नून मीम राशिद जिनका पूरा नाम नज़र मोहम्मद राशिद था, उर्दू साहित्य के एक प्रमुख आधुनिकतावादी शाइर हैं। वे उर्दू शाइरी में ‘आज की शायरी’ (Modern Urdu Poetry) के अग्रदूत माने जाते हैं और ख़ासकर आज़ाद नज़्म के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। अमिताभ सिंह बघेल द्वारा सम्पादित उनकी किताब ‘ज़िन्दगी से डरते हो’ से कुछ नज़्में प्रस्तुत है:
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ज़िन्दगी से डरते हो
ज़िन्दगी से डरते हो!
ज़िन्दगी तो तुम भी हो ज़िन्दगी तो हम भी हैं!
ज़िन्दगी से डरते हो?
आदमी से डरते हो!
आदमी तो तुम भी हो आदमी तो हम भी हैं
आदमी ज़बाँ1 भी है आदमी बयाँ2 भी है
उससे तुम नहीं डरते!
हर्फ़3 और मा'नी4 के रिश्ता-हा-ए-आहन5 से आदमी है वाबस्ता6
आदमी के दामन से ज़िन्दगी है वाबस्ता
उससे तुम नहीं डरते
'अन-कही' से डरते हो
जो अभी नहीं आई उस घड़ी से डरते हो
उस घड़ी की आमद7 की आगही8 से डरते हो
पहले भी तो गुज़रे हैं
दौर नारसाई9 के 'बे-रिया'10 ख़ुदाई के
फिर भी ये समझते हो हेच11 आरज़ू-मंदी12
ये शबे-ज़बाँ-बन्दी13 है रहे-ख़ुदा-वंदी14
तुम मगर ये क्या जानो
लब अगर नहीं हिलते हाथ जाग उठते हैं
हाथ जाग उठते हैं राह का निशाँ बनकर
नूर की ज़बाँ बनकर
हाथ बोल उठते हैं सुब्ह की अज़ाँ बनकर
रौशनी से डरते हो
रौशनी तो तुम भी हो रौशनी तो हम भी हैं
रौशनी से डरते हो
शहर की फ़सीलों15 पर
देव का जो साया था पाक हो गया आख़िर
रात का लिबादा16 भी
चाक17 हो गया आख़िर ख़ाक हो गया आख़िर
इज़्दिहामे-इंसाँ18 से फ़र्द19 की नवा20 आई
ज़ात21 की सदा आई
राहे-शौक़22 में जैसे राहरौ23 का ख़ूँ लपके
इक नया जुनूँ लपके
आदमी छलक उट्ठे
आदमी हँसे देखो शहर फिर बसे देखो
तुम अभी से डरते हो?
हाँ अभी तो तुम भी हो
हाँ अभी तो हम भी हैं
तुम अभी से डरते हो!
1. वाणी; 2. वक्तव्य; 3. अक्षर; 4. अर्थ; 5. लोहे की तरह मजबूत रिश्ता; 6. जुड़ा होना; 7. आगमन; 8. जानकारी होना; 9. पा न सकना; 10. आडम्बरहीन; 11. तुच्छ; 12. अभिलाषा; 13. जिस रात अभिव्यक्ति पर पहरा लग जाए; 14. ईश्वर की राह; 15. चहारदीवारी; 16. वस्त्र; 17.फट जाना; 18.इंसानों की भीड़; 19.एक व्यक्ति; 20. आवाज़; 21. अस्तित्व; 22. शौक़ की राह; 23. चलने वाला
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कौन-सी उलझन को सुलझाते हैं हम
लब1 बयाबाँ2, बोसे3 बेजाँ4
कौन-सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
जिस्म की ये कारगाहें5
जिनका हैज़म6 आप बन जाते हैं हम!
नीम-शब7 और शहरे-ख़्वाब-आलूदा8, हमसाए
कि जैसे दुज़्दे-शब-गर्दा9 कोई!
शाम से थे हसरतों के बन्दा-ए-बे-दाम10 हम
पी रहे थे जाम पर हर जाम हम
ये समझकर जुरआ-ए-पिन्हाँ11 कोई
शायद आख़िर इब्तिदा-ए-राज12 का ईमा13 बने!
मतलब-आसाँ14 हर्फ़15 बे-मा'नी16
तबस्सुम17 के हिसाबी ज़ाविए18
मत्न19 के सब हाशिये20
जिनसे ऐशे-ख़ाम21 के नक़्शे-रिया22 बनते रहे!
और आख़िर बोद23 जिस्मों में सरे-मू24 भी न था
जब दिलों के दरमियाँ हाइल25 थे संगीं26 फ़ासले
क़र्ब-ए-चश्मो-गोश27 से हम कौन-सी उलझन को सुलझाते रहे!
कौन-सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
शाम को जब अपनी ग़मगाहों28 से दुज़्दाना29 निकल आते हैं हम?
या ज़वाले-उम्र30 का देवे-सुबुक-पा31 रू-ब-रू32
या अना33 के दस्तो-पा34 को वुसअतों35 की आरज़ू
कौन-सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
1. होंठ; 2. उजाड़ वीराना; 3. चुम्बन; 4. बेजान; 5. कारख़ाना; 6. ईंधन; 7. आधी रात; 8. स्वप्न में खोया शहर; 9. रात में फिरनेवाला लुटेरा; 10. मुफ़्त का ग़ुलाम; 11. छिपा हुआ घूँट; 12. रहस्य का आरम्भ; 13. संकेत; 14. आसान; 15. अक्षर; 16. अर्थहीन; 17. मुस्कान; 18. कोण; 19. मूल लेख; 20. पृष्ठ के चारों ओर का किनारा; 21. कच्चे सुख; 22. आडम्बर के चिह्न; 23. दूर; 24. किंचित मात्र; 25. अड़चन; 26. कठोर; 27. आँख और कान का साथ; 28. दुख के घर; 29. चोरी-छिपे; 30. घटती उम्र; 31. हलके पैर वाला राक्षस; 32. सामने; 33. अहंकार; 34. हाथ और पैर; 35. फैलाव
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पहली किरन
कोई मुझको दौरे-जमानो-मकाँ1 से निकलने की सूरत बता दो
कोई ये सुझा दो कि हासिल है क्या हस्ती-ए-राएगाँ2 से
कि गैरों की तहजीब की उस्तुवारी3 की ख़ातिर
अबस4 बन रहा है हमारा लहू मोम्याई5
मैं उस क़ौम का फ़र्द6 हूँ जिसके हिस्से में मेहनत-ही-मेहनत है नाने-शबीना7 नहीं है
और उस पर भी ये क़ौम दिलशाद है शौकते-बास्ताँ8 से
और अब भी है उम्मीदे-फ़र्दा9 किसी साहिरे-बे-निशाँ10 से
मिरी जाँ शबो-रोज की इस मशक़्क़त से तंग आ गया हूँ
मैं इस खिश्त-कोबी11 से उकता गया हूँ
कहाँ हैं वो दुनिया की तज़ईन12 की आरज़ूएँ
जिन्होंने तुझे मुझसे वाबस्ता-तर13 कर दिया था
तिरी छातियों की जू-ए-शीर14 क्यूँ जहर का इक समुन्दर न बन जाए
जिसे पी के सो जाए नन्ही-सी जाँ
जो इक छिपकिली बन के चिमटी हुई है तेरे सीना-ए-मेहरबाँ15 से
जो वाक़िफ़ नहीं तेरे दर्दे-निहाँ16 से
उसे भी तो ज़िल्लत17 की पाबन्दगी18 के लिए आला-ए-कार19 बनना पड़ेगा
बहुत है कि हम अपने आबा20 की आसूदा-कोशी21 की पादाश22 में
आज बे-दस्तो-पा23 हैं
इस आइंदा24 नस्लों की जंजीरे-पा25 को तो हम तोड़ डालें
मगर ऐ मिरी तीरा26 रातों की साथी
ये शहनाइयाँ सुन रही हो
ये शायद किसी ने मसर्रत27 की पहली किरन देख पाई
नहीं इस दरीचे28 के बाहर तो झाँको
खु़दा का जनाजा़ लिये जा रहे हैं फ़रिश्ते
उसी साहिरे-बे-निशाँ का
जो मग़रिब29 का आक़ा30 था मशरिक़31 का आक़ा नहीं था
ये इंसान की बरतरी32 के नये दौर के शादियाने33 हैं सुन लो
यही है नये दौर का परतवे-अव्वलीं34 भी
उठो और हम भी ज़माने की ताज़ा विलादत35 के इस जश्न में
मिल के धूमें मचाएँ
शुआ'ओं36 के तूफ़ान में बे-महाबा37 नहाएँ
1. देश-काल का चक्र; 2. व्यर्थ जीवन; 3. मज़बूती; 4. बेकार; 5. मोम जैसा; 6. व्यक्ति; 7. रात की बासी रोटी; 8. पुरानी शान; 9. भविष्य की आशा; 10. नज़र न आनेवाले जादूगर; 11. ईंट कूटना; 12. सजावट; 13. जोड़ देना; 14. दूध की धारा; 15. मेहरबान सीना; 16. छुपा हुआ दर्द; 17. अपमान; 18. रोकथाम; 19. औज़ार; 20. पूर्वज; 21. सन्तुष्टि; 22. पैदावार; 23. जिनके हाथ-पैर नहीं—असक्षम; 24. भविष्य की; 25. पाँव की बेड़िया; 26. अँधेरी; 27. ख़ुशी; 28. खिड़की; 29. पश्चिम; 30. मालिक; 31. पूर्व; 32. विकास; 33. ब्याह शादी पर बजनेवाला बाजा; 34. आरम्भिक छाया; 35. जन्म लेना; 36. किरणें; 37. बेधड़क
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