बताते हैं। एक बार उन्होंने भूपेन से पूछा कि क्या कभी किसी स्त्री के नजदीक आये हैं आप? 

भूपेन ने जवाब दिया : ‘छोड़ यार।’ 

बजाय छोड़ने के नौशिल ने कहा : ‘मेरे पहचान की एक लड़की है। आप को पसन्द भी है। मैं बात कर सकता हूँ उससे, वह इण्टरेस्टेड हो सकती है।’ 

‘नहीं यार,’ भूपेन बोला। 

नौशिल ने पैंतरा बदला : ‘आप कैसे कह सकते हैं कि बात नहीं बनेगी अगर आप ने कभी कोशिश ही नहीं की है? कोशिश तो करिये एक बार। बाइसेक्सुअल हुए तो और मज़े होंगे।’

भूपेन के कहने पर कि ‘नहीं होता कुछ,’ नौशिल ने घेरा : ‘मतलब कि कोशिश की है आप ने।’

भूपेन का जवाब था : ‘हाँ।’

भूपेन के बचपन और नयी-नयी जवानी के दौरान उसकी सैक्सुअलिटी को लेकर हमारी जानकारी इतनी कम है कि अनुमान ही हमारा मुख्य प्रमाण रह जाता है। भूपेन ने अपने समलैंगिक जीवन के बारे में मुझे जो कुछ भी अलग-अलग वक़्त बताया वह, कारण जो भी रहा हो, बड़ोदा आ जाने के बाद वाले जीवन से सम्बन्धित था। मेरा यह था कि जितना सुनने को मिलता सुन लेता, लेकिन ख़ुद कभी कोई खोदा-खादी न करता। उसके प्रारम्भिक समलैंगिक जीवन के बारे में, परिणामत:, मैं मुकम्मल कुछ भी नहीं कह सकता। जो भी भरोसेमन्द जानकारी है, सुनील कोठारी को है, और वह भी बहुत थोड़ी है। मसलन यह कि बम्बई में जब वह चार्टर्ड अकाउण्टेंट की हैसियत से ए. एफ. फ़ेर्मूसन में नौकरी कर रहा था तब उसके अपने कुछ सहकर्मियों के साथ चलताऊ से—आधे-अधूरे मन वाले सम्बन्ध हुए थे।

भूपेन से मिली जानकारी की बिना पर सुनील कोठारी बताते हैं कि लगभग 12 साल की उमर से लेकर 15 साल की उमर तक घर का एक पुराना नौकर भूपेन के साथ दुष्कर्म करता रहा। आख़िर में परेशान हो कर भूपेन ने अपनी बड़ी बहन—माणेकबेन से कहा कि उस नौकर को निकलवा दो, और वैसा ही किया गया। बाद में भूपेन ने सुनील को बताया कि वह बूढ़े लोगों की तरफ़ आकर्षित होता है। इस आकर्षण का कारण वह नहीं समझ पा रहा था, पर इस की वजह से उसे अपराधबोध होता था। बम्बई में सिडैनहैम कॉलेज में पढ़ते वक़्त वह अपने प्रिंसिपल-प्रोफ़ेसर धोंगडे के प्रति आकर्षित हो गया। उसने उन्हें चिट्ठियाँ भी लिखीं, पर बगैर बताये कि वह उन पर फ़िदा हो गया है। कुछ और बूढ़े भी थे, सब गुमनाम, जिन की ओर वह उस ज़माने में खिंचा। हो सकता है कि इक्का-दुक्का कुछ अपवाद हो गये हों, पर ताउम्र वह धवल-केशी वृद्धों की ओर ही खिंचता रहा। 1992 के एक साक्षात्कार में उसने मज़ाक़ भी किया था कि बढ़ती उम्र के साथ अपने से बड़ों को खोज पाना मुश्किल होता जा रहा था उसके लिए।

इतनी थोड़ी जानकारी भी इस अनुमान के लिए काफ़ी है कि नौकर के साथ हुए लम्बे तकलीफ़देह अनुभव के बाद कुछ ऐसा भी हुआ होगा कि उसे समलैंगिकता में आनन्द आने लगा। जहाँ ढंग का अनुमान भी नहीं लग सकता वह है शीला प्रकरण से उठा सवाल कि भूपेन कभी विपरीत लिंग की तरफ झुका या नहीं। नौशिल से किये गये उसके इकबालिया बयान में भी विपरीत लिंग के प्रति झुकाव का कोई पक्का सबूत नहीं है। हो सकता है कि जो कुछ भी और जिसके साथ भी कोशिश की थी उसने वह मात्र इस उम्मीद में की हो कि अगर अन्दर कोई दूसरी प्रवृत्ति भी है तो उसको भी आज़मा लो।

जितना भी धीरे-धीरे टुकड़ों में सीधे भूपेन से मालूम होना शुरू हुआ उससे काफ़ी कुछ समझ में आने लगा। कई साल लगे इस सिलसिले को शुरू होने में। मुझे खूब याद है वह तीसरा पहर जब भूपेन मुझे पहली मंज़िल के अपने बैड-रूम में ले गया था नयी-नयी बनी ‘टू मैन इन बनारस’ दिखाने। इससे पहले ‘यू कांट प्लीज़ ऑल’ पर लम्बी-लम्बी बातें होती रही थीं हमारी। हम दोनों की सबसे ज्यादा बातें 1987 में बनी ‘ययाति’ पर हुई थीं।

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शुरू के सात-आठ शायद ज़्यादा—सालों में समलैंगिकता समेत काम-विषयक ये बातें सैद्धान्तिक स्तर तक ही सीमित रहीं। पढ़ने का शौक़ था ही उसे। सो ख़ासे गम्भीर स्तर पर चलती रहती थीं ये बातें। इन्हें कभी निजी मोड़ नहीं लेने दिया भूपेन ने। फिर याद नहीं कब धीरे-धीरे इशारों से अपनी समलैंगिकता की बातें करने लगा, जैसे कि वह जानता है कि मैं जानता हूँ और मुझे कहने की जरूरत नहीं है कि हाँ जानता हूँ मैं। न ही यह याद कि कब ये इशारे साफ़-सीधी बातों में बदल गये, और वह जब-तब बताने लगा अपने त्रासद समलैंगिक अतीत के बारे में।

1962 में महाराज सयाजीराव यूनिवर्सिटी की फैकल्टी ऑव फ़ाइन आर्ट्स में दाखिला लेने के वक़्त अट्ठाईस-वर्षीय भूपेन अपनी समलैंगिकता को अच्छी तरह पहचान चुका था। बड़ोदा आ कर उसने बड़े नाजुक और मुश्किल मोड़ पर ला खड़ा कर दिया था अपने आप को। कितना भी आश्वस्त रहा हो अपने फैसले को लेकर, डर भी था कि जो सम्भावनाएँ सोच रहा है उसके अन्दर हैं, वे निकलती भी हैं या नहीं। पर इस तनाव के बीच एक बड़ी उम्मीद भी थी। उम्मीद थी कि संस्कार नगरी माने जाने वाले बड़ोदा में, और ख़ासतौर से कलाकारों के बीच, उसे अपनी समलैंगिकता के प्रति आक्रामक संकीर्णता के बजाय थोड़ी उदारता मिलेगी।

कुछ भी न मिला वैसा। यह शहर भी बाक़ी शहरों जैसा ही निकला। पहले का पता नहीं, बड़ोदा में भूपेन के काफ़ी समलैंगिक सम्बन्ध निम्नवर्गीय पुरुषों से होते थे। उसने उन अड्डों का भी पता लगा लिया था जहाँ शहर के समलैंगिक झुटपुटे के बाद साथियों की या शिकार की तलाश में पहुँच लिया करते थे। इन स्थानों में प्रमुख था फाइन आर्ट्स फैकल्टी के सामने विशाल कमाटी बाग़ और शहर के बीचोंबीच गाँधी-गृह के पीछे स्थित जुबली बाग़ नाम का एक तिकोना पार्क।

इसी सन्दर्भ में एक बड़ी दिलचस्प जानकारी भूपेन से मिली। इन सार्वजनिक स्थानों पर जमा होने वाले कुछ समलैंगिक काम आसान करने के लिए ऐसी पैंटें बनवाते थे जिनकी ज़िप आगे के बजाय पीछे होती थी। उनका खेल खुल न जाय इसलिए पैंट के ऊपर क़मीज़ न पहन कर कुरता पहन कर निकलते थे।

कई बार, भूपेन ने बताया, वह पकड़ा भी गया। बड़ी छीछालेदर की लोगों ने, पिटाई भी की। उन अपमानों को वह भूला नहीं था। भूलना नहीं चाहता था शायद। भूलना चाहता भी रहा हो तो भूल नहीं पा रहा था। सालते रहते थे पुराने घाव। अन्दर ही दबे रहते तो और ज्यादा सालते। पिटाई का डर तो पहले ही दूर हो गया था, फिर जब प्रसिद्धि के कवच से लैस हो धीरे-धीरे उसने जगहँसाई से भी मुक्ति पा ली, भूपेन अपनी समलैंगिकता की बात करने लगा। बहुत बार उसने उन अनुभवों की बात की। हर बार उसके चश्मे के मोटे काँच के पीछे दूर चली गयी उसकी आँखों में बड़ी कातर वेदना भर आती। उसका घायल स्वाभिमान उसे रोने से रोक लेता। रुलाई की जगह वह उलाहना देता, हर बार, कि तुम लोग जान ही नहीं सकते कि क्या बीतती है हम लोगों पर।

क्या बीतती है ‘हम लोगों’ पर। कभी उसने ‘मुझ’ नहीं कहा, और न ही कभी भूत काल सूचक ‘थी’ का इस्तेमाल किया। हमेशा कहता ‘क्या बीतती है हम पर।’ बात सिर्फ़ उन मुश्किल दिनों की और उसकी अपनी नहीं थी। उसके अपने समलैंगिक समुदाय—अपनी बिरादरी की थी।

 

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