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Posted:
May 23, 2025
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समीक्षा
राहुल सिंह की किताब ‘जनजातीय नवजागरण’ की समीक्षा
समीक्षक : राही डूमरचीर
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राहुल सिंह को हिन्दी में कथा आलोचक के तौर पर जाना जाता है। हालाँकि उन्होंने कहानियाँ भी लिखी हैं। भले ही कहानियों की संख्या (शायद) दो ही हैं, पर वे कहानियाँ चर्चित एवं बहुपठित रही हैं। बहरहाल, हम यहाँ राहुल सिंह के एक नए रूप से परिचित होते हैं। ऐतिहासिक सन्दर्भ में आदिवासी समाज की अवस्था और उसके कारणों की पड़ताल करने वाले सामाजिक अनुशासन के एक लेखक के रूप में। ‘जनजातीय नवजागरण’ किताब एक ऐसे ही लेखक की श्रम और कमिटमेंट का प्रमाण लगती है।
इस किताब की मूल स्थापना या मान्यता, भारतीय इतिहास में आदिवासी नवजागरण की उपस्थिति से सम्बन्धित है। लेखक ने सप्रमाण इस बात को ज़ोर देकर सामने रखा है कि बांग्ला नवजागरण, मराठी नवजागरण या अवध (हिन्दी) नवजागरण की तरह आदिवासी नवजागरण भी हमारे इतिहास की सच्चाई है। यह भी कि इस तरफ़ ध्यान देने की कोशिश ही नहीं की गई। अंग्रेजी में भी आदिवासी प्रतिरोधों से सम्बन्धित लेखों-किताबों की मौजूदगी के बावजूद 'आदिवासी नवजागरण' को स्थापित-विश्लेषित करने का कोई प्रयास हमें दिखाई नहीं देता। इस ख़याल से यह सुखद है कि हिन्दी में ‘आदिवासी नवजागरण’ की अवधारणा को प्रस्तावित, स्थापित एवं उसे प्रमाणित करने की कोशिश ‘जनजातीय नवजागरण’ किताब की मार्फ़त हुई है।
मुख्यतया झारखण्ड के संताल, मुण्डा और कुडुख (उराँव) आदिवासी समुदाय के धार्मिक आन्दोलनों के माध्यम से उनके उपनिवेश-विरोधी संघर्ष के विश्लेषण का प्रयास इस किताब के केन्द्र में है। आदिवासी नवजागरण के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लेखक एक अहम सवाल हमारे सामने रखते हैं—“इन नवजागरणों (बांग्ला, मराठी, अवध) के घटित होने का कालक्रम क्रमशः इन प्रदेशों के पराधीन होने का भी कालक्रम है। यह बात थोड़ी विरोधाभासी नहीं लगती है कि कोई प्रदेश एक ओर ग़ुलाम भी हो रहा है और दूसरी ओर नवजागरण का दावा भी कर रहा है।” इस थोड़े नहीं बल्कि बेहद विरोधाभासी मामले को समझे बिना यह नहीं समझा जा सकता या समझा नहीं गया कि “आधुनिक दौर की इस उलटबाँसी में ही औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी इतिहास-दृष्टि की सफ़लता निहित है।”
‘ग़ुलामी को नवजागरण के उत्सव’ में तब्दील करने वाली इस सोची-समझी रणनीति का ख़ामियाज़ा ग़ैर-आदिवासी समुदाय ने कितना चुकाया पता नहीं पर आदिवासी समुदाय की दुनिया को इसने तबाह कर दिया। किताब यह बताती है कि अंग्रेजों का भारत को सभ्य बनाने का एजेंडा धूम-धाम से पूरी दुनिया में, इस मार्फ़त प्रचारित-प्रसारित भी हुआ। उनका हमारे ऊपर शासन करना भी, इस दृष्टि से वैध साबित हुआ था।
एक तरफ़ ग़ैर-आदिवासी समुदाय है जो अंग्रेजों के आने के बाद ‘नवजागरण’ की तरफ़ बढ़ता है और दूसरी तरफ़ आदिवासी दुनिया है जहाँ अंग्रेजों के आने के बाद प्रतिरोध और विद्रोह की शृंखला दिखाई पड़ती है। एक 1857 के विद्रोह के बाद हिन्दी प्रदेश में नवजागरण की शुरुआत हो जाती है, परन्तु आदिवासियों द्वारा लगातार किए जा रहे विद्रोहों के बावजूद उन्हें असभ्य, बर्बर और पीछे छूटा हुआ ही माना जाता रहा। सन् 1857 के ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के लगभग नब्बे साल पहले, सन् 1766 के रमना आहाड़ी के नेतृत्व में पहाड़िया विद्रोह से लेकर सन् 1948 के सरायकेला-खरसावाँ के आदिवासी विद्रोह के बीच, सिर्फ़ झारखण्ड में इकतालीस आदिवासी विद्रोहों की सूचना इस किताब में है।
इसका मतलब है कि सन् 1766 ई. से लगातार झारखण्ड में आदिवासी अपने हक़-हुक़ूक़ के लिए संगठित होते रहे, अपने सामर्थ्य के अनुसार साम्राज्यवादी ताक़तों और उनके एजेंटों से लोहा लेते रहे। इसके बावजूद यहाँ किसी जागरण, नवजागरण की अनुगूँज किसी बुद्धिजीवी को सुनाई नहीं देती। कुछेक किताबों, लेखों में उनके विद्रोहों का ज़िक्र करके या सीमित महत्त्व को रेखांकित करके छोड़ा जाता रहा है। ऐसे में यह किताब एक बड़ा दखल देती है। ‘आदिवासी नवजागरण’ के महत्त्व की केन्द्रीयता को सप्रमाण उपस्थित करने की कोशिश करती है। यह हस्तक्षेप निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है।
आदिवासी प्रतिरोध जो ऊपरी तौर पर धार्मिक आन्दोलन सरीखे जान पड़ते हैं, उनके उद्देश्यों और उनकी विचार-दृष्टि की गहरी शिनाख़्त करते हुए उन संघर्षों के उपनिवेश-विरोधी चरित्र को सामने रखने का प्रयास इस किताब में दिखाई पड़ता है। जिस समय हम उपनिवेश की अवधारणा का अभी अनुमान भी नहीं कर पा रहे थे, उस समय आदिवासी उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ लामबंद हो रहे थे, लड़ रहे थे। यह क्या नज़रअंदाज करने वाली बात है?
यह किताब बताती है कि आदिवासियों की ताक़त उनका संगठित होना है। (तब न अब उन्हें बाहर से मदद कहाँ मिली है?)। धर्म उनके संगठन की नींव को मज़बूती देता है, इसलिए उन्हें इसी रास्ते अपने आन्दोलन को आगे बढ़ाना पड़ा था। पर यह धर्म किसी भी तरह की साम्प्रदायिकता से मुक्त था। एक तरफ़ हिन्दी नवजागरण हिन्दी-उर्दू, हिन्दू-मुसलमान के प्रश्नों में विभाजित हो जाता है, पर आदिवासी समुदाय इस रास्ते अपनी एकजुटता को मज़बूत करता है और साम्प्रदायिकता से दूर रहता है।
असल सवाल यह है कि उनका आन्दोलन अंततः किसके ख़िलाफ़ खड़ा होता है। यह अंग्रेजों, दिकुओं और अन्य बहिरागतों के शोषण के ख़िलाफ़ खड़ा दिखाई पड़ता है। भक्ति आन्दोलन सत्ता और शास्त्र के ख़िलाफ़ अगर धर्म के आवरण में मनुष्य के पक्ष में खड़ा है तो आदिवासी नवजागरण धर्म के आवरण में समुदाय के पक्ष में खड़ा है, सर्वाधिक शोषित-उपेक्षित कौम आदिवासियों के पक्ष में खड़ा है।
यह किताब अंग्रेजों की उस चालाकी का भी पर्दाफ़ाश करती है, जहाँ अंग्रेज मराठी, बांग्ला, अवध नवजागरण के सन्दर्भ में मुसलमानों को और आदिवासी नवजागरण के सन्दर्भ में बहिरागतों को आततायी और ख़ुद को उद्धारक की तरह पेश करते हैं, और बहुत हद तक ऐसा करने में सफ़ल भी होते हैं।
नवजागरण के लिए किसी अन्धकार काल का और नज़दीकी शत्रु का होना ज़रूरी है। इसी पर उनकी पुनर्जागरण, प्रबोधन और आधुनिकता की अवधारणा टिकी हुई थी। उसका सफ़ल प्रयोग वह हिन्दुस्तान की माटी पर भी करने में सफ़ल होते हैं। (हालाँकि नवजागरण और पुनर्जागरण के बीच के कन्फ्यूजन को भी इस किताब में स्पष्ट करने की कोशिश की गई है)। इसमें ज़रा भी शक नहीं कि दिकू लोगों के अमानवीय शोषण को किसी भी तरह जस्टिफाई नहीं किया जा सकता पर सवाल यह है कि अंग्रजों के आगमन के बाद अचानक से यह समुदाय इतना सक्रिय और ताक़तवर कैसे हो जाता है? लगातार दमन की नीतियाँ बनाने वाले अंग्रेज, परदे के पीछे बैठे हुए कैसे ख़ुद को विकल्प और उद्धारक की तरह दिखाते रहे? 1793 ई. का ‘स्थाई बंदोबस्त’ और 1865 ई. का ‘वन अधिनियम’ कौन लेकर आता है और कैसे यह आदिवासियों की दुनिया में तबाही लेकर आता है, इसे भी ठीक से समझने की ज़रूरत है।
अंग्रेजी सत्ता के साथ का, दिकू समुदाय ने भरपूर फ़ायदा उठाया, जिसका सही लाभ तो अब जाकर उन्हें मिल रहा है। तब अंग्रेज उन्हें अपने फायदे के बतौर उपयोग कर रहे थे और आदिवासियों की बर्बादी के ताबूत को दिकू रूपी कील से मज़बूत बनाते जा रहे थे। कालांतर में जो आदिवासियों की कब्र नहीं कब्रगाह साबित हुआ। सत्ता से लाभ लेने का हुनर उन्हें अंग्रेजों ने सिखाया और देशी सत्ता को दिकू लोगों ने अपने हित में फ़ायदे के लिए प्रयोग करना भी सिखाया। आतंरिक उपनिवेशीकरण के रूप में, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
शोषण की व्यापक रणनीतियों और कार्यवाहियों के बीच, बार-बार और लगातार आदिवासी प्रतिरोध की शृंखला हमें दिखाई पड़ती है। इतिहास को बार-बार झकझोरने वाला उनका जज़्बा उनके हरेक आन्दोलन में दिखाई पड़ता है। बावजूद “पूरे भारतीय नवजागरण में कहीं जनजातीय सवाल दिखलाई नहीं देते हैं। पूरे भारतीय नवजागरण में कहीं जनजातीय आन्दोलनों की कोई गंभीर चर्चा नहीं मिलती है।” व्यवहार और बौद्धिकता दोनों ही स्तर पर उपेक्षा में पूरी की पूरी सदी बीती जा रही है। झारखण्ड के आदिवासियों का आन्दोलन तो एक बानगी भर है, देशभर के आदिवासियों के आन्दोलन पर गौर किया जायेगा तो नवजागरण की एक बिल्कुल अलग ही छवि उभरकर सामने आएगी। इससे अब तक के सेलीब्रेटेड नवजागरण के जो अगुआ और पैरोकर बुद्धिजीवी हैं, उनके महत्त्व और भूमिका का भी असल मूल्यांकन हो पायेगा। आदिवासी नवजागरण और आदिवासी विश्व-दृष्टि अब तक के पूरे सभ्यतागत और बौद्धिक-विकास की पोल खोल सकता है। यह कल्याणकारी नेशन-स्टेट के रूप और भूमिका पर भी सवाल उठा सकता है। इसलिए यह चुप्पी बहुत सायास प्रतीत होती है। इस चुप्पी की राजनीति को खंगालने के सन्दर्भ में यह किताब एक ज़रूरी हस्तक्षेप है।
यह किताब कई सवालों को भी सामने रखती है। उन पर बात होना ज़रूरी है। जैसे अपनी लिपि और बुद्धिजीवी की भूमिका का एक सवाल है। आदिवासी प्रश्नों पर विचार करने वाले और विशेषकर आदिवासी मूल के विचारक, लेखक इस प्रश्न को जब अपने तईं विश्लेषित करने का प्रयास करेंगे तो आदिवासी नवजागरण की बेहतर छवि सामने आ पायेगी। स्मृति या मौखिक परम्पराओं को इतिहास के उपादान की तरह बरतने का प्रस्ताव यह किताब सामने रखती है। पर ऐसा कोई प्रयास इस किताब में दिखाई नहीं पड़ता है। पूर्व में लिखित किताबों, शोध-ग्रन्थ के साथ अगर आदिवासी पुरखउती गीतों, कहानियों को अगर इस किताब में बतौर सन्दर्भ लिया जाता, उनका विश्लेषण किया जाता तो तस्वीर और साफ़ होती। लेखक के श्रम को देखते हुए ही यह उम्मीद जगती है।
बस एक प्रसंग में लेखक क्लिशे में उलझता हुआ दिखाई पड़ता है। किताब में कम से कम तीन जगह ‘जनजातीय नवजागरण’ को औपनिवेशिक-सत्ता की प्रतिक्रिया बताने के लिए भक्ति काल के जागरण को इस्लाम की प्रतिक्रिया के बतौर देखा गया है।
अपनी बात ख़त्म करते हुए यानिस वारोफकिस की बात को उद्धृत करना चाहूँगा। अंग्रेजों ने क्यों आस्ट्रेलिया के आदिवासियों पर हमला किया, आदिवासियों ने अंग्रेजों पर हमला क्यों नहीं किया; इस सन्दर्भ में वह कहते हैं—“यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। अगर हम इसका समझदारी से उत्तर नहीं देते हैं, तो किसी नासमझ की तरह हम यह स्वीकार करने का जोखिम उठाते हैं कि यूरोपीय लोग अधिक चतुर और अधिक सक्षम थे। जो निश्चित रूप से उस समय के उपनिवेशवादियों का दृष्टिकोण था। या हम यह सोचते/समझते हैं कि ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी बेहतर और अच्छे लोग थे, जिस वजह से वे क्रूर उपनिवेशवादी नहीं बने। भले ही यह सच हो, पर यह दूसरा तर्क भी पहले वाले के जैसा ही है। जिसके अनुसार गोरे यूरोपीय और ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों में कुछ मूलभूत अंतर होता है। इससे यह नहीं पता चलता कि यह अंतर कैसा है या क्यों है? कोई भी तर्क आदिवासी और अन्य लोगों पर किए गए अपराधों को वैध/उचित नहीं ठहरा सकता है।”
‘जनजातीय नवजागरण’ को पढ़ते हुए पाठक ख़ुद निर्णय करें कि उपनिवेशवादी सत्ता और झारखण्ड के आदिवासियों के बीच मूलभूत अंतर का पता उन्हें चलता है या नहीं? उपनिवेशवादी सत्ता और उनके एजेंटों की भूमिका को वे आज के सन्दर्भ में कैसे सोचते-विचारते हैं?
बहरहाल, यह एक बेहद ज़रूरी किताब है, इसे पढ़ा जाना चाहिए। इसमें प्रस्तावित दृष्टिकोण और निष्कर्षों पर बहस होनी चाहिए। इससे हिन्दी की आरामतलब दुनिया में एक ज़रूरी विमर्श खड़ा हो सकता है। मेरा मानना है कि ख़ालिस विरोध करने के लिए भी इस किताब को पढ़ा जाना चाहिए।
जोहार!
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