विमर्श समय में हस्तक्षेप करता हुआ ‘बेदावा’

तरुण भटनागर के उपन्यास ‘बेदावा’ पर डॉ. संगयोगिता वर्मा का आलेख

***

कभी उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने ‘साहित्य जीवन की आलोचना है’ कि तर्ज पर कहा था कि ‘उपन्यास जीवन की आलोचना है।’ उसमें बस इतना जोड़ देने की जरूरत है कि उपन्यास अपने समय का इतिहास भी होता है। समाज और संस्कृति भी होता है। युवा पीढ़ी के कथाकार है तरुण भटनागर का एक ऐसा ही उपन्यास है—‘बेदावा’, जो वर्तमान समय के इतिहास को दर्ज करने की कोशिश है।

किसी ने कहा भी है कि किसी देश को जानना है तो उस देश के साहित्य को पढ़ लो। आज साहित्य के केंद्र में हाशिये का समाज या हाशिये का विमर्श आ चुका है। उपन्यास या साहित्य के किसी भी विषय को अब साहित्यिक विमर्श से अलग हटकर देखने का कोई अर्थ नहीं रह गया है। शिल्प, कथा तत्व, सौंदर्य दृष्टि, रूपवाद या अन्य तात्विक दृष्टि से विवेचन संभव नहीं रह गया है। और वैसे भी साहित्य का उद्देश्य समय के साथ बदलता है। 

आज से पचास साल पहले या सौ साल पहले के साहित्य में जब विमर्श ढूँढा जा सकता है तो 2020 में प्रकाशित ‘बेदावा’ में क्यों नहीं? वैसे भी ‘बेदावा’ कई विमर्शों को अपने अंदर समेटे हुए हैं।

आज के समय में भारत, उसके लोगों, लोगों की मानसिकता, धर्म-समाज और राजनीति और उसके विमर्शों को जानना है तो ‘बेदावा’ एक जरुरी उपन्यास है। इस उपन्यास को वर्तमान समय के दस्तावेज की तरह भी पढ़ा-देखा जा सकता है। क्या नहीं है इसमें? सरकारी महकमों की कारगुजारियाँ, बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों की दास्ताने, परिवार में बेटे की चाहत, यूनिवर्सिटी-कॉलेज की सच्चाइयाँ, प्रेम के सारे पक्ष-विपक्ष, घृणा की कहानियाँ, अँधे सुधीर और आँखवाले लोगों का जीवन-विचार और तो और किन्नर विमर्श, स्त्री विमर्श, राजनीतिक विमर्श, नक्सलवाद और सबसे बढ़कर मानव-मुक्ति का स्वप्न। जीवन के मुक्ति का या मनुष्य के जीवन को एक महाकाव्यात्मक रूपक में परिणित करता हुआ उपन्यास है यह।

‘बेदावा’ प्रत्यक्ष रूप से ‘एक प्रेम कथा’ है। उपन्यास के मुख पृष्ठ पर भी लिखा है ‘बेदावा : एक प्रेम कथा’ लेकिन प्रकारांतर से यह विमर्शों की किताब है। कई विमर्श साफ-साफ दिखलाई पड़ते हैं, तो कुछ प्रेम कथा की ओट में है। दरअसल, यह उपन्यास एक प्रेम कथा के माध्यम से समाज की विभिन्न परतों अर्थात् सामाजिक संरचना की पड़ताल है। समाज कितने तहों में बँटा है—अमीर, गरीब और मध्यवर्ग ही नहीं बल्कि और भी तह पर तह हैं यहाँ। यह उपन्यास इन सभी तहों को पकड़ने की कोशिश करता है। दिखने में छोटा-सा यह उपन्यास अपने कथानक में बहुत विस्तार लिए हुए है। इसके केंद्र में प्रेम है, लेकिन यह इस तरफ भी इशारा करता है कि प्रेम सिर्फ एकबार ही नहीं होता है। प्रेम दुबारा भी होता है और पहले प्रेम को बचाये रखे हुए भी दूसरे प्रेम को जिया जा सकता है। उसके साथ खुशी-खुशी गुजर-बसर किया जा सकता है। दरअसल, यह एक ऐसी प्रेम कहानी है, जिसमें जिस्म लड़के का और रूह लड़की की है। अदीब शरीर से पुरुष है और मन से स्त्री। वह मनुष्य की मुक्ति के स्वप्न देखता है। संयोग से उसी डॉक्टर के पास पोस्टमार्टम के लिए उसकी लाश पहुँचती है जिसने उसके जननेंद्रिय (योनि) को ऑपरेट करके पुरुष जननेंद्रिय को लगा दिया था।

यह हमारे समाज की कितनी बड़ी विडंबना है कि आज भी लोग लड़के की चाहत में लड़कियों को हेय दृष्टि से देखते हैं। वह जो मन से स्त्री और शरीर से पुरुष है, अपने शरीर को कैसे देखना चाहता है, इससे उसके अभिभावकों को कोई मतलब नहीं है। क्यों?

अभिभावकों के इच्छाओं के तले कितने बच्चों के देह-आत्मा रक्तरंजित होती हैं? इसका आँकड़ा एक टेढ़ा मसला है। इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र अदीब जो एक होनहार छात्र, कलाकार और दुनिया बदलने के स्वप्नों से लबरेज नौजवान है। वह अंदर ही अंदर कितना कुछ झेल रहा होता है; उपन्यासकार के शब्दों में—“अपर्णा जब मैं पैदा हुआ था, तब मेरे जिस्म पर आदमी और औरत दोनों के जननांग थे...मैं न तो ठीक-ठीक आदमी था और न ही ठीक-ठीक औरत...। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो मेरे अब्बू मुझे लड़का बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि मेरे जिस्म में लड़कियों के जो हिस्से हैं उन्हें हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए। इस तरह मेरे तीन ऑपरेशन हुए। हर बार मेरे जिस्म का कोई अंग निकाला गया, कोई अंग जोड़ा गया... जब आप जवान हो रहे हो, जब इश्क की कोई मरगिल्लि-सी चाहत आपमें घर कर रही हो तब उन अंगों का काटा जाना एक बेहद खौफ़नाक-सी बात थी...ख्याल करता हूँ तो कैसा तो लगता है...मुझे लड़कियों के साथ रहना अच्छा लगता था, उनके कपड़े, उनकी खुशबू, उनके गहने, जेवर… उनकी शोहरत... पर मैं लड़का बन रहा था, लगातार… मेरे जिस्म को बार-बार काटकर मुझे लड़का बनाया जाता...।” (बेदावा, पृष्ठ-93-94) 

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि कॉलेज में पढ़नेवाले अदीब को एक पुरुष जिस्म में लगातार बदलने के लिए उसके अभिवावक ही मजबूर करते है। उसे ‘मेल हार्मोन्स’ दिए जाते हैं ताकि वह लड़का बना रहे। लड़का दिखता रहे। आगे वह कहता है—“तुम सोचती होगी कि ऐसे लोग तो नाचते-गाते हैं, उनकी अपनी दुनिया होती हैं। बच्चों के जन्म पर और शादियों में वे बधाइयाँ गाते हैं। लोग उन्हें इसी तरह से जानते हैं। जनखे या हिजड़े, पर यह पूरा सच नहीं है अपर्णा। बहुत से मां-बाप अपनी औलादों को छोड़ नहीं पाते। वे अपनी औलादों के सच को हकीकत नहीं मान पाते। वे उनकी पहचान को बदलने की कोशिश करते रहते हैं। वे दुनिया से बार-बार झूठ बोलते हैं। हर पल, हर कदम वे झूठ बोलते रहते हैं... एक ख्वाब के साथ कि उनकी औलाद ठीक-ठीक हो जाए जो वह चाहते हैं... पर ऐसा हो नहीं पाता। मुझे सिखाया गया कि यह बात हमेशा गोपनीय रहे कि मैं क्या हूँ। मुझे मेरे अम्मी-अब्बू ने हरपल खबरदार किया है कि यह बात कभी किसी को पता न चले...कभी नहीं...अगर वे जान गए कि मैंने तुम्हें कहा है, तो वे बुरी तरह से टूट जाएंगे...तुम समझ सकती हो...।” (बेदावा, पृष्ठ-94) 

परिवार के ख्वाबों तले टूटता रहता है एक होनहार छात्र, एक कलाकार। अम्मी-अब्बू की चाहत भारी पड़ती जाती है उसके मन-मस्तिष्क और जिस्म पर। उसके सोच-विचार पर। वह पढ़-लिखकर भी उन बेड़ियों से अलग नहीं हो पाता जो परिवार ने उसे पहनायी है। एक पढ़े-लिखे परिवार की जब यह गति-मति है तो बाकी समाज के बारे में सोचकर तो रूह काँपने लगती है...।

किन्नर विमर्श में सिर्फ़ किन्नरों के दैनिक जीवन के दुख ही नहीं होते, कुछ दुख ऐसे होते है जो उनके पूरे जीवन पर भारी पड़ते हैं। ख़ासकर जिन किन्नरों को घर की मर्यादा या माता-पिता की आकांक्षाओं-इच्छाओं पर जीवन होम करना पड़ता है। दरअसल, जब जीवन पर परिवार भारी पड़ने लगता है या माँ-पिता की इच्छाएँ तब किन्नर ही नहीं, एक आम बच्चे को जीवन जीना भी दूभर लगने लगता है। मन्नू भंडारी का उपन्यास ‘आपका बंटी’ इसका एक ज्वलंत उदाहरण है या मधु कांकरिया का ‘पत्ताखोर।’

इस उपन्यास से गुजरते हुए समाज के एक नंगे बिजली के तार को छू देने जैसा अनुभव होता है, अदीब को और हम पाठकों को भी। सच्चाई क्या है और हम किसे सच माने बैठे है। किन्नर विमर्श के दृष्टिकोण से देखें तो समाज नहीं, परिवार ही उनका पहला कब्रगाह होता है। समाज तो बाद में आता है। परिवार की इस सोच के पीछे कौन-सा सामाजिक मनोविज्ञान काम करता है? समाज इस समस्या को ऐसे क्यों देखता है? क्यों उन्हें उनके हिसाब से जीने नहीं देता? क्यों किसी की जिन्दगी को बर्बाद करने पर उतारू रहता है? उनकी आत्मा और शरीर को लहूलुहान करने पर उतारू रहता है?

इस ‘क्यों’ के जवाब की तलाश में इस उपन्यास को पढ़े-देखे जाने की जरूरत है। हर विमर्श के पीछे प्रश्न पूछने और उत्तरों को पाने की चाहत होती है। यह उपन्यास तो अपने अंदर विमर्शों की शृंखला लिए चलता है जो ‘शृंखला की कड़ियाँ’ की तरह एक-दूसरे से गुंथी हुई है। एक-दूसरे से नाभिनालबद्ध। अपर्णा-सुधीर का प्रेम एक नाबीना (दृष्टिहीन) और दृष्टिसम्पन्न व्यक्ति का प्रेम है। यहाँ एक दिव्यांग विमर्श देखा जा सकता है। अपर्णा के पहले प्रेमी जीवेश (बंडा) का जुनूनी प्रेम जो आगे चलकर हवश में तब्दील हो जाता है और धर्म की कट्टरता की तरफ़ मुड़ जाता है। अदीब और अपर्णा का प्रेम एक थर्ड जेंडर का प्रेम होते हुए भी प्रेम के उद्दात्त मूल्यों की तरफ इशारा करता है। इन सारे प्रेमों में एक कॉमन व्यक्ति है जिसका नाम अपर्णा है जो उपन्यास की मुख्य नायिका है। यहाँ स्त्री-विमर्श को भी देखा जा सकता है, पर स्त्री-विमर्श से पहले स्त्री अपर्णा को जान लें। वह यह जानते हुए भी कि अदीब के शरीर में एक स्त्री का मन है, आत्मा है। वह अदीब को दिलोजान से चाहती है। वह यह राज, राज ही रखती है कि अदीब पुरुष शरीर में एक स्त्री है। तब अदीब होनेवाले नाटक के इस संवाद को कहता है—“इश्क के दायरे नहीं होते हैं जहांपनाह। इश्क में जिस्म शामिल नहीं होता। इश्क तो मिट्टी से भी होता है हुजूर... तभी तो वह होता रहता है कायनात की हर शै से... इतना साफ-सुथरा होता है इश्क, इतना पाक कि हो सकता है वह खुदा से भी... इश्क का जिस्म से कोई वास्ता नहीं हुजूर-ए-आला...शहंशाहों के शहंशाह वाकिफ़ ही होंगे कि जिन्होंने कहा कि प्यार में शामिल होता है जिस्म, कि बिना जिस्म के प्यार में मुनासिब नहीं... उन्होंने, हाँ उन्होंने ही दगा दिया, उन्होंने दुनिया से दगाबाजियाँ की...।” (बेदावा, पृष्ठ-95)

अदीब जब नाटक के इस संवाद को दुहरा रहा था तब उसे कहाँ पता था कि एक दिन यही नाटक उसे अपर्णा से, अपने परिवार से और इस समाज से अलग कर देगा। यहाँ हम पाठकों का समाज के एक और भयावह रूप से परिचय होता है। दरअसल, अदीब उस नाटक में छत्रपति शिवजी का रोल प्ले कर रहा था और सुजान जो कि हिन्दू था वह औरंगजेब का। उसमें यह वाकया आता है कि शिवाजी औरंगजेब के दरबार में जाते हैं और उन्हें बैठने के लिए सामने की कुर्सी नहीं दी जाती। शिवाजी का अपमान और इस बात पर आपत्ति लाल टीका दल के लोगों को है कि शिवाजी तो कभी औरंगजेब के दरबार में गए ही नहीं। अगर गए तो ये संवाद ही सरासर गलत है—“मिट्टी से मोहब्बत लैला-मजनू की मोहब्बत के समान होती है जहांपनाह। मोहब्बत के दायरे नहीं हैं। देशप्रेम हो या कोई और प्रेम, दोनों की फितरत खुद को लुटा देने वाली होती है। प्रेम सर्वश्रेष्ठ मनोभाव है जहांपनाह आलमगीर। लाल टीका दल को इस संवाद में देशद्रोह दिख रहा था, क्योंकि यहाँ बड़ी चतुराई से देशभक्ति को देशप्रेम कह दिया गया था और उसे प्रेम और इश्क से जोड़ने की कुत्सित कोशिश भी की गई थी। फिर दृश्य में शिवाजी को तो दिखाया ही जा रहा था।” (बेदावा, पृष्ठ-88) 

आगे इसे अदीब के मुस्लिम होने और सुजान के हिन्दू होने से जोड़कर एक नया रंग दे दिया जाता है और अदीब और नाटक के निर्देशक तापस की दुनिया बदलने लगती है। एक नक्सलवाद (अदीब) की तरफ आगे बढ़ता है तो दूसरा (तापस) अवसरवाद की तरफ।

अवसरवाद और नक्सलवाद दरअसल है क्या? पूरे उपन्यास में कहीं भी अवसरवाद या नक्सलवाद को परिभाषित नहीं किया गया है। यह इस उपन्यास की भी खूबी है कि घटनाएँ पाठकों को पता बताती है कि कौन किस विचारधारा से प्रभावित हैं और अवसरवाद या नक्सलवाद क्या है? अवसरवाद को तो आजकल हर कोई जानता है लेकिन नक्सलवाद या नक्सली विचारधारा को जानने-समझने की जरूरत पड़ती है। 

इस उपन्यास में न नक्सलवादियों को और न ही नक्सलवाद को महिमामंडित किया गया है। न नक्सली दर्शन और साहित्य की बात की गई है और न किसी नक्सली नेता के मुँह से नक्सलवाद पर भाषण है। कोई नक्सली नेता आता भी नहीं उपन्यास में जो अदीब को प्रभावित करके नक्सलवाद की तरफ ले जाये। फिर भी अदीब नक्सलवादी बन जाता है और एक नक्सली की मौत मरता है। दरअसल, मनुष्य की मुक्ति के स्वप्न को देखनेवाला हर अदीब व्यवस्था की नजर में विद्रोही है, नक्सली है। पुलिस उसे बेरहमी से मार देती है। उसके घास-फूस के घर को जला देती है। मुक्तिबोध की काव्य-पंक्तियों को सबूत के तौर पर जब्त करती है कि ये कविता नहीं है, नक्सली साहित्य है और इसमें तो एक पुलिसवाला तो एम. ए. पास भी है। 

‘क्या मिला...?’

‘कागज का टुकड़ा...साबुत है, बिना जला...।’

‘पढ़ो...क्या लिखा है..।’

दूसरे ने पहले के हाथ से लटकते कागज के टुकड़े पर टार्च की रोशनी फेंकी—

“सफल जीवन बिताने में हुए असमर्थ तुम!

तरक्की के गोल-गोल

घुमावदार चक्करदार

ऊपर बढ़ते हुए जीने पर चढ़ने की

बढ़ते ही जाने की

उन्नति के बारे में

तुम्हारी ही जहरीली

उपेक्षा के कारण, निरर्थक तुम, व्यर्थ तुम।”

हाथ में मशीनगन लिए दूसरे ने टार्च बुझा दी। उसने दुहराया—‘उपेक्षा के कारण, निरर्थक तुम, व्यर्थ तुम’—फिर अँधेरे में खड़े जंगल को पल भर को देखा। फिर थोड़ा जोर से दुहराया—‘उपेक्षा के कारण, निरर्थक तुम, व्यर्थ तुम...।’’

‘लगता है कोई कविता है।’ पहले ने कहा।

‘ये लोग कविता भी पढ़ते हैं क्या...?’

‘हो सकता है पढ़ते हों...।’

‘नहीं, यह कविता नहीं है।’

‘अरे नहीं भाई, यह कविता है।’

‘यह कविता नहीं है। एकदम नहीं है।’

‘तुम इतना श्योर कैसे हो सकते हो कि यह कविता नहीं है?’

‘मैंने हिन्दी में एम. ए. किया है। मुझे पता है कि कविता कैसी होती है, यह कविता नहीं है।’ (बेदावा, पृष्ठ-139)

यह उच्चशिक्षा पर विमर्श ही नहीं एक करार झन्नाटेदार तमाचा है। काफ़ी लंबे समय के बाद मुक्तिबोध की कविताएँ उपन्यास में अपने तीक्ष्ण लावण्य के साथ उपस्थित होती है। एम. ए. पास पुलिस का एक सिपाही पूरे आत्मविश्वास से कहता है कि ये कविता नहीं है। मुक्तिबोध को कितना कम जानते हैं पढ़े-लिखे लोग, सिपाही, पुलिस, प्रशासन और हमारा समाज। लेकिन मुक्तिबोध जो कहना चाहते थे वह तो यही बात थी—“दंडकारण्य के जंगलों में कभी किसी लाश को देखकर दूसरे सिपाही को एक बहुत अजीब सा ख्याल आता है कि तुम भी गरीब और मैं भी गरीब...यह जो जंग है गरीब विरुद्ध गरीब...चलो इस जंग को यही खत्म कर देते हैं...एक गरीब अपने दुश्मन गरीब की बात मान ले...उससे हाथ मिला ले...फिर उसे लगता है कि इस तरह सोचना कितना तो गड़बड़ है...।” (बेदावा, पृष्ठ-144)

यह जो इस तरह एक सिपाही सोचता है। मुक्तिबोध भी ऐसे ही सोचते रहे होंगे तभी तो वैसी कविताएँ लिखते होंगे। उच्च शिक्षा पर छिड़ी सारी बहस, सारे विमर्श चूल्हे भाड़ में चले जाते हैं जब पढ़ने-लिखने का एक ही अर्थ रह जाता है—समझौता। तापस समझौता करता है लाल टीका दल और प्रशासन से। यह समझौता ही अवसरवाद है। सारे विमर्शों को यह समाज समझौतावादी ढंग से खत्म कर देना चाहता है और जो नहीं मानते अदीब की तरह, उनकी हत्या कर देता है और मुक्तिबोध की कविता तक को सबूत की तरह इस्तेमाल कर लेता है। यह है वर्तमान समाज जिसके लिए मुक्तिबोध ने कहा था— 

“कविता में कहने की आदत नहीं

पर कह दूँ

वर्तमान समाज चल नहीं सकता

पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता

स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी

छल नहीं सकता मुक्ति के मन को

जन को”

(मुक्तिबोध रचनावली-2, संस्करण-1986, पृष्ठ-350-51) 

लेकिन जिनका हृदय पूँजी से संचालित नहीं होता, जैसे डॉ. जोसेफ—तो वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। पूँजीवाद ने इस तरह से पूरे सिस्टम को अपने गिरफ़्त में ले लिया है कि उसके लिए लाभ के अतिरिक्त कुछ भी सोचना संभव नहीं। और जब डॉ. जोसेफ यह काम छोड़कर सरकारी महकमे में आ जाते हैं तो उनके सामने फिर वही सब उपस्थित हो जाता है, जिससे वे भागे थे। पूँजीवाद किसी महकमे को नहीं छोड़ता—चाहे वह गैर-सरकारी हो या सरकारी। इस व्यवस्था में अदीब जैसों को मरना ही पड़ता है और यही डॉ. जोसेफ उसके पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर लिखते हैं—मौत की वजह...। 

डॉक्टर जोसेफ लाल स्याही से पुलिस के कागजों में लिखते हैं—“पीठ, छाती और चेहरे पर खरोंच के गहरे निशान (संभवत: पथरीली जमीन पर घसीटे जाने की वजह से), दाहिने चेस्ट की पाँच पसलियाँ टूटी हुई, पेट के दाहिने हिस्से में गहरा घाव (किसी धारदार हथियार से हमले की वजह से), गर्दन के पीछे सर्वाइकल स्पाइन टूटी हुई (वहीं संभवत: पथरीली जमीन पर घसीटे जाने की वजह से), दाहिने टेंपोरल में गहरा घाव खोपड़ी के भीतर तक (बंदूक की गोली लगने से), बाई ह्यूमरस टूटी हुई...लगातार हुआ रक्तस्राव और ब्रेन के अंदरूनी हिस्सों में गंभीर चोट…” (बेदावा, पृष्ठ-159) 

अदीब के पोस्टमार्टम से शुरू हुआ उपन्यास, उसके पोस्टमार्टम रिपोर्ट के लिख चुकने के बाद खत्म हो जाता है और छोड़ जाता है कितने सारे सवाल? सवाल दर सवाल। दरअसल मनुष्यता के सवाल ही सभ्यता और संस्कृति के सवाल होते हैं। क्या हम सभ्य हैं? यह उपन्यास ऐसे सवालों को आपके अंदर फेन बुदबुद की तरह ही सही, पर उठाता है। यह प्रश्न उठना ही आपके अंदर के मनुष्य के जगे रहने का सबब बनता है। नहीं तो मुर्दे और जिन्दा लोगों में फ़र्क़ करना भी मुश्किल हो जाएगा। मनुष्य बने रहना मुश्किल हो जाएगा।

एक पुरुष शरीर में सिर्फ़ स्त्री-मन ही नहीं है यहाँ, यहाँ एक मानववादी मनुष्य है जो पूरी मानव जाति से प्रेम करता है। उसके लिए स्त्री-पुरुष महत्वपूर्ण नहीं है। प्रेम महत्वपूर्ण है। उसी का प्रतिफलन उसकी प्रेमिका अपर्णा में देखा जा सकता है जो नाबीना (जन्म से अंधे) सुधीर से दिलो-जान से प्रेम करती है। उसे अपने पहले प्रेम के बारे में सब सच-सच बतलाती है और एक दिन अपने घर-परिवार में माता-पिता को सब सच बताकर सुधीर के यहाँ रहने चली आती है। यह आपको ‘होगी प्रेम की जीत’ टाइप किसी फिल्म की कहानी लग सकती है लेकिन है नहीं। यहाँ वर्तमान समय अपनी भयावह उपस्थिति को हमेशा बनाए रहता है। कई परतों की सच्चाइयाँ यहाँ दबी-ढकी रहती है जो जरा से हवा के झोंके से सामने आ जाती है, जैसे लाल टीका दल की ये सच्चाई।

‘लाल टीका दल’ जो कि हम जानते हैं कि एक तथाकथित पार्टी है, उनका दृष्टिकोण स्त्रियों के प्रति जरा भी नहीं बदला है—“ लाल टीका दिल के एक लड़के ने जीवेश को सलाह दी थी कि वह थोड़ा अंग्रेजी सीख ले। अंग्रेजी से लड़कियों पर ख़ास रुआब पड़ता है। सो उसने पास ही एक अंग्रेजी लर्निंग स्कूल से अंग्रेजी सीख ली। उसने अंग्रेजी में बड़ा दिल लगाया। दोस्त का ही क्या, दल के सारे सदस्यों का मानना था की अंग्रेजी बड़ी जरूरी है। सालभर में उसे ख़ासी अंग्रेजी आ गई। अब वह जब भी कहीं बाहर जाता साथ में अंग्रेजी का एक नॉवेल भी अपने हाथ में रखता। एक जेब में एंड्रॉयड का मोबाइल, कान में ईयरफोन और हाथ में अंग्रेजी का नॉवेल। लाल टीका दल का मुखिया कहता कि जब भी लड़की पटाओ, मुहिम में जाओ तो भूल कर भी टीका न लगाओ। इससे मकसद में खलल पड़ता है। टीके से उस महजब की लड़कियाँ आकर्षित नहीं होती हैं, जो कि हमारा टारगेट ग्रुप है। सो वह सुबह के लगे टीके को पोंछकर ही घर से निकलता। बड़ी नफासत भरी अंग्रेजी में लड़कियों से बात करता। अंग्रेजी के नॉवेल को एक हाथ से दूसरे हाथ में पकड़ता रहता है या यूँ ही उसका कोई पेज खोलकर उस पेज को निहारता रहता। किसी लड़की को पता न चलना था कि माजरा क्या है?” (बेदावा, पृष्ठ-111)

कहने का अर्थ यह है कि अभी भी स्त्रियों को ही टारगेट किया जाता है, किसी से भी बदला लेना हो तो स्त्रियाँ सबसे ख़ास हो जाती हैं। धार्मिकता की आड़ में भी स्त्रियों का ही शिकार किया जाता है। जबकि अपर्णा के पिता अपनी बेटी अपर्णा और उसकी माँ के प्रति खासे उदारवादी है। सुधीर, अदीब या और भी पात्र उदारवादी है। लेकिन समाज कुछ मुट्ठीभर लोगों से नहीं बनता। समाज की खूबसूरती पर दाग-धब्बे की तरह ये मुट्ठीभर लोग, समाज को अपने नापाक इरादों से शर्मशार करते रहते हैं।

कभी सिमोन द बोउआर ने कहा था—‘स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बनाई जाती है।’ इस उपन्यास में स्त्रियों के प्रति उदार दृष्टिकोण तो है लेकिन कुछ पात्रों के पास। अपर्णा बला की खूबसूरत है। उसकी सहेली उसे कहती है—“तुम बहुत हसीन हो। जब और बड़ी होओगी तब सारी दुनिया तुम्हें घूरेगी। तब क्या करोगी? इसकी आदत डाल लो।” (बेदावा, पृष्ठ-10)

यह वाक्य एक स्त्री या लड़की, एक दूसरी लड़की को कह रही है। कहने का मतलब यह है कि आप विरोध मत करो, चुपचाप उसे सह जाओ क्योंकि अभी बड़े होने पर इसे और सहना है तो आदत डाल लो। दरअसल यह उसकी सहेली नहीं, एक पितृसत्तात्मक समाज बोल रहा होता है। रेखा कस्तवार ने सही लिखा है कि “औरत की देह के बारे में बोलना आसान है, खासकर मर्द होकर बोलना आसान है किन्तु उसकी देह के बारे में उसकी तरह बोलना आसान नहीं।” (स्त्री-चिंतन की चुनौतियाँ, पृष्ठ-20) 

इस उपन्यास में अपर्णा या उसकी सहेली अपनी देह के बारे में भले न बोल पाए लेकिन अदीब बोलता है। वह पूरे स्त्री समुदाय की तरफ से बोलता है। वह बोलता ही नहीं, एक कदम आगे बढ़कर बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष भी करता है। इसलिए मारा भी जाता है। उसके मरने पर उपन्यास का अंत होता है लेकिन अंत होने से पहले वह वे सारे कार्य कर जाता है जो पाठकों के दिलों में अग्नि प्रज्वलित कर जाती है। वे सारे विमर्श जो हमारे अन्तस् को झकझोर कर जगा दे, उनकी कुंडिया खड़खडाकर हमें नींद से जगा देता है। दरअसल एक बड़ी रचना जिस तरह अपने समय में हस्तक्षेप करती है, ‘बेदावा’ उसी तरह हस्तक्षेप करती है। यह हस्तक्षेप करना ही इस समय में सबसे जरूरी कार्य है।

 

(यह आलेख डॉ. संगयोगिता वर्मा ने लिखा है। वह साहित्य की अध्येता है।)

 

[तरुण भटनागर की पुस्तकें यहाँ से प्राप्त करें।]