लेखक-पत्रकार रवीश कुमार ने इंक़लाबी कवि ‘पाश’ के अनन्य दोस्त शमशेर सिंह संधू से हुई मुलाक़ात का क़िस्सा साझा किया है, आप भी पढ़ें।
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“सबसे ख़तरनाक होता है, सपनों का मर जाना”, पाश की कविता की इस पंक्ति से रोज़ टकराता हूँ। मेरे घर की दीवार पर चिपकी रहती है। रविवार दोपहर हौज़ ख़ास में अपने मित्र के घर इस कवि के अनन्य दोस्त से मुख़ातिब था। पाश के दोस्त पाश से। वे अपने दोस्त को याद कर रहे थे, मैं उनमें उनका दोस्त देखने लगा।
पाश अमेरिका के पेट्रोल पंप (गैस स्टेशन) पर काम कर रहे थे। चंडीगढ़ आना हुआ था और अपने इस दोस्त के साथ मटरगस्ती की कोई योजना बनी होगी। दोनों बीयर की बोतलें लेकर पहुँच गए रोज़ गार्डन। वहीं पर शमशेर सिंह संधू को पाश ने पहली बार यह कविता सुनाई थी—‘सबसे ख़तरनाक होता है, सपनों का मर जाना।’
इस कविता को सुनते ही शमशेर जी ने कहा कि इसका तो अंग्रेज़ी में अनुवाद होना चाहिए, तो पाश ने कहा कि पहले तो अंग्रेज़ी में ही यह कविता छपी है। अमेरिका के छोटे से अख़बार में इसका अनुवाद छपा था मगर किसी ने तवज्ज़ो नहीं दी। तब शमशेर सिंह ने पंजाबी पत्रिका में छापने की बात की और फिर यह कविता एक पंजाबी पत्रिका में छपती है। चूँकि शमशेर जी विशुद्ध पंजाबी में बोल रहे थे तो मेरे सुनने और समझने में गलती हो सकती है। कुछ जोड़-घटाव हो सकता है लेकिन पूरी दोपहर इतनी शानदार थी कि उसकी ख़ुमारी अभी तक नहीं उतरी है।
इस तरह पाश शमशेर जी की बातों में उतरते चले गए और वे अपने दोस्त को याद करते हुए पाश जैसे होने लगे। उनके बयान में पाश को जानने की शेखी नहीं थी। वे पाश को ख़ुद को ज़िंदा रखने के लिए याद कर रहे थे। पता चल रहा था कि उनका दोस्त उनके जीवन में किस हद तक रचा बसा है। इतना कि उनके बच्चे फोन से पाश से जुड़ी चीज़ें निकाल कर देख रहे थे। पाश अंकल। ये संबोधन तो हमने इस कवि के बारे में सुना ही नहीं था। पता चला कि पाश की बहन अक्सर इनसे पूछा करती है कि मेरे भैया के बारे में और बताओ।
शमशेर सिंह किस्से में किस्सा जोड़े जा रहे थे और बीच-बीच में पाश की पूरी कविता बाँच रहे थे। अपने फ़ोन से पाश की लिखी चिट्ठियाँ निकाल कर दिखाईं। पाश ने उन्हें कई सारे ख़त लिखे हैं। लिखावट अच्छी थी और पाश को काली स्याही पसन्द थी। उनके फ़ोन के इनबॉक्स से निकल कर पाश की लिखी चिट्ठियाँ मेरे इनबॉक्स में भी पहुँच गई है। शमशेर जी बता रहे थे पाश के भीतर गुस्सा भरा हुआ था लेकिन व्यंग्य भी तीखे करता था।

पाश के मित्र शमशेर सिंह संधू (साभार: रवीश कुमार)
पाश के ऐसे गहरे दोस्त से मिलना पाश से मिलने जैसा ही था। मैं उनकी बातों में अपने समय के महान कवि के जीवन को किसी वृत्तचित्र की तरह चलता हुआ देख रहा था। जिस दिन पाश को गोली मारी गई है, उस दिन शमशेर सिंह को भी उनके साथ होना था। मगर पास के गाँव में परिवार के किसी बच्चे के जन्मदिन में चले गए और वहीं पाश को गोली मारने की ख़बर उन तक पहुँचती है। पाश अमेरिका लौटने से पहले तलवंडी आए थे। अपनी भावुकता को थामे धीमे-धीमे पाश के जीवन को होल्डाल की तरह खोलते जा रहे थे।
खालसा कॉलेज में शमेशर सिंह पढ़ा करते थे। कॉलेज में महीने दो महीने पर युवा कवियों को बुलाया करते थे। ऐसे ही एक कार्यक्रम के दौरान पाश को बुलाया था। वहीं से दोनों दोस्त हो गए। उस समय शमशेर ‘संकल्प’ नाम की पत्रिका निकालते थे जिसका तेवर सत्ता विरोधी था। पाश को वह पत्रिका इसी वजह से पसन्द थी।
अमृता प्रीतम अपनी पत्रिका में साहित्यकारों की पत्नियों पर कॉलम लिखवाती थीं। उनकी पत्रिका के लिए शमशेर सिंह ने भी एक कॉलम पाश पर लिखा। पाश की कभी न बन सकी पत्नी। ऐसा ही कुछ उन्होंने बहुत धीमे से कहा। मैंने कहा कि आपने कॉलम लिखा था पाश की कभी न हो सकने वाली पत्नी पर। किसी को आप पर कॉलम लिखना चाहिए, कवि का दोस्त।
उनकी पंजाबी किसी सोने की गिन्नी की तरह मेरे कानों से होते हुए स्मृतियों में जमा हो रही थी। इस वजह से पाश के प्रेम प्रसंग का बड़ा हिस्सा छूट गया। एक बात ठीक से समझ सका कि मिल्खा सिंह की आत्मकथा मिल्खा सिंह ने नहीं, पाश ने लिखी थी। कुछ सात हज़ार का मामला था जो ठीक से नहीं पकड़ सका।
पाश को कहानियाँ बहुत याद थीं। एक कहानी यह भी सुनाई कि पाश एक बार जेल में थे। दोस्तों से कहा कि अख़बार के बने लिफ़ाफे में केला मत लाना, सादे क़ागज़ से बने लिफ़ाफे में लाना। तो केले के भीतर बॉल पेन का सिक्का डाल दिया गया और सफेद लिफ़ाफे में मुलाकाती दोस्त पकड़ा दिया करते थे। पाश उस पर कविता लिखते थे। लिखने के बाद अपनी पगड़ी की पिन को तले में आर-पार कराते थे और काग़ज़ को मोड़ कर उससे नत्थी कर देते थे। जो मिलने आता था उसे कविता पकड़ा दिया करते थे। अगर मैंने ठीक से सुना और समझा तो किस्सा यही है। और भी बहुत है।
रविवार की दोपहर हौज़ ख़ास से निकला तो सामने सिरी फोर्ट का सभागार था। वहाँ शायद हिन्दी के कई कवि और पाठक, रचनाकार सब जमा थे। मैं पाश से मिल कर लौट रहा था। सम्पादक जी को मैसेज किया तो व्यस्त थे। फिर अपने मित्र को फ़ोन लगा दिया। रास्ते भर उनसे पाश के बारे में ही बातें करता रहा।
किसी कवि का ऐसा दोस्त जो उसे एक-एक पल को जीता हो, याद करता हो—ऐसे दोस्त कितने कवियों के पास होते होंगे जो ठीक-ठीक उसी का एक और चेहरा लगते हों। अपने श्रद्धेय मित्र का शुक्रिया। आना-जाना तो होता ही था इस बार काफ़ी कुछ लौटा—पाश के जीवन का बड़ा-सा हिस्सा लेकर।
रवीश कुमार की फ़ेसबुक वॉल से साभार
