‘शिल्प’ साध्य या साधन : फिर उठा सवाल 

3 अप्रैल, 2025 को प्रतिष्ठित कवि-कथाकार कुमार अम्बुज ने कथ्य और शिल्प के सम्बन्ध में अपनी 2002 की डायरी से एक अंश फेसबुक पर साझा किया। डायरी का यह हिस्सा उनकी किताब थलचर : कुछ इंदराज, कुछ टिप्पणियाँ’ में संकलित है। डायरी के इस हिस्से में उन्होंने अपनी तरफ से रचना में शिल्प के अतिरेक पर टिप्पणी की। हिन्दी में कथ्य और शिल्प की बहस सदा से चलती चली आई है जिसमें कथ्य को बड़ा या मूल मानना ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ माना जाता रहा है। सुपरिचित कथाकार चंदन पांडेय ने कुमार अम्बुज की इस पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया कि शिल्प की साधना क्यों नहीं हो सकती? और इस तरह से विचारोत्तेजक बहस चल पड़ी। इस बहस में कई लेखकों, पाठकों व आलोचकों ने दोनों ही पक्षों से अपनी राय और तर्क रखे और कथ्य और शिल्प के बारे में, उनके सम्बन्धों के बारे में नए नए कोण हमारे सामने आए। अपने पाठकों के लिए इस बहस को उपयोगी मानते हुए हम इसे राजकमल ब्लॉग में प्रस्तुत कर रहे हैं।

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शिल्प की दाढ़ में लेखकों का ख़ून – कुमार अम्बुज

(3 अप्रैल, 2025) 

शिल्प पर मोहित होना जारी है। शिल्प इस तरह अर्जित किया जा रहा है जैसे आदमी मकान बनवाकर सोचता है कि हो गया इन्तज़ाम। अब हमारा एक स्थायी पता है, हम यहीं मिलेंगे। हमारी उपस्थिति अन्य जगह और किसी दूसरी तरह से यदि हो तो हम झूठे, बेईमान या असफल ठहरा दिए जाएँ। कोई उज्र नहीं। यह शिल्प ही हमारी साधना थी। कला का चरम सत्य हमारे इस शिल्प में आ गया। जैसे वह यथार्थ और कथ्य का विकल्प हो गया।

शिल्प की सवारी शेर की सवारी है। यह उपलब्धि है कि आपने शेर की सवारी की। लेकिन अब आप शिल्प के आसन से उतर नहीं सकते। शेर आपको खाने के लिए तैयार है। आप शेर पर बैठे, यह तस्वीर आपकी पहचान है लेकिन अब आप हमेशा ही शेर पर सवार रहने के लिए विवश हैं। आप उसके शिकार हो चुके हैं। आप भूल गए कि जैसे शिल्प को पाना एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है उसी तरह शिल्प को पार करना भी। शिल्प के चक्रव्यूह में प्रवेश करनेवाले अभिमन्युओं को चक्रव्यूह से बाहर आने की कला भी आनी चाहिए।

शिल्प साधन होता है, साध्य नहीं। शिल्प यथार्थ से बड़ा नहीं होता। यथार्थ रोज़ बदलता है इसलिए शिल्प स्थिर नहीं रह सकता। वह किसी आदमी की युवा या अधेड़ अवस्था में खींची गई तस्वीर की तरह नहीं हो सकता। वह जड़ित फोटो नहीं है। जो शिल्प को ग़ुलाम बनाना चाहते हैं, ज़रा ध्यान दें कि किसने किसको ग़ुलाम बना लिया है।

शिल्प औज़ार है, नेम-प्लेट नहीं। ‘कैसे कहा गया है’ तब ही विचारणीय हो सकता है जब ‘क्या कहा गया है’ भी महत्त्वपूर्ण हो। फिर जो रचनाएँ अनूदित होकर हमारे सामने आती हैं या अन्यत्र जाती हैं, वहाँ शिल्प उस तरह से साथ नहीं आता-जाता, जैसा कि वह मूल में रहा आया है। रचना अपने कथ्य के कारण ही देश-काल का संक्रमण करती है। यथार्थ की चेतना प्रत्येक लेखक से माँग करती है कि शिल्प की दासता से बाहर आया जाए। रचनाकार के लिए यह एक चुनौती है और उसे इसके प्रति स्वीकार भाव रखना चाहिए।

शिल्प महत्त्वपूर्ण पक्ष है लेकिन यह याद रखना होगा कि शिल्प एक क़ैदख़ाना भी होता है। शिल्प के उम्रक़ैदियों को देखना दुखद है। जैसे उन्हें शाप दिया गया हो कि जाओ, अब तुम इस ‘शिल्प-लोक’ में जाकर रहो!

#पुनश्च :

इस पोस्ट पर कुछ कमेंट्स पढ़कर याद आया फ़ैज का यह यह शेर :

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था  
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है।

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अंदाज़-ए-बयाँ - चंदन पांडेय

(4 अप्रैल, 2025)

पुरानी गहरी चोट या नई कोमल पत्तियों की तरह यह बहस बार-बार आपके समक्ष प्रस्तुत हो जाती है कि शिल्प या कथ्य? हिन्दी में यह बहस कुछ ख़ास मायने रखती है।

कुमार अम्बुज जी ने पुनः इसे उठाया है। उनके सरोकार परिचय के मोहताज नहीं हैं। वरिष्ठ और श्रेष्ठ कवियों में शुमार हैं। उन्होंने जो पोस्ट लिखी है उसी के अध्ययन से ‘कथ्य’ और ‘शिल्प’ का महत्व समझा जा सकता है : अगर कंटेंट की बात करें तो वह पोस्ट अपने सारांश में यह कहती है कि शिल्प का दुराग्रह अनुचित है उससे बचो लेकिन उस खास पोस्ट के ‘शिल्प’ को देखें तो वह शिल्प को लगभग नकारती है। हरेक वाक्य शिल्प के विरुद्ध जाता दिखता है।

वे लिखते हैं कि शिल्प यथार्थ से बड़ा नहीं होता! यह अजीबोगरीब समीकरण है!  शिल्प और यथार्थ ‘म्यूचुअली एक्सक्लूसिव’ पद हैं। यानी दोनों के बीच कोई साम्य (कॉमोनेलिटी) नहीं है। यथार्थ के तुलनात्मक अध्ययन के लिए आप उसके समक्ष कल्पना को रख सकते हैं, अतीत को रख सकते हैं, भविष्य को रख सकते हैं, थोड़ा और खींचें तो यथार्थ के समक्ष फैंटेसी को रख सकते हैं लेकिन शिल्प? शिल्प के बिना यथार्थ का ख्याल भी सम्भव है क्या? देखें तो यथार्थ या कोई भी कालखंड शिल्प के भीतर ही सम्भव है। 

लोग इसे सच मानने से कतराएँगे लेकिन सच यह है कि शिल्प ही रचना है। बड़े-बड़े लोगों ने इस बाबत कहा है। मार्क्स ने कहा है कि कि ‘फॉर्म इज दी फॉर्म ऑव इट्स कंटेंट।’ खुद कुमार अम्बुज जी की प्रसिद्ध कविताएँ शिल्पगत विशेषताओं के कारण अनूठी बन पाईं। वह शिल्प ही है जो ‘खाना बनाती स्त्रियों’ के संताप इस सघन तरीके से व्यक्त करता है कि मन भर्रा जाता है, कंठ अवरुद्ध हो जाता है वरना खाना बनाती स्त्रियों का यथार्थ हमेशा से वैसा ही रहा जैसा उस कविता में है। वह शिल्प नामक विशिष्टता ही है जो कवि ने समय से, समाज से, पठन पाठन से अर्जित किया होगा। इससे उलट आप जब शिल्प-विरोध की बात करते हैं तब आप ऐसा माहौल बनाते हैं कि रचनाकार शिल्प की सोचना ही छोड़ दे, अपनी तैयारियों को दरी कुर्सी बिछाने तक सीमित कर दे, शब्दकोष भूल जाए, विश्व साहित्य, कविता पढ़ना भूल जाए। संक्षेप में कहें तो तैयारी करना छोड़ दे। आप ध्यान देंगे तो पाएँगे कि शिल्प-विरोध और साहित्य-विरोध में सूत बराबर का भी फर्क नहीं है। हिन्दी के कई स्वनामधन्य पढ़ने को महत्व नहीं देते, ख़ुद के भी पढ़े-लिखे होने को नकारने में इन्हें आनंद आता है।

रचना का शिल्प रचनाकार का व्यक्तित्व है, वह रचनाकार का उत्स है। अरबों आवाजों में से एक को वह चमकाकर आपके समक्ष रखता है। सबकुछ एक जैसा कर देने की जिद पर अड़ी दुनिया के भीतर से वह एक ख़ास अभिव्यक्ति चुनकर, उसके लिए खुद को तपाकर निकालता है। शिल्प सिर्फ विशिष्टता नहीं है, वह पहचान है, शिल्प ही नवाचार है।

दूसरी बात कि शिल्प रचना से इस तरह नाभिनालबद्ध है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं कर सकते। जब ‘परिन्दे का इन्तज़ार-सा कुछ’ में नसर शिरीष को छोड़ कर लगभग लापता हो जाने का निर्णय लेती है तो यह शिल्प के कारण ही सम्भव हो पाता है, वह शिल्प जो कहानी के शुरुआती पन्नों में ही परिलक्षित होता है जब नसर के सैंडल की एड़ी टूट गई है और वह उसे पहने पहने, घिसटते हुए चल रही है। लोगों ने उसे खिलंदरापन कहा! तरस आती है और परेशान होकर वापस चली जाती है। ध्यान से देखते तो लोगों को मालूम चलता कि वह कहानी का चेखोवियन लम्हा है जिसे कहानी के भीतर बन्दूक टँगा होना कहते हैं और जिस बन्दूक को आखिर में चलना होता है।

मीर जब कहते हैं कि ‘सबकी आवाज़ के पर्दे में है सुख़नसाज एक’ तो दरअसल वे सुखनसाज से अधिक ‘सबकी आवाज़’ की सिंग्युलेरिटी को महत्व दे रहे होते हैं। अलग-अलग प्रार्थनाओं का महत्व उसके शिल्प से बनता है। ग़ालिब का ‘अंदाज़े-बयाँ और’ महज ग़ालिब के लिए नहीं है, वे हर मनुष्य की अभिव्यक्ति को अलग-अलग महत्व देने की बात करते हैं। यह शिल्प का आग्रह है जो ग़ालिब न सिर्फ़ स्वयं के लिए रखते हैं बल्कि सबसे आग्रह करते हैं कि वे अपना शिल्प अर्जित करें।

रचना संसार की तथाकथित जनवादी दुनिया में जाने क्यों शिल्प को हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है? आप कह सकते हैं कि आपने सीधा यह नहीं कहा लेकिन शब्द के भीतर से जो अर्थ झाँकते हैं उन्हें नकारेंगे? नतीजा यह निकला कि शिल्पहीनता को तवज्जो मिलने लगी। लेखक को लेखन को प्राथमिकता देनी होगी न कि नारेबाजी और पार्टी के काम को। पार्टी के काम के लिए अपना सर्वस्व राजनीति को दे चुके कार्यकर्ता हैं। यह भी एक चलन है कि भौंडी कलाकारी दिखाकर लोग मूल कार्यकर्ताओं की जगह लूटना चाहते हैं।

मेरा अपना मानना है कि शिल्पहीनता का आग्रह वे ही कर सकते हैं जो नेतृत्व करने की दबी सहमी आकांक्षा रखते हैं, जिन्हें भेड़ों का समूह चाहिए। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कॉर्पोरेट भी, जहाँ भीड़ भेड़ों की शक्ल में पसंद की जाती है, नवाचार के विरुद्ध उतना नहीं रहता जितना साहित्य में शिल्प से डरे लोग।

इसका नतीजा? वास्तविक सरोकारों से लैस जनपक्षधर लोग जहाँ शिल्पहीनता को माँजते रहे वहीं औसत सी शिल्प सजगता वाले रचनाकारों ने ‘सेंटर स्टेज’ अख़्तियार कर लिया और मौका मिलते ही जन विरोधी और फासिस्ट राजनीति के पाये से चिपक गए।

जी हाँ, रचनाकारों को हाँका न दिया गया होता तो शिल्पहीनता का जैसा उत्सव देखने को मिलता है, वह कत्तई न मिलता। शिल्पहीनता का ऐसा आग्रह रहा कि पार्टी लाइन और आलोचकों की पसंद नापसंद को भाषा विशेष में साहित्य का पैमाना बना दिया गया। 

क्या आप रोजगार की दुनिया में शिल्पहीनता को महत्व देंगे? आपके जीवन का कौन सा ऐसा काम है जिसमें आप शिल्प को गौण बताएँगे? भोजन पकाना? जहाज उड़ाना? घर बनाना? अपनी नौकरी? फिर रचना में क्यों ऐसा आग्रह है?

या क्या आप ऐसा दावे से कह सकते हैं कि जो शिल्पहीन है वह मानवीय मूल्यों से लैस होगा? यह अनुपात का विषय ही नहीं है। दोनों अलग अलग बातें हैं। दोस्तोयेवेस्की अपने कंटेंट के कारण नहीं, उस आवेग के कारण पढ़े जाते हैं जो अपनी भाषा में वे रचते हैं। उन स्थितियों को रचने के कारण पढ़े जाते हैं जो अन्यथा कल्पना से बाहर की बात होती। काफ्का की ‘ए हंगर आर्टिस्ट’ क्या महज कथ्य के कारण पढ़ी जाती है? यह सही आकलन नहीं है।

रचना विरोधी समय की बात होती है तब हम पता नहीं किसे दोष दे रहे होते हैं? क्या इसमें वे शामिल हैं जो शिल्प विरोधी हैं? आप कहेंगे, नहीं, जबकि वे हैं।

‘माय नेम इज रेड’ में ओरहान पामुक उन कलाकारों के बारे में लिखते हैं जो चित्रकारी के बारीक कामों को सीखने के क्रम में आँखों की रोशनी खो देते हैं लेकिन अपनी कला में पारंगत हो जाते हैं। मेरे अनुसार शिल्प यही है। खुद मुक्तिबोध ने शिल्प के पक्ष में लिखते हुए लिखा है कि आपको सरलता चाहिए तो कक्षा तीन की किताबें पढ़ें।

हमारे इस दौर की पहचान भविष्य में उन सैकड़ों मॉब लिंचिंग से होगी जो हृदयहीन मनुष्यों ने किया। यह कहना बेहद अमानवीय होगा कि किसी हत्या का इस्तेमाल साहित्य रचने के लिए हो लेकिन जब आप इतिहास के मुहाने पर होते हैं तब यह निर्णय लेने होते हैं। अगर हमारे दौर के रचनाकारों को प्रोत्साहन मिले तो अपनी तैयारियों से, अपनी आकांक्षा से, इन दुर्भाग्यपूर्ण हत्याओं के इर्द-गिर्द ऐसे साहित्य की रचना करेंगे जो आने वाली पीढ़ियों को अधिकाधिक मानवीय बनाएगा, और यह तभी सम्भव होगा जब वे शिल्पगत विशेषताओं से लैस होकर सर्जनात्मक कार्य करें। नात्सी जर्मनी के अत्याचारों का वर्णन विश्व के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह न होता अगर शिल्प न होता। ‘दि टिन ड्रम’ न होता, ब्रेख्त न होते, ‘H H h H’ न होता (इसके लिए गूगल कर लें), वह महान उपन्यास न होता जिसे दुनिया ‘औस्तार्लित्स’ के नाम से जानती है। वह महज उपन्यास नहीं है, बल्कि जीवन को बरतने का सलीका है।  

सबसे महत्वपूर्ण बात कि रचनाशिल्प को सांप्रदायिक, सामंती और ब्राह्मणवादी साहित्य रचने वालों के लिए खेल का खुला मैदान नहीं बनने देना चाहिए। वे दुनिया भर के बेहतरीन शिल्प का लुभावना इस्तेमाल किसी ऐसे साहित्य की रचना के लिए करें जिसमें हर मनुष्यविरोधी और प्रतिगामी मूल्य स्थापित होता जाए और आप शिल्पहीनता के कारण हाथ पर हाथ धरें बैठे रहें। यह साहित्य के मानवीय पहलू की वास्तविक पराजय होगी।

आप खूब जिएँ, लड़ें, पढ़ें और शानदार साहित्य लिखें। रोज लिखें। आप लेखक हैं और आपका काम है यह। उसे निभाएँ। बेहतर लेखन आपका इस तरह मक़सद होना चाहिए कि दोस्तों, संगठनों और पार्टीलाइन से अलग होना पड़े तो साहित्य के लिए आपको यह सहज स्वीकार्य हो।

हाँ।

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शिल्प का मोह वहाँ होता है, जहाँ कथ्य का अभाव हो - आशुतोष कुमार

(5 अप्रैल, 2025)

अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है      
शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात

— अल्लामा इक़बाल

शिल्प का मोह वहाँ होता है, जहाँ कथ्य का अभाव हो। नया कथ्य अपना नया शिल्प साथ लेकर आता है, उसे अलग से खोजना नहीं पड़ता।

हालाँकि शिल्प और कथ्य के रिश्ते को पूरी तरह साधन और साध्य की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि शिल्प की अनुपस्थिति में कोई कथ्य नहीं होता। अलबत्ता कथ्य के अभाव को शिल्प से भरने की कोशिश की जा सकती है।

जब शिल्प चमकता हुआ लगे और कथ्य अनुपस्थित हो तो यह एक समस्या है। इधर हिन्दी में यह समस्या बढ़ी है।

ऐसी चीजें लिखी जा रही हैं, जो अंदाज़े जुबान (न कि अंदाज़े बयाँ) और शिल्प की  बारीकियों से पाठक को मुग्ध कर लेती हैं और पाठक कथ्य के बारे में सोचना भूल जाता है!

मैं समझता हूँ कि कुमार अम्बुज  द्वारा पोस्ट किया गया टुकड़ा इसी खतरे की ओर ध्यान खींचने के निमित्त है।

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शिल्प का प्रकाश या कुहासा या चकाचौंध - कुमार अम्बुज

(5 अप्रैल, 2025)

एक

चूँकि यह एक उत्‍प्रेरक पोस्‍ट है इसलिए इसमें कुछ खंडन-विखंडन और मंडन शामिल हैं। सबसे पहले यह कि मेरी डायरी के उस पन्‍ने का (जिसके आधार पर हमारे विद्वान रचनाकार साथियों ने बहस आगे बढ़ाई), उनमें से कुछ ने, ख़ासतौर पर प्रिय चंदन पांडेय ने यह अर्थ निकाला है कि वह रचना में शिल्प के अभाव का आग्रह करती है या शिल्पहीनता का समर्थन करती है। इस मनमानेपन का तो कोई इलाज नहीं है। लेकिन इस वजह से उनका वह सारा विमर्श ही बेमानी बल्कि शायद अनचाहे ही बेमानी से अधिक बेईमान हो जाता है क्‍योंकि वे उस बात को मूल आधार बना रहे हैं, जो वहाँ है नहीं और कही भी नहीं गई है। यदि कुपाठ, अतिपाठ और टैक्‍स्‍ट से बाहर पाठ न किया जाए तो मेरे ख़याल से वह डायरी अंश अपने आप में स्‍पष्‍ट है। पंक्तियों के बीच पढ़ना भी दरअसल अनर्गल पढ़ना तो नहीं हो सकता।

निश्‍चय ही वहाँ 'अति शिल्प' के दुराग्रह का रेखांकन है, शिल्प सम्बन्धी अतिवादी आग्रहों की निन्दा है। शिल्प की एकांगी भक्ति, शिल्पवाद के प्रति चेतावनी है, इत्‍यादि। शिल्पवाद की ब्‍याज़ स्‍तुति है। शिल्प की दाढ़ में ख़ून शीर्षक से साफ़ आशय है कि जैसे शेर जब आदमी का शिकार करने लगता है तो वह आदम-ख़ोर हो जाता है, उसी तर्ज़ पर जब शिल्प लेखक का शिकार करने लगता है तो वह वह शिल्प एक विशेष अर्थ में लेखकभक्षी हो जाता है। ऐसे उदाहरण हर भाषा में बिखरे हैं, नाम लिखकर मैं इसे व्‍यक्तिपरक नहीं बनाना चाहता, वस्‍तुपरक ही रखना चाहता हूँ। हालाँकि, विभिन्‍न पोस्‍टों और प्रतिक्रियाओं में कुछ नाम लोगों ने अपने अनुसार लिख दिए हैं। ऐसी सूची हर कोई अपने स्‍तर पर बना सकता है।

दो

इससे अधिक हास्‍यास्‍पद क्‍या होगा कि जब कहूँ कि कलावाद का पक्षधर नहीं हूँ तो उसे इस तरह बताया जाए जैसे मैं कला के ख़िलाफ़ हूँ। या शिल्पमोह के विरुद्ध कुछ कहने को, शिल्प के ख़ि‍लाफ़ होना प्रचारित करने की कोशिश की‍ जाए। यह उतना ही हास्‍यास्‍पद है जैसे बाजारवाद, उपभोक्‍तावाद के विरोध को बाज़ार या उपभोक्‍ता का विरोध बताया जाए। हालाँकि यह गंभीर शरारत या अतीव विद्वता का नमूना भी हो सकता है। तब यही शेर याद आता है:

या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात    
दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़बाँ और।

(भले शेर मात्रिक रूप से ग़लत हो जाए लेकिन ‘दिल की जगह दिमाग़’ लिखना भी इस प्रसंग में शायद अनुचित न होगा।)

ज़ाहिर है कि ऐसे लोगों का इरादा कुछ और है। फिर प्रकारांतर से निजी तौर पर यह भी कहा जाने लगे कि रचना में कला, शिल्प, भाषा आदि की ज़रूरत को शायद मैं नहीं समझता हूँ तो फिर मामला कुछ और भी है। तभी तो बात खींचकर अनावश्‍यक रूप से जनवादी और प्रगतिशील लेखन तक पहुँचा दी गई। बहरहाल, याद दिलाना उचित है कि अन्‍य लेखों में बार-बार दर्ज कर चुका हूँ कि एक स्‍वप्‍नशील, प्रगतिशील, बेहतर दुनिया की आकांक्षी रचनाशीलता में कला-शिल्प-भाषा-विचार का कौशल, संतुलन तथा कथ्‍य का संप्रेषण बेहतर देखा है बजाय तथाकथित शिल्पवादियों, कलावादियों, और रूपवादियों की। इ‍सलिए मैं अपने डायरी-अंश में लिखे प्रत्‍येक शब्‍द और वाक्‍यों के साथ आज भी हूँ। उन्‍हें 'ओन' करता हूँ। कुपाठ करनेवाले अन्‍यथा पाठ करते रह सकते हैं। यह उनकी समस्‍या है और स्व अर्जित अधिकार भी।

तीन

यह कोई आज की ताज़ा ख़बर या ब्रेकिंग न्‍यूज़ नहीं है कि हर रचना में कथ्‍य के साथ शिल्प आता है। लेकिन वह सहज आ जाएगा, उसे घसीटकर और ख़ास तरह से सप्रयास लाने की ज़रूरत  क्‍यों है। उसे ठोक-पीटकर एकसार, मानकीकृत करते हुए। वह ‘एंसीलरी’ है, स्‍मरण रखते हुए कि वह कथ्‍य का ज़रूरी लेकिन सहायक उपकरण है, मुख्‍य मशीन नहीं। वह कथ्‍य को अधिक आकर्षक, ग्राह्य और बेहतर प्रकाशित कर सकता है लेकिन इतना प्रकाश नहीं चाहिए कि चकाचौंध हो जाए। जो इस चकाचौंध के समर्थक हैं, वे रतौंधी की राह पर हैं। इस तरह रचना में रतौंधी के समर्थक। यह यथार्थ को शिल्प की ओट में, कुहासे में रख देने का एक यत्‍न भी हो सकता है। हालाँकि यह भी उनका अधिकार है। और एक बार फिर मेरी वह अ‍सहमति है जो रचनाशीलता में इस तरह की धुन्ध और कुहासे के पक्ष में नहीं है। जो सुन्दर दिख सकती है लेकिन दूर तक की राह देखना बाधित करती है। चाहे-अनचाहे। जो स्‍पष्‍टता के ख़िलाफ़ है। जिसके एकाधिक मायावी मायने निकल सकते हैं। व्‍यंजक होना अलग बात है, धुँधला होना अलग।

कुछ लोगों ने मेरी बीसियों कविताओं, कहानियों के उदाहरण से (कुछ ने लिखकर, कुछ ने फ़ोन पर) उनमें शिल्प को रेखांकित किया है। एकदम ठीक, लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि उन सभी रचनाओं में कथ्‍य प्रधान है। बेशक, हर रचना की तरह उनमें किसी न किसी तरह का शिल्प है लेकिन वह एक-सरीखा शिल्प नहीं है। वहाँ शिल्प पृथक-पृथक रूप में केवल उस कथ्‍य को लांच करता है। जो लोग इन कविताओं को ज़ोर देकर शिल्प प्रधान घोषित रहे हैं, मेरे ख़याल से वे कविता-कहानी के कमतर पाठक हैं या जान-बूझकर ग़लत व्‍याख्‍या कर रहे हैं। हालाँकि यह भी उनका आत्म-संघर्ष से प्राप्त अधिकार है।

चार

फिर/दुबारा कह दूँ ताकि ग़लतफ़हमी न रहे—मैं शिल्प का समर्थक हूँ लेकिन शिल्पवादी नहीं। मैं कला का समर्थक हूँ लेकिन कलावादी नहीं। रूप का सम्‍मान है लेकिन मैं रूपवाद के ख़िलाफ़ हूँ। इस फ़र्क़ को समझे बिना, उस ज़रा से पन्‍ने को नहीं समझा जा सकता। केवल कुपाठ किया जा सकता है। शिल्प का इस तरह अर्जन करना कि लेखक की प्रायः समूची रचनाशीलता किसी विशेष तरह के शिल्प की मोहताज हो जाए या उसका पर्याय हो जाए, मेरी निगाह में यह दुर्घटना है और उसकी आलोच्‍य  सीमा भी क्‍योंकि तब देखा यही गया है कि ऐसा लेखक अपने शिल्प की रक्षा में यथार्थ को, अपने समय और आवश्‍यक लेखकीय प्रतिवाद को ही दाँव पर लगा देता है। फिर-फिर कहूँगा कि शिल्प स्थिर या जड़ नहीं हो सकता अर्थात एक ही तरह का शिल्प सारी रचनाओं में काम नहीं आ सकता। एक ही कोटि के शिल्प को प्राप्‍त करना, उसे उपलब्धि मानना एक तरह का क़ैदखाना है। शिल्प को भी गतिशील और विविध होना पड़ता है। जो लेखक लगभग मोनोलिथिक शिल्प का अर्जन और उसकी शव-साधना करते हैं, वह अंश और यह कथन उसी पर प्रश्‍नांकन है।

और जब शिल्प-भाषा-रूप रचना में कुहासा फैलाने लगें, कथ्‍य पर आच्‍छादित होने लगें, उसकी ओट में यथार्थ को, विषय को धुँधला, दरकिनार या उपेक्षित करने लगें तो इस तरफ़ ध्‍यानाकर्षण और विचार करना होगा। कि काँच को इतना मत घिसो की वह अर्द्धपारदर्शी, फिर अपारदर्शी हो जाए। और यह सब विचार करना शिल्प, भाषा आदि की अवमानना नहीं है बल्कि उन्‍हें उनकी समुचित भूमिका और ताक़त की याद दिलाना भी है। और यह कि उनके अतिरिक्‍त मोह में क्‍या कुछ गड़बड़ हो सकती है। और यह कि इनकी मोहिनी के झाँसे में नहीं आया जा सकता। ऐसी ही मधुमेही या अति कलावादी-शिल्पवादी भाषा के प्रयोग पर हरिशंकर परसाई ने कहा था कि इस भाषा पर किशमिश भी खींचकर मारो तो उसके गाल पर ख़ून छलछला जाएगा। यानी यह क्‍या प्रतिवाद करेगी, भला क्‍या और कितना कथ्‍य को उजागर करेगी। और कितना कुछ आँचल की ओट में छिपा लेगी।

रॉकेट लांचर का महत्‍व है लेकिन वे रॉकेट नहीं है। माध्‍यम महत्‍वपूर्ण है, आवश्‍यक है, अपरिहार्य है लेकिन वह अपने आप में सन्देश या कथ्‍य नहीं है। और जो ऐसा नहीं मानते, वह भी उनका अधिकार है। लेकिन मेरी असहमति है और उनके ऐसा मानने से मेरे भी स्व अर्जित, आत्म संघर्ष से प्राप्त अधिकार सीमित नहीं होते। बस, समझ और राह अलग होती है। सो है।

अन्त में—

ये तीन उद्धरण, जो मुझे लगा कि मेरे आशयों तक पहुँचते हैं, साभार नीचे दे रहा हूँ। सह-विचार के लिए -

श्री आशुतोष कुमार :

अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है        
शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात

— अल्लामा इक़बाल

शिल्प का मोह वहाँ होता है, जहाँ कथ्य का अभाव हो। नया कथ्य अपना नया शिल्प साथ लेकर आता है, उसे अलग से खोजना नहीं पड़ता।  कथ्य के अभाव को शिल्प से भरने की कोशिश की जा सकती है। जब शिल्प चमकता हुआ लगे और कथ्य अनुपस्थित हो तो यह एक समस्या है। इधर हिन्दी में यह समस्या बढ़ी है। ऐसी चीज़ें लिखी जा रही हैं, जो अंदाज़े जुबान (न कि अंदाज़े बयाँ) और शिल्प की बारीकियों से पाठक को मुग्ध कर लेती हैं और पाठक कथ्य के बारे में सोचना भूल जाता है!

श्री विनोद तिवारी :

कथ्य केन्द्रीय है, मूल है, पहले है। शिल्प बाद में। शिल्प-सौन्दर्य का तब तक कोई मोल नहीं जब तक कथ्य कैसा है? उसके मूल्य और महत्व पर विचार न कर लिया जाए। आप केवल शिल्प पर मोहित हैं या कथ्य तक आप पहुँच पाते हैं या नहीं?

श्री वीरेंद्र यादव :

मतलब खाने का हुनर आना चाहिए। लेकिन यह भी अपनी पसन्द का सवाल है। छिलका ही पसन्द हो तो आप कौन हैं, ये कहने वाले कि नहीं उसके भीतर का तत्व खाओ। मेरी मर्ज़ी। छिलके के बिना तत्व का अस्तित्व क्या सम्भव था! नहीं न, तो हम तो छिलका खाएँगे और 'छिलका महात्मय' बखानेंगें। जमाना भी तो पैकेजिंग का है।

(यह एक असमाप्‍त पोस्‍ट है।)

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शिल्प की अनिवार्यता के पक्ष में - चंदन पांडेय

(5 अप्रैल, 2025)

कुमार अम्बुज जी ने मेरे द्वारा बेईमानी करने की बात कही है। उनका आरोप सर माथे लेकिन निहितार्थों पर बात करना बेईमानी नहीं कही जाएगी। शिल्प पर बात करते हुए अगर आपको हर वाक्य में सफाई देनी पड़े, हर वाक्य में ‘लेकिन’ लगाना पड़े तो आप स्वयं सोचें कि शिल्प के लिए आपके मन में कितना स्थान है। हर वाक्य में कहना पड़े कि मैं शिल्पवादी नहीं हूँ, मैं रूपवादी नहीं हूँ तो आप शिल्प को पाँव की जूती भी शायद न समझते हों। हर वाक्य में मजबूरी! ऐसा कैसे हो सकता है?

क्या रचना संसार में शिल्प इतना हेय स्तम्भ है कि आपके पास उसके लिए एक सुन्दर सजीला वाक्य नहीं? एक वाक्य बिना ‘लेकिन’ का नहीं? अम्मा कहती है कि मयभा अगरअइलऽऽऽ तऽ लिट्टी में छेद कर माठा गिराईंऽऽ! यानी सौतेली माँ ने खुश होकर दिया भी तो मट्ठा दिया और इतना ही दिया जितना मोटी रोटी में छेद करने पर पा सकें। शिल्प का वही सौतेले बच्चे वाला हाल आप महानुभावों ने कर दिया है।

कल मैंने शिल्प की अनिवार्यता के पक्ष में लिखा लेकिन एक भी तथाकथित रूपवादी या कलावादी शख़्स उस पोस्ट पर नहीं आया! बल्कि उल्टा ही हुआ। यह लाजिम भी है क्योंकि जनपक्षधर संसार में शिल्प की अवमानना से ही दूसरा पक्ष यानी कलावादी पक्ष ऊर्जस्वित है, आप अगर शिल्प की बात करेंगे तो उनकी नाराजगी लाज़िम है क्योंकि इन्हीं बहसों की वजह से उनका एकाधिकार हुआ रखा है।

आप कहेंगे कि इस ‘लेकिन’वादी विचार से नुक़सान कहाँ हैं?

दरअसल, ‘कथ्य अपना शिल्प लेकर आता है’ भाग्यवादी विचार है। ‘सबके दाता राम’ जैसा कुछ। इसी स्थापना के आधार पर शिल्प को हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है कि वह तो आ ही जाएगा, आप तो बस कथ्य को देखें!

दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि ऐसा नहीं है। शिल्प अर्जित करना पड़ता है। शिल्प आपके संवेदनात्मक ज्ञान की देन है। वर्षों का परिश्रम होता है।

शिल्प ही कथ्य को रचना में तब्दील करता है। उसके हर अवयव को सीखना पड़ता है। शिल्प अनुशासन है। भाषा सीखनी होती है। बरतने का तरीका सीखना होता है। मार्केस कहते थे कि वे रोज कुछ घंटे का समय शब्दकोशों के साथ बिताया करते थे। और भाषा तो शिल्प का महज एक हिस्सा है।

दुनिया में उपस्थित और परिचित प्रविधियों के बीच से प्रविधि को चुनना होता है।

कल एक विचार उछाला गया कि कबीर के यहाँ कथ्य महत्वपूर्ण है शिल्प नहीं। कितना हास्यास्पद है यह!  यह कहना कि कबीर से पहले दुनिया कल के काम को आज करने और आज के काम को अब करने का महत्व नहीं जानती थी! क्या यह सच हो सकता है? यह कथ्य तो पहले भी रहा होगा कि काम समय पर पूरा कर लें लेकिन कबीर ने शिल्प से इसे अनोखी ऊँचाई दी। पल में प्रलय की कल्पना मात्र से जो सिहरन पैदा होती है या पल में समाये प्रलय की कल्पना से जो भाव उत्पन्न होता है उसने इसे कबीर का बना दिया! यही शिल्प है।

मैक्सिम गोर्की तक को कथाशिल्पी मानने से इनकार करने के मूड में हैं लोग। उनका दोष? दुरूह मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उन्होंने अपनी कहानियों में सहज सुगम बनाया। दोस्तोयवस्की इनके लिए कथ्य तक सिमटे हैं। विनोद तिवारी जी ने जिन दो कहानियों की आभा में कथ्य का महत्व ऊँचा करना चाहा वे ख़ुद सुघड़ शिल्प का उत्कृष्ट नमूना है। यानी कथ्य अपनी स्थापना के लिए पूरी तरह शिल्प पर निर्भर है।

मानव जीवन के किसी भी पहलू में निथरा हुआ शिल्प पाने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। क्या आप यह नहीं जानते? फिर ऐसा कैसे हो जाएगा कि कथ्य अपना शिल्प ख़ुद लेकर आता है? फिर तो आप कहेंगे कि ईंट गारा अपना मकान ख़ुद लेकर आते हैं? हारमोनियम अपना राग खुद लेकर आता है? ऐसा नहीं होता है न! फिर साहित्य में यह भाग्यवादी रवैया क्यों? कि कथ्य आ गया है अब शिल्प भी आ जाएगा?

मैं इस तरह की लड़ाई में हाथियों के समक्ष एक तिनके के बराबर भी नहीं इसलिए डरते हुए ही कहना चाहता हूँ कि यह बहस निर्दोष नहीं है। मुझे यह शक्ति संरचना पर काबिज़ होने या रहने की लड़ाई लगती है। इस पर मैं कभी और लिखूँगा।

आश्चर्य है कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि कलम वाले नक्सलियों से लड़ना होगा और आप कहते हैं कि शिल्प गौण है, हेय है। दोनों में अन्तर न के बराबर है। दोनों विचार रचनाविरोधी हैं।

शिल्प को महत्व देने से आप शिल्पवादी या कलावादी नहीं हो जाएँगे लेकिन क्योंकि आप लोग बड़े हैं, राय निर्मिति में आपका योगदान है इसलिए लिखने वालों के मन में शिल्प का महत्व स्थापित कर पाएँगे। यह आवश्यक है। मुक्तिबोध जिस भाषा में सम्भव हुए उसमें शिल्प की अवमानना और अवहेलना भाषा को, साहित्य को नुक़सान ही पहुँचाएगा।

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कथ्य केन्द्रीय है, मूल है, पहले है - विनोद तिवारी

(5 अप्रैल, 2025)

यह कहना कि कथ्य अपना शिल्प ख़ुद लेकर आता है अथवा तैयार करता है, विवादी कथन कैसे हो सकता है?

संरचित को तोड़कर, बिखेरकर फिर से रचने का हुनर और परिचित को भेदकर, उसे अपरिचित की तरह प्रस्तुत करने की युक्ति (कला मैं जान-बूझकर नहीं कह रहा, क्योंकि उस युक्ति में ही कलाकार की कला सन्निहित है) को शिल्प कहा जा सकता है। पर यह सब कथ्य के भीतर ही सम्भव होता है। कथ्य केन्द्रीय है, मूल है, पहले है। शिल्प बाद में। शिल्प-सौन्दर्य का तब तक कोई मोल नहीं जब तक कथ्य कैसा है? उसके मूल्य और महत्व पर विचार न कर लिया जाए।

नोबल सम्मान से सम्मानित अरबी भाषा के कथाकार नजीब महफ़ूज की एक छोटी सी कहानी है—‘मोती’। जितेंद्र भाटिया ने हिन्दी में इसका बहुत ही सुन्दर अनुवाद किया है। तो किस्सा यूँ है कि कथावाचक एक दिन एक सपना देखता है—“किसी ने मेरे सपने में आकर मेरी ओर हाथी दाँत का एक डिब्बा बढ़ाते हुए कहा, ‘इस तोहफ़े को क़बूल करो’। जब मैं उठा तो डिब्बा मेरे तकिये के पास रखा था। जुनून की हालत में मैंने डिब्बा खोला और पाया कि उसमें अखरोट के आकार का एक बड़ा सा मोती है। समय-समय पर मैं उसे किसी मित्र या विशेषज्ञ को दिखला कर पूछता, ‘इस लाजवाब मोती के बारे में आपका क्या ख़याल है?’ वह आदमी अपना सिर हिलाता और फिर हँसते हुए कहता, कौन सा मोती? यह डिब्बा तो बिलकुल खाली है।”

कहना न होगा कि शिल्प और कथ्य की बहस में डिब्बा क्या है और मोती क्या है।

अब चीन की एक बोध-कथा को लेते हैं। शीर्षक है—‘बन्दर ने फल कैसे खाया’? लू शुन लेखक हैं। कहानी यह है कि एक बार एक बन्दर तरबूज़ के खेत में गया। तरबूज़ इतने सुन्दर दिख रहे थे कि उससे रहा न गया और उसने एक तरबूज़ तोड़ ही लिया। पास में ही एक बैल उसे देख रहा था, वह बोला ‘शायद तुम्हें मालूम नहीं कि इसे कैसे खाया जाता है। मैं तुम्हें बताता हूँ कि...’ ‘नहीं चुप रहो तुम्हें क्या मतलब ?’ बन्दर ने तरबूज़ के छिलके पर दाँत गड़ाए और छिलका मुँह में आते ही उसे तुरन्त फेंक दिया, ‘छिः छिः! कितना ख़राब स्वाद है।’ बैल ने उसे बताया कि उसे छिलके के नीचे वाला हिस्सा खाना चाहिए था। ‘हाँ-हाँ! ठीक है। हमें छिलके की बजाय फलों का गूदा ही खाना चाहिए। यह बात मुझे मालूम है।’ फिर बन्दर खरबूजे के खेत में गया। उसने एक खरबूज़ चुना, उसे तोड़ा और गूदा खाने ही वाला था कि पास खड़ा एक गधा बोल, ‘तुम्हें गूदे की बजाय, छिलका खाना चाहिए।’ बन्दर ने खरबूजे का गूदा और बीज थूक दिए और छिलका खाने लगा—‘अब मैं समझा, छिलका खाओ गूदा नहीं।’ फिर वह अखरोट के पेड़ पर जा पहुँचा और उसने एक अखरोट तोड़ लिया। तभी एक चिड़िया चिल्लाकर बोली, ‘ठीक से खाना।’ लेकिन बन्दर ने कहा, ‘अपना काम करो। मुझे सब पता है।’ उसने अखरोट के कठोर और कड़वे छिलके को चबाना शुरू किया। उसका स्वाद इतना ख़राब था कि बन्दर को नदी में जाकर कुल्ला करना पड़ा। तब चिड़िया आकर बोली, ‘यही तो मैं तुम्हें बताना चाहती थी कि उसके अन्दर की गिरी खाना, पर तुमने झिड़क दिया।’ बन्दर को लगा कि अब वह सब समझ चुका है। उसने नाशपाती के पेड़ से एक नाशपाती तोड़ी। गिरी तो उसमें होती नहीं है, इसलिए उसके बीज निकाल कर मुँह में डाले और एक बार और उसका स्वाद इतना बुरा था कि उसे थूकना ही पड़ा। गुस्से में आकर बन्दर ने नाशपाती को फेंक दिया और उछलता-कूदता हुआ चिल्लाने लगा—“किस काम के हैं ये फल? तरबूज़, खरबूज़, अखरोट और नाशपाती, सबके सब बेस्वाद हैं।

मतलब कि खाने का तरीक़ा भी आना चाहिए। आप केवल शिल्प पर मोहित हैं या कथ्य तक आप पहुँच पाते हैं या नहीं? 

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बहस की निरंतरता में - विनोद तिवारी

(7 अप्रैल, 2025‌)

कथ्य शिल्प की रचना नहीं करता बल्कि शिल्प ही कथ्य बनाता है : चंदन पांडेय और मनोज पांडेय

यह देखना और समझना जिसे शिल्प का अर्जित किया जाना कहा जा रहा है, वह किसके लिए अर्जित किया जाता है या किया जाएगा? कुछ कहने के लिए होगा तभी तो उसे किस तरह से कहा जाए, इस पर सोचा जाएगा। कुणाल कामरा जो कहना चाहता है, उसे किस तरह से कहेगा वह कला है। मनोज पांडेय अपनी ‘राजा और देश’ सम्बन्धी कहानियों में जो कहना चाहते हैं, उसे किस शिल्प में कहेंगे वह कला है। उसे अन्योक्ति में कहेंगे, दृष्टांत देकर कहेंगे अथवा व्यंग्य में कहेंगे।

‘राग दरबारी’ में जिस लोकतन्त्र के प्रहसन को प्रकट करने के लिए जिस कला का सहारा लिया गया है वह शिल्प है। यह भी कि जब यह कहा जाता कि ‘अच्छा चलो कहानी मत सुनाओ, असल बात पर आओ’ तो साफ़ है कि केवल कहानी कहना कथ्य नहीं है, क्या कहना है यह कथ्य है। इसलिए कथ्य में दृष्टिकोण और उद्देश्य दोनों शामिल होते हैं।

एक बात और जिसे शिल्प कहकर जीवन भर की कमाई अथवा अर्जन कहा जा रहा है, उसे शिल्प नहीं बल्कि ‘ऑथरशिप’ कहा जाता है। और ‘ऑथरशिप’ क्या केवल शिल्प की कमाई है? फिर तो कालीदास, भवभूति, शूद्रक आदि में कोई फ़र्क़ ही नहीं होता। पेशे के प्रति आदर के साथ यह कहना चाहता हूँ कि अगर ‘ऑथरशिप’ केवल शिल्प का मसला होता तो राजमिस्त्री, बढ़ई आदि बड़े लेखक होते।

प्रसिद्ध चित्रकार मक़बूल फिदा हुसैन का कहना था कि ‘तस्वीर का बुनियादी ढाँचा, एक ईंट, एक क़दम से शुरू होता है—वो चाहे महाभारत हो या कर्बला।’

अतः रचना जिस ‘कथ्य’ के लिए निर्मित की जा रही है वह किसी सारगर्भित कथन या वाक़्य से, किसी कौंध से, किसी नुक़्ते से शुरू हो सकती है। लेकिन शुरू होने की प्रक्रिया के साथ ही वह अपने विकास में किसी न किसी संरचना और शिल्प में आकार लेने लगती है। वह संरचना और शिल्प किसी भी विधा का हो सकता है या विधाओं की सीमा तोड़-फोड़कर कई विधाओं के सम्मिलित फार्मेट में हो सकता है। बस, इसी को मैं रखना या कहना चाहता हूँ कि संरचना और शिल्प से बाहर कोई रचना नहीं होती पर रचना रूपी भवन जिस ज़रूरत के लिए खड़ा किया जाता है वह कथ्य है।

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शिल्प और आकस्मिक नैतिकता का दबाव - चंदन पांडेय

(7 अप्रैल, 2025)

शिल्प रचना के प्रति जवाबदार है कथ्य के नहीं। समय का सत्य सबपर उद्घाटित होता है लेकिन विरला कोई उसे शिल्प से माँजकर रचना का स्वरूप देता है जहाँ वह सत्य वैयक्तिक अनुभव या कल्पना से आगे निकलकर व्यापक स्वरूप ग्रहण करता है। यानी सत्य का रास्ता शिल्प से होकर गुजरता है।

महत्व तो कथा में प्रस्तुत एक-एक अक्षर का है लेकिन जब आप वर्षों से चली आ रही परम्परा की जिद में शिल्प को दोयम या अनुषंगी बताते हैं तो गलत कर रहे होते हैं।

शिल्पातिरेक अथवा शिल्प-दुराग्रह का आरोप मढ़ते हुए जब हम एक भी उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर पाते तब दो ही बातें हैं कि अपवाद को नियम माने बैठे हैं जबकि हिन्दी की सामाजिक ऐतिहासिक निर्मिति के कारण शिल्पाग्रह न्यूनतम है, इतना कम कि अगर कहीं हो तो अपवाद ही होगा। दूसरी बात, कि जिसे आप शिल्प का दुराग्रह कह रहे हैं, हो सकता है उस शिल्प के भीतर पसारा किए कथ्य तक आप पहुँचना न चाहते हों। इस वाक्य को दुबारा कहना चाहता हूँ। दूसरी बात, कि जिसे आप शिल्प का दुराग्रह कह रहे हैं, हो सकता है उस शिल्प के भीतर पसारा किए कथ्य तक आप पहुँचना न चाहते हों।

कुमार अम्बुज जी की डायरी का वह अंश 2002 का है और इधर उन्होंने पुनः प्रकाशित किया। अगर हम इसी दौर को देखें या पिछले चालीस-पचास वर्षों को देखें तो शिल्प का अतिरेकी आग्रह कहाँ है? किस रचना में? किस रचनाकार में? और अगर है तो कौन सा सत्य वह रचनाकार छुपाना चाहता है?

आप कथ्य की बात करते हैं। राजू शर्मा के उपन्यास ‘क़त्ल गैरइरादतन’ अपनी कला की बदौलत हमें ऐसे सत्य से मुख़ातिब करता है जिसे कथ्य के बतौर बता ही नहीं सकते। कथ्य वहाँ महज एक पंक्ति का सारांश है लेकिन किसी बड़े उपन्यास से गुजरकर जो अनुभूति, एक क़िस्म का बदलाव आप महसूस करते हैं वह इस उपन्यास में शिल्प के कारण सम्भव है। जिसे वास्तविक अर्थों में ‘स्लो बर्नर’ कहते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में समकालीन उर्दू साहित्य को पढ़ने का अवसर मिला और पाया कि एक समान समय और समाज के बावजूद शिल्पगत विशिष्टताओं ने जो ऊँचाई बख्शी है वह सीखने-समझने लायक है। सैयद मोहम्मद अशरफ़ का उपन्यास ‘आख़िरी सवारियाँ’ में गुजरा जमाना जब पीछे से और पीछे की तरफ़ बढ़ता है और तीन भिन्न समय की सवारियों के माध्यम से बात खुलती है तो उपन्यास पढ़ चुकने के बाद आप वही नहीं रहते जो पहले थे। क्या यह महज कथ्य से सम्भव है?

योगेन्द्र आहूजा की कहानी, ‘एक पुरानी कहानी’! क्या शिल्प! क्या उस कहानी से पहले वे स्थितियाँ नहीं थीं! क्या ऐसा पहले नहीं हुआ था कि कला के प्रति समर्पण से डरकर कोई भाग खड़ा हो! इसे आप क्या महज़ कथ्य के सहारे जाहिर कर सकते हैं? वह कथ्य या वैसा कथ्य वर्षों से नहीं सदियों से मौजूद था लेकिन लिखा योगेन्द्र ने। यह उनकी शिल्पगत विशिष्टता थी।

अनेक उदाहरण हैं। लेकिन शिल्प दुराग्रह का एक नहीं। इससे पहले की पोस्ट में आपने दोस्तोयवस्की, काफ्का, गोर्की, नीलाक्षी के उदाहरण देखे थे।

वर्ष 2004 के आसपास जब कुणाल सिंह कथासाहित्य के परिदृश्य में उपस्थित हुए तो कला के अतिरिक्त आग्रह वाली अफ़वाहें उड़ने लगीं। जिसने नहीं पढ़ा होता था उसके पास नहीं पढ़ने का यह आधार पहले पहुँच जाता था कि अरे वह तो विनोद कुमार शुक्ल से प्रभावित है, या किसी और से प्रभावित है। मैं विनोद जी को पढ़ता हूँ और सम्मान के साथ कहना चाहूँगा कि विनोद कुमार शुक्ल का गद्य जितना दुरूह था कुणाल उतना ही सरस लिख रहे थे। वे कहानियाँ, सनातन बाबू का दाम्पत्य, शोकगीत, साइकिल कहानी, डूब जिस क़रीने से अपने समय के सत्य को उजागर करती हैं वे किसी कतरन से सम्भव है क्या?

वे उपन्यास जो किसी मित्र की तरह आपके साथ आपके मन में चलते हैं वे कला के कारण वरना कथ्य तो किस पर जाहिर नहीं रहता! आजकल ब्लर्ब लेखन नाम का फलता-फूलता उद्योग कला के समूचे आस्वाद की हत्या करने पर तुला है क्योंकि वह कथ्य परोसता है और सबको कथ्य चाहिए! सब पढ़कर एहसान करना चाहते हैं!

इस दौर को परिभाषित करती रचनाओं में कौन सी कलातिरेक के कारण सम्भव हुई हैं अगर आप इस पर बात नहीं करते तो जाहिर है कि कोई दूसरे सक्रिय भय हैं।

एक अन्य बात कहना चाहूँगा कि हमेशा किसी आकस्मिकता का भय दिखाकर कलाकारों के मन में यथार्थ का हिमशैल, आईसबर्ग, दिखाना ग़लत है, साहित्य का टायटैनिक अगर यथार्थ को हल्के में लेगा, महज़ कथ्य तक सीमित कर देगा, तो बताने की आवश्यकता नहीं कि क्या दुष्परिणाम होंगे?  

उदाहरण कई देने हैं और आगे के अंशों में रखूँगा लेकिन एक अन्य उदाहरण से आज की बात रोकूँगा। एक ‘जैसे’ कथ्य को दो अलग अलग रचनाकार अपनी संवेदना, शिल्प, तैयारी से अलग निष्कर्षों तक पहुँचा देते हैं, इसका उदाहरण हैं दो कहानियाँ, संजय कुंदन की ‘मेरे सपने वापस करो’ और राहुल श्रीवास्तव की ‘तालियाँ’। एक कलाकार जो अपना जीवन थियेटर को दे चुका है। दोनों कहानियाँ पढ़िए। राहुल ने जो ऊँचाई उस रचना को दी है, वह मानीख़ेज है।

एक दूसरा आलम यह है कि लोग किधर से भी नहीं चलने दे रहे। अगर आप मॉब लिंचिंग जैसी क्रूरतम और नृशंस प्रवृतियों को, उसके हताश कर देने वाले प्रभावों को समझने हेतु साहित्य लिखो तब कहना शुरू कर देते हैं कि अभी तो कला का तीसरा क्षण आया ही नहीं? यानी बहुत जल्द लिख दिया! यही बात कोविड पर लिखे साहित्य को लेकर नहीं कहते। मुक्तिबोध की आत्मा करक जाती होगी यह सुनकर। लेकिन ख़ैर यह उनका शिल्प है जिससे वे वांछित सत्य उद्घाटित करना चाहते होंगे। दूसरी ओर शिल्प का दुराग्रह दिखने लगता है। आख़िर कोई इसका क्या अर्थ ग्रहण करे?

आगे शिल्प के दूसरे महत्व और अन्य उदाहरणों पर बात होगी।

(जारी)

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कथ्य बनाम शिल्प  - विनोद तिवारी

(8 अप्रैल, 2025)

शिल्प का नकार जिनके यहाँ हो, उनकी बात मैं नहीं करता। लेकिन शुरू से ही इस पूरी बहस में शिल्प के बिना किसी तरह के कहन/लेखन की बात किसी ने नहीं कही है। हाँ, शिल्प के बल पर ही कथ्य निर्मित होगा अथवा लाया जाएगा, इससे मेरी भी असहमति है। सधा हुआ शिल्प कथ्य के प्रभाव को द्विगुणित ज़रूर करता है, वह उसकी अर्थान्विति को सृजित भी करता है और एक्सिलेरेट भी करता है। मुश्किल तब होती है जब कथ्य को कथा-सारांश तक महदूद मान लिया जाए और शिल्प को फॉर्म मान लिया जाए। शिल्प क्राफ्ट है, फॉर्म नहीं। इसलिए जबतक ‘कथ्य’ पास में नहीं है तब तक फॉर्म और क्राफ्ट की योजना नहीं हो सकती। शिल्प के अतिरेक के उदाहरण इसलिए नहीं दिये जा रहे हैं (हालाँकि हमारे अपने समय में भी उसके उदाहरण मौजूद हैं) कि क्या शिल्प और कला ही के बल पर कोई चाह कर भी अर्थवान रचना दे सकता है? अगर दे सकता है तो वाइस-वरसा वही सवाल कि ऐसी किसी रचना का उदाहरण दें।

वस्तुतः मानव सृजित कोई भी रचना किसी न किसी दृष्टि के तहत ही होती है। यह दृष्टि जिस भी भाव, विचार, सिद्धान्त और दर्शन के द्वारा अभिव्यक्त होती है, वह रचना और उसके साथ रचनाकार के ‘दृष्टिकोण’ की पहचान कराती है। मैं इसी दृष्टिकोण को शुरू से ही कथ्य के पर्याय के रूप में रखने का निवेदन कर रहा हूँ।

कथ्यविहीन रचना का उदाहरण नहीं देखा गया है। अतः ‘कथ्य' किसी भी सृजन का प्राथमिक और सबसे ज़रूरी तत्व हो जाता है। कोई चीज़ देखना और उसे किसी ख़ास नज़र से देखना, इन दोनों में फ़र्क होता है। यह फ़र्क़ ही असल में सृजन की ओर उन्मुख और उसमें प्रवृत्त होने की क्षमता देता है। बाक़ी तो कहन और प्रस्तुति के अपने-अपने तरीक़े हैं, शैलियाँ हैं, कलात्मकता है। पर, मूल है—‘दृष्टिकोण’ इसलिए, दृष्टिकोण के तहत इस बात का विवेचन महत्वपूर्ण हो जाता है कि—‘कौन देखता है?’ क्या देखता है? कितना देखता है? ‘किस तरह से देखता है?’

दृष्टिकोण सहज विकसित धारणा या अनुभावात्मक प्रक्रिया भर नहीं है बल्कि उसमें एक व्यक्ति का सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और विचारधारात्मक उन्मुखीकरण (ओरिएंटेशन) भी शामिल होता है। दरअस्ल, दृष्टिकोण लेखकीय सृजन के नैतिक संघर्ष का आईना और उसकी चेतना व विचारों का हस्ताक्षर होता है। दृष्टिकोण कहने पर किसी न किसी रूप में विचारधारा की छूत का भान होता है। एक हद तक यह सच भी है, किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि दृष्टिकोण अपने परिवेश और वस्तु के सही परिप्रेक्ष्य की समझदारी है। कभी-कभी यह भी तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि देखने के कई नज़रिए हो सकते हैं और इस तरह से सत्य के भी कई कोण हो सकते हैं, या सत्य भी एक नहीं अनेक हो सकते हैं। सामान्यतः यह तर्क ठीक लग सकता है। परन्तु, इस तर्क में वैयक्तिकतावाद का समर्थन किया जाता है। मसलन, दृष्टिकोण तो ‘फासीवाद’ के पक्ष में भी एक ख़ास लक्ष्य और उद्देश्य के तहत दिया ही गया है, दिया ही जाता है और जनता के भीतर इसके पक्ष में, कभी नस्ल के नाम पर, कभी उसके स्वाभिमान के नाम पर, कभी सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के नाम पर, तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर, कभी परिवर्तन और सुधार के अनुशासन के नाम पर, समर्थन जुटाया ही जाता रहा है। पर क्या ‘फासीवादी’ दृष्टिकोण व्यापक और प्रगतिशील समाज-निर्माण और मानवीय गरिमा के लिए स्वास्थ्यकर माना जा सकता है? अतः देखने के नज़रिए अलग हो सकते हैं, पर वस्तु की मूल प्रकृति और अर्थ को अगर नकार कर उसे केवल इस तर्क पर कि नहीं यह भी सत्य हो सकता है, दरअसल, सत्य के वास्तविक रूप और अर्थ को सत्यासत्य के भ्रम में डालकर सही दृष्टिकोण को विलयित करना होगा।

(मेरी ओर से इस असमाप्त बहस की आख़िरी पोस्ट)

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शिल्पवाद - कुमार अम्बुज

(8 अप्रैल, 2025)

अति सर्वत्र वर्जयेत

समुचित तापक्रम तो ज़रूरी है, शिल्प का बुख़ार चढ़ आना स्वास्थ्यवर्धक नहीं। यह बुख़ार लम्बे समय तक रहे तो शिल्प-सन्निपात का दौरा पड़ जाता है, दिन-रात शिल्प-शिल्प की बड़बड़ाहट शुरू हो जाती है। फिर भी परवाह न की जाए, ख़याल न रखा जाए तो यह शिल्पोमेनिया में बदलकर लाइलाज गति को प्राप्त होता है।

इस मेनिया के विस्तृत लक्षणों को लिखने की ज़रूरत नहीं क्योंकि वह भी शायद कुछ अति हो जाएगी।

(शिल्प सम्बन्धी यह तीसरी और अन्तिम पोस्ट।)

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