मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानियों के शीर्षक बोलते से लगते हैं

मिथिलेश प्रियदर्शी के कहानी-संग्रह ‘लोहे का बक्सा और बन्दूक’ पर उज़मा कलाम की टिप्पणी

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मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानियों के शीर्षक बोलते से लगते हैं। आम ढर्रे से हटकर बिलकुल जुदा। शीर्षक पढ़कर ही उत्कंठा होती है कि आख़िर इस कहानी में क्या होगा। 

‘लोहे का बक्सा और बन्दूक’ संग्रह की पहली कहानी ‘हत्या की कहानी का कोई शीर्षक नहीं होता’ रोमांच, रहस्य और हास्य की चाशनी में डूबी हुई है। यही सब मिलकर इस कहानी को ख़ूबसूरत और अलग बनाते हैं। इस कहानी का रहस्य पाठक को आगे पढ़ते रहने के लिए उकसाता है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे चेहरे पर मुस्कान भी बढ़ती जाती है। 

यह कहानी वर्तमान समय की राजनीति और उसका लोगों पर कैसा असर है इस विषय को भी बड़े सुन्दर ढंग से छूती है। कहानी में खाने-पीने की जिस तरह से चर्चा हुई उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि लेखक एक अच्छा कुक भी है। कहानी ने दो-तीन जगह रूमानी होने की भी कोशिश की। पूरी कहानी में चेहरे पर बनी मुस्कान आख़िर में एक हँसी के साथ ख़त्म हुई।

दूसरी कहानी है ‘सहिया’। बाँधे रखने की पूरी ताकत है इसमें। कहानी कई पहलुओं को छूती हुई आगे बढ़ती है। आदिवासी रहन- सहन और नक्सलवाद के पीछे की दबी-छुपी बातें, ईसाई धर्म से आदिवासी वर्ग का कनेक्शन, अपने काम को जैसे-तैसे निभाते पुलिस और पत्रकार, समाज में विवाह की ख़ासियत और अन्त में सिसलिया के सशक्त चित्रण ने दिल जीत लिया। इस कहानी में भोले-भाले लोगों और प्यारे-से पालतू जानवरों का भी बेहतरीन वर्णन है।

‘मुनाफ़ा’ पढ़ते हुए लगा कि शायद लेखक पुलिस महकमे में भी रह चुके हैं। इस कहानी में उन्होंने पुलिस के काम और तौर-तरीकों का बहुत सटीक चित्रण किया है। कहानी में इतने सारे किरदार है फिर भी वे कहीं एक-दूसरे में उलझते नहीं। सब अपनी-अपनी बात कहते हैं और आगे चप्पू दूसरे के हाथ में थमा देते हैं। वर्तमान राजनीति की तो लेखक इस कहानी में जिस तरह से बखिया उधेड़ते हैं, वह लाजवाब है। लेखक बड़ी चतुराई से समाज की बुराइयों को कहानी में उड़ेल देते हैं। और हाँ, भोजन तो किसी भी कहानी में नहीं छूटता।

‘बहन का प्रेमी’ शीर्षक कहानी पढ़कर लगा कि अन्दर जाने क्या होगा। लेकिन जब पढ़ा तो जाना कि लेखक ने जो भी बयान किया वह समाज का सच ही है। हमारे समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव तो आम बात होती है, उसमें अगर एक जागरूक और ईमानदार औरत जो किसी की कठपुतली बनकर न रहे तो वह समाज के लिए गले में फँसा काँटा बन जाती है। इसे लेखक ने कहानी में शानदार तरीक़े से व्यक्त किया है। ऐसे विषयों पर अक्सर रोती-धोती कहानियाँ लिखी जाती है जो मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं आती। इन विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन रोते हुए नहीं, हँसते-मुस्कराते हुए। लेखक ने इस कहानी का अन्त भी बहुत अच्छे तरीक़े से किया कि उसे एक सुन्दर मोड़ देकर छोड़ दिया।

 

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