हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘दातापीर’ पर उषा प्रियम्वदा की टिप्पणी
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‘दातापीर’ जैसे एक साँस में पढ़ कर समाप्त किया। जीवन का एक नया चित्र सामने आ गया।
बचपन में घर से सटा एक क़ब्रिस्तान था, जिसकी गतिविधि देखी थी, मगर उससे जुड़े लोगों का जीवन, विपन्नता और दिनचर्या क्या होगी, इसका कोई अनुमान नहीं था। वह अनुभव दातापीर पढ़ कर हुआ। कहानी में एक गति, एक रवानगी तो है ही, मगर उसमें आनेवाले व्यक्ति, उनकी विपन्नता, उनके जीवन की उलट-पलट और अवरोध जैसे सुलभ जी की लेखनी से चित्रित हुआ है, उससे मैं बहुत प्रभावित हूँ।
मुझे वह कृतियाँ पसन्द हैं जो आगे पढ़ने के लिए बाध्य करें, खींचे और मैं उस कथ्य में डूब जाऊँ और कई दिन तक उसके बारे में सोचती रहूँ। इस कहानी का विषय मेरे लिए अनूठा तो है ही, लेखक का इतना गहरा अनुभव भी जगह-जगह लक्षित होता है।
उपन्यास का अंत भी अद्भुत है, जिन लोगों में अपनी स्थिति से उबरने की ललक है, वह किसी न किसी तरह अपने को मुक्त कर लेते हैं। मगर जिनमें ललक तो है मगर इतना साहस नहीं है, वह उसी परिवेश में रह जाते हैं। क़ब्र खोदते हैं और एक हताशा के बीच किसी तरह से जीते रहते हैं। जो कुछ मिलता है उसी में निर्वाह कर लेते हैं। परिवार, जिसमें उपन्यास की कथा के चलते केवल एक माँ और बेटी रह जाती हैं, उसी विपन्नता में किसी तरह जीती हैं। और ऐसा लगता है कि बेटी भी अपनी माँ की तरह ही अभावों में ज़िंदगी काटती रहेगी।
उपन्यास का एक प्रसंग मेरे मन में अटका रह गया, बेटी अमीना भोजन की तैयारी कर रही है, वह भात पका रही है और घर में दो तीन आलुओं के अलावा और कुछ नहीं है, वह आलू उसी में डाल देती है कि उबल जाने पर वह चोखा बना लेगी। यह प्रसंग उसके पूरे अभावग्रस्त जीवन और भविष्य का नक्शा सामने ले आता है। उसका प्रेमी सफल हो जाता है, छोटी बहन घर से भाग कर कहीं और चली जाती है, पोलियोग्रस्त भाई मर चुका है, जो क़ब्रें खोदने का काम करता था, मगर सारे चरित्र अपने में सशक्त हैं और उपन्यास का अंत एक हताशा में नहीं बल्कि एक आशा की किरण पर समाप्त होता है।
सुलभ जी की भाषा और विषय पर पकड़ चमत्कारी है, आशा है आगे भी उनकी लेखनी ऐसा ही चमत्कार दिखाती रहेगी।
— उषा प्रियम्वदा
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