कहानी रूह अफ़ज़ा की

गर्मी के दिनों में रूह अफ़ज़ा लगभग हम सभी पीते हैं। इन दिनों इस पेय की खूब चर्चा हो रही है। राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, अरुंधति रॉय की किताब ‘अपार ख़ुशी का घराना’ का एक अंश जिसमें रूह अफ़ज़ा की ईजाद और उसकी अब तक की यात्रा का संक्षिप्त वर्णन है। 

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हकीम मुलाक़ात अली जड़ी-बूटियों के नुस्ख़ों के माहिर और उर्दू-फ़ारसी शायरी के मुरीद थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी हकीम अब्दुल मजीद के ख़ानदान में नौकरी करते हुए बिताई थी, जिन्होंने रूहअफ़ज़ा (आत्मा का अमृत) नाम का लोकप्रिय शर्बत ईजाद किया था। 

रूह अफ़ज़ा ख़ुर्फा के बीजों, अंगूर, संतरे, तरबूज़, पुदीना, गाजर, थोड़े-से पालक, खसखस, कमल, दो क़िस्म के लिली के फूलों और दमिश्की गुलाबों से टॉनिक के तौर पर बनाया गया था। लेकिन लोगों ने पाया कि माणिक के रंग का यह चमकदार पेय दूध या पानी में दो चम्मच घोलने पर न सिर्फ़ बहुत ज़ायकेदार बन जाता है, बल्कि दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी और रेतीली हवाओं में आने वाले अजब क़िस्म के बुख़ारों में भी राहत पहुँचाता है। 

इस तरह दवा के तौर पर बना रूह अफ़ज़ा जल्दी ही गर्मियों के पेय के तौर पर पूरे इलाक़े के घरों में छा गया और एक कामयाब कारोबार बन गया। चालीस साल तक उसकी बादशाहत बनी रही और वह पुरानी दिल्ली के कारख़ाने से दक्खिन में हैदराबाद और पश्चिम में अफ़गानिस्तान तक पहुँचने लगा।

फिर बँटवारा आया। हिंदुस्तान और पाकिस्तान की नई सरहद पर जैसे ख़ुदा की शहरग खुल गई और नफ़रत ने दस लाख लोगों की जान ले ली। पड़ोसी इस तरह एक-दूसरे पर टूट पड़े जैसे वे कभी एक-दूसरे को न जानते थे, न कभी एक-दूसरे के शादी-ब्याह में शरीक़ हुए थे और न कभी उन्होंने एक-दूसरे के गीतों को गाया था। 

फ़सीलबंद शहर दरक गया। पुराने कुनबे (मुसलमान) भाग खड़े हुए। नए कुनबे (हिन्दू) आ पहुँचे और फ़सीलों के इर्द-गिर्द बस गए। रूह अफ़ज़ा को भारी झटका लगा, लेकिन जल्द ही वह इससे उबर गया और उसने पाकिस्तान में अपनी एक ब्रांच खोल ली। 

चौथाई सदी गुज़रने पर पूर्वी पाकिस्तान में हुई तबाही के बाद ताज़ा उभरे मुल्क बांग्लादेश में उसने एक और ब्रांच शुरू की। लेकिन आख़िरकार कोकाकोला ने दुनिया की दूसरी चीज़ों की तरह आत्मा के इस अमृत को भी मात दे दी, जो तीन मुल्कों की जंग और ख़ूनी पैदाइश के बावजूद अपने को बचाए हुए था।

 

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