गीताश्री के कहानी-संग्रह ‘कामनाओं की मुँडेर पर’ पर अनघ शर्मा की टिप्पणी
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गोरिया पातरि जइसे लवंगिया के डार...
पनवा जइसन गोरी पातरि हो
फुलवा अइसन सुकुमार...!!
गीताश्री का कहानी संग्रह ‘कामनाओं की मुंडेर पर’ अनदेखे लोक संसार के खुलकर बिखरने का संग्रह है। इस संग्रह में शामिल अमूमन सभी कहानियाँ स्त्री की छटपटाहट और उसकी भीतरी जद्दोजह्द को रेखांकित करती हैं। इन कहानियों में ज्यादातर ग्रामीण निम्न मध्य-वर्ग की बेचैनी, हताशा और उठापठक मुखर रूप से दिखती है। फिर भी इन कहानियों को शहर और गाँव की बायनरी में नहीं बाँधा जा सकता क्योंकि इनमें शहर और गाँव दोनों ही जगहों के स्त्री-जीवन के दुःख, विवशता और जीवट को सहृदयता के धरातल पर खड़ा महसूस किया जा सकता है।
गीताश्री को पत्रकारिता का एक सुदीर्घ अनुभव रहा है और निश्चित ही इतने लम्बे समय तक रिपोर्टिंग करते हुए उन्होंने सामाजिक ढाँचे में गहरे तक धँसी राजनीति के उस रूप को बहुत नज़दीक से देखा महसूस किया होगा जिसे आमतौर हम लोग अक्सर एक स्तर के बाद देखने से चूक जाते हैं।
मिसाल के तौर पर हम सभी वर्षों से कश्मीर की समस्या और वहाँ के राजनीतिक समीकरणों से वाकिफ़ रहे हैं, मगर फिर भी इस सब को ‘अफसानाबाज़’ कहानी के नैरेटर हिलाल की मार्फ़त सुनते-पढ़ते हुए हम एक तरह के वोइड के ज़रा और नज़दीक पहुँच जाते हैं। इसी तरह दो कहानियों ‘न्याय-चक्र’ और ‘धर्म-भ्रष्ट’ में नज़दीक से ये देखा जा सकता है कि जाति व्यवस्था और धर्म कैसे वर्गभेद को बनाये रखता है। इसकी सबसे गहरी चोट उसे लगती है जिसे हम हाशिये का समाज या निम्न मध्यवर्ग कहते हैं।
इस संग्रह की कहानियों में परिवारों के भीतर के अंतर्द्वंद हैं और पात्रों के उन्हीं अंतर्द्वंदों, परिवेश की जकड से बाहर निकल आने की और अपने लिए कुछ करने की कोशिश मुखर रूप से दिखती है। पात्रों का अपने बलबूते अपने लिए नया संसार बनायेंगे, नई राह पर चल निकलेंगे, खुदमुख़्तार होंगे; ये स्वर इन कहानियों में प्रमुख रूप से काबिज़ है। इसकी बानगी ‘सरकार से नाराज़ हैं ब्यूटी चौरसिया’ कहानी में देखी जा सकती है। ‘महानगर की हवा’ को भी इसी कड़ी, इसी भाव को केंद्र में रख कर लिखी कहानी माना जा सकता है जिसमें सुरेखा वापस दिल्ली जाकर नौकरी करने का फैसला लेती है।
इस कहानी में पति (शैलेश) की नौकरी छूट चुकी है और वह अपने घर दिवाली-छठ के लिए या ये कहें कि एक ब्रेक पर पर लौटा है ऐसे में बिना किसी पृष्ठभूमि, पति-पत्नी के बीच बिना किसी तनाव के एकदम से सुरेखा का दिल्ली चले जाना हो सकता है कि पढ़ते हुए कुछ पाठकों को खटके पर यूँ भी होता ही है संसार में।
यह एक तेज गति लिए हुए सुन्दर संग्रह है जिसे अपने आसपास के उस तबके को कुछ और समझने के लिए पढ़ा जाना चाहिए जिसके साथ रहते हुए भी हम उससे ज़रा दूरी पर रखते हैं।
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