निर्मला जैन की आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ : बचपन में वापसी

निर्मला जैन की आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ का अंश 

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रात नींद नहीं आई, कोशिश करने पर भी। मन पीछे छूट गया था। बाज़ार दरीबा, कूचा सेठ की सबसे सँकरी गली के आखिरी मकान के उसी घर-आँगन में, जिसे बहत्तर बरस पहले अलविदा कह दिया था।

तीन पत्थर-सीढ़ी चढ़कर जब चबूतरे पर पाँव रखा तो सामने की दफ़्तरनुमा बैठक में दीवार के सहारे पड़ी सेटी पर एक सज्जन अधलेटी-सी मुद्रा में स्थित थे। वे अचकचाकर उठ बैठे।

आप!’ यानीआप कौन?’ आँखों में सवाल था। कुछ दूर पीछे खड़ा बेटा भी धीरे से कदम बढ़ाकर सवाल में शामिल हो गया।

सामने अचानक प्रकटी वृद्धा के साथ सलवार-कमीज पहने एक प्रौढ़ महिला की जोड़ी के प्रति ऐसी प्रतिक्रिया सहज ही थी।

आप इजाजत दें तो हम अन्दर आ जाएँ?’

जीऽ हाँऽऽ, क्यों नहीं,’ कहते हुए उन्होंने सेटी के सामने पड़ी दो कुर्सियों की तरफ इशारा किया। आँखों का सवाल वहीं-का-वहीं था।

मैं यह मकान देखने आई थी। अस्सी बरस पहले मेरा जन्म यहीं हुआ था।मैंने अपना अनाम परिचय दिया। बैठते हुए।

आप लाला मीरीमल जी की बेटी हैं?’ उनकी विस्फारित आँखों में प्रसन्न कौंध थी, जैसे कोई अजूबा देख लिया हो! ‘पर हमने तो यह मकान नेमचन्द जी से खरीदा था।

जी, वो मेरे चाचा थे। लाला जी तो 1942 में ही गुजर गए थे।

आप अब...?’ सवाल करनेवाले की उम्र पचास-पचपन के आस-पास रही होगी।

अब तो मैं डी.एल.एफ. में रहती हूँ। कई साल दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाकर अब रिटायर हुए भी बरसों हो गए। मेरे साथ यह मेरी बेटी है। आपने यह मकान खरीदा कब?’

‘1952 में। उससे पहले हम गली के बाहर ठीक सामने वाले मकान में रहते थे।

ज़ाहिर है, उस समय वे खुद बच्चे रहे होंगे। खरीदा उनके बुजुर्गों ने होगा। बातचीत का सिरा मजबूती से हाथ में आ गया तो मैंने सिलसिला आगे बढ़ाया।

आप लोगों का बिजनेस है?’

जी! हमारे यहाँ कागज़ का काम होता है।उन्होंने मालिकाना गर्व से बेटे की तरफ़ मुखातिब होकर कहा, ‘जतिन, बहन जी को अपना कार्ड दो।

वे इस बीच प्रकृतिस्थ हो चले थे। स्वर में धीरे-धीरे पुरानी हवेली की मालिकाना हैसियत से पैदा आत्मविश्वास आता जा रहा था।

कार्ड मेरे हाथ में आ चुका था। सरसरी नज़र से देखा तो पिता और दो बेटों के अलग-अलग मोबाइल नम्बरों के अलावा एक लैंड लाइन नम्बर और ई-मेल आईडी दर्ज थे, सब अंग्रेज़ी में। फर्म का नाम भी। उनके यहाँपेपर एंड वेस्ट पेपरयानीकागज़ और रद्दीका व्यापार होता था।

दुकान तो चावड़ी बाज़ार में होगी?’ मैंने संकोच से पूछा।

वे अब सहज हो चुके थे। स्थिति पर पूरी तरह काबिज। वक़्त की लगाम उनके हाथ में थी, जिसे खींचकर उन्होंने बीसवीं सदी के छठे दशक पर टिका दिया था। सफेद धोती पर बाजू वाले सफेद बनियान की पोशाक में बाएँ पैर पर अपना दायाँ पैर चढ़ाए वे उसकी उँगलियों को बाएँ हाथ से धीरे-धीरे सहला रहे थे। अपनी दुकानों पर मसनद के सहारे बैठे यह उस समय के सम्पन्न लालाओं की ठेठ मुद्रा और आदत होती थी।

आप लोगों को रहना अच्छा लगता है यहाँ?’

सवाल जरूरी था। जिस आँगन में होश सँभालते ही संयुक्त परिवार के बच्चों की लाइन डोरी, लगातार कुदकड़े लगाती थी, उसमें शायद कई दिन से झाड़ भी नहीं लगी थी। दीवारों के किनारों की जमीन में कीच जमी थी। बीचोबीच बना संगमरमर का फव्वारा अलबत्ता मौजूद था, जस-का-तस। खासा साफ़-सुथरा शो पीस की तरह।

अजी, बहुत अच्छा,’ वे बड़े तपाक से बोले तो बोलते चले गए, ‘सबसे बड़ी बात तो जी ये कि ये जगा (जगह) पूरी तरह सेफ। कोई किसी किसम का खतरा नहीं और फिर न सर्दियों में सर्दी, न गर्मियों में गर्मी और मच्छर का तो नाम नहीं।

मैंने हामी भरी। मुझे याद था बचपन का यह मच्छर-मुक्त सदाबहार मौसम; बावजूद इसके कि गली में बीचोबीच खुली नाली बहती थी। गली के चार घरों के पाखानों से मैला इकट्ठा कर सिर पर ढोने के लिए दिन में एक बार मेहतरानी आती थी। अपनी नाक पर दुपट्टे का आच्छादन कसे जबबचके चलो, हटके चलोकी गुहार लगाते हुए उसकी सवारी गली के बीच से निकलती तो वातावरण अस्थायी रूप से कुवासित हो उठता। पर यह स्थिति बहुत दिन तक नहीं चली।

हमारे मेहमाननवाज पिता ने बड़ी जल्दी उस गली के मकानों के बीच पहली बार फ़्लश का पाखाना बनवाया। ड्योढ़ी पर चढ़ते ही, आँगन के प्रवेश-द्वार के बगल में। मेहतरानी फिर भी आती रही, एक बार साफ़-सफाई के लिए और दूसरी बार उस चाकरी के बदले कुछ रोटी-दाल बटोरने। इस काम के लिए उसे कुछ नगद दिया जाता था या नहीं, यह मुझे याद नहीं। पर आज भी कहीं जाती हूँ तो साफ़-सुथरे वॉश रूम के प्रति अतिरिक्त आग्रह का सूत्र मुझे बचपन के इसी अनुभव से जुड़ा लगता है।

मैं कौतूहल-भरी नज़र से आँगन की तरफ़ से पूरे घर का जायजा लेने की कोशिश कर रही थी। बैठक के तीन दरवाजे पहले भी आँगन में ही खुलते थे। उनमें तब भी किवाड़ लगे थे जो शायद ही कभी बन्द किए जाते हों। बाहर आँगन में पाँव रखते ही तिमंजिले घर का दीदार किया जा सकता था। उस वास्तुकला में आँगन के ऊपर छत डालने की गुंजाइश ही नहीं रहती थी। नीचे बड़ा-सा आँगन, तीन तरफ़ बैठकनुमा कमरे, चौथी तरफ़ प्रवेश की ड्योढ़ी जिसकी बगल से सीधा जीना पहली मंजिल के रिहाइशी हिस्से में जाकर खुलता था। ऊपर की मंजिल में भी लोहे के डिजाइनदार कटहरे के चारों तरफ इसी तरह कमरे बने थे।

आँगन के सामने वाला कमरा बड़ी-सी मर्दाना बैठक थी। दीवारों में फर्श से चार फीट तक रंग-बिरंगे फूल-पत्तोंवाली चौकोर टाइलों की जड़त। सामने वाली दीवार में टाइलों के ऊपर छत तक तीन अर्द्धचन्द्राकार मत्थे वाले शीशे जिनके तीनों तरफ़ बेलबूटों की रंगीन उभारदार नक्काशी। शीशों के सामने एक फुट चौड़े डिजाइनदार आले।

बड़े गर्व से उन्होंने उस कदीमी बैठक का साग्रह अन्त: दर्शन कराते हुए सूचना दी कि कमरे में लगी उन टाइलों के लिए उन्हें एक हजार रुपए प्रति टाइल के हिसाब से कीमत ऑफ़र हो चुकी है। यही नहीं, बाहर की बैठक के प्रवेश-द्वार पर मेहराब की शक्ल में जो बेलबूटों की उभरी नक्काशी है, उसे भी ज्यों-का-त्यों उखाड़ ले जाने के लिए पन्द्रह लाख की पेशकश की गई है।

मेरी अनकही जिज्ञासाओं का वे खुद--खुद धाराप्रवाह समाधान करते जा रहे थे।अजी, इन्हें खरीदने के लिए कई फ़ारिनर्स आते हैं, पर हम तो इसे पन्द्रह लाख तो क्या, करोड़ों में भी नहीं बेचनेवाले।

उनकी बातों में सच्चाई का अंश कितना होगा, नहीं कहा जा सकता, पर इतना तय था कि एक शताब्दी पहले की उस वास्तुकला का अब पुरातात्त्विक महत्त्व हो गया था। वैसे ही, जैसे मन में बसी यादों का।

समय में वापसी अजीबो-गरीब सूत्रों के सहारे हो रही थी। हवेली के वर्तमान निवासी अब भी उसी पारिवारिक बनत में बँधे थे, जिसमें हमने होश सँभाला था यानी तीन-चार भाइयों का संयुक्त परिवार, साझा रसोई। नीचे ड्योढ़ी के सामने वाले बड़े से कमरे में फर्शी दरी पर बैठी एक प्रौढ़ महिला हाथ की मशीन पर खटाखट कुछ सिलाई कर रही थीं। वैसे ही जैसे पचहत्तर बरस पहले हमारी माँ किया करती थीं। साड़ी पहनने का वही ढंग। सिर से ढलककर कन्धे पर टिका पल्ला। साड़ी न बुर्राक धुली, न मैली-कुचैली, सिर्फ़ अस्त-व्यस्त, जिससे वे रह-रहकर सिर ढकने की नाकाम कोशिश कर रही थीं। कान उनके बैठक में होनेवाली बातचीत में लगे थे। वे बीच-बीच में टोककर तथ्यों को सही करती जा रही थीं। जाहिर है, वे घर की बड़ी थीं।

मकान-मालिक अब मेजबान की भूमिका में आश्वस्त हो चुके थे। उन्हें अपनी बातों का महत्त्व समझ में आने लगा था। उन्होंने बड़े गर्व से सूचना दी, ‘हमारे घर में तो जी कमेटी का नल तक नहीं है, और घर के बच्चे तक सूरज डूबने के बाद खाना नहीं खाते।

यह सूचना आज के समय में हक्का-बक्का कर देने के लिए काफ़ी थी। अपनी याद को सही करते हुए मैंने आँगन की दाहिनी दीवार की तरफ इशारा किया, ‘नल तो घर में था? यहीं, आँगन में उस तरफ़?’

वो हमने कटवा दिया।

तो आप पानी कहाँ से पीते हैं?’

कुएँ से। वो उस तरफ आँगन के कोने में कुआँ है न!’ उन्होंने मेरी याददाश्त को दुरुस्त किया।

आनन-फानन में मैं दूसरे महायुद्ध की गिरफ़्त में थी। युद्ध अपने चरम पर था। आए दिन तरह-तरह की खबरें। अफ़वाहें- रेडियो, अखबार और मौखिक माध्यमों से प्रसारित होती रहतीं।

एक दौर में अचानक खबर फैली कि दिल्ली पर कभी भी आकाश-मार्ग से हमला हो सकता है। उस स्थिति में पहली गाज बिजली-पानी के स्रोतों पर गिरेगी। खबर फैलते ही घर आतंक के साये में। ऐसी आपात स्थितियों में फ़ैसले और हुकुम दोनोंलाला जीयानी हमारे पिताजी के चलते थे। रोशनी के लिए लालटेन, तेल, बाती का प्रबन्ध और पानी के लिए आँगन के एक कोने में युद्ध स्तर पर कुएँ की खुदाई शुरू हो गई। देखते-ही-देखते कुआँ तैयारपानी, मुँडेर, खींचने की चरखी और जरूरत पड़ने पर कुएँ में उतरने के लिए संगमरमर की लकदक सीढ़ियाँ।

उस कुएँ में अब तक पानी है? पानी का स्तर गिरा नहीं?’ मैंने हैरत से पूछा।बिल्कुल नहीं जी, वैसा ही मीठा साफ़-सुथरा। हमारा खाना-पीना, नहाना-धोना-सब उसी कुएँ के पानी से होता है।

पूरे परिवार का?’

जिस शहर में यमुना का चौड़ा स्वच्छ पाट मेरे देखते-देखते सूखकर प्रदूषित गंदी नाली के रूप में बच रहा हो, उसमें यह खबर चौंकानेवाली थी। यकीन न करने का सवाल नहीं था। मेरे शंका करते ही वे पीने के लिए कुएँ का पानी पेश कर देते, जिसे न पीने का विकल्प मेरे पास नहीं बचता।

मेरे मन के असमंजस को ताड़कर उन्होंने खुद स्थिति स्पष्ट की, ‘असल में ऐसा है बहन जी, हमारे यहाँ आए दिन मुनि महाराज आहार के लिए पधारते हैं, और वे तो नल के पानी से बनी रसोई ग्रहण करते नहीं, इसलिए हमने नल कटवाकर झगड़ा ही खत्म कर दिया।

उनके इस खुलासे से यह भी साफ़ हो गया कि दिल्ली शहर के पुराने गली-मोहल्लों में, ‘चतुर्मासमें मुनियों को आहार कराने के लिए चौके लगाने की प्रथा जैन समाज में आज भी कायम हैपूरे विधि-विधान और निष्ठा से।

बातचीत के दौरान उन्होंने गर्व से यह सूचना भी दी कि गली के बाहर के बड़े जैन मन्दिर के प्रबन्धक वे ही हैं। मुझे ताज्जुब नहीं हुआ। अधिकांश धर्म-स्थलों का प्रबन्ध व्यापारियों के हाथों में रहता आया है, जिसके माध्यम से पारलौकिक से बढ़कर लौकिक हित-साधना होती है। वास्तव में अधिकांश धर्म-स्थलों का प्रबन्धन हथियाने के लिए किए जानेवाले दाँव-पेंच की राजनीति चुनाव की राजनीति से कुछ ही कम जटिल होती है। बहरहाल, वह सामाजिक आचरण का अलग विषय है।

बातचीत के सिलसिले में बाधा दी, एक लगभग तीस-पैंतीस बरस के आगंतुक ने। गली के मोड़ पर वह जैसे अकस्मात् प्रकट हुआ, उतनी ही फुर्ती से लम्बे डग भरता हुआ बैठक में दाखिल हो गया।

मेल-जोल की वही बरसों पुरानी शैली। न कोई भूमिका, न संकोच।कहिए जी, क्या हाल है?’ प्रश्न उधर और प्रश्नवाचक की नज़र मेरी तरफ़।

सुननेवाले ने बिना सवाल के मेरी जन्मपत्री बाँच दी।

ये इनके पिताजी का मकान है।

आँखों में आश्चर्य का ज्वार और वाणी में अविश्वास, ‘आप लाला मीरीमल की बेटी हैं?’

वे जवाब जानते थे और मैं अभिभूत थी इस एहसास से किअब तक बजता है इन गली-मोहल्लों में मेरे पिता का नाम?’ जिस परिवेश से वे तिहत्तर बरस पहले और दुनिया से उसके एक साल के बाद ही रुख़्सत हो गए थे, उसमें अभी भी उनका वजूद कायम है? कहा नहीं जा सकता कि इसकी वजह शहरी ज़िन्दगी की सांस्कृतिक बनत है या उनके व्यक्तित्व की बुलन्दी, शायद थोड़ा-थोड़ा दोनों।

 

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