जयपुर से कोलकाता तबादले पर जाने के बाद सबसे पहले जिस साहित्यिक व्यक्ति से संपर्क बना, वह शंख घोष थे। उनकी स्मृति में प्रस्तुत है।
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विनोद दास: सर्वप्रथम कवि बनने के संबंध में आपने कब और क्यों सोचा?
शंख घोष: कवि बनने के बारे में मैंने कभी सोचा भी न था। अत: यह प्रश्न नहीं उठता कि मैं कवि क्यों बनना चाहता था। मुझे इस संबंध में केवल इतना भर याद है कि जब मैं बारह वर्ष का था, एक शाम मेरी माँ ने मुझसे कहा कि मैं किसी लायक नहीं हूँ। अगले दिन मैं स्टेशनरी की दुकान गया, एक कॉपी खरीदी और पूरी गंभीरता के साथ कविताएँ लिखना शुरू कर दिया। शायद मेरा ख्याल था कि अच्छा बनने का एक रास्ता यह भी है। यहाँ कहने की जरूरत नही है कि उन तुकबंदियों में कुछ भी कविता नहीं थी।
विनोद दास: आपको कब लगा कि एक कवि के रूप में आप शुरुआत कर चुके हैं?
शंख घोष: सत्रह वर्ष की आयु में एक समवयस्क लड़की से मैं प्रेम करता था या यूँ कहें मैं समझता था कि मैं उससे प्रेम करता हूँ। लेकिन मुझमें इतना साहस नहीं था कि उससे प्रणय निवेदन कर पाता अथवा किसी अन्य को इसके संबंध में बता पाता। भावावेग के वे सघन और मरणान्तक क्षण थे। उन भावुक क्षणों में कुछ पंक्तियों ने जन्म लिया। पहली बार वह कुछ कविता-सी लगी। जब वह पूरी हो गयी तो उसे मैंने अपने मित्रों को दिखाया, उन्हें भी यह अच्छी लगी। लेकिन किसी को यह शक नहीं हुआ कि आत्यंतिक रूप से यह प्रेम कविता है। मेरे विचार से यह एक शुरुआत थी। दरअसल उक्त कविता को मैंने अपने काव्य-संग्रह के आरंभिक खंड में रखा है।
विनोद दास: प्रारंभिक दिनों में आप पर किन कवियों का प्रभाव था? बचपन में पढ़ी किन महत्वपूर्ण पुस्तकों को आप याद करना चाहेंगे?
शंख घोष: रामायण, महाभारत, कुछेक लोकप्रिय लोक कथाओं के अलावा बचपन में मैंने रवीन्द्रनाथ को सर्वाधिक पढ़ा था। टैगोर भक्त अपने पिता से प्रभावित होने के कारण मैंने अपने साथियों की तुलना में रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का अधिकांश हिस्सा बहुत पहले पढ़ चुका था। चौदह वर्ष की आयु में टैगोर साहित्य से मैं सुपरिचित हो गया था। निश्चय ही मेरे जीवन और कार्यों पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा।
विनोद दास: आपके पास कविता किस तरह आती है?
शंख घोष: इसका कोई निश्चित रूप नहीं है। कभी एक पंक्ति आती है और मुझे लगता है कि मेरे भीतर कुछ पक रहा है। कभी न तो कोई पंक्ति आती है न ही कोई शब्द, पर एक तरंग की लगभग अनुभूति होती है। फिर मुझे लगता है कि समय आ गया है, मैं प्रतीक्षा करता हूँ। ऐसा नहीं है कि कविता हमेशा ऐसे बनती है। लेकिन कई बार ऐसा होता है।
विनोद दास: आप प्रेरणा में विश्वास करते हैं?
शंख घोष: हाँ! मैं प्रेरणा में विश्वास करता हूँ। प्रेरणा और कुछ नहीं, वह क्षण है जिसके बारे में मैंने आपको पिछले उत्तर में बताया। किंतु उस प्रेरणा के लिए हर समय स्वयं को तैयार रखना पड़ता है।
विनोद दास: क्या अपने काम करने के मेथड के बारे में आप कुछ बताना चाहेंगे?
शंख घोष: मेथड से आपका क्या आशय है, मैं नहीं जानता। लेकिन यह सच है कि पंक्ति मिलते ही मैं कागज़ लेकर उसे उतारने नहीं बैठ जाता। इस पंक्ति और परवर्ती पंक्तियों को अपने भीतर रचने, पकने देता हूँ। उन्हें विकसित होने देता हूँ। तदुपरांत उन्हें अपने मष्तिष्क में पुनर्सृजित करने देता हूँ। मैं उसे केवल तभी उसे कागज़ पर उतारता हूँ, जब मुझे प्रतीत होता है कि वह कविता कुछ कह रही है। हाँ! कई बार ऐसा भी हुआ है कि पूरी कविता लिख लेने के बाद मैंने उसे रद्द कर दिया है।
विनोद दास: आपने कवियों के काव्य तकनीकों का अध्ययन किया है?
शंख घोष: इस ओर मैं पर्याप्त रूप से सचेत नहीं रहा हूँ। टैगोर को मैंने पढ़ा है। आधुनिक अंग्रेज़ी-अमेरिकी कविता के अलावा मैंने फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली और रूस की कविताओं को मैंने अंग्रेज़ी अनुवादों के माध्यम से पढ़ा है। हो सकता है, इन सभी पठित कवियों में से प्रत्येक ने कुछ न कुछ तकनीकी रूप से मुझे समृद्ध किया हो।
विनोद दास: आपकी कविता भूमध्य सागर मनुष्य की अस्मिता को रेखांकित करती है। आप स्वयं इस कविता को किस रूप में देखते हैं?
शंख घोष: हाँ! भूमध्य सागर कविता मनुष्य की अस्मिता को रेखांकित करती है। मैं इतना और कहना चाहूँगा कि इस व्यक्ति की कुछ विशिष्टताएं हैं। अपनी अस्मिता की खोज करनेवाला यह मनुष्य तीसरी दुनिया का निवासी है और सतायी हुई मनुष्यता का एक प्रतिनिधि है।
विनोद दास: आपकी अधिकाँश कविताएँ प्रायः छोटे आकार की हैं। सृजनात्मक रूप से कविता का यह स्वरूप क्या आपके ज़्यादा अनुकूल है?
शंख घोष: यह सही है कि छोटी आकार की कविताएँ मेरी प्रकृति के ज़्यादा अनुकूल हैं। कुछेक कह सकते हैं कि यह बात मेरी प्रकृति से उतनी संबंध नहीं रखती है जितनी कि मेरी क्षमता से। मैं उनसे ही सहमत होना ही पसंद करूंगा।
विनोद दास: आपकी कविता में कोलकाता पूरी तरह रचा बसा है। कोलकाता को अपनी कविताओं के संदर्भ में आप किस तरह देखते हैं?
शंख घोष: जहाँ तक में समझता हूँ कि कोलकाता मेरी कविताओं में अनेक रूपों में रचा बसा है। बंगाल के पश्चिम हिस्से आज जिसे बांग्लादेश कहते हैं, के शरणार्थी के रूप में मैंने कोलकाता में अपने आपको एक बाहरी व्यक्ति के रूप में महसूस किया है। फिर भी मैंने कोलकाता को आत्मसात करने की चेष्टा की है, उसके साथ होने की चेष्टा की है। इसकी रहस्यमय गलियों और उपगलियों में डूबने की चेष्टा की है। यहाँ वह कोलकाता भी है जो कोलकाता के विरूद्ध संघर्षरत है। कई बार मैं उस संघर्ष से भी जुड़ा रहा हूँ।
विनोद दास: क्या आप अपनी कविताओं के छिपे अथवा गुप्त पैटर्न के बारे में कुछ बताना चाहेंगें?
शंख घोष: मेरी कविताओं में यदि कोई गुप्त या छिपा पैटर्न हो भी तो मैं उसे स्वयं क्यों बताऊँ।
विनोद दास: आपकी कविताओं की शक्ति आपके शब्दों की मितव्ययिता, पैटर्न और उसके रचाव में निहित है। आपकी कविता बूढ़ी औरतों का मिलन इसका अच्छा उदाहरण है। ये काव्य गुण बांग्ला की समकालीन कविता की लाउड प्रकृति से भिन्न है। आपकी क्या राय है?
शंख घोष: हाँ! छह और सात दशक के बीच एक ऐसा समय आया था जब मुझे लगा कि बांग्ला कविता का समकालीन परिदृश्य लाउडनेस, प्रदर्शनप्रियता अतिरेक आदि से ग्रस्त है। ऐसे में मैंने अपने आपको यथासंभव विद ड्रा करने के बारे में सोचा। यथासंभव मद्धिम स्वर में बात कहने का निर्णय लिया। उन्हीं दिनों मैंने एक छोटा सा लेख भी लिखा था-द पोइंटिंग फिंगर ऑफ़ साइलेंस जो एक तरह से मेरा घोषणापत्र था।
विनोद दास: आपके अध्यापन कार्य से आपके कवि रूप को कोई ख़ास सहायता मिली है?
शंख घोष: कोई ख़ास नहीं। मैं अपने प्रोफेशन के प्रति सच्चा रहना चाहता था और मैंने उसका पूरा आनंद उठाया। मेरे प्रोफेशन ने मेरा बहुत अधिक समय लिया जिसके कारण मुझे कविता के साथ लुका- छिपी का खेल खेलना पड़ा।
विनोद दास: क्या आपके मन में कभी अपनी कविताओं के माध्यम से राजनीतिक अभिमत व्यक्त करने की इच्छा हुई?
शंख घोष: मैंने कभी भी अपनी कविताओं के माध्यम से राजनीतिक अभिमत व्यक्त नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, मैंने सचेत रूप से कभी राजनीतिक कविताएँ लिखने के बारे में नहीं सोचा। लेकिन यह विचित्र अन्तर्विरोध है कि मेरी अनेक कविताओं को राजनीति-उन्मुख कविताएँ कहा गया है। मैंने केवल अपने दैनंदिन कार्य-व्यापार और अपने जीवन को व्यक्त करने की चेष्टा की है और समकालीन इतिहास का अंग होने के कारण अन्य-साथियों के जीवन से मेरा जीवन बिलकुल अलग नहीं है, अतः मेरी कुछ कविताएं राजनीतिक दृष्टिकोणों से सम्बद्ध हैं, राजनीतिक अभिमत से नहीं।
विनोद दास: आपके आलोचनात्मक लेख अत्यंत चर्चित रहे हैं। आप अपने इस भिन्न किस्म के लेखन को किस रूप में देखते हैं और अपने कवि रूप से किस तरह जोड़ना चाहते हैं?
शंख घोष: कुछ लेख को छोड़कर मेरा संपूर्ण आलोचनात्मक लेखन विभिन्न लघु पत्रिकाओं के संपादकों के निरंतर दबाव का परिणाम है। सच कहता हूँ कि मेरा मन गद्य लेखन में नहीं रमता। लेकिन मेरी इस बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा। किंतु जब भी मैंने दबाव में काम किया है चाहे कविता हो, नाटक हो या आलोचना, हमेशा सामान्य ज़िन्दगी के बारे में मैंने अपने विचार व्यक्त करने की चेष्टा की है।
विनोद दास: क्या आपको लगा कि आपकी कविता अपने प्रयोजन को अर्जित नहीं कर पाई। यदि ऐसा हुआ तो बाद में उन कविताओं के साथ आपका व्यवहार कैसा रहा?
शंख घोष: कई बार मैंने महसूस किया है कि मेरी कविताएँ असफल हो गयी हैं। लेकिन मैं यह नही कहूँगा की वे अपने प्रयोजन को पाने में असफल रही हैं क्योंकि मैं स्वयं नहीं जानता कि उनका प्रयोजन क्या था। मैंने केवल यह महसूस किया है वह एक कविता के रूप में असफल रही है क्योंकि उसमें पूरी-पूरी अभिव्यक्ति नहीं हो पायी है जैसा मैंने परिकल्पित किया था। चूंकि वे कविताएँ छप चुकी हैं और पुस्तकों में संग्रहीत हैं, उन्हें सहने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं है।
विनोद दास: आप एक सफल कवि हैं। क्या आपको लगता है कि सफलता ने आपके लेखन में परिवर्तन किया है?
शंख घोष: सफलता की अनुभूति एक मानसिक अवस्था है। मैंने कभी नहीं महसूस किया कि कोई मूल्यवान उपलब्धि मुझे मिली है। अतः इसके कारण मेरे लेखन में कोई परिवर्तन का प्रश्न ही नहीं उठता।
विनोद दास: क्या आप अपने बारे में लिखी चीज़ें पढ़ते हैं? यदि ऐसा है तो क्या इससे आपकी सृजनात्मकता को कोई सहायता मिलती है?
शंख घोष: सामान्यतः मैं अपने बारे में लिखी चीज़ पढ़ना पसंद नहीं करता। मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है जो सातवें दशक में घटित हुआ था। मेरे एक कवि मित्र ने प्रशंसात्मक स्वर में मुझसे कहा कि यह एक खुशी की बात है कि मेरी प्रकाशित नई पुस्तक पर इतने कम समय में अनेक समीक्षाएं या समीक्षा लेख छप गये हैं। ऐसा नहीं है क्या? उन्होंने पूछा। मैंने कहा कि मै ऐसा नहीं सोचता। अत्यधिक चर्चा अच्छी बात नहीं है। हमेशा नहीं, लेकिन अक्सर ऐसी प्रशंसाएं मुझे परेशान करती हैं। मेरे मित्र मेरे कहने का अर्थ भी न समझ पाए। मेरे बारे में लिखी चीज़ों का मेरी रचनात्मकता से कोई लेना देना नहीं है, सिवाय इतना कि कुछ कविताओं के संबंध में अपने सुविज्ञ आलोचकों से चोरी-छिपे संवाद कर सका हूँ।
विनोद दास: साहित्य के बाहर आपकी क्या रुचियाँ हैं?
शंख घोष: साहित्य के बाहर संगीत, रंगमंच और खेलों में मेरी रूचि है।
विनोद दास: आपके लेखन के सम्बन्ध में आपके परिवार की क्या प्रतिक्रिया रहती है?
शंख घोष: कोई अधिक नहीं। मैं इस बात को गहरे संतोष के साथ कह सकता हूँ। मेरी सदैव यह धारणा रही है कि एक सृजनकर्मी लेखक को एकांत की आवश्यकता होती है। उसे यथासंभव अपने को छिपाकर रखना होता है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं अपनी कविताओं को गुप्त रखता हूँ। यही मेरी दुनिया थी और अभी भी मेरी ऐसी ही दुनिया है। कविता प्रकाशित होने के बाद भी मैं किसी से प्रतिक्रिया नहीं पूछता-यहाँ तक कि परिवार के सदस्यों से भी नहीं कि उन्होंने मेरी कविता पढ़ने की जहमत उठायी है अथवा क्या इसका उन पर कोई प्रभाव पड़ा है। मेरे परिवार के सदस्यों ने भी इसी तरह अपनी शांत ख़ामोशी से मुझे उपकृत किया है। लेकिन ये बातें केवल मेरी कविताओं के बारे में सच हैं। समीक्षात्मक लेखन में इतनी गोपनीयता नहीं बरतता हूँ। दरअसल अपने सभी गद्य लेखों का पहला मसौदा तैयार होने के बाद मैं अपनी प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए उन्हें सुनाता हूँ। कई बार उनकी प्रारंभिक टिप्पणियों के संदर्भ में कुछ कांट -छांट भी करता हूँ। प्रसंगवश में बता दूँ कि मेरी पत्नी एम.ए. में मेरी क्लास-फेलो थी और बाद में कलकत्ता कॉलेज में अध्यापन कार्य करती रही हैं।
विनोद दास: इन दिनों बांग्ला कविता के परिदृश्य में क्या घटित हो रहा है?
शंख घोष: इन दिनों बांग्ला कविता में अनेक बातें घटित हो रही हैं। स्वयंभू उत्तर आधुनिक प्रवृति है। हालांकि में पूर्ण विश्वास के साथ नहीं कह सकता हूँ कि वे उक्त पद को किस तरह से परिभाषित करते हैं और कैसे उक्त परिभाषा उनकी रचनाधर्मिता से मेल खाती है। अतिघोषित नारीवादी प्रवृति है। शुद्ध कविता की शाश्वत खोज चल रही है। इस समय राजनीतिक कविता का स्वर कुछ धीमा है। कुछ लोगों के लिए काव्य एक गुह्य संसार है। दूसरी ओर कुछेक कविता को इतना सरल और सपाट बनाने में संलग्न हैं ताकि उसे सभी को सहजता से संप्रेषित किया जा सके। तीस वर्ष से कम आयु के असीम संभावनाओं से भे अनेक युवक-युवतियां हैं जो अच्छी कविताएँ लिख रहे हैं। मैं बांग्ला कविता के प्रति आशावादी हूँ।
विनोद दास: क्या बांग्ला कविता कमर्शिलाइजेशन के दबाव में है?
शंख घोष: हाँ, यह बिलकुल सही है कि बांग्ला कविता कमर्शिलाइजेशन के दबाव में है। दरअसल पिछले तीन दशकों में इस दबाव ने सभी संभावित तरीकों से अपनी शक्ति बढ़ाई है। लेखकों युवा और वरिष्ठ दोनों के लिए मीडिया एक्सपोजर एक खतरा बन गया है। मीडिया एक्सपोजर की गिरफ्त में सारा विश्व है। इसका अपवाद बांग्ला कविता भी नहीं है।
विनोद दास: एक कवि के रूप में आज आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
शंख घोष: एक्सपोजर की चुनौती पहली है। मेरा हमेशा मानना रहा है कि कवि को एकांत चाहिए। उसे दूसरों से छिपने की आवश्यकता पड़ती है। वह भीड़ में रहते हुए भी अपने को अपरिचित रखना चाहता है। लेकिन समाज का एक बाहरी हिस्सा समाचार पत्रों, संगोष्ठियों और सम्मेलनों के माध्यम से कवि को एक उपलब्ध वस्तु बनाना चाहता है। दूरदर्शन वास्तव में कवियों के लिए एक भयानक खतरा है। फ़िल्मी कलाकारों अथवा टीवी पर्सनलाटीज की तरह यह कवि को शो पीस बनाता है। यह चाक्षुष रूप से कविता को वर्णनात्मक बनता है जबकि उसमें आंतरिक रूप से कुछ भी वर्णनात्मक नहीं होता है। यह कविता पर हमला है। इसका सामना हमें करना है।
विनोद दास: जब आप लिख नहीं रहे होते हैं तो आप कैसा महसूस करते हैं?
शंख घोष: मैं अपने को अभागा महसूस करता हूँ। उस समय मुझे अपनी माँ का कथन याद हो आता है—यह कथन उन्होंने बारह वर्ष की आयु में चेतावनी के स्वर में कहा था कि मैं किसी लायक नहीं हूँ।
विनोद दास: क्या आपने हिन्दी कवियों को पढ़ा है? किन्हें आप अच्छा समझते हैं और क्यों?
शंख घोष: मैंने उन्हें पढ़ा है लेकिन व्यवस्थित और सुसंगत रूप से नहीं। केवल फुटकर उन्हें पढ़ा है। मुझे कौन से कवि अच्छे कवि लगते हैं, मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता।
विनोद दास: आप समझते ही होंगे कि हिन्दी कविता से बांग्ला कवि कम परिचित होंगे। हम किस तरह हिंदी और बांग्ला कविता के बीच संवाद बढ़ा सकते हैं?
शंख घोष: मैं आपसे सहमत हूँ। मैं स्वयं ही इसका प्रमाण हूँ। नियमित रूप से अनुवाद, मिलना-जुलना, बांग्ला कविताओं का हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशन और हिंदी कविताओं का बांग्ला पत्रिकाओं में प्रकाशन सरीखे कार्यों से दोनों भाषाओँ के बीच संवाद को बढ़ाया जा सकता है। मैं यह मानकर चलता हूँ कि आपसे मेरी यह बातचीत भी इस दिशा में एक प्रयास है।
विनोद दास: आपको इन दिनों अनेक पुरस्कार मिले है। क्या ऐसे पुरस्कार किसी कवि के विकास में कोई योगदान करते हैं?
शंख घोष: यदि मैं कहूँ कि मैं साहित्यिक पुरस्कारों के प्रति हमेशा शंकालु रहा हूँ तो लोग शायद मुझ पर हँसे या अविश्वास करें। सच है इन दिनों पूरे देश में अनेक पुरस्कार हो गये हैं। इससे काफ़ी हद तक साहित्यिक वातावरण प्रदूषित हुआ है। व्यक्तिगत रूप से मेरा यह कहना है कि इन पुरस्कारों ने मुझे कभी प्रेरित नहीं किया क्योंकि मैं प्रत्येक बार जानता था कि पुरस्कारों के लिए चयन एक स्वाभाविक दुर्घटना है। इनका कोई महत्व नहीं होता। कवि के मेरिट से पुरस्कारों का कोई लेना-देना नहीं होता। अतः पुरस्कारों ने मेरे साहित्यिक कैरियर के विकास में कोई भूमिका नहीं निभायी। आप पूछ सकते हैं कि क्या पुरस्कार से कवि का आत्मविश्वास नहीं बढ़ता तो मेरा कहना है कि यदि स्वयं में कवि का विश्वास नहीं है तो पुरस्कार उसमें क्या आत्मविश्वास भरेंगे क्योंकि कवि को एक ही पुरस्कार की अपेक्षा होती है, उसका पाठक उसकी रचना के प्रति संवेदनशील प्रतिक्रिया दे। यदि ऐसे पाठकों की संख्या एक से दो, दो से तीन होते हुए आगे बढ़ती है तो कवि स्वयं को पुरुस्कृत समझता है। संवेदनशील पाठक ही कवि के पुरस्कार होते हैं।
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