मालूम होता है कोई मास्टर मर गया है!

नन्ददुलारे वाजपेयी की जयशंकर प्रसाद पर केन्द्रित पुस्तक का वह अंश जिसमें प्रेमचंद की अन्तिम-यात्रा का प्रसंग है। 

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गत वर्ष जब प्रेमचन्दजी हिन्दी-संसार को सूना करके जा रहे थे, तब उनके साथ श्मशान तक प्रसादजी भी गए थे और मैं भी गया था। अर्थी काशी की गलियों से होकर जा रही थी, इतने में किसी ने वहीं की बोली में कहा—“मालूम होता है कोई मास्टर मर गया है।” बात यह थी कि अर्थी के साथ थोड़े से पढ़े-लिखे लोग थे, कोई भीड़ न थी, और ‘राम-नाम सत्य है’ की आवाज़ भी वैसी नहीं हो रही थी। ऐसी अवस्था में कोई मामूली मास्टर ही मर सकता था, और कौन मरता!

स्पष्ट ही मुझे उसकी वह बात अच्छी नहीं लगी और मैं कुछ गम्भीर-सा बन गया। अर्थी चली जा रही थी और हम लोग उसके पीछे चल रहे थे। इतने में देखता क्या हूँ कि प्रसादजी ने मेरे कन्धे पर हाथ रख दिया है और कान से लग कर धीरे-से, किन्तु अपनी सुपरिचित मुस्कान के साथ कह रहे हैं—“बाजपेयीजी, ई का कहि रहा है, कुछ समझ में आवता है?” प्रसादजी को जब विनोद करना होता, तब वे इसी प्रकार खड़ी बोली को जरा टेढ़ी-मेढ़ी कर दिया करते थे।

मैं अपनी वही फिलासफ़ी सुनाने को हुआ, यह कि आज किसी दूसरे देश का इतना बड़ा व्यक्ति उठ गया होता, तो क्या दृश्य होता, कोई यह कैसे कह सकता कि कोई मास्टर मर गया है सिर्फ़; यह मैं कह रहा था कि प्रसादजी ने बीच ही में बात काट दी। कहने लगे—“अरे यार तुम कुछ समझते नहीं हो, का नाम के बीच मा, यहै बनारसी रंग आय।” जब कभी प्रसादजी की इच्छा होती, बहुत प्रसन्न होते, मुझसे कानपुर की बोली में बातें करते। वे स्वयं उसी प्रान्त के मूल निवासी थे, यह भी झलक उनकी बोली में रहती।

मेरी उदासी कम हुई। मैंने यह समझा कि उसने मास्टर के मरने की बात किसी तुच्छता के विचार से नहीं कही। वह अपने किसी काम में लगा हुआ था। जो बात स्वाभाविक उसके मन में आई, वही उसने कही। इसमें मेरे लिए गम्भीर होने की कोई बात नहीं थी। लाखों मनुष्यों का किसी मनुष्य के मरने पर काम-धाम छोड़ कर तन्मय हो जाना, कुछ बहुत आवश्यक नहीं; न मरनेवाले की महत्ता ही इससे प्रकट होती है कि उसकी अर्थी के साथ कितने अधिक व्यक्ति थे, न इससे मृत व्यक्ति को कुछ सुख है, न कुछ लाभ। देखने की बात तो यह है कि किसी ने अपने जीवनकाल में क्या किया। अपने जीवन से स्वयं उसको कितना संतोष या पछतावा रहा और दूसरों के लिए वह क्या छोड़ गया? यही दो मुख्य बातें किसी के जीवन का महत्त्व निर्णय कर सकती हैं। 

काल इतना विशाल है और पृथ्वी इतनी विस्तृत है कि बड़े-बड़े सम्राटों की कीर्ति भी फीकी पड़ जाती है। जिनके जीवन और मरण के अवसर, एक ही साँस में, संसार को आनन्द के कोलाहल और शोक के सन्नाटे से भर सकते हैं, वे ही बड़े नहीं हैं। बड़े वे भी हैं, जिनका जीवन-दीप सूने में ही बुझ गया है, किन्तु जिनकी अमर ज्योति एक के पास से दूसरे के पास जाकर सबको आलोकित करेगी, धीरे-ही-धीरे सबके अनुभव में आएगी, सबको प्रकाश देगी। ये सब बातें उसी क्षण मेरे माथे में आ गईं और मैंने प्रसादजी की ओर हँस कर देखा और कहा—“सचमुच आप ठीक कहते हैं, यही बनारसी रंग है।”

प्रसादजी फिर मुस्कराए और बोले—“अब समुझ मा आवा, बनारसी रंग का आय?” 

मैंने कहा—“आवा समुझ मा।”

पर सच तो यह है कि प्रसादजी की बात मेरी समझ में फिर भी नहीं आई; क्योंकि मैं उसे समझना चाहता ही नहीं था। अथवा यह कहूँ कि मेरी समझ के परे उनकी बात थी। मैं तो भविष्य की बात सोच रहा था कि आगे चलकर प्रेमचन्दजी का सम्मान होगा, अभी लोग उन्हें मामूली मास्टर ही समझें तो समझ लें। पर प्रसादजी का यह मतलब बनारसी रंग से नहीं था। उनका मतलब तो यह था कि कोई किसी के मरने पर क्यों मातम मनावे। हम स्वयं कितनों के मरने की खबर रखते हैं? सब अपने-अपने काम में लगे हुए हैं, अपनी-अपनी धुन में मस्त हैं, यही अच्छा है। आनन्द तो अपने काम में अपनी कृति में है; दूसरी जगह उसे कोई कहाँ ढूँढ़े और ढूँढ़े भी क्यों? सब अपने में ही आनन्द पाते हैं। जिसको यह आनन्द उपलब्ध नहीं, वही उसकी खोज में इधर-उधर भटकेगा।

भविष्य की आशा भी एक प्रकार का भटकना ही है। मैं भी इसी में भटक रहा था और प्रसादजी की बात समझना नहीं चाहता था; पर प्रसादजी जैसे निर्मम और निर्लेप व्यक्ति का वैसा कहना स्वाभाविक ही था।

जो कोई किसी की आशा करता है, वह अपने साथ प्रवंचना करता है। जो भविष्य पर आस्था रखता है, वह अपने अन्तःकरण की दुर्बलता प्रकट करता है। जो अपनी कृति पर अविश्वास करेगा, वही अपनी कीर्ति चाहेगा। जो अपनी करनी से प्रसन्न नहीं है, संसार में उसे कभी प्रसन्नता नसीब न होगी। बनारसी रंग से प्रसादजी का एकमात्र यही आशय था; किन्तु मैं इसे समझना नहीं चाहता था। दुर्बलता तो मेरे अन्दर थी।

मैंने प्रसादजी का सदैव यही बनारसी रंग देखा। बाहर से उनका व्यक्तित्व देखकर कोई उनकी मुस्कान से मुग्ध होता, कोई उनकी व्यवहार-पटुता और मैत्री से मोहित होता। किन्तु उनके इस दिव्य, किन्तु मोहक वाह्य के भीतर जाकर अपनी ही कृति में आनन्द माननेवाले, कीर्ति की लिप्सा न रखनेवाले, भली-बुरी समीक्षाओं से समान रूप से तटस्थ रहनेवाले निस्पृह तथा दिव्यतर प्रसादजी को बहुत कम लोगों ने देखा। मैं जब उन्हें पहचानने के योग्य हो रहा था, इतने में वे स्वयं ही न रहे।

मेरे पास प्रसादजी के जाने कितने संस्मरण हैं, कितनी स्मृतियाँ हैं। अपने जीवन का कितना आनन्द मैंने उनके सम्पर्क से प्राप्त किया, मैं नहीं कह सकता। उसे कहना उसका मूल्य घटाना होगा; पर, एक बात मैं बिना कहे नहीं रह सकता। प्रसादजी अपने युग के सबसे बड़े पौरुषवान् कवि थे। मैथिलीशरणजी का काव्य करुणा के रंग से ओत-प्रोत है, शक्ति का संकल्पात्मक स्त्रोत उसमें उतना नहीं। 'प्रियप्रवास' के हरिऔधजी के संगीत में पौरुष है; किन्तु अपने समय की संकोचशील प्रवृत्तियों की छाया भी उसमें पड़ी हुई है। 'निरालाजी' का पौरुष नारी के स्नेह से ही नहीं, सम्मान से भी सम्बद्ध होने के कारण 'रोमैण्टिक टाइप' का है। श्री सुमित्रानन्दन पंतजी के काव्य में (मेरा मतलब उनके सर्वश्रेष्ठ 'पल्लव' काव्य से है) बाल्यसुलभ स्निग्धता और निर्मलता है; किन्तु प्रसादजी का काव्य शक्ति और एकमात्र शक्ति की साधना का एक अविरल प्रवाह है। उनके पुरुष और उनकी नारियाँ दोनों ही इसी शक्ति की साधना में तन्मय हैं। इसीलिए मैं प्रसादजी को हिन्दी का सबसे प्रथम और सबसे श्रेष्ठ शक्तिवादी और आनन्दवादी कवि मानता हूँ। 

प्रसादजी का साहित्य सौन्दर्य और कल्पना-प्रधान होता हुआ भी उनके काव्य-प्रतीक वास्तविक जीवन-रस से अभिषिक्त है। जीवन से वैराग्य, तटस्थता और निषेधों का प्राबल्य हम उनमें कहीं नहीं पाते। छायावाद, जिसके ये आविर्भावक थे, उनकी पुरुष-वृत्ति का साधक हुआ है। नारी और पुरुष दोनों में शक्ति की एक ही तरंग समान रूप से भरने के कारण प्रसादजी में किसी प्रकार का मानसिक स्खलन या दुर्बलता नहीं दीख पड़ती। स्वस्थ स्त्री और पुरुष जैसे और जो कुछ होते हैं, वही प्रसादजी के काव्य में हैं। और उनके चित्रण में भी प्रसादजी मनोवैज्ञानिक यथार्थता की ओर निरन्तर बढ़ते गए हैं, जिसका विकास उनके अन्तिम काव्य-ग्रन्थ 'कामायनी' में बड़े उत्तम रूप से हुआ है।

प्रसादजी और प्रेमचन्दजी एक दृष्टि से एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रेमचन्द का साहित्य मुख्यतः दुःख के आधार पर स्थित है। दुःख का बोध करा देना ही शक्ति का स्रोत बहा देना है। उनका यही मूलमन्त्र था। (यद्यपि दुःख या दैन्य का परिचय कराने में वे सब जगह सफल नहीं हुए) प्रेमचन्दजी ने आनन्द के विधानात्मक पक्ष की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत प्रसादजी संस्कृत और स्वस्थ नारी और पुरुष की शक्ति का रहस्य हो प्रकट करते रहे। शक्ति का परिचय करा देना ही दुःख का उच्छेद कर डालना है। उनका यही विधान-पक्ष था। जहाँ तक रूढ़ि है, वहाँ तक शुद्ध शक्ति नहीं है, इसलिए प्रसादजी रूढ़ियों का तिरस्कार करके एकमात्र शक्ति के ही साधक हुए। इस साधना में उनके समान सफल साहित्यकार मुझे इस युग में कोई दूसरा नहीं दिखाई देता। भारतवर्ष के इने-गिने आधुनिक श्रेष्ठ साहित्यकारों में प्रसादजी का पद सदैव ऊँचा रहेगा, इसमें तो सन्देह ही क्या है; किन्तु मुझे कहना यह है कि अपने उद्देश्य के प्रति ऐसी एकनिष्ठा मैंने किसी आधुनिक कलाकार में नहीं देखी। इसे आप बनारसी रंग कहें, या काशी की महिमा कहें, या 'प्रसादजी' की अपनी सूझ कहें, संस्कृति कहें, जो कुछ चाहें, कहें।

आज वह बनारसी रंग कहाँ है, वह काशी की महिमा कहाँ है, शक्ति का एकनिष्ठ उपासक वह आधुनिक शैव कहाँ है? हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ नेता, मेरे सम्मानित मित्र 'प्रसादजी' कहाँ हैं? हार मानकर कहना पड़ता है, 'प्रसादजी' अब नहीं रहे।

नवम्बर, 1937

 

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