‘उपलक्ष्य 75’ : अब्दुल बिस्मिल्लाह की रचनात्मक यात्रा का उत्सव

राजकमल प्रकाशन की विशेष कार्यक्रम शृंखला है—‘उपलक्ष्य 75’

• जीवन के 75 वर्ष पूरे कर रहे लेखकों को समर्पित है यह आयोजन 

पहली कड़ी में 19 अगस्त को अब्दुल बिस्मिल्लाह पर आयोजित होगा कार्यक्रम

18 अगस्त, 2025 (सोमवार)

नई दिल्ली। राजकमल प्रकाशन अब्दुल बिस्मिल्लाह की रचनात्मक यात्रा और साहित्यिक योगदान को समर्पित एक विशेष कार्यक्रम ‘उपलक्ष्य 75’ का आयोजन कर रहा है। यह कार्यक्रम 19 अगस्त की शाम छह बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्स, नई दिल्ली में आयोजित होगा। इस अवसर पर उनके लेखन-संसार पर चर्चा, पाठ और स्मृति-संवाद आयोजित किए जाएंगे। साथ ही, राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनके संस्मरणों की किताब ‘स्मृतियों की बस्ती’ का लोकार्पण भी होगा।

कार्यक्रम में आलोचक व ‘आलोचना’ पत्रिका के संपादक संजीव कुमार तथा द वायर उर्दू के संपादक फ़ैयाज़ अहमद वजीह अब्दुल बिस्मिल्लाह से बातचीत करेंगे। वहीं राजकमल उर्दू के संपादक तसनीफ़ हैदर और रंगकर्मी-अध्यापक नेहा राय उनकी कृतियों के चयनित अंशों का पाठ प्रस्तुत करेंगे। यह जानकारी राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने सोमवार को दी। 

हमारे साहित्य-समाज की विशिष्ट उपस्थिति हैं—अब्दुल बिस्मिल्लाह

अशोक महेश्वरी ने कहा, हमारे साहित्य-समाज में अब्दुल बिस्मिल्लाह की उपस्थिति विशिष्ट है। वे अपनी अद्वितीय कथाभूमि और लोकजीवन की गहरी समझ के लिए जाने जाते हैं। उनको पढ़ना अपने ही समाज के अनदेखे हिस्सों की नब्ज़ को महसूस करना है। उनकी कथाभूमि गाँवों-कस्बों से लेकर शहरों तक फैली है, लेकिन केंद्र में हमेशा इंसानी चेतना रही है, जो सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ताओं से टकराती है और परिवर्तन की सम्भावनाओं की ओर इशारा करती है। अपने इस अप्रतिम कथाकार के 75वें वर्ष में प्रवेश करने पर हम उनकी रचनात्मक यात्रा का उत्सव मना रहे हैं।

उपलक्ष्य 75 : राजकमल प्रकाशन की विशेष कार्यक्रम शृंखला

अशोक महेश्वरी ने कहा, यह आयोजन राजकमल प्रकाशन की विशेष कार्यक्रम शृंखला ‘उपलक्ष्य 75’ की पहली कड़ी है। यह उन प्रतिष्ठित लेखकों को समर्पित है जो इस वर्ष अपने जीवन के 75 वर्ष पूरे कर रहे हैं। ऐसे अनेक लेखक जिनके साहित्यिक अवदान से हिन्दी समाज भलीभाँति परिचित है, उनकी रचनात्मक यात्रा को विशेष आयोजनों के माध्यम से रेखांकित किया जाएगा। इस शृंखला के अंतर्गत आने वाले समय में और लेखकों पर कार्यक्रम आयोजित करेंगे। 

अब्दुल बिस्मिल्लाह : एक परिचय

अब्दुल बिस्मिल्लाह का जन्म 5 जुलाई 1949 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद ज़िले के बलापुर गाँव में हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. और डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। 1993 से 1995 तक वे पोलैंड की वार्सा यूनिवर्सिटी में और 2003 से 2005 तक भारतीय दूतावास, मॉस्को के जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे। उन्होंने सोवियत संघ, ट्यूनीशिया, हंगरी, जर्मनी, प्राग, पेरिस, म्यूनिख और जोहांसबर्ग जैसे देशों में आयोजित कई अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक आयोजनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

उनकी साहित्यिक यात्रा अत्यंत समृद्ध और विविध रही है। उनके उपन्यासों में ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ ‘कुठाँव’, ‘अपवित्र आख्यान’, ‘मुखड़ा क्या देखे’, ‘ज़हरबाद’, ‘दंतकथा’ और ‘रावी लिखता है’ उल्लेखनीय है। ‘समर शेष है’ उनका आत्मकथात्मकक उपन्यास है। उनके कहानी-संग्रहों में ‘अतिथि देवो भव’, ‘रैन बसेरा’, ‘रफ़ रफ़ मेल’, ‘शादी का जोकर’ और ‘ताकि सनद रहे’ शामिल हैं। ‘वली मुहम्मद और करीमन बी की कविताएँ’ और ‘छोटे बुतों का बयान’ उनके कविता-संग्रह और ‘दो पैसे की जन्नत’ उनका नाटक है। उन्होंने आलोचना में ‘अल्पविराम’, ‘कजरी’ तथा ‘विमर्श के आयाम’ जैसी पुस्तकें लिखीं। इसके अलावा उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की डायरी ‘दस्तंबू’ का अनुवाद भी किया है। उनके संस्मरणों की किताब ‘स्मृतियों की बस्ती’ नवीनतम पुस्तक हैं। 

उनकी कई कृतियाँ भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुईं। ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ का उर्दू और अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ, ‘रावी लिखता है’ पंजाबी में, और ‘रफ़ रफ़ मेल’ की बारह कहानियाँ फ़्रेंच में प्रकाशित हुईं। उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष और प्रोफ़ेसर रहे और वहीं से सेवानिवृत्त हुए।