निर्मल वर्मा की किताब ‘देहरी पर पत्र’ की समीक्षा
समीक्षक : विनीता बाडमेरा
***
मोबाइल के युग में पत्र लिखना बीते ज़माने की बात हो गई है। आज दूरियों को नजदीकियों में बदलने के अनेक साधन आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन वो जमाना भी ख़ूब था जब डाकिए को देखकर बांछें खिल जाया करती थीं।
बीते ज़माने में बहुत सारे देशी-विदेशी साहित्यकारों ने अपने मित्रों को पत्र लिखे, जिनका ज़िक्र निर्मल वर्मा ने भी किया है। मैंने उन पत्रों को नहीं पढ़ा, लेकिन निर्मल जी ने उस समय के युवा साहित्यकार जयशंकर जी को जो पत्र लिखे, वे तमाम पत्र ‘देहरी पर पत्र’ नामक पुस्तक में संकलित किए गए हैं। इन पत्रों को पढ़ने के बाद एक लेखक का पाठक होना देखकर, उसका घुमक्कड़ी स्वभाव पढ़कर और उनका अपने ढंग से जीवन जीना समझकर मैं सचमुच विस्मित हूँ।
‘देहरी पर पत्र’ में संकलित ये पत्र लेखक द्वारा एक ऐसे मित्र को लिखे गए हैं, जिसकी रुचियाँ उसके समान हैं। वे दोनों फिल्में देखना, यात्राएँ करना, किताबें पढ़ना और कहानियाँ लिखना पसन्द करते हैं। उनके पास इन सबसे जुड़ी अनेक बातें हैं और उन बातों को समझने-समझाने के लिए चिट्ठियाँ एक बहुत अच्छा और प्रभावी माध्यम बन जाती हैं।
इस पुस्तक में 1982 से 2005 तक निर्मल वर्मा द्वारा जयशंकर को लिखे गए पत्र शामिल हैं। ये पत्र उस मित्र को संबोधित हैं, जिनकी माता जी के स्वास्थ्य की फ़िक्र निर्मल जी को बराबर रही। उन्होंने हर पत्र में जयशंकर जी की माता जी के स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएँ दीं और लिखा, “आपकी मां का स्वास्थ्य कुछ बेहतर है, आप उनकी इतनी सेवा करते हैं, यह देखकर बहुत सन्तोष होता है।” यह पढ़कर गहरा यक़ीन होता है कि इन पत्रों में महज़ औपचारिकता नहीं है—यहाँ परिवार के सुख-दुख भी एक-दूसरे के लिए मायने रखते हैं। दूर रहकर भी एक-दूसरे की चिन्ता करना छोटी बात नहीं है।
निर्मल जी की यात्राएँ देखकर हैरानी होती है कि उन्होंने न केवल देश में बल्कि अनेक दूसरे देशों की भी यात्राएँ कीं। कई बार तो एक ही वर्ष में तीन-चार बार विदेश जाना हुआ। वे अपने शहर से भी कई-कई दिन बाहर रहते थे, फिर भी पढ़ते रहे, लिखते रहे। उन्होंने विदेशी साहित्यकारों को ही नहीं, देशी साहित्यकारों को भी लगातार पढ़ा। पढ़ने में रमा उनका मन एक साधक-सा प्रतीत होता है।
जयशंकर जी को लिखे गए इन पत्रों में उनके कुछ ख़ास मित्रों के नाम भी दर्ज हैं, और उन मित्रों से मेल-मुलाकात होने पर प्रसन्नता भी व्यक्त की गई है। साथ ही, एक सच्चे और तटस्थ पाठक की भांति जयशंकर जी की जिन कहानियों ने निराश किया या जहाँ सुधार की आवश्यकता महसूस हुई, वहाँ उन्होंने बिना लाग-लपेट के अपनी बात कही। आज के समय में लिखने वाले की थोड़ी-सी कमी बताना भी धृष्टता मानी जाती है। बुरा मानने का भय बना रहता है, लेकिन निर्मल जी और जयशंकर जी की यह दोस्ती अद्भुत थी।
वह कार्ड भेजने का ज़माना था। चिट्ठियों के साथ ख़ूबसूरत कार्ड का आदान-प्रदान करना सुखदायी तो होता ही था, साथ ही यह मीठी-सी बात कहना कि “मैंने उसे अपनी डेस्क पर लगा लिया है, आप बहुत ख़ूबसूरत कार्ड भेजते हैं”—मित्रता को और भी गाढ़ा कर देता है।
निर्मल जी न केवल देश के, बल्कि दूसरे देशों में भी पढ़े जाने वाले लेखक हैं। उन्होंने चेक और अंग्रेजी साहित्य की अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद भी किया। इसके बावजूद, अपने बेशकीमती समय में से कुछ वक़्त निकालकर वे अपने पाठकों और मित्रों के पत्र पढ़ते और उनके उत्तर भी बराबर देते थे।
इस पुस्तक में एक और अनूठी बात देखने को मिलती है—जहाँ पत्र समाप्त होते हैं, उसके बाद के पृष्ठों में निर्मल जी द्वारा पढ़ी गई किताबों (जिनका ज़िक्र पत्रों में है) तथा उनके लेखकों की सूची भी दी गई है। साथ ही, उनके द्वारा की गई यात्राओं और देखी गई फिल्मों की सूची भी संलग्न है।
यह किताब इसलिए भी पढ़ी जानी ज़रूरी है कि हम एक लेखक का पाठक होना देख सकें। यह जानना महत्वपूर्ण है कि लिखने के लिए पढ़ना ज़रूरी है, लेकिन एक नई दुनिया से रूबरू होने के लिए भी पढ़ना मायने रखता है। फिर एक लेखक के व्यक्तित्व की छाप भी उसकी किताबों में होती है, इसलिए किसी लेखक को थोड़ा-सा ही सही, लेकिन उसकी लेखनी के माध्यम से जाना जा सकता है। उसमें भी जब बात उनके निजी पत्रों की हो तो उनकी एक अलग ही छवि देखने को मिलती है।
कुछ दिनों पहले मैंने जयशंकर जी की लिखी किताबें—‘गोधूली की इबारतें’, ‘कुछ दरवाज़े कुछ दस्तकें’, तथा ‘पूर्व-राग’ भी पढ़ीं। जिस तरह ‘देहरी पर पत्र’ में निर्मल जी का पाठक होना देखा गया, उसी तरह जयशंकर जी का पाठक होना भी उनकी किताबों के माध्यम से देखा और समझा जा सकता है। जिस तरह निर्मल जी ने अपने पत्रों में जयशंकर जी के प्रति स्नेह और आत्मीयता दिखाई, उसी तरह जयशंकर जी ने भी अपनी इन किताबों में निर्मल जी का ज़िक्र किया है। उनके निबंधों और कहानियों पर बार-बार अपने मन की बात लिखी है। चूंकि इन किताबों को कुछ समय पहले ही मैंने पढ़ा है, इसलिए दोनों लेखकों की आपसी समझ और आत्मीयता मेरे मन को गहरे तक छू गई।
इस किताब में अपने मन की बातें बाँटते हुए निर्मल जी बहुत सरलता से हर वो बात कहते हैं जो वे महसूस करते हैं। साथ ही, प्यार से झिड़की भी देते हैं—“आप अपने पत्र में इस बात का कभी उल्लेख नहीं करते कि आपको मेरे पिछले तमाम पत्र मिलते रहे हैं अथवा नहीं।” यही मीठा उलाहना मित्रता है, स्नेह है। यही आत्मीयता का बंधन है, जो आज भी दो लोगों के बीच बँधा है, फिर चाहे उनमें से एक इस भौतिक जगत में न भी हो, यह रिश्ता मायने रखता है।
[निर्मल वर्मा की पुस्तकें यहाँ से प्राप्त करें।]