जैसे सतपुड़ा की मिट्टी को हथेली पर रखकर देखना

लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा ‘जब से आँख खुली है’ की समीक्षा

समीक्षक : जयप्रकाश मानस

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जैसे सतपुड़ा की मिट्टी को हथेली पर रखकर देखना

लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा ‘जब से आँख खुली है’ को पढ़ना जैसे सतपुड़ा की मिट्टी को हथेली पर रखकर देखना है, जहाँ मिट्टी की गंध, गोंडी गीतों की लय और एक बच्चे की आँखों का पानी है।

मंडलोई की आत्मकथा कोई किताब नहीं, गुढ़ी गाँव की धूल है, जो हवा में उड़ती है और आँखों में बस जाती है।

सतपुड़ा की घाटियों में 1953 में एक बच्चा पैदा हुआ, जिसके लिए माँ की साड़ी में धूल थी, और उस धूल में दुनिया। मंडलोई लिखते हैं—“माँ की आवाज़ गोंडी थी, पर मेरे लिए मिट्टी बोलती थी।” देखने में यह वाक्य हल्क़ा-सा है, जैसे हवा में पत्ता, पर उसमें जड़ों का वज़न है। गोंडी, मालवी, हिन्दी—ये शब्द नहीं, पसीने की गंध हैं, जो मिट्टी से उठती हैं। 

भूख थी, अभाव था, पर मंडलोई कहते हैं—“मैं ग़रीबी में अमीर था।” यही जादू है—बहुत साधारण में असाधारण देखना, जैसे कोई बच्चा स्लेट पर लिखे अक्षर को चाँद समझ ले। “आँख खुली, और मिट्टी बोली,” यह आत्मकथा का दिल है, जो हर उस इंसान का है, जो अपनी मिट्टी को सुनता है।

सुगंधों का संसार

मंडलोई का बचपन गंधों-सुगंधों का घर है। माँ के पसीने की गंध, गाय की सार की गंध, सतपुड़ा की हरी हवा की गंध। गंध केवल नाक तक नहीं, मन तक जाती है। गाय की घंटी रात में टुनटुनाती थी, और भूख हल्की हो जाती थी। मंडलोई लिखते हैं—“गाय ने हमारी तकलीफ़ देख ली थी।” जैसे कोई पेड़ चुपके से इंसान से बात कर ले। माँ की साड़ी बरगद की छाँव थी, बाबूजी की सख़्ती में सपने लटके थे। दोस्त रमेश नदी किनारे पत्थर फेंकता, “पत्थर पानी को चूमता है, पानी हँसता है।” यह गद्य की शक्ल में दरअसल पद्य है, जो मन में चमक बन जाती है। 

माँ की हथेलियाँ सख़्त थीं, कुदाल से खुरदरी, पर उनकी छुअन में जादू था। बच्चा चुभन भूल जाता, जैसे हल्का होकर उड़ जाता। गाँव के मेले में बूढ़ी औरत के गोंडी गीत ‘पेड़ बन गए,’ और मंडलोई की स्मृति में जड़ें गहरी हो गईं।

रज्जो : भूख की चमक

रज्जो आत्मकथा में चमकती है, जैसे विनोद कुमार शुक्ल की कहानियों में कोई साधारण लड़की अनंत हो जाए। मंडलोई लिखते हैं—“रज्जो के घर भूख नाचती थी।” यह भूख कोई भूख नहीं, कोयलांचल की हक़ीक़त है, जो तांडव करती है। 

रज्जो आटा खाती, चने चबाती, और उसकी आँखें पत्थर-सी चमकती थीं, जो पानी को चूमकर हँसता है। “उसे आटा खाते देखकर दया नहीं आई, प्रेम उमड़ा।” फारूक, जुग्गू—ये दोस्त स्मृतियों में बसते हैं। परसादी के जंगल में महुए की गंध थी, मस्ती थी, जो खेल बन जाती थी। मंडलोई की मिट्टी, नीम का झोंका, पिता का पेड़—ये सब मन की महाकविताएँ हैं। “मैं उसे हवा से बचाता हूँ, ताकि जुगनू-सी रोशनी दे सकूँ,” यह उनकी संवेदना है, जो जल की तरह बहती है।

स्लेट पर लिखा चाँद

मंडलोई का स्कूल पेड़ों के नीचे था, जहाँ स्लेट और पट्टी दुनिया थी। मजदूर माँ-बाप का बेटा, शर्म और डाँट के बीच पढ़ता था। किताब-कॉपी नहीं थी, पर माँ का चेहरा और बाबूजी का विश्वास था। यह संघर्ष छोटा-सा लगता है, पर उसमें ज़िंदगी की गहराई है। 

बोरे के टुकड़े पर बैठकर पढ़ना, टाट-पट्टी की मनाही—ये दृश्य ग़रीब भारत की करुण चित्र हैं, जहाँ हम अपेक्षा करते हैं कि बच्चा स्लेट पर लिखते हुए चाँद देखने का पाठ समझ जाए। इमली का स्वाद दोस्ती है। जया, रज्जो, कस्तूरी की “अ-हा-ओ-ए-ई” मासूमियत है, जेठ माह के झरने-सी हँसी देती है। महुआ का फूल गरीबों का दोस्त था, जो मंडलोई की गंध में डूबा है।

जुग्गू : जीवों का साथी

जुग्गू की गायें—जुग्गी, जुम्मी, जोगिया—उसके हाथ को जानती थीं। जुग्गू ने मंडलोई को गायों की प्रजातियाँ, जड़ी-बूटियाँ सिखाईं। “जुग्गू न होता, तो मैं कुछ और होता।” कबूतर की गुटरगूँ, गौरैया की चहक, घायल तोते की देखभाल—ये क्षण जैसे किसी कविता में बंधे हों, जो छोटी बातों को बड़ा बना देती है।

फारुख : दाल की कोमलता

फारुख और उसकी अम्मी की यादें कोमल हैं। अम्मी ने दाल बनाना सिखाया, सब्ज़ी काटना सिखाया, बिना दीवारों के। मंडलोई लिखते हैं—“फारुख की धँसी आँखें कंचों की तरह चमकती थीं।” खोया कंचा, जो स्मृति में चमकता है। अम्मी की दाल, गाँव की गलियाँ, माँ की लोककथाएँ—ये स्मृतियाँ विशुद्ध कविताएँ हैं, जो हल्क़े से मन को छूती हैं।

कविता का ठहरा जल

मंडलोई की आत्मकथा एक परिचित जंगल है, जहाँ स्मृतियाँ पत्तों-सी झरती हैं। हिन्दी आत्मकथाएँ तारीख़ें गिनती हैं, पर मंडलोई का रास्ता नदी का है—वह बहती है, ठहरती है। “कोयले की धूल मेरे फेफड़ों में थी, पर उसकी चमक ने आग सिखाई”—जैसे दुख में रोशनी। किताब ग़रीबी में कविता रचने की सीख देती है। यह समाज की पुकार है, जो अपनी सादगी में छिपी है।

हवा की खुली खिड़की

किताब बंद होती है, पर सतपुड़ा की हवा बनी रहती है। गोंडी गीत, माँ की साड़ी, महुए की गंध—ये सब मन में ठहर जाते हैं। यह आत्मकथा रज्जो की भूख, जुग्गू की गायों, फारुख की दाल को समझने वालों के लिए है। मंडलोई की यह कृति जैसे ग्रीष्म काल में हरियल पेड़ है, जिसकी छाँव में मिट्टी की बोली सुनी जा सकती है।

 

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