स्मृतियों का कोलाज ‘बख़्तियारपुर’ 

विनय सौरभ के कविता-संग्रहबख़्तियारपुरपर पुरू मालव की टिप्पणी 

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विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता की पंक्तियाँ हैं

कितना बहुत है 

परन्तु अतिरिक्त एक‌ भी नहीं 

एक पेड़ में कितनी सारी पत्तियाँ 

अतिरिक्त एक पत्ती नहीं 

एक कोंपल नहीं अतिरिक्त 

एक नक्षत्र अनगिन होने के बाद। 

बख़्तियारपुरकी कविताओं से गुज़रते हुए ये पंक्तियाँ अचानक याद आ जाती हैं। एक भरा-पूरा संग्रह होने के बाद भी कोई कविता अतिरिक्त नहीं लगती। एक विषय पर एकाधिक कविताएँ हैं किन्तु एक भी कविता अतिरिक्त नहीं लगती है।

कालानुसार कवि की रचना-प्रक्रिया परिवर्तित और परिपुष्ट होती रहती है। कवि की प्रारंभिक और अद्यतन कविताओं में विचार और शिल्प के रूप में विभेद दृष्टिगत हो जाता है। 

इस संग्रह की कविताओं में उनका रचना समय अंकित नहीं है फिर भी मोटे तौर पर अनुमान लगाया जा सकता है कि एक विस्तृत समय के कई कालखण्डों में इनकी निर्मिती हुई हैं। दो कविताओं के रचना समय में बहुत कम और बहुत अधिक अन्तराल भी रहता है और कभी कवि के रचना कर्म में ही लम्बा अन्तराल आ जाता है। कवि नवीन प्रयोग करता है। अपना मुहावरा भी गढ़ता है। उसके पात्र और विषय बदलते हैं। सारांश यह कि एक ही संग्रह की कविताओं में आधारभूत अन्तर आ जाता है। किन्तु इस संग्रह की कविताओं पढ़ते हुए उनके रचना-समय का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। शिल्प और भाव की दृष्टि से प्रत्येक कविता परिपक्व है। लगता है जैसे एक ही समय विशेष में इनकी रचना हुई हैं। यह कवि-कौशल भी है।

इन कविताओं में पिता कई बार आते हैं; पिता के भी कई रूपों में। कवि की स्मृति में पिता का जीवन और जीवन का संघर्ष; पिता की मृत्यु और मृत्यु से संघर्ष सदैव बना रहता है।

संग्रह की शीर्षक कविताबख़्तियारपुरकोस्मृति की स्मृतिकी कविता कहा जा सकता है।‌ कवि की स्मृति में पिता हैं किन्तु पिता की स्मृति में बख़्तियारपुर शहर है। कवि जब पिता को याद करता है तो बख़्तियारपुर भी याद आता है। उसकी स्मृति में एक व्यक्ति भी है और एक स्थान भी। वह दोनों का स्मरण करता है।

विडम्बना यह भी है कि जो चीज़ें हमारी स्मृति में बनी रहती हैं, हम उन्हें देखने से या‌‌ उनके समीप जाने से भी बचते रहते हैं। क्योंकि समय के दीर्घ‌ अन्तराल में या तो वो चीज़ें खो जाती हैं या उनका स्वरूप वो नहीं रहता जो हमारी स्मृति ने स्वीकार किया है।

गिरिडीह बहुत अच्छा शहर थाकविता में कवि कहता है

उस शहर में मत जाओ 

जहाँ तुम्हारा बचपन गुज़रा

अब वो वैसा नहीं मिलेगा 

जिस घर में तुम किरायेदार थे 

वहाँ कोई और होगा 

तुम उजबक की तरह 

खपरैल वाले उस घर के दरवाज़े पर खड़े होगे और 

कोई तुम्हें पहचान नहीं पाएगा 

मनुष्य की सामाजिक और भौगोलिक स्थितियाँ अलग हो‌ सकती हैं किन्तु संवेदना का तन्तु एक ही होता है। कवि के जीवन के व्यक्तियों, स्थानों और‌ घटनाओं से पाठक का परिचय प्रायः नहीं रहता है। किन्तु उसके स्वयं के जीवन में भी बहुत कुछ घटित होता है। वो भी कभी पीछे मुड़कर पीछे छूट चुके व्यक्तियों और स्थानों को देखता है और ये देखना कवि और पाठक का एक‌ जैसा होता है। एक व्यक्ति के जीवन का एक भाग ऐसा होता है जिसे वो बार-बार देखना चाहता है। 

नोनीहाट, दुमका, गिरिडीह, भागलपुर, बख़्तियारपुर जैसे गाँव-शहर हमारी भी स्मृति में होते हैं। असगर मियां, रामरूप, इसराइल, राजेन्दर, गंगेसर राम, सुकांत, रमेश, राधे चा, रहमान दर्जी, ख़ान बहुरुपिया, खोगेन विष्णु, वासु दा, सुबन्धु, सुखदेव मरांडी, देवी प्रसाद शेट्टी, शंकर साह जैसे व्यक्ति हमारे भी जीवन में आते हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है जैसे हम मुड़कर अपना ही जीवन देख रहे हैं।

कवि के पास स्थानों, व्यक्तियों और वस्तुओं की इतनी स्मृतियाँ है कि यदि इस संग्रह कोस्मृतियों का कोलाजकहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

लेकिन अपनी परछाई की तरह कई चीजें 

उम्र भर लगातार हमारा पीछा करती है 

स्मृतियों की कविताओं की बहुलता के आधार पर कवि को स्मृतियों का कवि कहना समीचीन नहीं होगा। अतीत से गहरे जुड़ाव के बाद भी वो वर्तमान से विमुख नहीं है। उसकी आँखें कल और आज दोनों पर टिकी हैं। संग्रह की अन्तिम कवितामानहानिआज के समय का कटु यथार्थ है। इसे पढ़कर ही हम समझ जाते हैं आज सत्ता, साहित्य‌ और पत्रकारिता का कितना पतन हो चुका है।

और अन्त में इतना ही कि यह संग्रह, कविता संग्रह ही नहीं; कवि का आत्मकथ्य, संस्मरण, डायरी सब कुछ है। क्योंकि सभी विधाओं का सार कविता है। 

— पुरू मालव 

 

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