हमारे शेखर दा यानी हिमालयविद्, इतिहासकार और यायावर प्रो. शेखर पाठक से अपनी किसी रचना पर त्वरित किंतु आलोचकीय दृष्टि से भरी, ऊष्मित-आत्मीय टिप्पणी लिखित रूप में पा लेना विरल है। मेरे सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘भूतगाँव’ पर उनकी यह टिप्पणी ई-मेल पर प्राप्त हुई। बाहर की वर्षा के बावजूद भीतर जो सूखा पड़ा हुआ था, अब तर-बतर हूँ!
— नवीन जोशी
***
प्रिय नब्बन,
कल हल्द्वानी पहुँचकर ‘भूतगाँव’ पढ़ना शुरू किया और एक गो में अभी शाम को पारायण कर लिया। उपन्यास पूरा हुआ और बाहर हवा तूफ़ान और बारिश थी। लगा यह कहानी के हिस्से के रूप में हो रहा था। जैसे आनंद सिंह के एकमात्र साथी शेरू को बाघ द्वारा उठाने के बाद प्रकट उसके पागलपन को पिघलाने की कोशिश में प्रकृति उमड़ पड़ी हो! मीरा और विनायक अपने चाचा को तब पाते हैं जब वह फ़ौजी अपने अकेले साथी शेरू के गम में पागल हो गया है। मेरी आँखें भी भर-सी आयीं। शायद विनायक और मीरा भीतर से भीग गए थे।
‘कहानी बाँध के रखती है और पाठक खो-सा जाता है। निर्मम भी पिघल पड़ता है। भावुकता और उदासी के हिस्से कितनी तरह के क्लाइमैक्स और एंटी क्लाइमैक्स निर्मित कर जाते हैं। सिर्फ़ मन और अंतर्मन के ही नहीं, समाज और स्थानीयता और प्रदेश के भी । निरीहता और विडंबना के भी। अभिशाप और राक्षसपने के भी।
वीरेंद्र और हीरा की सहज स्वाभाविक प्रेम कहानी कैसे जाति दंश से ध्वस्त हो जाती है। पर माथुर दम्पति उनको एक रास्ता तो दे ही जाते हैं। वीरेंद्र और मधुमिता की कहानी दोनों के सयाने और अनुभव संपन्न हो जाने के बाद की है तो उसमें मानवीय ऊष्मा और गरिमा है, पर वह भी वीरेंद्र के जाति दंश और पुरुष सत्ता के पागलपन को जरा भी पिघला नहीं पाती है। उसे अपने परिवार की बर्बादी का एहसास भी शायद नहीं रहा और न एकदम पारदर्शी हीरा के प्रेम के बराबर वह खड़ा रह सका। उससे उसका भाई आनंद ज्यादा दमदार निकला जो एक अनंत नायक की तरह बाघ से ही नहीं उस मारक एकान्त और घातक मनोविज्ञान से भी लड़ता रहा जिसे उसने नहीं उसके समाज, पिता और बड़े भाई ने रचा था।
आनंद ‘ओल्ड मैन एंड सी’ के नायक की तरह लगता है जो उस डरावने समंदर से जूझता है जो जाति व्यवस्था, पुरुष सत्ता और उसके बाप-भाई ने पिछली पीढ़ियों से ढोया है। एक अंधकार और जबरन प्रतिष्ठा पाए हुए सामाजिक कूढ़े को चुनौती देने का साहस उनके समाज में नहीं था, नहीं है। कुछ ऐसा कर पाते हैं और उसे निभा और भी कम पाते हैं। वीरेंद्र का प्यार उसकी जातिदंशता के नीचे दब गया और उनकी संततियाँ इस जातिदंशता को तब समझी जब उसके सभी शिकार दुनिया से जा चुके थे। हीरा अपना अपराध कभी नहीं समझ सकी, जो दरअसल उस पर थोपा गया था।
इस कहानी में जातीय कट्टरता और पुरुष सत्ता दोनों को चुनौती मिली है। हालांकि दोनों हार नहीं सके हैं, मगर वे जीते भी नहीं हैं। विनायक-मीरा ने इन दोनों से मुक्ति पाई है। यह हीरा और वीरेंद्र के प्यार की जीत है पर उनकी हार भी। यह पलायन से आगे मानवीय संबंधों की भी कहानी है। अप्रत्याशित, असहज पर कृत्रिम नहीं। आनंद भी अपनी लड़ाई में जीता है हार जाने के बावजूद।
भूतगाँव जितना पलायन से उजड़ा उससे ज्यादा जाति दंश और मर्द सत्ता की संयुक्त शक्ति से। पता नहीं कुछ ज्यादा ही तो नहीं कह रहा हूँ। शायद यह भी कम है। लच्छू कुठयारी की संतानें हर दौर में होती हैं। लेकिन हमारे दौर में वे सत्ताशीन हैं। वे हमारे अपने समाज के प्रतिबिम्ब के जैसे भी लगते हैं, बल्कि हैं।
मेरी आँखों में अब नींद आ रही है तो मैं चनर राम और उसके शेष कुनबे के बारे में ही सोच रहा हूँ। हीरा के साथ जो वीरेंद्र ने किया उससे ज्यादा उसके बाप ने हीरा के परिवार के साथ किया होगा। अब यह भी लगता है कि गाँव में कंपनी का आगमन मामूली पलायन से आगे एक वैश्विक संकट के हिस्से की तरह लगता है। पर यह भी हमको जाति दंश और पुरुष सत्ता और उन अपमानों से मुक्त नहीं कर पायेगा, जो इस समाज से हमने विरासत में पाया है।
प्यारे नब्बन, एक और धड़कती रचना हमको देने के लिए तुमको बधाई और एक पुच्च।
अब तो आधी रात होने को आई। पता नहीं आज आनंद सिंह क्या कर रहा होगा शेरू के बिना!
— शेपा
[नवीन जोशी का उपन्यास 'भूतगाँव' यहाँ से प्राप्त करें।]