अब्दुल बिस्मिल्लाह का कथा संसार : एक परिचय

अब्दुल बिस्मिल्लाह को पढ़ने का अर्थ है—हाशिए पर खड़े समाज की नब्ज को महसूस करना, उसके दुख-सुख, द्वंद्व और प्रतिरोध को गहराई से जानना। उनकी रचनाओं में जीवन किसी भावुक कल्पना की तरह नहीं, बल्कि जीती-जागती विडम्बनाओं, संघर्षों और उम्मीदों से बना यथार्थ है। मुस्लिम समाज की आन्तरिक जटिलताएँ हों या बुनकरों की रोज़मर्रा की मुश्किल ज़िन्दगी, हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों की सामाजिक परतें हों या स्त्री जीवन की मार्मिक गाथाएँ—बिस्मिल्लाह हर जगह अपनी विशिष्ट दृष्टि और गहरी आत्मीयता के साथ उपस्थित होते हैं।

उनकी कथा-भूमि में गाँव है, कस्बा है, शहर की सरहदें हैं—लेकिन सबसे प्रमुख है इंसानी चेतना, जो सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ताओं से टकराती है, कभी टूटती है, तो कभी पूरे आत्मबल के साथ टिके रहने की कोशिश करती है। उनका लेखन यथार्थ की जड़ता को केवल दर्ज नहीं करता, बल्कि उसमें छिपी परिवर्तन की सम्भावनाओं को भी टटोलता है।

आज यह विशिष्ट कथाकार अपने जीवन के 75 वर्ष पूरे कर रहे हैं। इस अवसर पर हम राजकमल ब्लॉग में उनके कथा-साहित्य से पाठकों का परिचय करा रहे हैं। प्रस्तुत है :

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झीनी-झीनी बीनी चदरिया (उपन्यास)

 

झीनी झीनी बीनी चदरिया अब्दुल बिस्मिल्लाह का प्रतिनिधि उपन्यास है, जो बनारस के बुनकर समुदाय के जीवन को केंद्र में रखकर रचा गया है। यह हिंदी कथा-साहित्य में एक नए अनुभव-संसार की सर्जना करता है, जहाँ पाठक इसके पात्रों के सहारे उस अभावग्रस्त, रोग-जर्जर दुनिया में प्रवेश करते हैं, जिसकी उपेक्षा साहित्य में अक्सर होती रही है। इस दुनिया में ऐसे अनेक चरित्र हैं—जो कठिन परिस्थितियों में भी टूटते नहीं, समझौता नहीं करते, बल्कि संघर्ष और बदलाव की राह चुनते हैं।

उपन्यास न केवल बुनकर समाज के दैनंदिन संघर्षों को उकेरता है, बल्कि उस शोषण-तंत्र की परतें भी खोलता है, जिसमें राजनीतिक स्वार्थ, सरकारी योजनाओं की विफलता और सांप्रदायिक सोच तक की भूमिका शामिल है। साथ ही, लेखक ने समुदाय की अपनी परंपराओं, सामाजिक कुरीतियों और मजहबी जड़ता की आलोचना कर यह दर्शाया है कि असली मुक्ति केवल बाहरी बदलावों से नहीं, बल्कि आत्मालोचन और जागरुकता से संभव है।

इस उपन्यास का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि यह संघर्ष की विरासत को अगली पीढ़ी तक सौंपता है—एक ऐसे इक़बाल के माध्यम से, जो न केवल हालात को समझता है, बल्कि उन्हें बदलने के लिए संकल्पबद्ध भी है।

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कुठाँव (उपन्यास)

 

कुठाँव अब्दुल बिस्मिल्लाह का एक साहसिक और मार्मिक उपन्यास है, जिसमें समाज के गहरे और जटिल तनावों को उजागर किया गया है। इसमें स्त्री और पुरुष, प्रेम और वासना, हिंदू और मुसलमान का और ऊँच-नीची जातियों का एक भीषण परिदृश्य रचा गया है।

यह कहानी मेहतर समुदाय की मुस्लिम औरत इद्दन और उसकी बेटी सितारा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो समाज में ऊँची कही जाने वाली जातियों और पैसेवाले मर्दों के अन्याय के ख़िलाफ़ डटकर खड़ी होती हैं। उपन्यास में दिखाया गया है कि किस तरह मर्द अपनी सत्ता और प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए औरत की देह और इच्छा का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करते हैं। लेकिन ये महिलाएँ सिर्फ शिकार नहीं हैं—वे लड़ती हैं, जवाब देती हैं, और अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद लड़ती हैं।

उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है: क्या औरतों के लिए कोई मुक्ति की राह है? सदियों से जकड़ी, दमित और शोषित स्त्रियों के लिए यह कहानी बताती है कि मुक्ति का रास्ता उनके अपने सपनों से होकर जाता है। यही सपने उन्हें ताक़त देते हैं, और एक दिन ऐसा भी आएगा जब न कोई उन्हें शारीरिक रूप से झुका पाएगा, न सामाजिक रूप से।

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ज़हरबाद (उपन्यास)

ज़हरबाद अब्दुल बिस्मिल्लाह का प्रकाशन-क्रम में तीसरा, किंतु लेखन-क्रम में पहला उपन्यास है। इसकी कथा मध्य प्रदेश के मंडला अंचल के ग्रामीण जीवन पर आधारित है—एक ऐसा क्षेत्र, जो आज़ाद भारत की विकास योजनाओं से अब तक लगभग अछूता है।

इस उपन्यास में लेखक ने उन लोगों की कहानी बुनी है, जो गरीबी की रेखा से बहुत नीचे जीते हैं—जिनके पास सपने तो हैं, पर साधन नहीं। पति-पत्नियों, माता-पिताओं, बेटों-बेटियों और प्रेमी-प्रेमिकाओं की मार्मिक कहानियाँ मिलकर इस रचना को एक जीवंत, सामाजिक महागाथा में बदल देती हैं।

यह न केवल एक संवेदनशील सामाजिक दस्तावेज़ है, बल्कि मंडला अंचल की बोली-बानी और जीवन-शैली का भी प्रमाणिक चित्र है। इसकी संवाद शैली और स्थानीय भाषा का प्रयोग पात्रों को विश्वसनीय बनाता है और पाठक को उस परिवेश का सजीव अनुभव कराता है।

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अपवित्र आख्यान (उपन्यास)

अपवित्र आख्यान अब्दुल बिस्मिल्लाह का एक विचारोत्तेजक उपन्यास है, जो हमारे समाज की सांप्रदायिक जटिलताओं, सांस्कृतिक द्वंद्वों और सामाजिक विडंबनाओं को गहराई से उभारता है। यह उपन्यास खासतौर पर उस गंगा-जमुनी तहज़ीब की पड़ताल करता है, जो भारत की साझी विरासत रही है, लेकिन जिसे आज के समय में लगातार खुरचने की कोशिशें हो रही हैं।

कहानी का नायक एक ऐसी संस्कृति से जुड़ा है जहाँ धर्म, भाषा और जीवन-शैली में कोई टकराव नहीं था। उसके लिए हिंदी, संस्कृत, उर्दू और फारसी सभी ज्ञान की ज़ुबानें थीं। लेकिन तथाकथित 'सभ्य' समाज उसे बार-बार उसकी धार्मिक पहचान का एहसास दिलाता है—यह जताता है कि मुसलमान होकर उसे हिंदी-संस्कृत नहीं, उर्दू-फारसी पढ़नी चाहिए थी। उपन्यास यह दिखाता है कि कैसे आधुनिक समाज धर्म और भाषा के आधार पर पहचान को सीमित कर देता है।

यह केवल धार्मिक द्वंद्व तक सीमित नहीं है—उपन्यास में ऐसे कई पात्र हैं, जो बाहर से धार्मिक या नैतिक लगते हैं, लेकिन भीतर से अवसरवादी और दोहरे मापदंडों वाले हैं।

यह उपन्यास धर्म, नैतिकता, सत्ता और पहचान के सवालों को बेहद बेबाकी से उठाता है। यह केवल मुस्लिम समाज की आंतरिक ग्रंथियों की बात नहीं करता, बल्कि मौजूदा उपभोक्तावादी समाज की परतों को भी उघाड़ता है—जहाँ हर चीज़, यहाँ तक कि संबंध और आस्था भी, बाज़ार और स्वार्थ के तराज़ू पर तौले जा रहे हैं।

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समर शेष है (आत्मकथात्मक उपन्यास)

समर शेष है अब्दुल बिस्मिल्लाह का आत्मकथात्मक उपन्यास है, जो एक मातृविहीन बालक के संघर्षमय जीवन की मार्मिक कथा कहता है। पिता के असमय निधन के बाद वह बच्चा अकेले एक कठोर जीवन-संग्राम में उतरता है—जहाँ उसे अभाव, अपमान और असुरक्षा के बीच अपने सपनों को बचाए रखना है।

यह उपन्यास केवल कठिनाइयों की कहानी नहीं है, बल्कि उस जिजीविषा और आत्मबल की भी गवाही है, जिसके सहारे वह बच्चा बड़े होकर न केवल अपने हालात से लड़ता है, बल्कि जीवन को नई दिशा भी देता है। किशोरावस्था की पहली प्रेमानुभूति से लेकर युवावस्था के आत्मनिर्माण तक, यह कथा मनुष्य के संकल्प, संवेदना और संघर्ष की गहराइयों को छूती है।

विपरीत स्थितियों के बावजूद संकल्प और संघर्ष के गहरे तालमेल से मनुष्य जिस जीवन का निर्माण करता है, यह कृति उसी की सार्थक अभिव्यक्ति है।

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दंतकथा (उपन्यास)

दंतकथा अब्दुल बिस्मिल्लाह का एक प्रयोगधर्मी और बहुस्तरीय उपन्यास है, जो पारंपरिक कथा-शिल्प से हटकर एक अनोखी दुनिया रचता है। इसका नायक एक मुर्ग़ा है—जो मनुष्य की हत्यारी प्रवृत्ति को भाँपकर नाबदान में शरण लेता है, पर वहाँ से निकल पाना भी अब असंभव है।

मुर्ग़ा इस कैद में लगातार सोचता है—अपने बारे में, अपनी जाति के बारे में। और सिर्फ़ सोचता ही नहीं, दम घोंट देनेवाले उस माहौल से बाहर निकलने के लिए जूझता भी है। वह लड़ता है भूख से, मौत से, और सबसे ज़्यादा उस नियति से जो उसे मनुष्य के हाथों हलाल होते देखने को मजबूर करती है।

यह उपन्यास नाबदान में फँसे एक मुर्ग़े के बहाने पूरी धरती पर व्याप्त भय, असुरक्षा और आतंक तथा इनके बीच जीवन-संघर्ष करते प्राणी की स्थिति का बेजोड़ शब्दचित्र प्रस्तुत करता है।

साथ ही इसमें मुर्ग़ों का रहन-सहन, प्रेम, आकांक्षाएँ—सब कुछ बड़ी संवेदना से उकेरा गया है। यही वजह है कि यह हर पाठक को एक अलग दृष्टि से सोचने के लिए प्रेरित करता है।

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मुखड़ा क्या देखे (उपन्यास)

मुखड़ा क्या देखे अब्दुल बिस्मिल्लाह का वह उपन्यास है, जो स्वाधीनता के कुछ वर्षों बाद से लेकर आपातकाल तक के दौर में भारत के ग्रामीण समाज पर पड़े प्रभावों की गहरी पड़ताल करता है। इसकी कथा-भूमि कोई विशिष्ट गाँव या समुदाय नहीं, बल्कि पूरे देश का वह जनमानस है, जो बड़े राजनीतिक परिवर्तनों को अपनी जमीन पर महसूस करता है—अपने ही तरीके से, अपनी भाषा में, अपनी समझ से।

लेखक इस बात को बेझिझक सामने रखते हैं कि जिन घटनाओं को बुद्धिजीवी और इतिहासकार किसी विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखते हैं, आम ग्रामीण व्यक्ति उन्हें एक ठोस, जमीनी हकीकत की तरह महसूस करता है—भले ही उसके निष्कर्ष बौद्धिक रूप से ‘सही’ न माने जाएँ।

यह रचना किसी एक धर्म या जाति के पक्ष में नहीं खड़ी होती, बल्कि उस साझा पीड़ा को स्वर देती है जहाँ शोषण की संरचना में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों के सामर्थ्यवान तबके शामिल हैं। सम्पन्न हिन्दू और मुसलमान दोनों अपने-अपने समाज की ‘परजा’ को नियंत्रित और शोषित करते हैं। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त है—यह विभाजनकारी दृष्टि को तोड़कर एक समग्र भारतीय यथार्थ को सामने लाती है।

लेखक ने विभिन्न धार्मिक समुदायों—मुसलमानों, हिन्दुओं और ईसाइयों—की परंपराओं, रीति-रिवाज़ों और जीवन-पद्धतियों को जिस प्रामाणिकता से चित्रित किया है, वह इसे समकालीन हिन्दी उपन्यासों में अलग पहचान देती है। कथा की अंतर्वस्तु, शिल्प और भाषा पर गहरे देसी रंग और लोक संस्कारों की छाप है, जो इसे एक ओर सघन सामाजिक दस्तावेज़ बनाती है, तो दूसरी ओर एक सांस्कृतिक महागाथा का स्वरूप देती है।

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रावी लिखता है (उपन्यास)

रावी लिखता है उपन्यास पाश्चात्य और भारतीय संस्कारों के बीच सेतु बनाता हुआ एक संवेदनशील, शालीन मुस्लिम परिवार की कई पीढ़ियों की मार्मिक कथा को सामने लाता है। लेखक ने अतीत और वर्तमान को जोड़ते हुए फैंटेसी की प्रविधि का प्रयोग जिस सौंदर्यात्मक दक्षता से किया है, वह इस रचना को विशिष्ट बनाता है।

निम्न मध्यवर्गीय लेकिन कर्मशील मुस्लिम परिवार की जीवनगाथा के साथ-साथ यह उपन्यास गाँव, प्रकृति, खेत-खलिहान और संस्कृति के उस लोक की यात्रा करता है जो आज के समय में अक्सर हाशिये पर चला गया है।

पाश्चात्य संस्कृति में पले बच्चों का भारतीय जीवन से सहज रूपांतरण एक ख़ूबसूरत प्रक्रिया के रूप में उभरता है। नई और पुरानी दुनिया के बीच टकराव नहीं, संवाद और सामंजस्य इसकी केंद्रीय चेतना है।

कम्प्यूटर, मैसेज, ईमेल की तेज़ दुनिया में भी कैसे रिश्ते और संवेदनाएँ जीवित रह सकती हैं—यह उपन्यास उसी का मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ है। इसकी सरल, प्रवाही भाषा इसे गहराई और पठनीयता दोनों देती है।

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शादी का जोकर (कहानी-संग्रह)

शादी का जोकर अब्दुल बिस्मिल्लाह का एक महत्त्वपूर्ण कहानी-संग्रह है, जिसमें कुल सत्रह कहानियाँ संकलित हैं। यह संग्रह उस रचनात्मक परिपक्वता का परिचायक है जो उन्होंने दशकों तक उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहते हुए अर्जित की है।

इन कहानियों की ज़मीन आम ज़िन्दगी है—वहाँ की उलझनें, रिश्तों की कशमकश, सामाजिक विसंगतियाँ और व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा। ‘ख़ून’, ‘त्राहिमाम’, ‘महामारी’, ‘तीसरी औरत’ जैसी कहानियाँ मानवीय सच्चाइयों को बेहद संजीदगी से प्रस्तुत करती हैं। इनमें न तो आडंबर है, न शैलीगत बड़बोलापन—बल्कि एक साफ़, नैतिक और निष्कपट क़िस्सागोई है, जो अब्दुल बिस्मिल्लाह की विशिष्ट पहचान रही है।

शीर्षक कहानी में सामाजिक उपेक्षा और कला की विडंबनाओं को गहरे व्यंग्य और संवेदना के साथ उकेरा गया है। चाहे दिल्ली के कला-रसिकों की भागमभाग हो या तूफ़ानी पहलवान की भीगती ढोलक—ये दृश्य पाठक के मन पर देर तक ठहर जाते हैं।

यह संग्रह समकालीन जीवन की जटिलताओं को कथा-रस में ढालकर प्रस्तुत करता है—सरल, सधा हुआ, लेकिन गहराई से भरपूर।

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ताकि सनद रहे (कहानी-संग्रह)

ताकि सनद रहे अब्दुल बिस्मिल्लाह के चार चर्चित कहानी-संग्रहों—'रैन बसेरा’, ‘कितने-कितने सवाल’, ‘टूटा हुआ पंख’ और ‘ज़ीनिया के फूल’—से चुनी गई कहानियों का संग्रह है। इन रचनाओं में उस जीवन की सच्चाइयाँ हैं, जहाँ साधारण-सी इच्छाओं की पूर्ति भी संघर्ष माँगती है।

लेखक ने हाशिये पर मौजूद लोगों को कथा के केंद्र में लाकर उनकी संवेदनाओं, आकांक्षाओं और विडंबनाओं को बेहद सादगी से शब्द दिए हैं। सामाजिक विकास की आलोचना यहाँ किसी नारे में नहीं, बल्कि चरित्रों के जीवन में घुली हुई है।

इन कहानियों की भाषा पारदर्शी, सहज और संवेदनात्मक है—जो परिचित संसार में भी अप्रत्याशित यथार्थ से साक्षात्कार कराती है। यह संग्रह पाठक को सोचने, ठहरने और समाज को भीतर से समझने का अवसर देता है।

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रफ़ रफ़ मेल (कहानी-संग्रह)

रफ़ रफ़ मेल समकालीन हिन्दी कथा-परिदृश्य में अब्दुल बिस्मिल्लाह की विशेष पहचान को रेखांकित करता है। इस संग्रह की कहानियाँ लोक से जुड़ी हैं, जनसामान्य की पीड़ाओं, संघर्षों और सूक्ष्म संवेदनाओं की विश्वसनीय अभिव्यक्ति हैं। लेखक ने पूँजीवादी व्यवस्था और टूटते हुए मूल्यों के बीच दम तोड़ते लोगों की जिजीविषा को न केवल पहचाना है, बल्कि उसमें जीवन के प्रति अडिग प्रेम और उम्मीद की लय भी रची है।

इस संग्रह की कहानियाँ—जैसे ‘गृह प्रवेश’, ‘दुलहिन जीना तो पड़ेगा’, ‘पेड़’, ‘लंठ’, ‘कर्मयोग’, ‘माटा-मिरला की कहानी’—अपने शिल्प, तेवर और भाषा में विविधता से भरपूर हैं। इनमें लोक-भाषा, लोक-लय और व्यंग्य की तीखी धार है, जो न केवल अतीत की याद दिलाती है, बल्कि भविष्य की दिशा भी इंगित करती है।

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अतिथि देवो भव (कहानी-संग्रह)

 

अतिथि देवो भव अब्दुल बिस्मिल्लाह का एक अत्यंत विचारोत्तेजक कहानी-संग्रह है, जो समकालीन सामाजिक यथार्थ से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। इसमें शामिल कहानियाँ भारतीय समाज के विविध वर्गों, संस्कारों और परंपराओं के भीतर दबे हुए मानवीय अनुभवों को उजागर करती हैं।

इन कहानियों के पात्र केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि मानव-मूल्य बनकर उभरते हैं—अलिया, भुनेसर, कमली, महादेव, सरवर, गुलामू चचा जैसे चरित्र व्यवस्था की अमानवीयता के विरुद्ध अपनी चुप, मगर ठोस आवाज़ में बोलते हैं। उनके भीतर का गुस्सा, विरोध और संघर्ष इस संग्रह को एक गहरी संवेदनात्मक और वैचारिक ऊँचाई प्रदान करता है।

साथ ही कुछ कहानियाँ उन पात्रों को भी उजागर करती हैं, जिनमें आधुनिक जीवन की विद्रूपता और लंपटता झलकती है। यह संग्रह नारे नहीं लगाता, उपदेश नहीं देता—बल्कि आज के जटिल यथार्थ से सहज, किंतु असरदार ढंग से संवाद करता है।

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