रतन थियाम : भारत के एक वैश्विक रंग निर्देशक

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी रतन थियाम को अमितेश कुमार की श्रद्धांजलि

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भारतीय रंगमंच के आखिरी महान रतन थियाम नहीं रहे। हो सकता है कि यह पद अतिश्योक्तिपूर्ण लगे लेकिन यह सच है। बीसवीं सदी में निश्चित दिशा, दृष्टि और अभिनेताओं के दल के साथ निरन्तर और सार्थक रंग रचना करने वाले निर्देशकों की वह आखिरी कड़ी थे।

रतन थियाम के पिता थियाम तरुण कुमार और माता बिलासिनी देवी मणिपुरी के नर्तक थे। कला और संस्कृति की शुरूआती शिक्षा उन्हीं के साथ हुई जिनकी प्रस्तुतियों के साथ रतम थियाम भी यात्रा करते थे। चित्रकला और कविता से शुरू करने के बाद वह रंगमंच के क्षेत्र में आए और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण प्राप्त किया। 

जब उन्होंने अपनी रंगयात्रा शुरू की तो ‘थियेटर ऑफ रूट्स’ का नारा जोर पर था। गिरीश कारनाड, विजय तेंदुलकर, हबीब तनवीर के नाटक सफलता से मंचित हो चुके थे। के.एम. पणिक्कर और ब. व. कारंत के सफल रंग प्रयोगों नें इसे और दृढ़ किया और रतन थियाम ने इसको आगे बढ़ाया। 

उन्होंने अपनी रंगभाषा को मणिपुर की स्थानीय कला और संस्कृति के रूपों से जोड़ा। मणिपुरी नृत्य और ‘थांगता’ जैसी युद्ध कला का प्रभाव उनकी रंग भाषा पर स्पष्टता से दिखता है। स्थानीय परम्पराओं को आधुनिकता से जोड़ते हुए उन्होंने ऐसी रंगभाषा गढ़ी जिसके वैश्विक दर्शक थे। 

मणिपुरी समझ में ना आने के बावजूद उनके रंगमंच का सौन्दर्यबोध दर्शकों को बांधे रखता था जिसमें वह अभिनेत्री की देह गतियों, आवाज़ के उतार-चढ़ाव, प्रभावी दृश्य रचनाओं, नियंत्रित और अनुशासित प्रकाश व्यवस्था से एक जादू रचते थे। मंच पर भव्य और विराट दृश्य प्रतीकों के प्रयोग से ऐसा लगता था कि उनके रंगमंच में संसाधन का इस्तेमाल बहुत होता था लेकिन करीब से देखने-जानने वाले जानते थे कि यह न्यूनतम संसाधनों से किया गया खेल होता था। 

रंगमंच की सभी विधाओं में वह पारंगत थे लेकिन निर्देशक और संगठनकर्ता सबसे ऊपर था। मंच पर प्रकाश में वह अँधेरे और उजाले से खेलते थे। खामोशी और अँधेरा उनकी रंगभाषा का अनिवार्य तत्व था। वह अपनी प्रस्तुतियों को लगातार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ले गए और सही मायनों में भारत के एक वैश्विक रंग निर्देशक बने। 

उन्होंने संस्कृत, मणिपुरी, हिन्दी के साथ-साथ विदेशी भाषाओं के नाटकों की भी प्रस्तुति की जिनमें कालिदास, शेक्सपियर और इब्सन जैसे नाटककारों के नाम शामिल हैं। 

अभिनेताओं के एक ही समूह के साथ निरन्तर सक्रिय रहते हुए वह प्रस्तुतियाँ तैयार करने में समय लेते थे। वह ऐसे आखिरी निर्देशकों में से थे जिनकी प्रस्तुतियाँ गहन तैयारी और दृष्टि का उत्पाद थीं, ना कि किसी होड़ का हिस्सा। 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से 1974 में स्नातक होने के पश्चात वे अपने राज्य मणिपुर वापस लौट गए और 1976 में इंफाल में बारह रंगकर्मियों के साथ एक कोरस रेपर्टरी थियेटर कंपनी की स्थापना की। 

भास की रचनाओं ‘उरूभंगम’ औऱ ‘कर्णभारम’ की प्रस्तुतियों से उन्होंने सबको प्रभावित किया। 1984 में उनके अपने द्वारा लिखी गई ‘चक्रव्यूह’ उनकी सबसे चर्चित प्रस्तुति थी। हिन्दी नाटकों में उन्होंने धर्मवीर भारती की ‘अंधा युग’ और ‘कनुप्रिया’ और अज्ञेय की ‘उत्तर प्रियदर्शी’ की प्रस्तुति की। 

रंग आलोचकों की अक्सर एक शिकायत रहती है कि मणिपुर का उनके काम में बस शोभावर्द्धक इस्तेमाल है, मणिपुर की राजनीतिक और संकटजन्य परिस्थितियों का अक्स उनके रंगमंच में नहीं दिखता है। लेकिन यह महज शिकायत ही है। मणिपुर के राजनीतिक परिवर्तनों से उनका व्यक्तित्व और जीवन प्रभावित रहा। उन्होंने मणिपुर त्रयी के अंतर्गत ‘नाइन हिल्स वन वैली’, ‘हे नुनंगशिबी पृथ्वी’ और ‘वाहडोक’ की प्रस्तुति की जो मणिपुरी संस्कृति के संकटों और वहाँ व्याप्त हिंसा पर आधारित था। वर्तमान में चल रहे मणिपुर संकट पर भी बेहद उद्देलित थे और लगातार मुखर भी। 

1987 में रतन थियाम एक बार फिर दिल्ली लौटे, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक बनकर। उनके द्वारा कायम किया जा रहा अनुशासन छात्रों को रास नहीं आया और उनका विरोध शुरू हो गया जिसके कारण उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। 2013 से 2017 तक वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अध्यक्ष भी रहे और इस दौरान थियेटर ओलम्पिक्स का आयोजन भी कराया जिसमें वैश्विक रंग प्रस्तुतियों ने प्रतिभाग किया था। 

मैंने उनकी पहली प्रस्तुति ‘व्हेन वी डेड अवेकन’ देखी थी जो इब्सन फेस्टिवल के दौरान कमानी सभागार में हुई थी और आखिरी प्रस्तुति 2020 के भारत रंग महोत्सव के समापन में ‘लाइरेम्गीबी एशाई’ में। वैसे उनकी आखिरी प्रस्तुति धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ थी जिसके साथ वह यात्रा भी कर रहे थे। ‘लाइरेम्गीबी एशाई’ की प्रस्तुति के बाद घुटनों में दर्द होने बावजूद वह अपने सिग्नेचर स्टाइल में अपने कलाकारों के साथ दर्शकों के अभिवादन के लिए झुके थे। यह प्रस्तुति थियम की पिछली प्रस्तुति ‘मैकबेथ’ की कड़ी में थी जिसमें मैकबेथ की महत्त्वाकांक्षा को एक ऐसी मानवीय होड़ से जोड़ा था जिसका असर परिवेश पर भी पड़ा है। 

सदी की यात्रा में मनुष्य ने तकनीक के साहचर्य में समय की अनिवार्यता का हवाला देकर जिस विकास का रास्ता चुना है, उसमें वह वैश्विक तो हुआ है लेकिन अपने बक्से में बंद भी है। उसका दुनियावी संपर्क जीवंत कम, आभासी अधिक है। और इस क्रम में प्रकृति से असंबद्धता के कारण संस्कृति के जैविक तत्वों से दूर होता गया है। इसको उभारते हुए उन्होंने इस प्रस्तुति में निरन्तर प्रकृति के क्षरण की चिंता की थी। प्रकृति उनके चिंतन का हिस्सा थी जिसके बारे में वह अक्सर बातचीत करते थे और कालिदास के ‘ऋतुसंहारम’ की प्रस्तुति में पहले भी व्यक्त किया था।

लंबे कद के, सीधे तने हुए और बुलंद आवाज वाले रतन थियाम छ: भाषाएँ लिखते-बोलते थे और आठ भाषाएँ समझते थे। उनको मिलने वाले पुरस्कारों की भी एक लंबी सूची है जिसमें संगीत नाटक अकादमी, पद्मश्री, इत्यादि शामिल है। 1948 में जन्मे रतन थियाम में अभी रंगमंच बचा हुआ था लेकिन तीन महीनों से वह गंभीर रूप से बीमार थे और पिछले पन्द्रह दिन बहुत तकलीफ़ में थे। बीती रात डेढ़ बजे के करीब भारतीय रंगमंच का यह सितारा बुझ गया लेकिन अपनी एक अमिट छाप हमारे दिलों पर छोड़ गया। 

 

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