जब 20 लाख मज़दूरों ने देशभर में थाम दिए थे ट्रेनों के पहिए

मई 1974 में हुई भारतीय रेलवे हड़ताल देश की अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल थी, जिसमें करीब 20 लाख कर्मचारियों और मज़दूरों ने बेहतर काम-काज की शर्तों और अपने अधिकारों के लिए ट्रेनों के पहिए थाम दिए थे। गौतम चौबे का उपन्यास ‘चक्का जाम’ इसी पृष्ठभूमि पर लिखा गया है, जो उस दौर के सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत संघर्षों को बारीकी से दर्शाता है। यह उपन्यास स्वतंत्रता के बाद के भारत में समाज और सरकार के रिश्तों को उजागर करता है, साथ ही मध्यम वर्ग की चुनौतियों, पलायन की पीड़ा और जातीय व्यवस्था की जटिलताओं को भी सामने लाता है। वरिष्ठ साहित्यकार त्रिपुरारी शरण ने इसके लोकार्पण कार्यक्रम में कहा था, “यह उपन्यास 1974 की रेलवे हड़ताल का एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ है।” राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, इस उपन्यास का अंश।

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मई आते-आते आन्दोलन नित नये रंग बिखेरने लगा। किसी दिन गिरिडीह में भ्रष्ट अधिकारियों पर जन-मुक़दमा चलता तो किसी दिन पटना के अदालतगंज से कदमकुआँ तक मशाल जुलूस निकलता। किसी दिन हज़ारीबाग़ में औरतें छात्रों के लिए सत्याग्रह करतीं तो किसी दिन फ़ंड जुटाने के लिए अहिला में कीर्तन होता।

और अब पिछली शाम से ही रेलवे-हड़ताल की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। धनबाद में तो उपद्रव का शुभारम्भ भी हो चुका था। एक कर्तव्यनिष्ठ सुपरवाइजर की कसकर धुलाई हुई थी। उस बेचारे का बस इतना अपराध था कि उसने ऑफ़िस प्रांगण में मीटिंग कर रहे हठी कर्मचारियों को उन्हीं का माइक छीनकर गरिया दिया था। प्रशासन ने अपने वफ़ादार से वफ़ादारी की और उद्दंड कर्मचारियों को त्वरित प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। लेकिन जब इसकी ख़बर पास के कोयला खदान-मज़दूरों तक पहुँची, तो उन्होंने भी समर्थन में फावड़ा फेंक दिया।

पटना-रेडियो से घोषणा हुई थी कि हड़ताली बख़्शे नहीं जाएँगे। होमगार्ड से लेकर बीएसएफ तक, सबको चौकन्ना कर दिया गया था। ख़बर यह भी थी कि अधिकारी घर-घर घूमकर कर्मचारियों को चेता रहे हैं। उनके परिवारवालों को भी हड़काया जा रहा है। 

इधर पिता जी की चिन्ता दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी। वे जानते थे कि क्रान्तिकारी हवा किसी महामारी की तरह फैलती है। कितनी मुश्किल से देव की नौकरी लगी थी, जो अब पक्की होने वाली थी। एक दर्दनाक दौर के बाद परिवार की स्थिति थोड़ी सुधरने वाली थी। लेकिन पिछले डेढ़ महीने के घटनाक्रम से पिता जी सकते में थे। बेटे का ज़ख़्मी होना, बहू का यूँ आन्दोलन से जुड़ना। और देव का अपनी पत्नी की इस उद्दंडता को मौन समर्थन। कहीं पटना से गाँव आई ये उपद्रवी बयार देव को कोयलाडीह में भी घेरे न रखे।

हालाँकि सरकारी नौकरी की अहमियत पर वे अनन्त भाषण दे चुके थे। “रेल जागृत आत्मा है। समर्पण माँगती है,” यह बारम्बार समझा चुके थे। लेकिन अब स्थिति हद पार करने वाली बनती जा रही थी। पारम्परिक दलीलों और सामान्य अनुनय से काम चलने वाला नहीं था। मौक़ा देखकर उन्होंने देव को अपने पास दालान में बुलाया, वहाँ लगे बेंच पर बिठाया और फिर अपना ब्रह्मास्त्र निकाला—रंगून की एक और कहानी। लेकिन इस बार वहाँ जाने की नहीं, वहाँ से लौटने की।

“बुढ़ापा में जेल जाना पड़ेगा क्या?”

“हम समझे नहीं पिता जी?”

“मंत्री बोल रहा है कि आन्दोलन करने वाला आदमी का परिवार भी धराएगा।” 

“हम भी सुने हैं। लेकिन पटना का छात्र-नेता सब इसका विरोध किया है। जेपीओ इसको गलत बोले हैं। हमारा विचार है कि सरकार बेफालतू में हड़का रहा है।” 

“विचार तुम्हारा है या तुम्हारी मेहरी का?”

“जी”, देव इस बेबाक सवाल के लिए तैयार नहीं था। 

“हम भी बहुत जुलूस देखे हैं। तुमसे बहुते ज्यादा। जब आन्दोलन का बोखार उतरेगा, बदन पर बिस्टी भी नहीं बचेगा। आज जो नेता है वो बनेगा मंत्री, और मंत्री का साला पाएगा सरकारी नौकरी। समझे?” 

“पर हम क्या किये हैं पिता जी?”

“यहाँ जो किये, सो किये। अब हड़ताल शुरू होने से पहले नौकरी पर लौटो। पहले कमा लो पैसा-कौड़ी, फिर करना दौड़ा-दौड़ी।”

“जी।”

“और हड़ताल-फड़ताल से दूर रहना है। चाहे कितना भी चक्का जाम हो, तुम्हारा चक्का चलते रहना चाहिए। समझे? 

“जी।”

“जानते हो, गोगोन मिस्तरी ‘रंगून गीता’ से खाली वो अध्याय सुनाता था जिसमें सब अच्छा बात लिखा होता था। गाँव में सबको लगता था कि गोगोनवा झूठ बोल रहा है। सब कहते थे कि वो लालच देकर रंगून भेज देगा, फिर जीवन भर बेगारी करना पड़ेगा। डर हमको भी था। फिर भी हम वहाँ गए कि नहीं?”

“जी।”

“एक टाइम हम फूचांग में रहते थे। भोजपुरिया बिरादरी का बिसाल बस्ती था। लगता था शाहाबाद में आ गए हैं। खेती का काम था। जीवन बढ़िया चल रहा था। फिर एक रात बस्ती पर शान डकैत का हमला हुआ। पुलिस जैसा खाखी पहने, हाथ में डाह लिये। लूटा कम, काटा ज्यादा। क्या लेडीज, क्या बच्चा। हिन्दुस्तानी आदमी पर उन लोग का बहुत गुस्सा था। हमारा रूममेट भी मरा गया। और हम? हम वही पुआल में लुकाकर सबको कटते देखते रहे। साँस दाबकर।”

देव चुपचाप सुन रहा था।

लेकिन रामजीवन फिर भी नहीं लौटे। काम करना था, पैसा कमाना था। वे फूचांग से दोबारा रंगून गए। और फिर एक बार दंगे में फँस गए। इस बार और भी भयानक दंगा। बस भर-भरकर उपद्रवी आए, कोरिंघी लोगों को मारने। झंडा, डाह, रिक्शा का लोहा, जो मिला उसे ही औज़ार बना लिया।

“पूरा शहर में आग लगा था। एकठो अखबार था—दी सन—उसको भी जरा दिया। पुलिस कमिशनर को भी मारा। फिर जब मशीनगन लेकर आर्मी आया—कैमरून हायलैंडर—तब कहीं जाके जान बचा। केतना लोग मराए। और यहाँ भी हम बस लुकाकर देखते रहे,” बताते हुए पिता जी का गला रुँध गया था। 

देव ने भी राँची और पटना में दंगे देखे थे। एक अख़बार का दफ़्तर वहाँ भी जला था। कुछ लोग वहाँ भी मरे थे। पर ऐसा बीभत्स दृश्य! 

“लेकिन उसके बाद भी हम आठ महीना और रुके। पैसा बचाए। उसके बाद कहीं जाकर वापस आए। तब कहीं जाकर जीवन शुरू होता है। तो बात ऐसा है कि घर चलाने के लिए आदमी को जानवर बनना पड़ता है। नेता नहीं।”

आदमी के जानवर बनने की कहानी देव ने पहले भी सुन रखी थी। 

***

हालाँकि वह कुछ दिन और रुकना चाहता था, पर पिता जी का आदेश स्पष्ट था। नौकरी पर लौटना था, अविलम्ब। वापसी वाले दिन सुबह-सुबह मोनू पहुँचा, हज्जाम वाला वही पुराना बक्सा लेकर। मोनू ने भी हड़ताल के विषय में सुन रखा था। वह दाँत चियारकर बोला, “लेकिन सुना है तुम लोग का लीडरवा मायानगरी का निवासी है। सावधान रहना। बाबूजी का बम्बई-यात्रा याद है न? हीरोईन का चक्कर वाला, वो होते तो तुमको जरूर चेताते।”

“आरे हम स्ट्राइक-वेस्ट्राइक नहीं करेंगे। परमानेंट होना है, स्लोगन नहीं सरियाना है।” 

“जानते हो, हम लोग का भी हड़ताल है। ऑल बिहार नाई संघ फैसला किया है कि कौनो भी विधायक का दाढ़ी-बार नहीं काटना है। जबले समाज से करप्शन का कम्पलीट उन्मूलन नहीं हो जाता है।”

“सही में?” देव ने हँसकर पूछा।

“बोल तो सहिए रहे हैं। लेकिन तुम कौन सा विधायक हो जो तुम्हारा बार नहीं काटेंगे?” एक ईंट पर बक्सा रखते हुए मोनू बोला। 

तीन साल पहले तक—जब उसके पिता कोतवाल ठाकुर बक्सा लेकर घूमते थे—मोनू भी सरकारी नौकरी की उम्मीद में पटना में डेरा डाले बैठा था। कम्पटीशन के नाम पर गाँव छोड़ने वाले छात्रों में वह सबसे पहला था। शुरू-शुरू में जब नेपाल पटना पहुँचा, तो मोनू ने ही उसे अपने साथ रखा था। दोनों मिलकर पढ़ते, घूमते, सिनेमा देखते। वह उम्मीदों का दौर था। गाड़ी पटरी पर थी। गन्तव्य की आहट मिल रही थी।

लेकिन फिर एक दिन कोतवाल ठाकुर गाँव की एक बरात में रोहतास गए और कभी नहीं लौटे। दो-एक बार दरभंगा में उनके दिखने की बात भी सामने आई, लेकिन गाँव में वे फिर कभी नहीं दिखे। संन्यास ले लिया, मरा गए, अपनी हीरोइन की खोज में असम चले गए—किसे पता?

“अब ई बक्सा हाथ में, और किस्मत का कनस्तर घूरा में पड़ा है,” देव के बालों को भिगोते हुए मोनू ने मुँह खोलकर एक गहरी बदबूदार साँस छोड़ी। 

“हमारा किस्मत का ट्यूबलाइट भी खाली भुकभुका रहा है। देख नहीं रहे हो?” देव ने अपनी कोहनी के सूखते घाव पर हाथ फेरते हुए कहा। 

“किस्मत तो अपना हाथ में नहिए होता है। और बियाह का बाद तो एकदम्मे नहीं। सब मेहरारू पर डिपेंड करता है।”

“ई तुमको कौन बताया?”

“बिलकुल करता है। प्रह्लाद भइया का हाल ले लीजिए। कितना बेजोड़ ज़िन्दगी था। काम-धन्धा चकाचक, किस्मत टनाटन। फिर बियाह कर लिये। कलकत्ता से मेहरारू लाए। एकदम टिप-टॉप। लेकिन सहर का सुग्गा गाँव में पोसाएगा जी? मेहरी इतना धूँसी कि सीधे लुधियाना भाग गए। अब अपना खेती छोड़कर कौनो सरदार जी के लिए मजूरी कर रहे हैं। पाँच साल से घर नहीं लौटे हैं। अब बताइए, मेहरारू किस्मत लेकर आती है या नहीं?”

प्रह्लाद की बीवी, जो वास्तव में मिदनापुर से आई थी, दिन-रात उच्च स्वर में कलकत्ता-राग अलापती रहती थी। उस शहर के कई रसूख़दार उसके रिश्तेदार थे, ऐसा वह कहती-फिरती। 

निस्सन्देह, ऐसे अभिजात परिवार की लड़की का अहिला जैसे गाँव में विवाह होना किसी त्रासदी से कम नहीं था। माधवी भी तो कई बार अपना दुखड़ा रो चुकी थी। प्रह्लाद का हाल सुनकर देव का चेहरा लटक गया। क़िस्मत पर कंट्रोल तो उसका भी नहीं था। भद्रा की व्यवस्थित-सुरक्षित फ़िज़ा को एक दिन अचानक छोड़कर वह गाँव के अराजक खुलेपन में आ बसा था। लेकिन फिर परिस्थितियाँ बदली, शादी हुई और अब वह कोयले में सने एक शहर में नये सपने बुन रहा था। 

“लेकिन एक चीज है जो अपना हाथ में है,” मोनू अपने मित्र की चिन्ता भाँप गया था। 

“क्या?”

“तुम्हारा बाल का कटिंग। बना दें राजेश खन्ना? या ज़ंजीर का अमिताभ बच्चन?”

“अरे नहीं। हमारे लिए तो देवानन्द ही एनीटाइम सदाबहार है।”

“और दाढ़ी? छील दें?”

देव ने थोड़ा सोचकर जवाब दिया, “नहीं, अब हम परमानेंट दाढ़ी रखेंगे। बस थोड़ा छाँट दो।”

बाल बनाने के बाद भी मोनू घंटेभर बैठा रहा। सुख-दुख की बातें की, आगे की योजनाएँ बनाईं, कुछ पिछली बातों को याद किया। 

“देखो देव, हम लोग का तो खाली पास्टे-पास्ट है। पूरा गाँव में फ्यूचर सिर्फ तुम्हारा है। बस किस्मत ठीक हो जाए तो जिन्दगी चकाचक,” इतना कहकर मोनू ने एक गहरी साँस ली और बक्सा उठाकर सुस्त क़दमों के निकल गया।

“फ्यूचर तो लाल नेपाल का भी था,” देव धीरे से बुदबुदाया।

वैसे चाल तो देव की भी सुस्त हो चुकी थी। पाँव में अभी भी दर्द था, लेकिन लँगड़ाने की नौबत नहीं थी। छुट्टी की मियाद ख़त्म होने वाली थी। आज शाम उसे कोयलाडीह के लिए ट्रेन पकड़ना था। 

कपड़ों में चिपके बाल झाड़कर जैसे ही वह दालान की तरफ़ बढ़ा, पर्दे के पीछे खड़ी माधवी उससे टकरा गई। उस रोज़ माधवी परछाईं की तरह देव के साथ चिपकी थी; शहर लौट रहे पति को पत्नी जी भरकर देखना चाहती थी। उसके हाथ में एक प्लेट थी जिसमें गरमागरम ठेकुआ और आम का अचार परोसा गया था। 

“मीठा ठीक है कि और चीनी डालें?”

देव ने अचार के मसाले में सना ठेकुआ का एक टुकड़ा मुँह में डाला, आनन्द में आँखें बन्द कीं और अपना विश्लेषण सुनाया, “गज्जब बना है। ई तो कोयलाडीह पहुँच ही नहीं पाएगा...ट्रेनें में चट कर लेंगे।”

“ठीक,” इतना कहकर माधवी लौटने लगी। परसों सुबह उसे भी नइहर लौटना था। मन उसका भी उदास था। उसे यूँ जाता देख देव ने लपककर उसका हाथ पकड़ा और अपना वादा दोहराया, “हम पहुँचेंगे, नौकरी परमानेंट करेंगे, और आपको लेकर जाएँगे। एक-दो महीना का बात है बस।”

“हमारे वजह से आपका लक ट्यूबलाइट जैसन भुक-भाक कर रहा है? आपका किस्मत खराब हो गया है?” इतना कहते ही माधवी की आँखें भर आईं। 

“उफ़। ई सब का बोल रही है। मोनुआ साला एकदम लम्पट है। और देखा जाए तो ट्यूबलाइट तो हम हैं। गांधी जी को, माँ को, हरीश दादा को, नेपाल को, सिपाही बाबा को...जिसको छुए, उजाड़ दिये। कुंडली तो मेरा खराब है,” कहते हुए देव भावुक हो उठा। 

“नौकरी परमानेंट करवा लीजिए, एक साथ सब सँवर जाएगा,” माधवी ने प्यार से उसके गाल चूमे और चौके की तरफ़ जाने लगी। लेकिन फिर रुकी, मुड़ी, और आँखों में आँसू लाकर बोली, “हमको भले मत ले जाइए। राजधानी से दिल्ली भी नहीं जाएँगे। लेकिन इस बार हाथ-पैर नहीं तोड़वाना है। समझे?”

डेढ़ महीने में दूसरी बार पति को विदा करते हुए माधवी ने करुण आग्रह किया। उसकी आँखें डबडबा आई थीं। माधवी को यूँ रोता देख देव ने उसे सीने से लगा लिया। 

“और एक बात। कोयलाडीह पहुँचते ही सिनेमाघर जाइएगा। आपको आपके हरीश दादा का कसम। सिनेमा देखने वाला मुराद जरूर पूरा कर लीजिए।” 

‘हरीश दादा की क़सम’—इस सौगन्ध में अब भी सम्भावना थी। जिया से हुई उस छोटी-सी मुलाक़ात के बाद से ही वह लगातार हरीश को ढूँढ़ रहा था। सग़ीर के पुराने पते पर कई चिट्ठियाँ लिखीं, कई बार चक्रधरपुर जाकर हरीश के दफ़्तर में पड़ताल की। भद्रा से लेकर राँची तक, कई परिचितों से मिला, पूछताछ की। पर कोई सुराग नहीं मिला। पिता जी से पूछने पर सिर्फ़ गोल-मोल जवाब मिलते। ज़्यादा कुरेदने पर वे ग़ुस्सा जाते या रोने लगते। कभी कहते कि उनके पास हरीश के मरने की पुख़्ता जानकारी थी। और कभी कहते कि उन्होंने ख़ुद ही उसकी मृत्यु की अफ़वाह उड़ाई थी, ताकि पुलिस उसका पीछा करना छोड़ दे। 

पर देव ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी थी। उसने माधवी का सर चूम लिया और धीरे से कहा, “हरीश दादा का कसम नहीं तोड़ेंगे।”

 

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