निर्मला जैन से जुड़ी यादें… बातें…

निर्मला जैन को कुछ इस तरह याद किया उषा प्रियम्वदा ने

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ज़िन्दगी के सफ़र में जिनका इतना लम्बा साथ रहा, 1956 की जुलाई से लेकर अब तक, उनका जाना कैसा लगता है? हम कितने निकट थे, एक-दूसरे के साथ वह सब साझा करते, जो दुनिया की नज़र से ओझल रहता था। उन्हें मुझे लेकर चिन्ता रहती थी, कहती थीं, तुम्हें समझ नहीं है, सब पर भरोसा कर लेती हो, याद क्यों नहीं रखती कि सभी तुम्हारे शुभचिन्तक नहीं हैं। उन्होंने दुनिया देखी थी, उसकी उठा पटक से परिचित थीं। और उनमें सबसे बड़ा गुण था कि यद्यपि वह उपन्यास लिखने की इच्छा रखती थीं, मगर मुझे प्रमोट करती थीं। मैं उनकी हर बात आँख मींचकर मान लेती थी। 

जब आकाशवाणी ने ‘पचपन खम्भे’ बनाने की अनुमति माँगी तो मुझे उन्होंने ही कहा कि मालूम नहीं कैसी बनेगी मगर परमिशन दे दो। वह कन्सल्टंट भी रहीं और मीता ने उनकी कई साड़ियाँ भी उस सीरीयल में पहनी। यह सीरियल बहुत पॉपुलर हुआ। कोविड के दौरान प्रसार भारती ने उसे दोबारा प्रसारित किया तो एक नई पीढ़ी ने उसे देखा। उसका श्रेय मैं निर्मला जी को ही देती हूँ।

हम दोनों ने अपनी अपनी ज़िन्दगी के सभी मीठे अवसरों को साझा किया था, उनके दोनो बेटों के विवाह में में शामिल हुई थी। जैन साहब बहुत कोमल और केरिंग व्यक्ति थे। उनके जाने के बाद निर्मला जी ने जिस साहस से अपने को और परिवार को सम्हाला वह भी मेरे लिए एक उदाहरण बना।

यह कहने के बाद कि एक-एक करके सब मित्र चले गए, भारतभूषण अग्रवाल से लेकर अजित, स्नेहमयी, राजेंद्र और नामवर जी, वे बहुत अकेली हो गयीं थीं। मेरा भी भारत आना कम हो गया। फ़ोन लेना उन्होंने काफ़ी दिनों से बंद कर दिया था। वह चली गयी हैं, मगर उनके स्नेह और ममत्व भरी उपस्थिति मेरे जीवन में हमेशा बनी रहेगी।

उषा प्रिंयवदा