क्या अकबर ने चित्तौड़ में कराया था क़त्ले आम?

शाज़ी ज़माँ का उपन्यास ‘अकबर’ प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर बुनी एक ऐसी गाथा है, जो मुग़ल सम्राट अकबर के जीवन और समय को एक लेखक की दृष्टि से टटोलने का प्रयास करती है। इस उपन्यास का एक अंश प्रस्तुत है: 

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लगभग चार बरस पहले बारहवें इलाही सन् के आख़िर में, बमुताबिक़ 23 फ़रवरी, 1568 ईसवी, मंगल के दिन, चित्तौड़ के मज़बूत क़िले ने बादशाह सलामत की फ़ौज के सामने घुटने टेक दिए। इस से एक रात पहले ही क़िले की दीवार को जगह-जगह से भेदा जा चुका था लेकिन चित्तौड़ की फ़ौज अभी तक शाही फ़ौज को रोक पा रही थी। 

रात के अँधेरे में गोलाबारी की लपक में जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने हज़ार मेख़ी पहने एक शख़्स को उस मोर्चे पर देखा जहाँ दीवार भेद दी गई थी। बादशाह सलामत ने अपनी पसंदीदा बंदूक़ ‘संग्राम’ को उठाया। उन्हें बंदूक़ों का बहुत शौक़ था। न सिर्फ़ वो बेहतरीन निशानेबाज़ थे बल्कि उनके ईजाद किए गए तरीक़े से इतनी मज़बूत बंदूक़ें बनीं कि पूरी भरी होने पर भी उनके फटने का अंदेशा नहीं रहा। 

अब बंदूक़ों को चलाने के लिए आग देने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। सिर्फ़ बंदूक़ के घोड़े की हल्की-सी हरकत ही काफ़ी थी। बादशाह सलामत हज़ारों बंदूक़ों में से एक हज़ार पाँच बंदूक़ों को अपने ख़ास इस्तेमाल के लिए चुनते थे। इन ख़ासा बंदूक़ों में भी ‘संग्राम’ सबसे ख़ास थी। ये उनकी पहली ख़ासा बंदूक़ थी। इसे वो जंग के साथ-साथ शिकार पर भी ले जाते थे। चूँकि बादशाह सलामत के हुक्म से हर बंदूक़ से हुए शिकार का हिसाब रखा जाता था, इसलिए ये पाया गया कि अकेले ‘संग्राम’ से एक हज़ार उन्नीस जानवर शिकार हुए।

अब जब बादशाह सलामत ने ‘संग्राम’ से गोली चला दी तो राजा भगवंत दास से कहा, “जब निशाना सही लगता है तो अच्छा शिकारी जान लेता है।”

अभी घंटा भर भी नहीं हुआ कि चित्तौड़ की फ़ौज ग़ायब हो गई और क़िले में कई जगहों से आग की लपटें उठने की ख़बर आई। अभी दरबारी क़यास लगा ही रहे थे कि राजा भगवंत दास ने कहा, “ये जौहर है। जब हार तय होती है और मर्द मारे जाते हैं तो औरतें संदल, सूखी लकड़ी और तेल की चिता में समा जाती हैं।”

सुबह होते-होते पता चल गया कि बादशाह सलामत की ‘संग्राम’ ने चित्तौड़ के क़िलेदार जयमल को निशाना बना लिया था। चार महीने के घेराव के बाद अब जाकर चित्तौड़ का क़िला बादशाह सलामत के क़दमों में आ गया। वो हाथी पर सवार हो कर क़िले में दाख़िल हुए। शाही फ़ौज के लगभग तीन सौ हाथी भी क़िले में घुसे। बादशाह सलामत की नज़र के सामने हाथी ने चित्तौड़ के जाँबाज़ पत्ता को कुचल दिया। इस हाल में भी एक राजपूत ने शाही लश्कर के मधुकर हाथी की सूँड पर हमला किया और कहा, “बादशाह सलामत को मेरा सलाम कहना।” भोर से लेकर दोपहर तक क़त्ले आम हुआ। लगभग तीस हज़ार लोग मारे गए। 

ऐसे मौक़ों के लिए अख़्लाक़े नासिरी में जो कहा गया था वो बादशाह सलामत को ख़ूब याद था—“फ़तह के बाद भी तदबीरें नहीं छोड़नी चाहिए, ना ही सूझ-बूझ में कोई कमी आनी चाहिए। लेकिन जहाँ तक हो सके, जो ज़िंदा पकड़ा जा सके, उसे मारना नहीं चाहिए क्योंकि क़ैद में लेने के कई फ़ायदे हैं। जैसे बंधक बनाना, फ़िरौती वसूल करना, किसी पर एहसान कर देना। मारने के कोई फ़ायदे नहीं हैं। फ़तह के बाद किसी को मारना नहीं चाहिए। ना ही कोई दुश्मनी या भेदभाव रखना चाहिए क्योंकि फ़तह के बाद दुश्मन की हालत ग़ुलाम या रिआया की है। बताया जाता है कि जब सिकंदर ने एक शहर पर क़ब्ज़ा कर के बेहिसाब क़त्ले आम किया तो अरस्तू ने डाँट कर ख़त लिखा, ‘फ़तह से पहले दुश्मन को मारने की बात समझ में आती है। फ़तह के बाद अपनी रिआया को मारने की क्या तुक है।’ बादशाहों की माफ़ी औरों की माफ़ी से बड़ी है। ऐसे वक़्त पर माफ़ करना क़ाबिले-तारीफ़ होता है जब माफ़ नहीं भी किया जा सकता था।”

बादशाह सलामत के दौर की तारीख़ लिखने वाले शेख़ अबुल फ़ज़ल ने कहा, “पिछली बार 703 हिज्री के मुहर्रम की तीन तारीख़ को जब सुल्तान अलाउद्दीन ने इस क़िले पर छह महीने और सात दिन के बाद क़ब्ज़ा किया तो किसानों को मौत के घाट नहीं उतारा गया क्योंकि उन्होंने जंग में हिस्सा नहीं लिया था लेकिन इस बार इस क़त्ले आम की वजह है कि किसानों ने बहुत जोश से हिस्सा लिया।”

चित्तौड़ की लड़ाई बादशाह सलामत ने ख़ुद लड़ी थी। इस थका देने वाली मुहिम के दौरान बादशाह सलामत ने बहुत नुक़सान उठाया था। बारहवें इलाही सन् बमुताबिक़ 1567 की 20 अक्तूबर को चित्तौड़ के क़िले के पास शाही ख़ेमा लगा था। जिस पहाड़ी पर चित्तौड़ का क़िला था, उसके दो कोस के घेरे का जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने अगले ही रोज़ चक्कर लगाया। महीने भर के अंदर पूरी घेराबंदी कर दी गई। जब सीधे चढ़ाई की कोशिश में शाही फ़ौज के लोग मारे जाने लगे तो बादशाह सलामत ने इस की मनाही कर दी और कहा, “ये बहादुरी नहीं है। उतावलापन है।”

इसके बाद हुक्म हुआ कि तीन जगहों पर बारूद बिछाने की ऐसी तरकीब निकालें कि क़िले की दीवार में सेंध लगाई जा सके, और दो जगहों पर पहाड़ में से ऐसा रास्ता बने जो सीधे क़िले तक जाए। पाँच हज़ार कारीगर सबात बनाने में जुट गए, जो ऐसा घिरा हुआ रास्ता था कि इससे फ़ौज क़िले के पास पहुँच कर दीवार में सेंध लगा सकती थी। क़िले के अंदर से हमले होते रहे और रास्ता बनाने की कोशिश में हर रोज़ दो सौ लोगों की जान जाती रही। मज़दूरों पर सोना-चाँदी लुटाया गया और सबात तेज़ी से बनता गया। बादशाह सलामत के हुक्म से बारूद भी आगे बढ़ता गया।

क़िले के अंदर के राजपूतों में इन हालात को देखकर खलबली मच रही थी। ख़ुद महाराणा इस वक़्त क़िले में मौजूद नहीं थे। बादशाह सलामत के आने की ख़बर सुनने के बाद उन्होंने जयमल को क़िले की ज़िम्मेदारी दी और अपने ख़ानदान और पाँच हज़ार राजपूतों के साथ पहाड़ी इलाक़ों में छुप गए। इस पूरी जंग के दौरान वो आसपास नहीं आए।

अब सुलह के लिए चित्तौड़ के क़िले के अंदर से दो राजपूत सरदारों को बादशाह सलामत के पास भेजा गया।

चालीस गज़ ऊँचे आकाशदीए से चित्तौड़ के इलाक़े में दूर-दूर तक लोगों को शाही मौजूदगी का एहसास हो रहा था। लोग इसकी लौ को देखते और कहते, “अकबर चा दीवा।”

चित्तौड़ के क़िले से आए रावत साहिब ख़ान चौहान और डोडिया ठाकुर सांडा ने बादशाह सलामत से कहा, “महाराणा तो पहाड़ों में चले गए। जो क़िले में बचे हैं उनका कोई क़सूर नहीं है। क़िले का घेरा उठा लें क्योंकि पहले से बादशाहों का यही दस्तूर है कि पेशकश पाने पर मेहरबानी करते हैं।”

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने राजपूत सरदारों की बात को सुना और कहा, “राणा के आए बग़ैर लड़ाई नहीं रुकेगी। इसके सिवाय जो चाहे माँगो।”

डोडिया ठाकुर सांडा ने कहा, “अब हम को और क्या ज़रूरत है जो माँगें। जो आप हुक्म देते हैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि अगर लड़ाई में मारा जाऊँ तो मेरी लाश हिंदू रीति से जलवा दी जाए।”

बादशाह सलामत ने इस बात को मंज़ूर किया और एक बड़े हमले की तैयारी कर ली। लेकिन ये हमला उनके लिए अफ़सोस की बहुत बड़ी वजह बन गया।

अब तक बारूद बढ़ते-बढ़ते क़िले के नीचे तक आ पहुँचा था। लाखौटा दरवाज़े के दोनों तरफ़ बारूद बिछा दिया गया। एक जगह एक सौ बीस मन और दूसरी जगह अस्सी मन। इरादा था कि दोनों जगहों पर एक साथ धमाका करके क़िले की दीवार को तोड़ दिया जाए और फ़ौज फ़ौरन से अंदर दाख़िल हो जाए। लेकिन अनहोनी हो गई जब एक धमाका पहले हो गया। क़िले की दीवार टूटी। शाही फ़ौज तेज़ी से आगे बढ़ी और क़िले को बचाने के लिए चित्तौड़ के फ़ौजी भी आगे बढ़े। उसी वक़्त दूसरा धमाका हुआ जो इतना ख़ौफ़नाक था कि पचास कोस दूर तक सुनाई दिया। शाही फ़ौज के दो सौ और चित्तौड़ के चालीस फ़ौजी उसी वक़्त मौत के मुँह में चले गए। उनके हाथ-पाँव हवा में उड़ के यहाँ-वहाँ जा गिरे।

ये बादशाह सलामत के लिए बड़ा सदमा था। मरने वालों में बीस तो ऐसे थे जिनसे उनका ज़ाती ताल्लुक़ था। बादशाह सलामत ने पहले ही कहा था कि दो जगहों के बारूद को एक साथ आग लगाने के लिए ज़रूरी है कि आग अलग-अलग जगह से लगाई जाए। उन्होंने ताकीद की थी कि एक जगह से बारूद के दोनों ढेर को आग लगाई जाएगी तो दूसरे ढेर में आग लगने में वक़्त लग सकता है।

 

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