इच्छाओं के जीवाश्म : दृश्य के उस पार की कविताएँ

उस्मान ख़ान के कविता-संग्रह ‘इच्छाओं के जीवाश्म’ की समीक्षा

समीक्षक : पवन करण

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सिगरेट जलती है बुझ जाती है, अलाव बुझ जाते हैं, ख़त्म करने के लिए बस कहानी रह जाती है।

मन उदास है। भाषा उदास है। कविता उदास है। उसे किसी भी कोने से, किसी भी कोने तक नाप लो, कविता की यह उदासी धरती के इस छोर से उस छोर तक छितरी है। आसमान से धरती तक उदासी की एक डोर है। दोनों के बीच हवा में हिलती हुई। कविता इतनी उदास क्यों है? भाषा इतनी हताश क्यों है? खुद पर खुद का इतना अविश्वास क्यों हैं? उस्मान ख़ान के कविता-संग्रह ‘इच्छाओं के जीवाश्म’ में अपने हाथों निराशाओं के इन जालों की निर्मिति-निरंतरता को बूझने का विफल उपक्रम किया जा सकता है। प्रारंभ से विफलता के बीच का तय किये जाने वाला कंटीला रास्ता ही इस प्रयास का हासिल हो सकता है। 

क्या अँधेरे को काटने की कोशिश, अँधेरे को समझने की तुलना में, एक विफल कोशिश है? मगर शोध और उससे हासिल इस कथन के रास्ते में आकर खड़ा हो सकता है। अनुभव का अपना मूल्य है। कविता बस वहीं नहीं बसती जहाँ सन्तोष और उल्लेख की शक्ल में सब प्राप्त है। कविता वहाँ भी थककर सुस्ताती और उठकर अँगड़ाई लेती है, जहाँ प्राप्त होते हुए भी कुछ प्राप्त नहीं। जहाँ पर सब पर कुछ का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कब्जा है। जहाँ एक चाबुक है जिसकी नज़र आपकी पीठ पर है। जहाँ आप खुले बंदी हैं। जैसे इस दौर का भारतीय नागरिक समाज।

भाषा और कविता की उदासी सीधे नागरिक समाज से जुड़ती है। मन में छटपटाहट है तो दिल की धड़कनें तेज़। ‘इच्छाओं के जीवाश्म’ संग्रह में संकलित उस्मान ख़ान की कविताओं के चेहरे पर अधिकतम बेचैनी और न्यूनतम राहत की गहराती लकीरों को पहचाना जा सकता हैं। तब भाषा और कविता की निराशा के पीछे कारक तत्व कौन-से हैं। निसंदेह राजनैतिक-समकाल इसकी पृष्ठभूमि में सक्रिय है। एक बड़ी नागरिक-संख्या की शक्ल में एक समाज का संदेहास्पद होना इसकी निरंतरता और वृद्धि में कारक तत्व बना है। 

मगर भाषा के उदास और कविता के निराश होने की नौबत तब आती है जब मनुष्य से उसका विश्वास उठने लगता है। मनुष्य मन का आलस उसे पराजित करने लगता है। जब विवेक कुतर्क और मक्कारी देने लगता है। आखिर भाषा ने एक समाज के ठहर जाने अथवा पीछे चल देने की कल्पना तो शायद कभी नहीं की होगी?

प्रगतिशील कल की कल्पनाओं से भरीं कविताओं ने भी नहीं सोचा होगा कि वह एक दिन शासक के सामने जुड़े हाथों में और उसकी प्रशंसा को उत्सुक होठों पर होगी।

कवियो, बेचैनी से बचने का इतना पस्त और हारा हुआ उपाय? उस्मान ख़ान की कविता सूनीं-पथरीली गलियों के सन्नाटों में विचरती कविता की तरह हमें मिलती है। वह हमसे तब ही ‘हम-मन’ होती है, जब हम उसे, उस जैसे लगते हैं। जैसे जब दो निरंतर हारते जाते मनुष्य एक-दूसरे का हाथ एक-दूसरे से अपनी कहने के लिए थाम लेते हैं। कविता में दिल की दास्तान आसानी से समझ आती है मगर पीड़ा से पैदा टीस को महसूस करने में कठिनाई का सामना करना होता है। आखिर दुखों को कौन दिल में स्थान देना चाहता है। मगर पीड़ा होती है तो होती है, उसके होने को नकारा नहीं जा सकता। उसकी आँख में अपना चेहरा देखा जा सकता है। 

उस्मान ख़ान की कविताओं में बहुत कुछ अदृश्य है। दृश्य के उस पार है। उसके होने की कल्पना उनकी कविता पढ़ते ही होने लगती है। अदृश्य, अपरिभाषित मगर पकड़ में आता। महसूस होता। और यह महसूस होना ही उनकी कविता में बहाव की तरह है। जो एक तंज भरे स्थायी तनाव की तरह संग्रह में प्रारंभ से अंत तक बना रहता है। मगर ऐसा नहीं कि उनकी कविता में उम्मीद की किरण नहीं भकभकाती। तनाव और खीज से उत्पन्न ईंधन उसे जलाए रखता है। कवि की कविता उसी की कम-ज्यादा होती रोशनी में संभलकर अपने तेज कदम आगे रखती है।

उस्मान खान की कविताओं में कवि-कथन की ख़ासियत अधिकतर अबूझ है। उनकी कविता के द्वार तब खुलते हैं जब हम खुद के भटकाव को नियंत्रित कर अपनी समझ की सामर्थ्य के कपाट खोलते हैं। यहीं कला और प्रतीकों के नव-समृद्ध स्तर पर कवि-सामर्थ्य वास करता है। उस्मान ख़ान की कविता में भी पूरी दुनिया है मगर उसे देखने, समझने और उससे प्रेम और उसके प्रति अपना क्षोभ प्रकट करने की, कुछ पूर्ववर्ती कवियों की विशेषता का अनुकरण करती, उसमें कुछ अपना शामिल करती, उसे समृद्ध करती, उनकी दृष्टि अपनी है।

किसके पास छोड़ आया हूँ अपना वक़्त

रेलिंग छूता हूँ एक बन रही बिल्डिंग की

लोहे की बकरी सीमेंट की घास खाती है

अपने ही ज़िन्दा होने की झूठी खबर हूँ

किसी अफ़सर की टकसाल आँखों में 

या किसी मंत्री की सम्भोग-इच्छाओं में रहता है क्या देश

ये किस धातु के इंसान हैं ना रुकते हैं न थकते हैं

कब-कब टूटे निज़ाम जुल्म के? इन्सान सामान कैसे बना?

दिन एक लंबाई है मेरे लिए मुझे शाम को सूझते हैं काम

मैं ही कच्चा माल था और मशीन

मैं ही खुद को बनाता और बेचता था

मृत्यु! एक शहर में भटकते हम दोनों 

एक दिन टकराएँगे ही

तुम घोड़ों से आये और तुमने सिर्फ़ दो स्वाद 

हमारे लिए शाश्वत बना दिए—

एक कड़वा और एक कसैला

तुम घोड़ों से आए और तुमने सिर्फ़ दो चीज़ें हमें दीं

नाल और लगाम

सिगरेट जलती है बुझ जाती है, अलाव बुझ जाते हैं

ख़त्म करने के लिए सिर्फ़ कहानी रह जाती है

मैं सुलगाता हूँ रात का बेचैन अँधेरा 

और फूकता हूँ सुब्ह तक

एक चीख़ से जिंदगी शुरु होती है

इस सघन सन्नाटे में फाँसी के फंदे की तरह

सब कुछ की समाप्ति के बाद देर तक झूलते रहना चाहता हूँ

दीवारें-जिनमें से तुम कारतूस निकालते हो

सड़कें-जहाँ तुम खून सना रिबन लिए भटकते हो

हमें बाज़ारों की नहीं, साथियों की जरूरत है

मैं तुम्हें अपनी शक्ल देना चाहता था, तुम मुझे अपनी

तूफ़ान में मिले हम, तूफ़ान में बिछड़े

मैं तुम्हारे सामने इतना बच्चा हो गया कि ख़ुद डर गया 

सिर पर तुम्हारी हँसी जुनून बनकर खड़ी है

दुनिया अकेले ना जलाई जा सकती है 

ना बसाई जा सकती है

नेताओं के जुड़े हाथ और मुस्कराहट 

नहीं माँगते सिर्फ़ वोट 

वे हत्या और बलात्कार की भी मांग करते है

इस लहूलुहान सड़क पर अपनी आख़िरी चीख़ से

तुम तोड़ना चाहते हो आसमान की उदासीनता

कितनी हसीन है तुम्हारी इच्छा, तुम कवि हो क्या!

जिंदगी के बेलिबास हुस्न से

ख़ुद की आज़ादी के सुख से

डरो मत, न मौत से, ना भूख से

हम सब एक बार खुलकर हँसने के लिए 

किसी के फिसलने का इंतजार कर रहे थे।

 

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