अंतिम अरण्य : संबंधों की टूटन और चुप्पियों के बीच जीवन-मृत्यु का दर्शन

निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ की समीक्षा

समीक्षक : विनीता बाडमेरा

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मृत्यु शाश्वत सत्य है। बाकी सब मिथ्या। जन्म के साथ ही परमात्मा ने मृत्यु की तारीख़ भी लिख दी है—कब, कहाँ, कैसे, यह पहले से ही निश्चित है। मृत्यु पर हमारे मनीषियों और लेखकों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन निर्मल वर्मा ने जिस तरह अपने उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ में इसे रचा है, वह अद्भुत है।

‘अंतिम अरण्य’ निर्मल वर्मा का ऐसा उपन्यास है जिसे शायद सबसे अधिक पढ़ा गया और जिस पर सबसे अधिक चर्चा हुई। यह चर्चा इसलिए भी हुई कि उम्र जैसे-जैसे बीतती है, जीवन की गाड़ी तेज़ चलने के बाद धीरे-धीरे रेंगने-सी लगने लगती है। युवावस्था से वृद्धावस्था कब आ जाती है, इसका भान तब होता है जब शरीर थकने लगता है, साँसें तेज़ चलने लगती हैं और मन अतीत के हर टुकड़े को याद करने लगता है।

इस उपन्यास में बहादुरगढ़ के एक पर्वतीय स्थल पर वर्षों से रहने वाले मेहरा साहब और उनकी पत्नी दीवा हैं। वहीं एक जर्मन महिला अन्ना है, जो युवावस्था में भारत आई और यहीं बस गई। डॉक्टर सिंह साहब हैं और सेब के बागान वाले निरंजन बाबू। छोटे से इस शांत पहाड़ी कस्बे में रहने वाले ये लोग अपने-अपने एकांत में जीते हैं और आपस के संबंधों के सहारे जीवन के सुख-दुख बाँटते हैं।

जीवन की सांध्यवेला में दीवा कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से जूझ रही हैं। उन्हें पता है कि मृत्यु कभी भी उनकी साँसें रोक सकती है, लेकिन उनके बाद मेहरा साहब की देखभाल के लिए कोई होना चाहिए। यह ‘कोई’ इस परिवार का कोई नज़दीकी रिश्तेदार या पुराना मित्र नहीं है। उसने दिल्ली के ‘स्टेट्समैन’ अख़बार में एक विज्ञापन देखा था। उन दिनों उसके भीतर भी अशांति का ज्वार था, जिसे शांत करने के लिए वह इस पहाड़ी कस्बे में आ गया। दीवा की मृत्यु के बाद भी वह ‘कोई’ मेहरा साहब की मृत्यु तक वहीं रुका रहा—सिर्फ़ इस सोच के साथ कि “कोई आख़िर तक साथ नहीं जाता, लेकिन कुछ दूर तक तो साथ जा सकता है।”

जीवन एक बड़ा उपन्यास है, जिसमें आए हर पात्र की अपनी कहानी है। कुछ कहानियाँ खुल जाती हैं, कुछ बंद रहती हैं। कई बार वे बंद कहानियाँ अगर खुल जाएँ तो भूचाल ला सकती हैं। जैसे इस उपन्यास में निरंजन बाबू की कहानी—जो खुलकर भी अंततः अनकही ही रह जाती है। कौन-सी इच्छाएँ, कौन-सी पीड़ा उन्हें बार-बार मैदान से पहाड़ की ओर खींच लाती है?

और मेहरा साहब की बेटी तिया—वह क्यों नहीं अपने पिता के अंतिम समय में उनके साथ पूरा समय बिता पाई? ये प्रश्न अनुत्तरित हैं। शायद कुछ दर्द बाँटे नहीं जा सकते, कुछ भूलें माफ़ नहीं की जा सकतीं। कुछ सुख अनजाने में अपनों से दूर रहने में होते हैं, और कुछ दुःख ऐसे होते हैं जिन्हें बस मौन में सहा जा सकता है। यही जीवन का दर्शन है।

किन्तु जीवन बीतता है, और धीरे-धीरे रीतता भी है। उत्साह से भरे मन का संबल भी तब टूटने लगता है जब दूर से मृत्यु की आहट सुनाई देने लगती है। वह आहिस्ता-आहिस्ता दरवाज़े पर दस्तक देती है और एक दिन कस कर हाथ पकड़ लेती है।

हम सभी ने अपने घरों में वृद्धों को मृत्यु के समीप आते देखा है। पर जिस तरह ‘अंतिम अरण्य’ में मृत्यु मेहरा साहब की ओर धीरे-धीरे बढ़ती है, उसे पढ़ना मात्र एक अनुभव नहीं, बल्कि भीतर तक कुछ महसूस करना है।

यह आम बात है कि एक उम्र के बाद शरीर थकने लगता है। कोई बड़ी बीमारी न भी हो, वृद्धावस्था स्वयं एक बीमारी बन जाती है। उस समय कोई पास हो—कुछ कहे न कहे, पर मौन सुने—यही सबसे बड़ी बात है।

देह धीरे-धीरे शिथिल होती जाती है। कभी अपनी कही बातों पर भी भरोसा नहीं रहता। भला-चंगा, सधा हुआ दिखने वाला मेहरा साहब भी उस समय तकिए के नीचे रूमाल रखता है, क्योंकि अब उनके मुँह से लार बहती है। शायद निर्मल जी का उद्देश्य यही दिखाना था कि बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी मृत्यु को रोक नहीं सकता। बुढ़ापा हर किसी को आता है—बिना किसी भेदभाव के।

मृत्यु जिस तरह एक दिन आकर कस कर पकड़ ले जाती है, उसका अहसास तब होता है जब रोज़ दिखने वाला कोई व्यक्ति अचानक दिखना बंद हो जाता है। उसकी अनुपस्थिति ही उसकी मृत्यु का सबसे गहरा प्रमाण बन जाती है।

मृत्यु को समझना आवश्यक नहीं, लेकिन उसका स्वीकार होना अनिवार्य है।

इस उपन्यास में एक ऐसा व्यक्ति, जो न तो परिजन है, न मित्र, अंतिम क्षणों में मेहरा साहब का साथ निभाता है, और अंततः उनकी अस्थियाँ भी वही विसर्जित करता है। यह चौंकाता है, पर यह भी बताता है कि हर संबंध को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। दीवा का यह प्रेम भी असाधारण है, जो अपनी मृत्यु के बाद भी मेहरा साहब के अकेलेपन को भरने के लिए ‘किसी’ को बुलाती है।

यह उपन्यास जीवन और मृत्यु की गहराइयों, संबंधों की टूटन और चुप्पियों की व्याख्या करता है।

यह न केवल मृत्यु के दर्शन को खोलता है, बल्कि यह भी सोचने पर विवश करता है कि क्या भविष्य में वृद्धों का अकेलापन दूर करने के लिए ‘किसी’ को नौकरी पर रखना होगा? यह प्रश्न असहज करने वाला है—और अत्यंत आवश्यक भी।

 

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