उजला अँधेरा : आँसुओं में घुलकर बनी स्याही से लिखा गया उपन्यास

कैलाश वानखेड़े के उपन्यासउजला अँधेराकी समीक्षा 

समीक्षक : डॉ. संजय जोठे 

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शहर एक विशालकाय तिलिस्म है, एक जादुई कुंड जो गरीबों को अपनी चकाचौंध से बुलाता है, और फिर धीरे-धीरे उनकी रूहों को निचोड़कर उनकी हड्डियों से अपने महल खड़े करता है। शहर का अपना मन होता है, अपनी वासनाएँ, अपनी पसंद और नापसंद। यही सब उस तिलिस्म को बनाते हैं। यह तिलिस्म देखने में जितना मोहक है, उतना ही क्रूर भी है। ये एक ऐसा भ्रमजाल है जो उजाले की आड़ में अँधेरे को छिपाता है। और जब इस तिलिस्म में एक दलित प्रवेश करता है, तो उसकी आँखों में जो उम्मीद की चमक होती है, वह बहुत जल्द उस रोशनी की तपिश में जलने लगती है। फिर ऐसा बहुत कुछ होता है जिसे समझा जाना ज़रूरी है।

शहर का जीवन दलित के लिए कोई नया जन्म नहीं, एक और असल में ये गाँव के ही जीवन की एक ख़ास क़िस्म कापुनर्जन्महैजहाँ गाँव के अपमान की विरासत शहरी अपमान के सूट-बूट में सामने आ खड़ी होती है। जाति यहाँ परंपरा नहीं, प्रणाली बन जाती है। गाँव में वह सम्मानित बस्तियों और टोले से बाहर था। वहाँ एक दलित सम्मानित गलियारों में घुस नहीं सकता था। यहाँ शहर में वह बस्ती के बाहर नहीं बल्कि भीतर कैद है। यहाँ वो झुग्गी बस्तियों से बाहर नहीं निकल सकतागाँव से शहर की यात्रा में कुल यही बदलाव उसकी ज़िन्दगी में आता है। गाँव में छुआछूत खुली गाली थी, शहर में वह शालीन मुस्कान में लिपटा हुआ नकार हैसाक्षर, सुसंस्कृत, लेकिन उतना ही तीखा और अमानवीय।

कैलाश वानखेड़े का उपन्यासउजला अंधेराइस तिलिस्मी यथार्थ का दस्तावेज़ हैएक ऐसा दर्पण जिसमें शहर का सारा शृंगार उतर जाता है और भीतर का कौरूप, दुर्गन्ध और रोग एकसाथ नज़र आने लगते हैं। इस उपन्यास में वे दरारें उजागर होती हैं जिनमें दलितों का ख़ून, पसीना और सपने दबे हुए हैं। यह उपन्यास नायक की कहानी तो है ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा यह उस सामूहिक मन की कथा है, जो हर पीढ़ी में, हर गली में, हर जलती हुई रोटी के भीतर पुनर्जन्म लेता है।

नायक का पिता पंचर की दुकान चलाता है। लेकिन वह पंचर नहीं बनाता। वह समय के टूटे हुए चक्रों को जोड़ने की कोशिश करता है। उसका काम सिर्फ़ पंचर की मरम्मत नहीं है, व्यवस्था की दरारों को हर दिन पाटना है। लेकिन ये दरारें इतनी गहरी हैं कि हर कोशिश के बाद वे और खुल जाती हैं। दूसरों के पहियों में हवा भरने वाले पिता की ख़ुद की छाती में जीवन के लिए जगह सिमटती जा रही है। 

नायक की माँ एक औरत नहीं, एक खोई हुई संस्कृति की पुकार है। वह दिन भर एक ख़ास क़िस्म के संयम में जीती है, क्योंकि बाहर शौचालय नहीं है। वह कम खाती है, कम पीती है, ताकि रात के अँधेरे और दिन के उजाले में भी उसे बाहर न जाना पड़े। वह भारतीय शहरों में दलित औरत की वह जीवित कथा है जो हर बार अपनी देह की ज़रूरतों से समझौता करती है। झोपड़ी के एक कोने में जब वह चूल्हा जलाती है, तो वह केवल खाना नहीं पकातीवह धुएँ के साथ उस अँधकार को भी बाहर निकालती है जो उसके अस्तित्व में जमा होता गया है। उसकी साँसों में राख बसती जाती है और एक दिन वह बीमार पड़ जाती है। लेकिन यह बीमारी शरीर की नहीं, उस पीड़ा की है जो लंबे समय से उसके भीतर बैठी रही।

इस झुग्गी बस्ती में बारिश कोई मौसम नहीं है। बारिश यहाँ एक पर्दा हटाने को आती है। उस अमानवीय जीवन की पोल खोलने आती है जो बस्तियों में नालियों के साथ बहता है। इस बस्ती की ज़िन्दगी शहर की गटर पर फैली पोलिथीन जैसी होती हैऊपर से चमकदार, नीचे से सड़ांध भरी। नायक जब अपने घर में पानी भर जाने के बाद बाल्टी से उसे बाहर फेंकता है, तो वह केवल घर नहीं बचा रहा होता, वह व्यवस्था के खिलाफ़ एक मौन युद्ध लड़ रहा होता है। यह युद्ध तलवारों या बंदूकों का नहीं है। यह थाली, तपेली, बाल्टी और भीगी हुई किताबों का हैएक ऐसा प्रतिरोध, जो रोज़मर्रा की थकान में गुम हो जाता है।

एक अनजान बीमारी नायक के भाई को खाये जा रही है। डॉक्टर की फीस, दवा की पर्ची, अस्पताल की सातवीं मंज़िल से दिखता आसमानसब उस परिवार के लिए एक सपना बन जाते हैं। और फिर एक दिन वह भाई दुनिया छोड़ जाता है। उसका जाना केवल एक निजी शोक नहीं, वह उस पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके पास इलाज के नाम पर केवल प्रतीक्षा और प्रार्थना होती है।

प्रशांत काका कलाकार हैंजिनकी दुनिया में तरन्नुम है, साज़ हैं। लेकिन रोटी नहीं। उनका हारमोनियम कबाड़ी की दुकान से आया है, लेकिन क्रांति के सुर छेड़ता है। उनकी संगिनी बिना किसी सामाजिक मान्यता के उनके साथ रहती है, इस उपन्यास का वह स्त्री-पक्ष है जो अपनी एजेंसी ज़ाहिर करता है, निर्णय लेता है, प्रेम करता है, और समाज की निगाहों से बेपरवाह बिंदास जीता है। यह रिश्ता कोई अधूरी परंपरा नहीं, वह पूरी आधुनिकता की वह मुकम्मल घोषणा है जिसे शहर ने अब तक पहचान तो लिया है लेकिन सिर्फ़ अमीर लोगों के लिए। अमीरों का लिव इन यासंबंधहमेशा स्वीकृत रहे हैं। लेकिन दलितों कालिव इनना जाने कैसे कैसे सवाल उठाता है। यह दलितों से बैर का नतीजा है? या स्त्री से? या दलित स्त्री से?

एक दृश्य में प्रशांत काका और नायक के पिता के बीच बहस होती हैजाति बनाम वर्ग को लेकर। प्रशांत काका के लिए असली लड़ाई वर्ग की है, और जब तक संसाधनों पर कब्ज़ा नहीं छूटेगा, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। लेकिन पिता की आवाज़ में अंबेडकरी तल्ख़ी है। पिता ज़ोर देकर कहते हैं, "जब हमारे दूल्हे को घोड़ी से उतारा जाता है, तब वह मज़दूर नहीं, दलित होता है।" यह बहस उपन्यास के बौद्धिक विमर्श की नींव बन जाती है। इस बिंदु पर मार्क्स और अंबेडकर की विचारधाराएँ आमने-सामने आती हैं।

दादी एक विद्रोही परंपरा की वारिस हैं। वे जब प्रशांत काका की संगिनी को कहती हैं, "मेरे सामने घूँघट मत करना, जिसके साथ जीना है, खुलकर जियो।" यह कोई पारिवारिक अनुमति नहीं, बल्कि दलित स्त्रीवादी चेतना का शिखर है। दादी के शब्दों में वह ठसक नहीं, वह अनुभव है जो हर दलित औरत की रसोई और राख में दबा रहा हैऔर अब आग बनकर फूट पड़ा है। यह फेमिनिज़्म किसी आयातित आन्दोलन का हिस्सा नहीं, यह जले हुए चूल्हों और भीगे हुए आँगनों की मिट्टी से उपजा हुआ नारीवाद हैजिसमें मुक्ति का स्वाद है, और समानता की भूख भी।

शहर की सड़कें काग़ज़ माँगती हैं। वे उन्हें ही पहचानती हैं, जिनके पास काग़ज़ हैंमकान के, नौकरी के, जाति के। बाकी लोग बस रेखाओं के पार खड़े होते हैंअवैध, अनदेखे, अनकहे। जब किसी दलित दूल्हे को घोड़ी से खींचकर नीचे उतारा जाता है, तो यह केवल परंपरा की रक्षा नहीं होतीयह उस स्वप्न की हत्या होती है जिसमें एक दलित पहली बार बराबरी की कल्पना करता है। थानेदार की हँसी—"घोड़ी पर बैठने की क्या ज़रूरत थी"—इस व्यवस्था का वह वाक्य है, जो हर बार, हर शहर में दोहराया जाता है, बस पात्र और स्थान बदल जाते हैं।

उपन्यास का नायक कोई नायक नहीं हैवह एक सामान्य युवक है, जो बस जीना चाहता है। लेकिन हर सुबह उसे अपनी जाति, अपनी गरीबी, अपनी अस्मिता की परछाईं ओढ़नी पड़ती है। वह एक कोना चाहता हैएक छोटी सी जगह जहाँ वह बैठ सके, सोच सके, पढ़ सके। लेकिन उस कोने के लिए भी उसे संघर्ष करना पड़ता है। वह कोना कोई आलीशान कमरा नहींवह बस एक टेबल और एक बल्ब की माँग है। लेकिन शहर के नक्शों में ऐसी माँगों के लिए कोई जगह नहीं।

उजला अँधेराउस स्याही से लिखा गया उपन्यास है, जो आँसुओं में घुलकर बनी है। इसमें कोई नाटकीयता नहीं, कोई बड़ा मोड़ नहींबस जीवन की वह थकान है, जो हर बार एक नई सुबह में ढलती है और हर बार फिर एक नए अँधेरे में बदल जाती है। यह उपन्यास बताता है कि अँधेरा केवल रोशनी के अभाव में नहीं होताकभी-कभी उजाले की अति भी अँधेरा बन जाती है। जब हर जगह रोशनी हो, लेकिन आँखें फिर भी कुछ न देख पाएँ, तब जो होता है, वही उजला अँधेरा है।

यह उपन्यास हमारे समय का दस्तावेज़ है, हमारी ग़लतियों का लेखा-जोखा, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सवालकि क्या शहर सिर्फ़ इमारतों से बनता है? या उन धड़कनों से भी जो उन इमारतों के साए में रोज़ दम तोड़ती हैं? यह एक ऐसा पाठ है जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो सोचता है कि वह प्रगतिशील है, मानवीय है, और समतावादी हैक्योंकि शायद वह भी किसी न किसी उजले अँधेरे में जी रहा है, जिसे पहचानना अभी बाक़ी है।

 डॉ. संजय जोठे 

(एसोसियेट प्रोफ़ेसर, गांधियन सेंटर फॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल इक्विटी, आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर मध्यप्रदेश) 

 

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