अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ पर महेश मिश्रा की टिप्पणी
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बनारस के साड़ी बुनकरों पर केन्द्रित यह उपन्यास कई मायनों में भव्यता को छूता है। उपन्यास की रीढ़ में सिसकी है, असहायता है, जिजीविषा है, प्रेम है, जीवन है, छल कपट है और जीवन की लघुता और विराटता है। बुनकरों के जिस अभावग्रस्त जीवन की यह यथार्थपरक गाथा है वह हमारे देश का ऐसा सच है जो चारों तरफ़ उतनी ही दारुण दशा में आज भी है जितना 40-50 साल पहले रहा होगा।
मुस्लिम समुदाय में गरीबी और अभावग्रस्तता का वही आलम है जो कमोबेश दूसरे समुदायों में है, यह सच्चाई शायद हम जानते हैं लेकिन शायद यह जानने में बाधा है कि उनकी चिंताएं भी वही हैं जो बाकी सबकी हैं। रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा।
अब्दुल बिस्मिल्लाह इस उपन्यास को इतने अकुंठ बनारसी अंदाज़ में पेश करते हैं और भाषा की रवानगी ऐसी कि स्वाद आ जाता है। कहानी का पेग इतना सटीक रखा है कि मतीन, अलीबुन और इक़बाल के इर्द-गिर्द बुनी हुई यह दुनिया भारत की और शायद अभावग्रस्त सारे संसार की सच्चाई को बुन ले जाती है, बता ले जाती है। इस मायने में ही कोई सच्चा सर्जक सार्वभौम महत्त्व का काम कर पाता है।
टूटने और जुड़ने के बीच रंग बुनती ज़िंदगी जितनी शिद्दत से लेखक इस उपन्यास में विन्यस्त कर पाते हैं वह अद्भुत है। कोमल प्रेम को पकड़ पाने में लेखक सिद्धहस्त लगे। लेखक स्पर्श-कातर नहीं हैं और ऐसी कातरता को वे शायद बर्दाश्त भी नहीं करते।
सामाजिक आर्थिक शक्तियों का प्रपंच कैसे काम करता है और वंचित मनुष्य को कैसे असहाय करके छोड़ता है उसकी सटीक बानगी है इस उपन्यास में। धर्म की सीमा भी वे समझते हैं और धार्मिक कर्मकांडों में छिपे शोषणकारी तर्क के छद्म को अनावृत्त करने में जिस शैली का अब्दुल बिस्मिल्लाह इस उपन्यास में उपयोग करते हैं वह बेमिसाल लगी। वे आर्थिक शोषण में सहयोग करती अस्वस्थ सामाजिक परम्पराओं, कुरीतियों, मज़हबी जड़ता, कट्टरता और सांप्रदायिक निगाह को कत्तई अनदेखा नहीं करते हैं। इसके लिए शैली एकदम सटीक रही।
एक बात और, शोषण के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को भी उन्होंने बिल्कुल सहजता से विन्यस्त किया है। एक लेखक सांप्रदायिकता के विरुद्ध कैसे लड़े यह इस पुस्तक से सीखने लायक़ है। यह पुस्तक सांप्रदायिक भाव-भूमि को कोई खाद पानी नहीं देती बल्कि सांप्रदायिक सोच-शैली को फालतू की चीज़ (redundant) बनाकर छोड़ देती है।
प्रतिरोध की शक्तियों और उनके संगठित हो पाने और न हो पाने की विवशता को भी वे रेखांकित करते हैं लेकिन हताश करके पाठक को छोड़ देने वाले नहीं हैं। उम्मीद देकर जाते हैं। इक़बाल उसका प्रतिनिधि चरित्र बनता है। ज़रूर पढ़ा जाने लायक़ उपन्यास है।
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