राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ की समीक्षा
समीक्षक : मनोज कुमार झा
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‘टोपी शुक्ला’ राही मासूम रज़ा द्वारा लिखित एक सशक्त हिन्दी उपन्यास है, जो सांप्रदायिक संबंधों और स्वतंत्रता के बाद के भारत के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने का जीवंत चित्रण करता है। मैं राही मासूम रज़ा से दुर्भाग्यवश कभी मिल नहीं पाया लेकिन उन्हें मैं निःसंकोच उन्हें अपना फ्रेंड, फ़िलोसोफर और गाइड कह सकता हूँ।
यह कहानी है टोपी शुक्ला की जो एक निम्न मध्यमवर्गीय हिंदू समुदाय से आता है। रज़ा टोपी की नज़रों से विभाजन, धार्मिक कट्टरता और राजनीतिक पाखंड के दुष्परिणामों से जूझ रहे राष्ट्र में आम नागरिकों द्वारा सामना किए जाने वाले भ्रम, मोहभंग और पहचान के संकट की पड़ताल करते हैं।
टोपी, एक शिक्षित लेकिन बेरोजगार व्यक्ति, अपने प्यारे दोस्त इफ्फ़न के संग के दैनंदिन के संघर्ष का भी गवाह बनता है। समान पालन-पोषण और मूल्यों की अनुरूपता के बावजूद समाज उनके साथ किस तरह से व्यवहार करता है वो आज भी प्रासंगिक दिखता है। उनकी दोस्ती सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बन जाती है जो उनके चारों ओर सांप्रदायिकता और संदेह के बढ़ते ज्वार के विपरीत एक सुकूनदायक टापू का अहसास देता है।
उपन्यास चेतना की धारा पर आधारित कथा है, जो टोपी की आंतरिक दुनिया में गहराई से उतरती है—उसकी कुंठाएँ, यादें और स्वतंत्र भारत में नैतिक और सामाजिक मूल्यों के पतन के बारे में उसकी तीखी टिप्पणियाँ व्यक्ति से चलकर समष्टि तक की दूरी तय करती है।
उपन्यास बेरोज़गारी, नौकरशाही की उदासीनता और योग्यता या मानवता के बजाय धर्म के आधार पर व्यक्तियों को चुनने या न्याय करने की सामाजिक प्रवृत्ति से भी जूझता है। कथा अतीत और वर्तमान के बीच घूमती है, यह बताते हुए कि कैसे व्यक्तिगत संबंध, धार्मिक पहचान और राजनीतिक घटनाएँ एक आम आदमी की मानसिकता को आकार देती हैं।
रज़ा ने व्यंग्य, पुरानी यादों और आलोचना को हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के पाखंड और अपने नागरिकों को पूर्वाग्रह से बचाने में धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य की विफलता को उजागर करने के लिए कुशलता से मिश्रित किया है।
सहज भाव और भाषा के शिल्प के माध्यम से टोपी शुक्ला केवल एक व्यक्तिगत कहानी नहीं रहता बल्कि परिवर्तनशील राष्ट्र का आईना है। यह भारतीय समाज में व्याप्त गहरे तनाव और विरोधाभासों को खोलकर सामने रखती है और इसलिए इसे एक कालातीत और विचारोत्तेजक रचना कहा जा सकता है। सामाजिक पाखंड और राजनीतिक अवसरवाद की आलोचना राही मासूम रज़ा द्वारा टोपी शुक्ला में केंद्रीय विषयों में से एक है।
रज़ा इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि समाज धर्मनिरपेक्षता, नैतिकता और न्याय जैसे मूल्यों को बनाए रखने का दिखावा करता है, लेकिन वास्तव में, यह धार्मिक और जातिगत आधार पर गहराई से विभाजित है। टोपी शुक्ला, एक हिंदू और उसका मुस्लिम दोस्त इरफ्फ़न दोनों ही हाशिए पर हैं, प्रतिभा या बुद्धि की कमी के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि वे समाज के सांप्रदायिक और पाखंडी मानदंडों के अनुरूप होने से या उसे आत्मसात करने से इनकार करते हैं। लोग सार्वजनिक रूप से सांप्रदायिक सद्भाव की वकालत करते हैं, लेकिन निजी तौर पर पूर्वाग्रह रखते हैं और ये पूर्वाग्रह उनकी वैचारिकी का आधार बन जाता है।
टोपी ने देखा कि कैसे ‘धर्मनिरपेक्ष’ व्यक्ति भी व्यक्तिगत या राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किस तरह धर्म का उपयोग करते हैं। टोपी ऐसे माहौल में घुटन महसूस करता है जो लोगों को उनके चरित्र से ज़्यादा उनके धर्म और दिखावे के आधार पर आँकता है। टोपी की घुटन भी एक व्यक्ति की घुटन से बढ़कर एक बड़े, बहुत बड़े समूह की घुटन दिखती है।
रज़ा दिखाते हैं कि विभाजन ने कैसे गहरे घाव छोड़े और उन्हें भरने की बजाय, राजनेताओं ने समाज को ध्रुवीकृत करने और वोट हासिल करने के लिए सांप्रदायिक भावनाओं का फायदा उठाया। यह उपन्यास धर्मनिरपेक्ष आदर्शों को सही मायने में लागू करने में भारतीय राज्य की विफलता पर सवाल उठाता है।
क्या ये सच नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता मात्र एक स्लोगन बन कर रह गया है जबकि अल्पसंख्यक समुदाय अलग-थलग रह गए हैं और राजनीतिक लाभ के लिए बहुसंख्यकवादी भावनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। ये आज बहुत बड़ा और विकराल सच बनकर खड़ा है।
टोपी खुद निराश, शिक्षित युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जो धार्मिक और राजनीतिक दोनों संस्थाओं के झूठ को देखता है, लेकिन व्यवस्था को बदलने में खुद को शक्तिहीन महसूस करता है। टोपी का चरित्र खुद ही आम आदमी का प्रतीक बन जाता है—भ्रमित, अलग-थलग और मोहभंग—आधुनिकता के वादों और सांप्रदायिकता की वास्तविकताओं के बीच फँसा हुआ। ‘टोपी’ नाम रूपक है—शायद समाज द्वारा व्यक्तियों पर थोपी गई सतही पहचान की ओर इशारा करता है।
राही मासूम रज़ा ‘टोपी शुक्ला’ का इस्तेमाल न केवल एक कथा के रूप में करते हैं, बल्कि समाज और राजनीति के दोहरेपन को उजागर करने के लिए एक साहित्यिक हथियार के रूप में भी करते हैं। वह पाठकों को आदर्शों और वास्तविकता के बीच के अंतर पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह भी कि जब धर्म और पहचान का व्यक्तिगत या राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दुरुपयोग किया जाता है, तो इससे क्या नुकसान होता है।
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