आज ही के दिन 123 वर्ष पहले पिछड़ों को पहली बार मिला था आरक्षण

आज से ठीक 123 साल पहले, 26 जुलाई 1902 को, भारत में सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल हुई थी। करवीर (कोल्हापुर) राज्य के प्रगतिशील शासक और महान समाज सुधारक छत्रपति शाहूजी महाराज ने राज्य के राजपत्र में एक अंग्रेज़ी अधिसूचना जारी की, जिसमें पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 50% सरकारी पद आरक्षित किए गए। यह कदम भारत में आधिकारिक स्तर पर आरक्षण लागू करने का सबसे पहला उदाहरण था। 

साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार संजीव के छत्रपति शाहूजी महाराज के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास ‘प्रत्यंचा’ का एक अंश प्रस्तुत है:

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26 जून, 1902। किसे पता था कि स्थितियाँ एक युद्धरत विवश राजा को ऐसा अमोघ अस्त्र उठाने को बाध्य कर देंगी जिसका परिणाम इतिहास की चूलें हिला देगा, जिसकी टंकार इतिहास में नये युग का आगाज करेगी—बहुजनों द्वारा अधिकारों के लिए संघर्ष का आगाज!

युद्ध भूमि में सारे अस्त्रों के विफल होने पर ऐसे अमोघ अस्त्र उठाते हैं महान योद्धा। बात बहुत ही सामान्य और बुनियादी थी—एक ही परिवार में जब बड़े सदस्य छोटों को अधिकार देने से वंचित कर रहे हों, एक दो दिन-एक दो वर्ष नहीं, युगों से, तो कहना पड़ता है—हमारा तुमसे नहीं निभेगा अब। मेरा हिस्सा अलग कर दो।

कोल्हापुर गजेट में प्रकाशित मेनिफेस्टो को कभी नींव की ईंट की तरह इतिहास के विद्यार्थी उठाकर पढ़ेंगे—“राज्य के हर व्यक्ति की शिक्षा के विकास और अनुराग के लिए पिछले वर्षों से कोशिशें चल रही हैं मगर महाराज को दुख के साथ कहना पड़ता है कि आशानुकूल सफलता नहीं मिली...सर्वत्र एक-सा फल नहीं है।

“कुछ हद तक इस पर विजय पाने के लिए अति पिछड़े वर्ग को कुछ इन्सेंटिव्स (incentives) जरूरी हैं। उन्हें नौकरियों में जितना हिस्सा मिलता रहा है, उससे ज्यादा मिलना चाहिए। इस नीति के तहत महाराज को यह निर्देश देते हुए हर्ष हो रहा है कि इस तिथि से जो भी रिक्तयाँ होंगी, उनका 50 प्रतिशत पिछड़े वर्ग से भरी जाएँगी। उन सभी दफ्तरों में जहाँ अभी पिछड़े वर्ग की उपस्थिति 50 प्रतिशत से कम है, अगली नियुक्ति इसी (पिछड़े) वर्ग से होगी।

“इस राज्याज्ञा के जारी होने के बाद से सभी विभागों में ऐसी सभी नियुक्तियों की तिमाही रपट जमा करनी होगी।

“इस हुक्म के तहत, ‘पिछड़ा वर्ग’ का आशय उन सभी जातियों से होगा जो ब्राह्मण, प्रभु (कायस्थ), शेनविस, पारसी और दूसरे अगड़े वर्गों से नहीं आते हैं।” 

तुरही बज उठी थी। कुछ सुन पा रहे थे। कुछ नहीं। जो सुन पा रहे थे, अचम्भित, आन्दोलित और आतंकित थे।

सच, क्या ऐसा भी हो सकता है? क्या मनु का नियम उलट जाएगा? क्या पुष्यमित्र शुंग को मिर्गी आएगी? क्या चाणक्य अपनी चोटी के बल शीर्षासन करने लगेंगे?

बहुजनों को रौंदते, अबाध गति से दौड़ते ब्राह्मणवाद के अश्वमेध के घोड़े की लगाम किसने पकड़ कर झुका दी? एक मामूली नरेश ने! और घोड़ा...? घोड़ा हिनहिना रहा था। आक्रोश और करुणा की अटपटी हिनहिनाहट।

क्या बीजापुरकर, क्या नारायण राजोपाध्याय, क्या लोकमान्य तिलक! क्या ‘कल्पतरु’, क्या ‘केसरी’, क्या ‘समर्थ’ और क्या अंग्रेजी का ‘Marhatta’, सारे ही प्रतिवाद और प्रतिकार में उठकर खड़े हो गए—ब्राह्मणों के साथ भीषण अन्याय!

अब से सरकारी नौकरियों के पचास प्रतिशत पर पिछड़ी जातियों की ही नियुक्ति होगी। ब्राह्मणों, प्रभुओं और पारसियों को सिर्फ 50 प्रतिशत?

5 प्रतिशत ब्राह्मण और वर्ग अब तक 95 प्रतिशत पर काबिज था, तब तो आपको अन्याय न दिखाई पड़ा!

अभी भी 5 प्रतिशत आप बाकी 50 प्रतिशत पर काबिज होंगे। यह क्या है? गणितीय दृष्टि से भी यह गलत है। संख्या के लिहाज से सिर्फ आपको पाँच प्रतिशत नौकरियाँ मिलनी चाहिए।

—क्या कहा, अब्राह्मण अयोग्य हैं?

—आपने हमें योग्य बनने का मौका दिया आज तक?

ब्राह्मण वर्ग तिलमिलाकर अनाप-शनाप बकने लगता—वे ब्राह्मण भी जिन्हें अब तक कोई भी सरकारी नौकरी नसीब न हुई थी और ब्राह्मणत्व का सूखा आशीर्वाद छिड़क कर भीख पर जी रहे थे।

यूरोप में सचमुच सीखने को कितना कुछ है। क्या-क्या सीखें? क्या-क्या चुनें?

“विन्चेस्टर के स्वागत समारोह में मैं अंग्रेजी में बोलने वाला था। पर जब मैंने पाया कि मैलन साहब ने अपना लेक्चर लैटिन में दिया, मेरी भाषा की दुविधा जाती रही। मैंने अपना व्याख्यान सुसंस्कृत मराठी में दिया। निजता का सम्मान हो। रायल एशियाटिक सोसायटी ने देशी नरेशों के सम्मान में भोज दिया। अपने प्रतापसिंह ने अंग्रेजी में बोलना शुरू किया पर हिन्दी में लौटना पड़ा।

अन्दर-ही-अन्दर कितना कुछ कौंधता रहता है। 

“एल्डर शाट की वो परेड! 30,000 सैनिकों की परेड। उतने कदमों के एक साथ संचालन से क्या शानदार छवि बनती है फौज की! काश अपने यहाँ भी सारे योद्धाओं के कदम एक साथ उठते और गिरते! ब्राह्मण, मराठे, महार सब के!”

“और...?”

“और वह नई चिकित्सा पद्धति होमियोपैथी!”

“और...?”

“मेरे ब्राह्मण विरोध पर मेरा नैतिक समर्थन देने वाले यूरोपियनों का प्रोत्साहन—नया बोध।”

“दुनिया के सारे प्रगतिशील एक जैसा सोचते हैं।”

“बस?”

“नहीं, 4 जुलाई को इंडिया हाउस। मामूली-सा यह भवन, जहाँ से भारत पर शासन किया जाता है। 3,000 लन्दन वासियों से सजा हाल और भारतीय नरेश। सभी नरेश अपनी-अपनी तलवारें वहाँ भेंट कर रहे थे...तलवारें या अपनी-अपनी वफादारी! पिता शिवाजी चतुर्थ याद आए और याद आया उन पर ढाया गया बर्बर अत्याचार।”

“16 जुलाई को पिता के मित्र ली-वार्नर द्वारा दी गई एक टी-पार्टी। आश्चर्य तब हुआ, जब पिछड़ों, वंचितों की शिक्षा के क्षेत्र में किये गए मेरे कार्यों की सराहना की गई...। सारी ब्रिटिशशाही इसका समर्थन कर रही थी। मनोबल बढ़ा। चलो अपना मान-सम्मान दाँव पर लगाकर भी सबके लिए सामाजिक न्याय हासिल करना सम्भव हो, तो सौदा बुरा नहीं है। फिर इसके सिवा और विकल्प भी कहाँ थे अपने पास! सदियों से नहीं, युगों से कपट और अन्यायपूर्ण तरीके से पीछे ठेले जाते हुए दलितों, दोहितों, वंचितों, की मुक्ति के लिए मैं सब कुछ—अपनी गद्दी भी, अपनी जान भी कुर्बान कर सकता हूँ सब कुछ, बशर्ते राहें खुलें, वरना ऐसे तो कई युग गए, कई युग और चले जाएँगे। मुझे राजा राममोहन राय याद आते हैं, कहा था, ‘मैं बैठ नहीं सकता, बैठने का मतलब है एक और निर्दोष विधवा का दाह!’ मुझे भी बैठने का अधिकार नहीं। उन्हें भी उन्हीं अंग्रेजों से मदद लेनी पड़ी, मुझे भी लेनी पड़ रही है तो क्या हर्ज है!”

विदेश यात्रा की डायरी। छोटे-छोटे नोट्स। 

टुकड़े-टुकड़े में याद आएगा प्रवास! नींद के पहले या किसी गहरे एकान्त इन्द्रधनुष-सा टँग जाएगा। 

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा मानद एल.एल. डी! कितने सारे भारतीय और अंग्रेज मित्र! फेरिज ने तो भारत में यहाँ तक कह डाला—सम्पूर्ण कोल्हापुर में किसी भी ब्राह्मण को वह शैक्षिक गौरव हासिल न हो सका और न ही उनके शिक्षा-विरोध के चलते भविष्य में हासिल होने की गुंजाइश ही बनती है। राजा, छोटे राजा ही सही अलफ्रेड, आर्थर और फ्रांस में नेपोलियन जैसे बड़े-बड़े विश्वविजेताओं के बीच खुद को पा रहा था। यह सच है, नहीं, सपना है। नहीं ये सच है, नहीं सपना है! फिर ‘दुत्त’ कहकर इस उलझन के जाले को नोच फेंका...इतिहास से लेकर पुराण, देश से लेकर विदेश जहाँ-जहाँ जो-जो भी अच्छा है उसे अपने सीने पर सजा लेना है? सीने पर...? नहीं सीने के अन्दर! 

ओह, फिर वही! अपने पारम्परिक पोशाकों में इठलाते चहलकदमी करते हुए भारतीय नरेश। दरबार में उपस्थित 3,000 अंग्रेजों के लिए ये चिड़ियाखाने के जन्तु हैं। इनसे तो बड़ौदा नरेश गायकवाड़ सायंजी महाराज ही अच्छे! गुलामगिरी का यह प्रदर्शन कितना ओछा लगता है! 

और तुम राजा? तुम भी तो इस परेड में शामिल हो! तुम्हारी पर्सनालिटी के चलते तुम्हें तो कुछ ज्यादा ही तवज्जो मिल रही है। बस न? 

“हाँ शायद! यह क्षुद्र महत्त्वाकांक्षी लोभी मन! कभी इसी की कामना की थी मगर जब कामना पूरी हो रही है तो एक अलग किस्म की उदासी घेरने लगी है। बीच-बीच में चौंक जाता हूँ जैसे नींद से उचट-उचट जाए मन—

मैं एक गुलाम बच्चा हूँ! सोने का मुझे अधिकार नहीं। मुझे हर घड़ी कुछ सीखना है, हर पल कुछ सीखना है। दुनिया देखना बहुत जरूरी है, न सिर्फ देखना बल्कि अन्दर तक महसूसना, छाँटना और अपनाना, जहाँ-जहाँ संजीवनी बिखरी पड़ी है, ऐसी संजीवनी चाहिए ताकि उससे अपने राज्य को जिला सकूँ।”

यूरोप के एक संक्षिप्त दौरे के बाद लौट आए लन्दन। छात्र मिले, भारतवंशी मिले, फत्ते सिंह गायकवाड़ मिले। क्या ही अच्छा होता दुनिया पैदल घूमा जाता, जहाँ जितनी देर रुकने का मन करता रुक जाता, फिर आगे बढ़ जाता! पैदल चलना अपने आप में किसी किताब से गुजरने जैसा होता है, सो हाइड पार्क से आवास तक पैदल। बगल में बकिंघम पैलेस जैसे अलविदा कहता हुआ। यूरोप के इस भाग की सबसे बड़ी खासियत है गर्मियों के दिन—बीस-बीस घंटे के। रातें नाम मात्र की। दो पल दम नहीं ले पाती रात कि सुबह की दस्तक! हाथ छुड़ाकर चल देती है। मुसलमानों के लिए तो और भी मुसीबत मगरिब की नमाज अदा करते न करते आ धमकती फजिर की नमाज।

वेस्टमिन्स्टर चर्च का कोरोनेशन हॉल! 9 अगस्त, 1902 की सुबह। राजकुमार एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक! लम्बे-लम्बे सफेद चोंगों में कैंटरबरी और आर्क विशप का अनुष्ठान। इस समारोह में जहाँ भी नजर जाती है, अंग्रेजों के लिए विचित्र पर अपने लिए अपनी रौबदार पोशाकों की नुमाइश करते अपने देशी रजवाड़े। कई तो प्रिंस ऑफ वेल्स के अगल-बगल ऐसे चल रहे थे मानो उनके सिपहसालार हों।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के भारतीय छात्र। नया खून है सो इस गुलामगिरी पर क्षुब्ध और हैरान, आपस में मजाक उड़ाते हैं—और झुको। और...जमीन में गड़ जाओ, जमीन में, कहीं राज छिन न जाए। मजा तो तब होता जब आप महारानी के पल्लू पकड़ कर उन्हें पहुँचाने जाते, ‘केसरी’ उसी अन्दाज में इन स्वाभिमान हीन रजवाड़ों को महाराष्ट्र में कोस रहा था।

मन उचट रहा था।

मिस्टर हिल, प्रतापसिंह, भारतवासी छात्र, मित्र, पार्लियामेंट के सदस्य एवं राजनयिक, सम्राट-सम्राज्ञी परिवार से मिलते-मिलाते पाँच दिन लग गए।

14 अगस्त को जलयान ने बम्बई का किनारा छुआ, अपने वतन का किनारा।

31 अगस्त को कोल्हापुर। उस दिन रविवार था पर भीड़ उथला रही थी।

उथलाती क्यों न? 50 प्रतिशत दलितों-पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में सीटें पक्की कर आए थे उनके राजा। इस भीड़ में जैन भी थे, मुसलमान भी। कोल्हापुर के 26 हजार ब्राह्मण खिन्न थे—हारे हुए-टूटे हुए और 9 लाख अब्राह्मणों के चेहरों पर उजाला!

पूरे परिवार में प्रणाम पाती। बच्चों से मिले, अजीज दोस्तों से मिले,

पलने-मिलाने की रस्मों के बाद आज इस मन्दिर, कल उस मन्दिर जाने की योजना!

क्यों शाहूजी, क्या एक बार भी नहीं याद आए प्रतापसिंह...मूर्तिपूजा पाखंड है...! और भी कितना कुछ! शाहू ने प्रतापसिंह से आँख चुराकर सिर्फ उतना ही लिया जितना उन्हें लेना था, बाकी छोड़ दिया।

“रुको महाराज!” चौंक कर देखा। सामने खड़े थे वही पुरोहित। ये मन्दिर और इसके देवी-देवता इनकी बपौती हैं?

“क्या बात है? “पूछते हैं शाहूजी!

“समुद्र पार करने का पाप आपके सिर पर है। इस पाप का प्रायश्चित्त किये बिना महालक्ष्मी मन्दिर में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है आपको।’ आगे बढ़कर उनकी राह रोक पाने का नैतिक साहस किसी में नहीं था। छत्रपति के समर्थन में एक विशाल भीड़ हुंकारे भर रही थी।

छत्रपति मूँछों ही मूँछों में मुस्कराए। भीड़ को देखा और हाथ जोड़ लिए, “जब से मैं गया, तभी से आप सब यहीं खड़े हैं क्या भूदेव?”

आज्ञा-पत्र लन्दन से टप्पा खाकर महाराष्ट्र में गिरा और लहरें उठने लगीं। ‘केसरी’, यानी तिलक ने कहा—“यह आज्ञा-पत्र सिर्फ ब्राह्मणों को ही धक्का पहुँचाने वाला नहीं हैं, अपितु रियासत के हितैषियों को भी धक्का पहुँचाने वाला है। इसके पहले तो कभी सुनने में नहीं आया कि छत्रपति ने पहले कभी तेली, तंबोली और मुसलमानों को शिक्षा देने का प्रयत्न किया हो।”

अंग्रेजी अखबार ‘मराठा’ में तिलक ने लिखा—“यह आज्ञा-पत्र घोषित कर शाहू छत्रपति ने राज कारोबार में जातीयता का मुद्दा खड़ा कर दिया।”

‘केसरी’ ने आगे लिखा—“शाहू महाराज पिछड़ी हुई जातियों के हित का बुरका ओढ़कर मात्र मराठा समाज के हितों की रक्षा करना चाहते हैं।”

“क्या सच?”

विमर्श टप्पा खाकर जनता के बीच आया— 

‘इस समय कोल्हापुर रियासत की कुल आबादी है नौ लाख, जिसमें 100 में ब्राह्मण ठहरते हैं मात्र 3। यानी 3 प्रतिशत ब्राह्मण रियासत की 97 प्रतिशत पर काबिज हैं। नये विधान का मतलब क्या हुआ? यह कि 50 प्रतिशत पर अब्राह्मण, शेष 50 प्रतिशत पर अभी भी ब्राह्मण...! सच पूछें तो 3 प्रतिशत ब्राह्मण अभी भी 50 प्रतिशत नौकरियों पर काबिज रहेंगे। बाकी 97 प्रतिशत अब्राह्म 50 प्रतिशत पर। अनुपात तो अभी भी दुरुस्त नहीं है।’

“तुम ब्राह्मण-ब्राह्मण क्या चीख रहे हो? कहो, ऊँची जात वाले!”

शाहूजी के 50 प्रतिशत आरक्षण की पहेली लोग अपने-अपने ढंग से बूझ रहे थे—तिलक से लेकर मामूली आदमी तक। बीजापुरकर ने ‘समर्थ’ में इसका मर्म इस प्रकार खोला—

‘इस अपवित्र आज्ञा-पत्र ने कानून की पवित्रता ही नष्ट कर दी है। शास्त्रों में उच्च वर्णियों को जो अधिकार प्रदान किये गए हैं, उन्हें उससे वंचित कर दिया गया है।’

खबरें छन-छनकर राजमहल में पहुँचती हैं। सुनकर अवाक् हो गईं राजमाता, “यह सच नहीं है। सच बोलो ब्राह्मणो, सच! मेरे बेटे का किसी भी ब्राह्मण तो क्या, किसी भी जाति से कोई द्वेष नहीं है। वह हमारे पूज्य शिवाजी महाराज की तरह धर्म-जाति की संकीर्णता से मुक्त है। दोष लगाओगे तो तुम नरक में जाओगे और शाहू ने पक्षपात किया होगा तो वह नरक में जाएगा। ये तोफखाने, करमरकर, गोखले, भिडे...किर्लोस्कर कौन हैं? और ये साँगली के अभ्यंकर कौन हैं? रानडे कौन हैं?” आनन्दीबाई के पेट में पहले ही शूल था और अब यह नया शूल? हाय देवा!

अगले माह पेट की बीमारी से तड़पती हुई माँ आनन्दीबाई गुजर गई। जन्मदात्री माँ की गोद सूनी पड़ती देख जिस माँ ने इस मातृहीन बालक को आगे बढ़कर अपनी गोद में उठाया, वह माँ चली गई। जिस औरत ने खुद को औरतों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया, वह औरत चली गई।

भूदेव फिर आ गए थे बिन बुलाए, तब आशीर्वाद लेकर आए थे, अब अभिशाप लेकर। उन्होंने आनन्दीबाई की मौत के लिए सीधे-सीधे शाहूजी के पापों को जिम्मेवार ठहराया। इतने पर भी शान्त न हुए। वह 14 सितम्बर की रात थी। इसके साथ ही किसी अनिष्ट के प्रतीक खूनी पंजे दीवारों पर जहाँ-तहाँ नजर आने लगे। डराने के लिए और भी बहुत कुछ कर रहे थे षड्यंत्रकारी। लोग आशंकित थे—पता नहीं क्या होनेवाला है।

यह सब राजोपाध्याय और अन्य ब्राह्मणों के साथ किये जा रहे अन्याय के कोप का कहर है। डर तो वे भी गए थे। वे भी, जो महात्मा फुले, रानडे और अन्य धर्म सुधारों से प्रभावित होने लगे थे।

शाहूजी को लगा, जैसे वे दो हजार वर्ष पहले के काल में आ गए हों जहाँ चाणक्य नन्द को शूद्र कहकर अपमानित कर रहा हो। वक्त आ गया है कि चाणक्यों को फिर से उनकी औकात बता दी जाय। उन्होंने ऐसे ब्राह्मणों को ससम्मान राजमहल के बाहर छोड़ आने का हुक्म दिया, अब तक जाति के नाम पर जदरबार से जो भी इनाम-इकराम दिये जा रहे थे, सबको निरस्त कर दिया।

पंचगंगा के घाट पर माता आनन्दीबाई का शव पड़ा था। हड़ाई गई मक्खियों की तरह पुरोहित-दल यहाँ भी आ बैठा था। उनका एक बड़ा समुदाय महज यह सुनिश्चित करने आया था कि आनन्दीबाई की अन्त्येष्टि पुराणोक्त पद्धति से ही हो, वेदोक्त पद्धति से नहीं।

लेकिन यह क्या? यह तो वेदोक्त है। धर्म का इतना बड़ा अपमान! भूदेवों में खलबली मच गई कि उनके कुछ भाई-बन्धु विप्र लोक सम्मति के विरुद्ध धर्म विरुद्ध आचरण कर रहे थे। कुछ उत्तेजित विप्र सामने आए—

“रुकिए-रुकिए विप्रगण। हमारे रहते आप ब्राह्मण होकर धर्म विरुद्ध आचरण नहीं कर सकते।”

प्रतिक्रिया में कई आवाजें उठीं, “कौन-सा आचरण धर्म विरुद्ध है महाराज?” 

“किसी शूद्र का अन्तिम संस्कार वेदोक्त पद्धति से किया जाना।”

“यह राजमाता हैं।”

“हैं तो शूद्रा ही न!”

“शूद्रा! शूद्रा!! शूद्रा!!!”

भीड़ हुंकार उठी, ‘मारो मारो...’

बापूराव ने किसी सिपाही की म्यान से सर्र से तलवार खींच ली। मातृ वियोग असहनीय था और उस पर उस धर्मपरायणा माँ के शव का अपमान! शाहूजी ने खून के आँसू रोए। बापूराव की तलवार फिर से सिपाही को वापस कर भीड़ को शान्त रहने का इशारा किया।

विरोध कर रहे ब्राह्मणों को ठेल कर परे हटाया गया। वेदोक्त पाठ शुरू हो गया।

बापू साहब को भाई का यह रुख अच्छा नहीं लगा, “अब तो पानी नाक के ऊपर आ गया। कुटिल जातिवादियों को अभी सबक न सिखाया गया तो कब सिखाया जाएगा?

“हम तो सिर्फ भाई का लिहाज कर रहे हैं वरना इन्हें दो मिनट में बता देते कि उचित क्या है और अनुचित क्या।” शोकार्त्त भीड़ शान्त हो गई।

ब्राह्मणों की कुटिलता का यहीं अन्त नहीं था। राजमाता के शवदाह में राजमहल के सारे ही लोग पंचगंगा तट पर आए हुए थे। सारा ध्यान चटचटा कर जलती चिता पर था। तभी किसी का ध्यान पीछे की ओर गया, वहाँ भी कुछ जल रहा था।

कुछ दुष्टों के साये कब राजमहल की ओर बढ़ चले थे, उन्हें कयास भी न था। भीड़ का एक हिस्सा राजमहल की ओर दौड़ पड़ा। वहाँ

इक्के-दुक्के प्रहरियों ने कुछ हलचल देखी, मगर उन्हें खटकने वाली बात लगी नहीं। शस्त्रागार तो दूसरी ओर था। पर उनका खयाल गलत था। थोड़ी ही देर में पुराने राजमहल से आग की लपटें लपलपाने लगीं। अब लोग दौड़े आ रहे थे। घाट से बापू साहब को राजमहल भेज कर स्थिरचित्त खड़े थे छत्रपति।

धुँधिया-धुँधिया कर जल रहा था पुराने राजमहल का वह किनारा। एक आग वहाँ जल रही थी, एक यहाँ और एक अन्दर। यह आग तो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रही थी पर वह आग जो अप्रत्यक्ष थी, उससे कैसे बचते लोग? भला हो कर्नल फेरिस और मिस्टर ब्यूक का जो अपने लाव-लश्कर के साथ तुरन्त पहुँच गए। न आते तो...! ब्राह्मणों ने अपनी विजय की दुन्दुभी पीटी, “हमने क्या कहा था?”

“इसी बात का डर था। “शाहूजी ने सबनीश से कहा।

“डर और आपको?”

“हाँ। मुझे किसी भी दुर्घटना से डर नहीं लगता। डर सिर्फ इस बात का है कि दुर्घटना को आधार बनाकर ब्राह्मण वर्ग को अन्धविश्वास फैलाने का अवसर मिल जाएगा और हमारे उद्देश्यों को धक्का लगेगा।”

झुंड के झुंड नगरवासी आ-आ कर उनके विलायत से सकुशल लौट आने और बच जाने पर बधाई दे रहे थे। विरोधी ब्राह्मणों के चेहरे उतरे हुए थे। 

“आपकी अनुपस्थिति में तिलक के दो ए.डी.सी. आए थे। ताकि आपके विरुद्ध विरोध खड़ा कर सकें।” 

“मालूम है लेकिन मैं इन्हें कैसे रोक सकता हूँ?”

“नारायण भट भी सातारा गया था—राजोपाध्याय के पक्ष में जनमत बनाने।” 

“तो?”

“सफल नहीं हुआ, फिर पुरानी चाल पर लौट आया।”

राजोपाध्याय कोर्ट गए, वतनी सम्पत्ति की जब्ती के विरुद्ध। उनका और उनके बड़े भाई का तर्क था कि वे कुलगुरु हैं, यह सम्पत्ति उनके भरण-पोषण के लिए थी। वे कोई भी राजकीय कर्मकांड करने के लिए बाध्य नहीं हैं। कई ब्राह्मण अम्बा देवी के मन्दिर में एक नये ढंग के पूजा-पाठ में जुटे हुए थे—राजा के अपकर्म के लिए शुद्धि-प्रायश्चित्त! समूचे कोल्हापुर में इसकी चर्चा थी। अलग-अलग मत थे, अलग-अलग व्याख्याएँ। एक कदम और! राजोपाध्याय परिवार द्वारा कहा गया कि यह सम्पत्ति राजा की नहीं, उनकी व्यक्तिगत है। ब्राह्मण अपनी ऐंठ में थे, साथ ही डर भी रहे थे कि कहीं उनको मिली ‘इनामी’ या ‘वतनी’ सम्पत्ति छिन न जाय।

कोई कह रहा था, “मठ के महन्त स्वामी शंकराचार्य की सम्पत्ति भी 1903 में अटैच्ड हुई थी। सारी अकड़ निकल गई। अन्त में माना की शाहूजी क्षत्रिय हैं।”

बाहर आम चर्चा थी, “तुम इन ब्राह्मणों को नहीं जानते। इनके पास हजार कहानियाँ, हजार जी हैं। अभी जो कहानी फिजा में तैर रही है, जानते हो, क्या है वह, राजा नृग की कथा। महादानी नृग ने ब्राह्मणों या किसी ऋषि को हजार गायें दान दीं। भूल से एक दान दी हुई गाय दूसरे को दे दी। कोई कहता है राजा के पास ही लौट आई। इसके शमन के लिए एक सौ हजार गायें दान करनी पड़ीं। ब्राह्मणों का कोप फिर भी शान्त न हुआ। राजा को उन्होंने माफ नहीं किया। उन्हें नरक में जाना ही पड़ा।”

“अरे देवा! कहाँ से ढूँढ़ लाए?”

“कहते हैं, यह भागवत पुराण है।”

“अरे सिर्फ एक पुराण नहीं, सारे ही पुराण यही कहते हैं कि ब्राह्मणों से अगर कोई अपराध हो जाए या वह आपको मारें-पीटें, शाप दें फिर भी उन पर क्रोध न करो, वह वन्दनीय हैं, उनको प्रणाम करो। पूजा करो।”

ये चर्चाएँ अभी चल ही रही थीं कि 16 अक्टूबर, 1903 को राजोपाध्याय की कोर्ट से पराजय की खबर आई। जैसे कोई कलशी थी, गुड़गुड़ा कर डूब गई कुएँ में!

 

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