कुत्ते तो अपना पक्ष रखने आने से रहे

‘अल्फ़ा-बीटा-गामा’ नासिरा शर्मा का संवेदनशील उपन्यास है, जो कोरोना काल की पृष्ठभूमि में आवारा कुत्तों की आँखों से मानव समाज की बेरुखी, असमानता और संवेदनहीनता को उजागर करता है। सामाजिक यथार्थ और मार्मिक कथा के माध्यम से यह किताब पाठकों को इंसानियत और करुणा पर गहरा आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करती है। इस उपन्यास का एक अंश प्रस्तुत है:

***

मोहल्ले के कुत्तों के बीच मॉब लिंचिंग गिरोह यानी भगोड़े कुत्तों के चेहरे पहचान लिये गए थे। सभी कुत्तों ने जी भरकर उनकी भर्त्सना की थी, मगर दल को इसकी कोई परवाह न थी कि कौन लूला, लंगड़ा, बूढ़ा खूसट कुत्ता उनकी पीठ के पीछे क्या बक रहा है, उनको क्या कह रहा है, जो वर्षों तक जीवन जीकर भी अपनी गरिमा न बना पाए। आधी रोटी खाकर तलवे चाटते रहे। उनकी बातों में न दम है और न उनकी हैसियत बनती है कि दल के सामने आकर उनकी आलोचना करें।

इन सरफिरों ने क़ानून अपने हाथों में ले लिया था। गली के नुक्कड़ या किसी और जगह कुत्तों के बीच तू-तू, मैं-मैं होती तो दल का सभापति कुत्ता सीना फुलाकर कहता, “इन निर्मम इनसानों के मुँह से हमने सुना है, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। लाठी तो नहीं, हम अब अपने दाँतों और नाखूनों से इनके अहंकार की ऐसी की तैसी कर देंगे, जिन्होंने हम पर अत्याचार और अन्याय की हद कर दी है।”

फिर नारा गूँजता : 

कुत्ता राज आकर रहेगा-आकर रहेगा! 

भूख हमारी मिट के रहेगी-मिट के रहेगी! 

कुत्तों का मसीहा-जिन्दाबाद, जिन्दाबाद! 

ज़ुल्म का बाजा फट के रहेगा-फट के रहेगा! 

कुत्ता अपना अधिकार लेकर रहेगा-लेकर रहेगा!

“बोलो सब एक साथ।” कोई कुत्ता कहता तो सब गर्दन उठाकर भौंकते :

कुत्तों का मसीहा जिन्दाबाद-जिन्दाबाद! कुत्ता राज आकर रहेगा-आकर रहेगा!

इस दल में धीरे-धीरे करके कुछ झक्की, कुंठित, अधेड़ और किशोर कुत्ते भी शामिल हो चुके थे। उनमें एक बेहतरीन वक्ता था, जो बिलकुल नये परन्तु समस्याओं के गर्भ से प्रश्न उठाता था। उसकी आवाज़ गूँज रही थी, जिसके भौंकने को सुनकर आस-पास रहनेवालों ने उसका नाम ‘नगाड़ा’ रख दिया था। किशोर उसे ‘डीजे’ पुकारते थे। इन सब उपाधियों से बेख़बर वह जोशीले अन्दाज़ से भौंक रहा था :

“इनसान बच्चे पैदा करते जाएँ, अपनी आबादी बढ़ाते जाएँ और हमारी नस्ल पर पाबन्दियाँ लगाते जाएँ—आख़िर क्यों? हमारे कितने भाई-बहनों को इन्होंने अपने वाहनों से कुचला। हमारी भूख के बदले विषैला भोजन हमें परोसा। हमारे बुजुर्गों व बीमारों को गलियों व फुटपाथों से काजी हाउस भिजवाया। कितने बेकसूरों को गोलियों से मरवाया। ये सब भूलने व माफ़ करने वाली बातें नहीं हैं। जैसा हमारे भीरु साथी हमसे कहते हैं, जब कहीम कोई समारोह आयोजित होता है तो ये हमें गलियों से उठवाकर दूर फिंकवा देते हैं। जब कहीं कोई विश्व स्तर का मेला लगता है तो हम इनकी आँखों में काँटे की तरह चुभते हैं। अपनी शर्म छुपाने के लिए हमारा वजूद मिटा देते हैं। हमें निर्वासित कर देते हैं। इनके दिलों में कत्तों के लिए न प्यार है, न स्थान है। हम बहरे व नासमझ नहीं हैं जो इनकी चालें न समझें।”

तभी सभा के बीच कोई श्रोता कुत्ता भौंका, “तो फिर उस दिन भागे क्यों थे?” 

“हम भागे नहीं थे, हमने अपनी रणनीति बदली थी।” नगाड़े ने अपनी बात जारी रखते हुए आगे कुछ कहना चाहा कि तभी सामान्य कुत्ते द्वारा लगाए इस पलीते से दूसरे ने पूछा, “छुप-छुप कर वार करना बुज़दिली है कि नहीं?” उनके चीखने के बीच कोई कुत्ता उन्हें शान्त करते हुए बोला, “यह मत भूलो कि इनके बच्चे और बड़े भी हमारे पिल्लों से कितना दुलार करते हैं।”

तभी भगेडू कुत्ता समर्थक चीखा, “दिखावा है! दिखावा है!”

“अपनी बकवास बन्द करो।” श्रोताओं में कुछ विरोधी कुत्तों ने नारे लगाए।

फिर किसी ने कहा, “चुप रहो, सुनने दो।”

“तुमने कूड़े में मरे चूहे, छिपकलियाँ, तिलचट्टों को देखा है, जिन्हें ये तेज दवाओं से मार डालते हैं? हम पर भी ये ऐसा ही जुल्म करते हैं।” उसके ऐसा कहने पर भौंक-भौंककर कुत्तों ने ‘हाँ’ में ‘हा’' मिलाई।

नगाड़े के इस वाक्य ने पासा पलट दिया और उसके समर्थक चीख उठे, “जवाब दो, जवाब दो!”

“उस दिन जब जान बचाकर भागे तुम सब, तो आज भी अवसर देखकर भागोगे।” किसी कुत्ते ने ज़ोर से भौंककर अपनी शंका व्यक्त की। इस प्रश्न पर नगाड़े की हूटिंग हुई।

“जो मरेगा, वह लड़ेगा कैसे?” भगोड़ा दल का एक सदस्य जवाब में तर्क देने लगा और बाक़ी उसके साथी भौंकने :

लड़ना है तो जीना है...

जीना है तो लड़ना है...।

कुत्ता-सभा रोज़ श्मशान के सन्नाटे में लगती, जिसको सुनने-समझने के लिए दूसरे कुत्ते भी वहाँ पहुँच जाते। उसमें कभी-कभी मोती भी होता।

उसे इनकी कुछ बातें सही लगतीं जो उसके विचार से मेल खाती थीं, मगर उनके लड़ने में जो हिंसा का रास्ता था, वह उसे क़तई पसन्द न था। ‘परसों जो कांड इस दल के किशोरों ने अंजाम दिया है, वह कुत्ता-समाज के नाम पर कलंक है। हमारी वफ़ादारी की परम्परा कुत्ता-समाज की शान और पहचान है। उस पर कीचड़ उछाला गया है।’ मोती खिन्न मन से यह सोच बीच सभा से उठ गया। उसका दिमाग़ भिन्ना रहा था।

“हर बात का जवाब देना, हर ईंट का जवाब पत्थर से देना कोई समझदारी नहीं है। ये नादान कुत्ते अपने साथ हमें भी ले डूबेंगे।” बड़बड़ाता-सा मोती श्मशान घाट से निकलकर कुत्ते का सामान बेचने वाली दुकान की तरफ़ चल पड़ा ताकि थकन उतार सके।

वह दुकान के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसके शोरूम से दिखती चीज़ों को घूरने लगा।

“सारा झंझट इस दुकान से शुरू होता है। ये जवान कुत्ते यहाँ आकर फ़ैशन की चीजें देखते हैं, अन्दर घुसकर घूम आते हैं और कुढ़ते हैं। इनका दिल कई तरह के सवालों से घिर जाता होगा। आख़िर ये सारी प्यारी-प्यारी चीज़ें हम देसी कुत्तों के लिए तो नहीं हैं न? बेचारा मालिक! काट लिया उसको जाकर तीन-चार जगहों पर इन छापामारों ने एक दिन, जबकि वह कुत्तों को रोज़ दो पैकेट बिस्कुट के खिलाता था। कभी-कभी दूध भी पिलाता था ताकि उसके शोरूम के सामने ये लोग हरियाली के बीच आराम कर सकें और उसकी आमदनी में इनके कारण बरकत हो। उसे क्या पता था कि जिन लावारिस पिल्लों को कल तक वह पनाह देता आया था, आज उनके किशोर मन में ऐसी ईर्ष्या का विष शत्रुता बनकर बैठ चुका था! अचानक दुकान में घुसकर उन्होंने कैसा हुड़दंग मचाया और उसे काट खाया!”

मोती को जिस बात का डर था, वही हुआ। पुलिस और कुत्ता-गाड़ी और मोहल्ले के बुजुर्ग हरकत में आ गए। तय पाया कि सारे कटखने या कहें, व्यवहार में नीमपागल कुत्तों को पकड़ा जाए और पूरी तरह छानबीन कर उन्हें शूट कर दिया जाए। बात सिर्फ उस उद्दंडता व उच्छृंखलता की नहीं थी बल्कि श्मशान के उस दर्दनाक हादसे की भी थी, जिसके बारे में दूसरे दिन सुबह लेंडी ने मोती को वह सारा किस्सा कह सुनाया था।

सुबह चार बजे के करीब एक अरथी के साथ दस-बारह लोग श्मशान घाट आए। रोना-धोना चल रहा था। जवान बेटा ट्रक दुर्घटना में मरा था। पोस्टमार्टम के बाद लाश का ऐसा हाल था कि उसका अन्तिम संस्कार त्वरित करना था। कत्ते वहाँ जमा होकर जोशीली बातें कर रहे थे। शव के अन्तिम संस्कार की तैयारी शुरू होनी थी। वहाँ के कर्मचारी ने कुत्तों को भगाने की कोशिश की तो वे सब मिलकर गुर्राने लगे। उनमें से जो चन्द श्रोता कुत्ते थे, वे तो टूटी दीवार से जैसे अन्दर आए थे, उसी रास्ते दीवार फलाँग भाग गए मगर ‘भगोड़ा दल’ उर्फ़ कटखना दल यह सोचकर कि जाना तो हमें होगा ही अपनी सभा भंग करके, फिर क्यों न जाते-जाते इनके कामों में विघ्न डाल इनको परेशान कर मज़ा लिया जाए? आख़िर ये हमारे मरे साथियों का अन्तिम संस्कार तो दूर, लाश को दफ़नाने तक नहीं देते हैं और घूरे पर फिंकवा देते हैं। उनमें से एक कुत्ता ज़ोर से भौंका, “टूट पड़ो, टूट पड़ो!”

बस, फिर क्या था! कुत्तों ने दौड़कर पहले पंडित जी को छेंका। उनकी धोती चीर उनकी पिंडली में दाँत गड़ाए। फिर अरथी के साथ आए शोकाकुल लोगों के कपड़े, धोती-कुर्ता नोचा-फाड़ा और इस हाहाकार के बीच जो गंगाजल वहाँ रखा था, उसे सूँघा फिर उसमें मुँह डाला। अन्त में मटकी को फोड़ा। पूजा के सामान को रौंदा और फिर वे सब सरपट भाग निकले।

“यह कैसा अनर्थ हो गया?” लडके का बूढ़ा बाप इतना कह अपना सिर पीटते हुए बिलख-बिलखकर रोने लगा।

“यह कैसा कांड कर गए कुत्ते?” पंडित का सारा शरीर थर-थर काँप रहा था। “पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। मैं ख़ुद आश्चर्यचकित हूँ इनकी दुष्टता पर।” आधी चुनी चिता की बिखरी लकड़ियाँ समेटता बाबूराम लगभग रो पड़ा।

सारे दुखी सज्जन जब कुछ समय बाद सँभले तो सोचने लगे, अब क्या करें? यदि बात बढ़ाते हैं या श्मशान में होनेवाले इस हादसे को मुद्दा बनाते हैं तो होगा क्या? दिल पर पत्थर रख फिर से सारा आयोजन शुरू किया गया। यह देखकर उन सबने ऊपर वाले को धन्यवाद दिया कि पुत्र के शव को उन कुत्तों ने कोई हानि नहीं पहुँचाई थी।

लेकिन भोर होते ही घटना का पता पहले शौच जाने वालों को लगा, फिर बात एक मुँह से दूसरे के कान तक आश्चर्य व आक्रोश की छौंक के साथ पहुँची। सब कुछ सुनकर जहाँ लोग भौचक थे, वहीं बौखला उठे। अजीब मानसिक पीड़ा से गुजरे लोग। कुछ तो हट्टे-कट्टे कुत्तों को देखकर भयभीत हुए और कुछ ने आव देखा न ताव, मरगिल्ले बीमार कुत्तों को धुनकर रख दिया। यह अराजकता देख किसी ने 100 नं. घुमा दिया।

यह स्थिति लेंडी और चिरकुट के लिए बहुत शोचनीय थी। गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है। उन्हें अपनी चिन्ता खाए जा रही थी। चौकीदार कुत्तों के भी कान खड़े हो गए थे। मोती ने कहा, “मेरी सलाह मानो और जंगल की तरफ़ फूट चलो। अब यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है।”

“चलो... चलो!” सबने ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाई और पाँचों रैनबसेरा की टूटी दीवार से जंगल में कूद गए।

कुछ दूर चले ही थे कि उन्हें अपने से बड़े जंगली पशुओं का डर सताने लगा। इधर-उधर ताकते आगे बढ़े, जहाँ उन्हें दो-तीन घर मिले और गाय-भैंस-बकरियाँ नज़र आईं। अपने लिए कोई सहारा देख उनका मन सँभला, मगर वे वहाँ रुके नहीं बल्कि मोती की बताई बड़ी-बड़ी चट्टानों से घिरी पहाड़ी पर जाकर थम गए। उन्हें प्यास लग रही थी, मगर जलस्रोत आस-पास कहीं न था। झरबेरियों की झाड़ व हरी-हरी घास उगी हुई थी। वे सारे घास चबाकर अपना गला तर करने लगे, फिर उसी पर लोट गए। उनका दिल अनहोनी से धड़क रहा था। यह चिन्ता भी उन्हें अन्दर-अन्दर खाए जा रही थी कि पता नहीं, दूसरे कुत्ते किस हाल में हैं?

दोपहर तक पुलिस और एम.सी.डी. हरकत में आ गई। अपराधी कुत्तों की कौन शिनाख्त करता और उन्हें कैसे पकड़ा जाता, यह एक बहुत बड़ी समस्या थी। मोहल्ले वालों से विशेष अनुरोध किया गया कि वे कुत्तों को ढूँढ़ने और पकड़वाने में उन दोनों महकमों की मदद करें। वहाँ रहनेवालों का भय दूर करने के लिए जो कुत्ता सामने दिखा, उसे पकड़ कुत्ता-गाड़ी में डाल दिया गया। उसमें चुलबुल भी पकड़ा गया, जो सुबह की जरूरत से निपटने के लिए घर से बाहर निकला था। जो कुत्तों के हिमायती थे, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि स्थिति को कैसे हैंडिल करें! इस कुत्ता-कांड के बाद उनकी बोलती बन्द थी। उनके बदन में यह सोच-सोच कर सिहरन होती कि यदि पोस्टमार्टम की हुई लाश को ये नोचते-खसोटते, तो...?

जिस पत्रकार ने बच्चे वाली स्टोरी लिखी थी, उसने कई टी.वी. चैनलों को फ़ोन कर दिया। ख़बर अपने में भयानक व रोचक, दोनों थी, लेकिन चैनल वालों को अचानक नाबालिग लड़की के बलात्कार की कोई और सनसनीखेज़ स्टोरी मिल गई तो उन्हें वहाँ जाना पड़ गया।

पुलिस महकमे की मीटिंग में यह हुक्म पास हो गया कि गम्भीर स्थिति, विशेष कर मानवीय जीवन की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन जाने वाले जीव-जन्तु और जनजीवन की शान्ति भंग करनेवाले ऐसे ख़तरनाक, आतंकी पागल कुत्तों को देखते ही गोली मार देनी चाहिए। जिस पुलिस टुकड़ी को यह केस दिया गया था, उसके हेड इंस्पेक्टर ने गोली चलाने की जगह जाने क्यों एयरगन और हवाई फ़ायर के प्रयोग करने का मन बना लिया था। उसके अन्दर का छुपा मानव अधिकार जाग उठा जिसको पहले रहमदिली कहा जाता था। उससे किसी ने पूछ बैठा कि वास्तव में जानवरों का बिना पूछताछ और मुक़दमे के मारा जाना क्या उनकी बेजुबानी का फ़ायदा उठाना नहीं है? वैसे भी उन्होंने किसी की हत्या तो नहीं की थी जो उन्हें मौत की सज़ा आनन-फानन में दे दी जाती। कुत्तों की लाशें बिछाने में उसकी रुचि नहीं थी, न ही कुत्तों का एनकाउंटर करके मेडल लेने में उसकी कोई दिलचस्पी थी।

इंस्पेक्टर मनोज के पास मोहल्ले के लोग अपनी-अपनी बातें लेकर थाना पहुँच रहे थे। वह सबकी सुन रहे थे। कुछ कुत्तों के पक्ष में बोल रहे थे, कुछ विपक्ष में अपनी समस्या सामने रख रहे थे। अधिकतर लोग भावुक व क्रोधित थे। उनके पास समस्या से निबटने व गुत्थी को सुलझाने के न तर्क थे, न सुझाव । उनसे मिलना इंस्पेक्टर मनोज को इसलिए लाभकारी लग रहा था कि इससे वे यह जान सकें कि इस औसत लोगों की इस बसावट की मूल समस्याएँ क्या-क्या हैं, उसमें कुत्ते जैसे वफ़ादार पशु की भूमिका क्या है: वहाँ इनका इतना आतंक फैल चुका है और लोग जो आपे से बाहर हो रहे हैं, इसके मूल में क्या है। सब कुछ सुन-समझ कर आख़िर इंस्पेक्टर को कहना पड़ा, “वे कुत्ते तो अपना पक्ष रखने आने से रहे। सारा केस एकतरफा बयान पर आधारित है। सबूत के तौर पर आप लोगों के पास ऐसी किसी घटना का चित्र नहीं, जिससे कुत्ते चिन्हित किए जाएँ। आप ख़ुद सोचें, पुलिस क्यों बेगुनाह कुत्तों को अन्धाधुन्ध मारेगी?” इंस्पेक्टर ने अपनी बात रखी।

“फिर कैसे हल होगी हमारी समस्या?” किसी ने दुखी हो पूछा तो इंस्पेक्टर को लोगों को यह बताना पड़ा कि “चंडीगढ़ की ‘केन्द्र विहार सोसाइटी’ में एक घटना कुत्तों और इनसानों के बीच घटी थी जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर आया था कि सड़क के कुत्तों को मारना, उन्हें अपनी जगह से विस्थापित करना जुर्म है। यह मनाही नगर महापालिका पर भी है। यह क़ानून 2009 में आया और 2013 में जारी किया गया। आप कहते हैं कि कुत्तों का सफ़ाया कर दो। कैसे कर दूँ, जब यह बात क़ानूनी रूप में ग़लत है? इनकी जनसंख्या पर कंट्रोल के लिए 2001 में क़ानून आया। ‘फीमेल डॉगीज’ को बाकायदा स्टर्लाइज़ किया जाने लगा है। उस पर एतराज होता है कि उन्हें ऑपरेशन के कुछ घंटों के बाद छोड़ दिया जाता है। इंफेक्शन के कारण बहुतों की मौत हो जाती है। यह उनके प्रति क्रूएलिटी है। ऐसी स्थिति में जब हर नागरिक अपना विचार रखता है और अपनी दृष्टि से देखता है तो फिर किस-किस की सुनी जाए?”

“लेकिन सर, शूट का ऑर्डर तो दिया गया है न?”

“ऑर्डर दिया गया है, मगर क़ानून तो नहीं बना है न!”

“लेकिन?”

“चलो, मान लेते हैं और इस मोहल्ले की दो-चार गलियों के आस-पास, जहाँ श्मशान है, उसके सारे कुत्तों को मार देता हूँ। फिर?... उनकी ख़ाली जगह भरने दूसरी जगहों से कुत्ते आ जाएँगे, जिनको आप जानते नहीं। वह स्टर्लाइज हुए हैं या उन्हें टीके लगे हैं या नहीं, किसी को क्या पता? वे आपसे फ्रेंडली नहीं होंगे। वे आपको काटेंगे। पहले वाले कुत्ते बाहर से आने वाले नये कुत्तों से लड़ेंगे। उनमें झगड़ा व दुश्मनी होगी। फिर आप क्या करेंगे? जो कुत्ते फ़िलहाल उग्रता दिखा रहे हैं, उसके भी कारण होंगे जो जेन्विन होंगे। जब हम कुत्तों को सताने के जुर्म में किसी व्यक्ति को पकड़कर लॉकअप में बन्द करेंगे तो आपमें से बहुत-से यह कह उठेंगे कि यह कैसा अन्याय है, जो कुत्ते के चलते इनसान को बन्द कर दिया? इसलिए मैं कहूँगा कि आप अब धैर्य रखें। हम पर विश्वास करें। हम जो करेंगे, वह सुरक्षा, शान्ति और मानवता को नज़र में रखते हुए करेंगे। पशु और मनुष्य के आपसी सम्बन्ध मधुर होने चाहिए, यह सोचें और इस पर अमल करें... जय हिन्द!”

उस दिन सुबह वेटनरी डॉक्टरों, डॉग लवर्स के साथ इंस्पेक्टर मनोज ने छोटी-सी मीटिंग रखी, जिसमें इंडियन पिनल कोड-428, आईपीसी-4 सेक्शन, क्रुएलिटी टू एनिमल्स पर विस्तार से बातें हुईं। पढ़े-लिखों व अनपढ़ लोगों के स्वभाव, जानवरों के प्रति उनकी घृणा व लापरवाही को भी गम्भीरता से रेखांकित किया गया। उनमें कुछ समाजसेवी थे, जिन्होंने कुत्ते के प्रति जो तिरस्कार व अवहेलना है, उस पर चर्चा की। इत्तिफ़ाक़ से इस मुलाक़ात में डॉक्टर शशिधर व कार्तिक भी मौजूद थे। उनके जाने के बाद सब-इंस्पेक्टर और कांस्टेबल के साथ इंस्पेक्टर मनोज ने एक मीटिंग रखी।

“तुममें से कोई भी न किसी व्यक्ति से हाथ मिलाएगा, न मेरे हुक्म के बिना उसकी मदद करेगा। मेरा इशारा समझ गए हो न? जान लो, इनको भी सबक सिखाना है कि क़ानून सिर्फ़ बन जाने भर से अपना प्रभाव या बदलाव नहीं ले आता है बल्कि नागरिकों के सहयोग से समाज में परिवर्तन आता है। केवल आलोचना करने से स्थिति नहीं बदलती।”

 

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