रसभाँग : क़िस्से, इतिहास, मौज और सफ़र

अक्षय बहिबाला की किताब ‘रसभाँग’ पर प्रभात रंजन की टिप्पणी 

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मैं पहले सोचता था कि भाँग मूलतः बिहार के मिथिला, यूपी में बनारस और उसके आसपास और मध्य प्रदेश में मालवा की संस्कृति से जुड़ा हुआ है और अधिकतर वहीं के लोग इसका सेवन करते होंगे। लेकिन अक्षय बहिबाला की किताब ‘रसभाँग’ पढ़ी तो पता चला कि इसका प्रचलन उड़ीसा में बहुत अधिक है और वहाँ हाल तक औषधि के रूप में भाँग खिलाया जाता रहा है। 

उड़ीसा में वैद्य को कबिराज कहा जाता है और कबिराजों की हज़ारों साल पुरानी चिकित्सा परम्परा में भाँग को बहुत महत्व दिया जाता रहा है। मुझे याद आता है कि बिहार में भी औषधि के रूप में इसको खाने की परंपरा रही है। 

मेरे गाँव में एक जाति की पंचायत ने अपनी जाति के लोगों में नशे को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। अब जो नशेड़ी थे उन्होंने इसका रास्ता निकाला और अपनी जाति पंचायत के प्रमुख के पास जाते और पेट खराब होने की शिकायत करते तो जाति पंचायत प्रमुख उनको रात में दवा के रूप में भाँग खाने की इज़ाजत दे देता। इस तरह जाति पंचायत का आदेश भी रह गया और भंगेड़ियों का काम भी चल गया।

अक्षय बहिबाला की किताब से ही पता चला कि यूनानी तिब्बती परंपरा में भी भाँग को औषधि के रूप में दिए जाने की परंपरा पुरानी रही है। आज भी दिल्ली यूपी समेत अनेक राज्यों में भाँग सरकारी दुकानों के माध्यम से बेची जाती है। अलबत्ता गाँजा जरूर प्रतिबंधित है। 

दिलचस्प बात याद आई कि कुछ साल पहले उड़ीसा में सरकार ने जब गाँजे के साथ भाँग को भी प्रतिबंधित किया तो उड़ीसा के एक सांसद तथागत सत्पथी ने इसको ‘अभिजात करतूत’ कहा था। वहाँ के अनेक सांसद तथा कार्यकर्ता गाँजे, अफ़ीम की वैध तथा क़ानूनी आपूर्ति के लिए अभियान चला रहे हैं। उनका तर्क यह है कि इससे देश में हेरोइन और कोकीन की लत को कम करने में मदद मिलेगी। 

अक्षय बहिबाला की किताब में गाँजे और अफ़ीम की खेती, व्यापार को लेकर भी दिलचस्प बातें हैं। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी इस किताब का हिन्दी अनुवाद व्यालोक पाठक ने किया है। 

 

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लेखक की फेसबुक वॉल से साभार