प्रेम, अँधकार और प्रतिरोध का शोकगीत

कुणाल सिंह के उपन्यास ‘रोमियो जूलियन और अँधेरा’ की समीक्षा

समीक्षक : डॉ. उर्वशी 

***

कुणाल सिंह का उपन्यास ‘रोमियो जूलियट और अँधेरा’ प्रेम, अँधकार और प्रतिरोध का शोकगीत है। इस उपन्यास को मैंने कुछ वर्ष पूर्व एक ऐप पर पढ़ा था, तब यह केवल डिजिटल रूप में उपलब्ध था। उस समय यह कोई चर्चित कृति नहीं थी, लेकिन जैसे ही मैंने इसे पढ़ना शुरू किया, मैं कई दिनों तक इसके भावों और विचारों में बहती रही। यह उपन्यास जैसे मेरे भीतर उतर गया था—मुझे भीतर से हिला देनेवाला अनुभव। अब यह उपन्यास प्रकाशित होकर पाठकों के हाथों में है, और मुझे प्रसन्नता है कि अब वह कथा, जो मेरे मन में एक संवेदनशील स्मृति बन गई थी, एक जीवंत पुस्तक के रूप में सामने है।

प्रेम की सबसे त्रासद विडंबना यह है कि यह वहाँ पनपता है, जहाँ उसे सबसे अधिक वर्जित किया जाता है। ‘रोमियो जूलियट और अँधेरा’ उपन्यास एक ऐसी ही दुनिया का आख्यान है—जहाँ प्रेम अँधकार में पलता है, जहाँ भाषा की पहचान रक्त से लिखी जाती है, और जहाँ जूलियट को चुपचाप मिटा दिया जाता है, क्योंकि वह ‘दूसरी’ भाषा, ‘दूसरे’ नाम और ‘दूसरे’ भूगोल से आती है। यह उपन्यास केवल एक प्रेम-कथा नहीं है; यह आधुनिक भारतीय समाज के उस विद्रूप चेहरे की कथा है, जहाँ ‘हम’ और ‘वे’ के बीच की विभाजन रेखा दिन-ब-दिन रक्तपात की दीवार में बदलती जा रही है। इसमें शेक्सपियर का रोमियो है, लेकिन वह बिहार से असम में जाकर अध्यापन करता है। उसमें जूलियट है, लेकिन वह अब एक ‘असमिया लड़की’ नहीं, इतिहास की एक साक्षात पीड़ा बन चुकी है। और यह अँधेरा—यह केवल प्रेम का निजी अँधेरा नहीं, यह भाषायी, जातीय और राजनीतिक अँधकार का जीवित प्रतीक है।

कुणाल सिंह ने इस कथा को सूक्ष्म संवेदनशीलता और सामाजिक विवेक के साथ बुना है। भाषा उनका औज़ार नहीं, उनका ताप है। शब्दों के भीतर अनकहे इतिहास की झलक है—जब असम आंदोलन की आँच में ‘बाहरी’ और ‘स्थानीय’ की खाई गहरी होती गई, और भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम न रहकर पहचान और प्रतिशोध का अस्त्र बन गई।

उपन्यास का नायक—एक बिहारी शिक्षक—असम की भूमि पर जाकर शिक्षा, प्रेम और अस्तित्व की तिहरी परीक्षा देता है। वह केवल एक प्रेमी नहीं है; वह एक निर्वासित आत्मा है, जो विद्यालय की सीढ़ियों पर खड़ा होकर भाषा के मानचित्र में अपनी जगह खोजता है। उसकी चुप्पी, उसकी लाचारी, उसकी कोशिशें—सब इस उपन्यास को एक जीवंत आत्म-संस्मरण का रूप देती हैं। वहीं, नायिका जूलियट—या कहें, वह स्त्री जो केवल ‘प्रेमिका’ नहीं, बल्कि संवेदना की शहादत है—अपने अस्तित्व के लिए लड़ती है।

कुणाल सिंह की लेखनी में एक विशेष प्रकार की धीरज भरी आंतरिक गति है—वे घटनाओं को नहीं, मनःस्थितियों को खोलते हैं। उनके वाक्य कविता की तरह नहीं, चिंतन की तरह पाठक के मन में उतरते हैं। उपन्यास का प्रत्येक अध्याय एक सांस्कृतिक संघर्ष का दस्तावेज़ है—जहाँ भाषा, भूगोल और प्रेम एक त्रिकोणीय युद्ध में उलझे हैं।

इस रचना में लेखक ने ‘असम और बिहार’ को प्रतीकों की तरह नहीं, यथार्थ के कटु अनुभवों की तरह प्रस्तुत किया है। पाठक जैसे-जैसे कथा में आगे बढ़ता है, वह केवल पात्रों की नहीं, अपने भीतर की पहचान की भी पड़ताल करता है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता है—वह पाठक को भीतर से मथता है।

यह उपन्यास हमें बताता है कि भाषा की अस्मिता और प्रेम की आकांक्षा जब एक ही राह पर चलते हैं, तो सत्ता, समाज और सांस्कृतिक संकीर्णता उन्हें बेरहमी से कुचलती है। यही ‘अँधेरा’ है—जहाँ प्रेम का सूर्य कभी नहीं उगता।

‘रोमियो जूलियट और अँधेरा’ उस सदी का आख्यान है, जिसे हमने जातीय घृणा, भाषायी संकीर्णता और सामाजिक विद्वेष के नाम पर जी लिया है। यह केवल दो प्रेमियों की कथा नहीं है; यह हजारों अस्वीकृत प्रेमों, अनसुनी आवाज़ों और अदृश्य विभाजनों का गान है। यह उपन्यास एक अविस्मरणीय आह्वान है—कि भाषा की दीवारें गिरें, प्रेम मुक्त हो, और अँधेरा हटे। कुणाल सिंह ने एक ऐसी कथा लिखी है, जो हमें सोचने के लिए मजबूर करती है, रोने के लिए भी, और शायद—प्रेम करने के लिए भी।

 

[कुणाल सिंह की पुस्तकें यहाँ से प्राप्त करें।]