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राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनके उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ का एक अंश। व्यंग्य-प्रधान शैली में लिखा गया यह उपन्यास आज के हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों को पूरी सच्चाई के साथ पेश करते हुए हमारे आज के बुद्धिजीवियों के सामने एक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
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Posted: January 30, 2024
पुस्तक अंश : खड़े रहो गांधी
Read moreमहात्मा गाँधी की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘संस्कृति वर्चस्व और प्रतिरोध’ में संकलित लेख ‘खड़े रहो गाँधी’ का एक अंश।
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Posted: January 22, 2024
पुस्तक अंश : हिन्दू होने की क्या है पहचान?
Read moreराजकमल ब्लॉग में पढ़ें, विद्यानिवास मिश्र की किताब ‘हिन्दू धर्म : जीवन में सनातन की खोज’ का एक अंश। इस किताब में हिन्दू धर्म-दर्शन पर विवेचनापूर्ण विचारों का संकलन किया गया है।
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क़ुर्रतुल ऐन हैदर की जयंती पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनके उपन्यास ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ का एक अंश। इस उपन्यास में नाचने-गानेवाली दो बहनों की कहानी है, जो बार-बार मर्दों के छलावों की शिकार होती हैं।
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सआदत हसन मंटो की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनकी सम्पूर्ण रचनाओं के संग्रह ‘दस्तावेज’ के खण्ड चार में संकलित मंटो की डायरी का एक अंश : ‘मैं अफ़साना क्योंकर लिखता हूँ’।
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रांगेय राघव की जयंती पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनके उपन्यास मुर्दों का टीला का एक अंश। इस उपन्यास में लेखक ने एक रचनाकार की दृष्टि से मोअन–जो-दड़ो का उत्खनन करने का प्रयास किया है। प्राचीन भारत की सिन्धु घाटी सभ्यता के स्वरूप, उस समाज के लोगों की जीवन-शैली, शासन व्यवस्था आदि का अद्वितीय विवरण इस उपन्यास में मिलता है।
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शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के जन्मदिवस पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनके उपन्यास ‘क़ब्ज़े ज़माँ’ का एक अंश। उर्दू से इसका अनुवाद रिज़वानुल हक़ ने किया है। यह छोटा-सा उपन्यास उर्दू क़िस्सागाेई की बेहतरीन मिसाल है।
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शमशेर बहादुर सिंह की जयंती पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनकी कविता 'टूटी हुई, बिखरी हुई'। यह कविता इसी शीर्षक से प्रकाशित उनके कविता संग्रह और 'प्रतिनिधि कविताएँ' में संकलित है।
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स्वामी विवेकानन्द की जयंती पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक रोमां रोलां द्वारा लिखित विवेकानन्द की जीवनी का एक अंश। मूल रूप से फ्रेंच भाषा में लिखी गई यह किताब विवेकानन्द पर लिखी गई शुरुआती महत्वपूर्ण किताबों में से एक है। हिन्दी में इसका अनुवाद ‘अज्ञेय’ और रघुवीर सहाय ने किया है।