कामनाओं की मुँडेर पर : मुलायमियत भी, ज़माने को जला देने वाली आग-सी कहानियाँ

गीताश्री के कहानी-संग्रह ‘कामनाओं की मुँडेर पर’ की समीक्षा 

समीक्षक - निवेदिता

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गीताश्री का कहानी-संग्रह ‘कामनाओं की मुँडेर पर’ जब पढ़ना शुरू किया तो किताब हाथ से छूटती ही नहीं थी। उसमें इतना रस था कि मैं उसी में डूबती चली गई।

मैं गीताश्री को लगातार पढ़ती रही हूँ, इसलिए उनके लेखन को निखरते हुए देखना मेरे लिए एक सुखद अनुभव है। मुझे पता है, उन्हें खुद को गढ़ने के लिए किसी बाहरी औजार की ज़रूरत नहीं है। यह बात उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए सहज ही समझ में आ जाती है।

गीताश्री ने जो कहानियाँ लिखीं, उनमें घर से लेकर बाहर की दुनिया तक—जो कुछ उन्होंने देखा, सहा, जिया—वह उनके पात्रों के रूप में सामने आया। उन्होंने यथार्थ को जितनी सहजता से कथा में पिरोया, उतनी ही सहजता से कथा को अपने जीवन में समेट लिया।

गीताश्री का पहला कहानी-संग्रह 2013 में आया था। मैं तभी से उन्हें पढ़ रही हूँ और यह देखा है कि उनकी कहानियों की बुनावट लगातार और अधिक महीन, सघन होती गई है। उनकी कहानियाँ कभी उनकी पकड़ से छूटती नहीं—गज़ब की तीरंदाज़ हैं, जिसका निशाना कभी नहीं चूकता। उनकी कहानियों में बेसाख़्तापन है, भाषा का चटखारा है।

मेरी समझ में अच्छी कहानी की एक कसौटी यह है कि पाठक का उसे बार-बार पढ़ने का मन करे और गीताश्री की कहानियाँ इस कसौटी पर खरी उतरती हैं।

‘कामनाओं की मुंडेर पर’ संग्रह की पहली कहानी ‘अफ़सानाबाज़’ से ही मोहब्बत हो जाती है। कश्मीर और कश्मीरियत को समझना हो तो यह कहानी ज़रूर पढ़नी चाहिए। गीताश्री के अफ़सानों में सबसे अहम चीज़ है—इंसानी रिश्तों का एहसास। ग़म, मोहब्बत और नफ़रत के दरमियान वे जिन रिश्तों को अपनी कहानियों में ले आती हैं, वह अद्भुत है। उनकी कहानियों के हजारों रंग हैं—कभी सुरमई, तो अगले ही पल शफ़क़ जैसी सुर्ख़ी लिए हुए, और फिर अचानक किसी उड़ी-उड़ी घटा की तरह आपको घेर लेने वाली।

जब पहली बार मैंने गीताश्री की कहानियाँ पढ़ीं, तो मेरे ज़ेहन की चारदीवारी में एक नया दरीचा खुला। लगा, ये कहानियाँ तो हमारे आसपास की ही ज़िंदगी हैं।

‘धर्म भ्रष्ट’ कहानी की किरदार हैं माता जी जो एक धर्मपरायण महिला है लेकिन उनके मन में दूसरे धर्मों के लिए गहरी घृणा है। यह कहानी दो अलग धर्म मानने वालों के बीच की है, जो समाज में धर्म की भूमिका और उससे पैदा होने वाले विभेद की बारीक पड़ताल करती है।

प्रस्तुत संग्रह में कुल दस कहानियाँ हैं—‘न्याय चक्र’, ‘कामनाओं की मुँडेर पर’, ‘श्मशान वैराग्य’, ‘सरकार से नाराज़ नहीं है ब्यूटी चौरसिया’, ‘स्वप्नभंग’, ‘महानगर की हवा’, ‘अपवित्र पानी’, ‘जी-हजूरी’ आदि। इनमें से हर कहानी का मिज़ाज अलग है। मुझे लगता है, अगर गीताश्री औरत न होतीं तो ये अफ़साने इतनी गहराई में न उतरते। उनमें मुलायमियत भी है और ज़माने को जला देने वाली आग भी। जिस तरह वे अपनी कहानियों को बयान करती हैं, लगता है जैसे उनके कलेजे पर घन बरस रहे हों—

“…एक स्त्री की आँखों से आषाढ़ बरस रहा था। वो उसकी माँ नहीं, माँ जी थीं—यानी उसकी सास। ‘माँ’ और ‘जी’ एक साथ लगा दो, एक संबोधन बनता है, एक रिश्ता। उनका बेटा कहता था, बहू होने के नाते ‘माँ’ के साथ ‘जी’ लगाना ज़रूरी है। ‘जी’ लगाते ही पहले दिन से गज भर की दूरी आत्मा में प्रवेश कर गई।” (श्मशान वैराग्य)

“ये सब करते-करते जाने दांपत्य कब हाथ से निकल गया, पता ही नहीं चला। उसे नियंत्रित करने वाले हाथों ने एक दिन उसका दमन छोड़ दिया। जो शासक था, जो उसका मान-मर्दन करके अपने पुरुषोचित दंभ से फूला रहता था।” (कामनाओं की मुँडेर पर)

“ऊपर आकाश से ठंड गिर रही थी, नीचे वह आग सेंक रही थी। पहली बार उसने आग के बारे में सोचा। चीड़ और देवदार वृक्षों के बारे में सोचा। ज़िंदगी ने बहुत घुमाया, लेकिन कभी ठहर कर प्रकृति के बारे में सोचने का मौका ही कहाँ दिया। पहली बार उसे लगा, वह आज़ाद चीज़ों की संगत में है—हवा, नदी, आग, घास, आकाश, तारे, वृक्ष...” (अफ़सानाबाज़)

इन टुकड़ों को बुलंद आवाज़ में पढ़िए और कहानियों की रफ़्तार का अंदाज़ लगाइए। गीताश्री के अफ़साने आपको नए जंगलों की ओर ले जाते हैं—नए अरज़ा, नए तेवर, नए उफ़क की ओर, जहाँ पाठक ठिठक कर रह जाता है। उनकी कहानियाँ जीते-जागते इंसानों की कहानियाँ हैं जिनके ज़रिए समाज की मक्कारी और जकड़न बेनक़ाब होती है।

वे अपने पोशीदा दुखों, कुचले हुए जज़्बातों को नए रंग में ढालती हैं जहाँ एक ओर आकाश की गहराई है, वहीं इंसान को खुली हवा में ले जाने का साहस भी। ये कहानियाँ किसी झूठी दुनिया की नहीं, आपके अपने घर की हैं—एक औरत की दुनिया, जो सीधी-सादी ज़ुबान में हर घर में समझी जा सकती है।

‘ब्यूटी चौरसिया’ कमाल की कहानी है—एकदम आज के समय की। रील बनाने से लेकर उससे होने वाली कमाई तक। इसमें बाज़ार है, छोटे शहर की लड़की के सपने हैं, उनके टूटने की टीस है, और फिर ख़ुद को फिर से खड़ा करने की जद्दोजहद भी। 

गीताश्री की कहानियों में छोटी-छोटी तशबीहे, मुहावरे, शोखियाँ हैं—जो उन्हें और दिलचस्प बना देती हैं। लंबे, उबाऊ वर्णन नहीं मिलेंगे, लेकिन जो बात वो कहती हैं वह आपके दिल से होकर गुज़रती है।

‘श्मशान वैराग्य’ वैसी ही कहानी है जो ‘संस्कार’ के नाम पर औरतों का शोषण करती दुनिया को सामने लाती है। 

“नंदिता ने कुपित होकर माँ जी की तरफ़ देखा। उसकी आँखों से चिंगारियाँ फूट रही थीं—‘और बताइए माता जी, क्या कहना है आपका? आपको सती होना चाहिए?’ उसने रघु की तरफ आग्नेय नेत्रों से देखा जिनमें चिंगारियों की तरह सवाल छिटककर निकल रहे थे।”

इस कहानी के ज़रिए गीताश्री ने ‘गरुड़ पुराण’ जैसे ग्रंथों में स्त्री-विरोधी और अमानवीय श्लोकों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। यह कहानी बेहद सूक्ष्म ढंग से स्त्रियों के साथ सदियों से जारी हिंसा और गुलामी की पड़ताल करती है। 

यह दुनिया पाखंडों से भरी है जहाँ जहालतें हैं, शोषण है, ज़ुल्म है। गीताश्री का हर अफ़साना तराशे हुए हीरे की तरह चमकता है। उसे पढ़कर लगता है कि इंसानी ख़ून रगों में तेज़ी से दौड़ने लगा है। जैसे कोई पहाड़ी नदी लबालब, उबलती हुई, रास्ता बनाती हुई। वो लिखती रहें और कथा की दुनिया में आम आदमी की आवाज़ महफ़ूज़ रहे।

 

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