कन्यादान • द्विरागमन : मैथिल ब्राह्मणों की एथनोग्राफ़ी

हरिमोहन झा के मैथिली भाषा के उपन्यासों ‘कन्यादान’ और ‘द्विरागमन’ पर अमितेश कुमार की टिप्पणी 

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मैथिली भाषा का क्लासिक उपन्यास पढ़ा ‘कन्यादान’ और साथ में ‘द्विरागमन’। 

हरिमोहन झा लिखित इन दोनों ही उपन्यासों में मैथिल ब्राह्मणों की एथनोग्राफ़ी है। बीसवीं सदी के जागरण की चेतना की समाज में कैसी प्रतिक्रिया हो रही है? आधुनिक युवा इसको कैसे अपना रहा है और परम्परागत समाज इस आधुनिकता को किस निगाह से देख रहा है? इसका एक दिलचस्प लेखा-जोखा कथा रस के साथ तैयार किया गया है।

किस्सागोई में वाचक की विदग्धता—जिसमें व्यंग्य की ध्वनि है—पर मन रीझ जाता है। उपन्यास की भाषा में दृश्य उपस्थित करने का कौशल गजब है। ट्रेन के जरिए सकरी से वाराणसी की यात्रा, विवाह की वेदी के कर्मकाण्ड, मिथिला के भोज के विवरण आदि में इसे महसूस किया जा सकता है।

जड़ मैथिल समाज की आलोचना ‘कन्यादान’ में अंतर्निहित है तो यह लगता है कि क्या लेखक औपनिवेशिक ज्ञान के प्रभाव में एहसास कमतरी का शिकार हो गया है? लेकिन उपन्यास के दूसरे खंड ‘द्विरागमन’ में महात्मा जी के वचन के प्रभाव में चंडीदत्त को निरुत्तर होकर दिखाने से यह लगता है कि आलोचना के तेवर को थोड़ा पृष्ठभूमि में रख दिया गया है। ‘कन्यादान’ का साहस ‘द्विरागमन’ का समझौता बन जाता है।

यह भी कहना चाहिए कि आलोचना के दायरे में आधुनिकता को भी रखा गया है, लेखक उससे मुग्ध नहीं बल्कि सचेत है। आधुनिकता के प्रभाव में परिवर्तन हो रहे हैं और उसका एक समाज की चेतना पर असर हो रहा है लेकिन उसी समय इसी समाज का एक व्यापक वर्ग आधुनिकता को अजनबियत और संदेह की नज़र से देख रहा है। क्या ये हरिमोहन झा का कौशल है जिसने दिखाया है कि स्त्री को परम्परा और आधुनिकता दोनों ही के उपेक्षित छोर पर रखा गया है। दोनों ही स्त्री को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। स्त्री का कौन-सा मन मुक्त है, आधुनिक या पारम्परिक? यह सवाल उपन्यासों में मौजूद है जिसकी पड़ताल पाठक को करनी है।

यह सवाल मन में आता है कि ‘द्विरागमन’ में रेवतीरमन की पत्नी जैसी मजबूत किरदार की उपेक्षित उपस्थिति क्यों है?

बहरहाल, 1933 से 1943 तक के समाज की यथार्थ कथा मैथिली में कहना, वह भी आलोचनात्मक मुद्रा में, सहज नहीं रहा होगा। इस समाज की समस्या अभी वही है, जड़ता वही है लेकिन आधुनिकता और अब प्रौद्योगिकी अपने दुष्प्रभाव के साथ समाज को भीतर से बदल चुकी है, लेकिन आत्मावलोकन की वैसी निगाह क्या अब है जैसी हरिमोहन झा की थी…?

लेखक ने भले कह दिया है कि पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं लेकिन एक-एक पात्र अपनी व्यक्तिगत विशेषता के साथ समाज में मौजूद हैं। चरित्र-चित्रण की ऐसी सूक्ष्मता पाना उपलब्धि है। घटनाएँ भी देखी और जानी पहचानी है।

ये दोनों ही उपन्यास मूल मैथिली भाषा में राजकमल प्रकाशन से एक ही जिल्द में प्रकाशित है।

 

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