मन्नू भंडारी के जन्मदिवस के अवसर पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनकी आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ का एक अंश।
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लेखन एक अनवरत यात्रा—जिसका न कोई अन्त है, न मंज़िल। बस, निरन्तर चलते चले जाना ही जिसकी अनिवार्यता है, शायद नियति भी। हर रचना एक पड़ाव, जिसमें यहाँ तक पहुँचने के सुख-सन्तोष से ज्यादा आगे जाने का उत्साह भरा रहता है। पर कभी-कभी यह क्रम उलट भी जाता है। अपने रचे का सुख-सन्तोष और उससे मिलनेवाला यश लेखक को एक ऐसी गहरी तृप्ति का बोध करा देता है, जिससे आगे जाने का यह उत्साह लौट-लौटकर मुग्ध भाव से अपने रचे के इर्द-गिर्द ही चक्कर लगाने लगता है।
पिछले दस वर्षों में अपने मन की दस पंक्तियाँ भी न लिख पाने के पीछे कहीं यही कारण तो नहीं? नहीं, बहुत ईमानदारी से मन का कोना-कोना टटोलकर देख लिया...आत्ममुग्ध तो क्या, मैं तो अपने लिखे को लेकर कभी आत्म-तुष्ट भी नहीं हो पाई। भरपूर आत्म-तोष देनेवाला कुछ लिखा ही नहीं...न स्तर की दृष्टि से, न परिमाण की दृष्टि से। तब? क्या मेरे सरोकार और प्राथमिकताएँ बदल गईं? लेकिन प्राथमिकता के क्रम में लिखना मेरा पहला और प्रमुख सरोकार तो कभी रह ही नहीं पाया।
बेटी और घर (जिसकी पूरी-पूरी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी) के साथ नौकरी (जो अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए अनिवार्य थी) के बीच में से ही लिखने के लिए समय और सुविधा जुटानी पड़ती थी और मैंने जो कुछ भी लिखा, इन सबके बीच ही लिखा, इनकी कीमत पर कभी नहीं लिखा। लेकिन पहले सभी स्तर पर संकट थे, कष्ट थे, समस्याएँ थीं, नसों को चटका देनेवाले आघात थे, पर उनके साथ लगातार लिखना भी था...जो भी, जैसा भी। आज ये सारी समस्याएँ-संकट समाप्तप्राय हैं पर लिखना तो बिलकुल ही समाप्त है। तो क्या संघर्षपूर्ण और समस्याग्रस्त जीवन ही लिखने की अनिवार्य शर्त है?
कभी-कभी सोचती हूँ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझमें लिखने के प्रति पहले जैसी निष्ठा या लगाव नहीं रहा! हो सकता है कि कारण यही हो; और है तो मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच भी नहीं। अच्छा है कि मेरे पास कोई ऐसा तर्क-कौशल या लेखकीय हुनर नहीं है जिससे मैं लेखन में आए इस ठहराव को भटकाव न मानकर कुछ सामान्य से कारण ढूँढ़ लेती और उस मानसिक यन्त्रणा और जानलेवा दंश से भी मुक्ति पा लेती जो इस स्थिति की अनिवार्य परिणति होनी चाहिए।
मेरे पास आज अगर कुछ है तो हर दिन के साथ बढ़ती छटपटाहट और लगातार रिसते-टूटते आत्मविश्वास की कचोट। आज मैं कितनी शिद्दत के साथ महसूस कर रही हूँ कि कलम और शब्द के साथ रिश्ता टूटते चले जाने की प्रक्रिया में कैसे ज़िन्दगी के साथ भी मेरा रिश्ता टूटता चला गया—कैसे मैं सबसे कटी-छँटी अपने में ही सिमटती-सिकुड़ती चली गई। लेकिन इतना सब होने के बावजूद लिखने की एक अव्यक्त-सी लालसा मन को बराबर कचोटती रही है और एक दिन इसी कचोट की मार से मैं घर की सामान्य-सी सुविधाओं में लिथड़ी, पर मन को निरन्तर कंगला और शरीर को रुग्ण बनाती, अपनी एक निहायत ही यान्त्रिक ढर्रे में ढली बेजान-सी ज़िन्दगी को छोड़कर उज्जैन चली आई—अकेली। एक प्रयोग यह भी सही।
लिखने का आधार बनाने के लिए ज़िन्दगी के टूटे-बिखरे और खोए सूत्रों को समेटने की प्रक्रिया में जाने क्यों अपने माली की एक बात याद आई। बिना स्थान, साधन-सुविधा और जानकारी के महज़ शौक के चलते मैंने अपने घर में थोड़े-से गमले लगा रखे थे और मुझे उनसे बहुत लगाव था। एक दिन देखा कि बिना मौसम और प्रत्यक्ष कारण के एक गमले की ढेर सारी पत्तियाँ झड़ गईं और दो-तीन दिन में ही वह पौधा चन्द पत्तियों के साथ टहनियों का एक झुंड-भर रह गया—मात्र ठूँठ, कुछ-कुछ मेरी ही तरह। माली ने देखा तो बड़ी बेरहमी से बची-खुची पत्तियों को भी नोच फेंका। मेरे मुँह से निकले “अरे-अरे” को सुनकर बड़ी सहजता से उसने अपनी भाषा में कहा, “इन पत्तियों को तो अब झड़ना ही होगा, इनसे मोह रखकर अब काम नहीं चलेगा, क्योंकि ये अब जान नहीं देनेवाली इस पौधे को...अब तो जड़ को देखना होगा, ” और उसने गमले की मिट्टी उलट दी। गमले की निचली गहराई से निकला जड़ों का गुच्छा...मिट्टी में लिथड़े, एक-दूसरे से उलझे अनेक रेशे। जो रेशे सड़े-गले थे और जिन्होंने पौधे की जीवनी-शक्ति को कुन्द कर दिया था, उन्हें बड़ी निर्ममता से उसने तोड़ फेंका। जो स्वस्थ थे, उन्हें साफ़ करके सहेजा-सँवारा, इन्हीं से अब पौधा रस ग्रहण करेगा, फलेगा-फूलेगा—वह पूरी तरह आश्वस्त था। तो क्या अपने को पुनर्जीवित करने के लिए मैं भी अपनी जड़ों की ओर लौटूँ, सारे सड़े-गले रेशों को उखाड़कर, उन रेशों को देखूँ-परखूँ, सहेजूँ-सँवारूँ, जिनकी जीवनी-शक्ति ही मुझे यहाँ तक लाई? उन्हीं का एक ऐसा अनवरत सिलसिला तलाश करूँ जो बेजान हो आए इस पौधे में भी शायद जान फूँक सके।
आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखना सहायक ही नहीं, कभी-कभी अनिवार्य भी नहीं हो जाता? यादों की, घटनाओं की, स्थितियों की न जाने कितनी छोटी-छोटी पोटलियाँ खुँसी मिलेंगी जो जरा-सा स्पर्श पाते ही अपनी पूरी जीवन्तता के साथ आ खड़ी होंगी। न जाने कितने पात्र अपने व्यक्तित्व के पूरे निखार के लिए अनुकूल घटनाओं की, तो न जाने कितनी घटनाएँ अपने सारे अर्थ उजागर करने के लिए अनुकूल पात्रों की माँग करतीं—आपको उकसातीं, प्रेरित करतीं या फिर आज की स्थितियों में नए सन्दर्भों की माँग करतीं आपके सामने आ खड़ी होंगी—एक चुनौती बनकर। एक बार पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ इन सबसे जुड़कर देखा तो जाए। कौन जाने, इन ठूँठ जैसी टहनियों में भी कुछ अंकुरित होने की प्रक्रिया शुरू हो जाए!
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